लोकसभा चुनाव के लिए बिछ गई बिसात, सरकारी योजनाओं के लाभुकों को गोलबंद करने में लगी भाजपा

jharkhandवैसे 2019 लोकसभा चुनाव में अभी कुछ माह बाकी हैं, लेकिन सियासी नारे सुनाई पड़ने लगे हैं और चुनावी सभाएं भी होने लगी हैं. झारखंड में चुनावी बयान के साथ-साथ राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरु हो गया है. झारखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव भी होने हैं, सो अभी से सियासत की बिसात बिछने लगी है. सभी दल आदिवासी एवं महतो मतदाताओं को रिझाने में लग गए हैं. मुख्यमंत्री रघुवर दास जहां दोनों चुनावों की कमान खुद संभाल भाजपा के मुख्य रणनीतिकार बन गये हैं, वहीं विपक्षी दलों ने भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुकाबले के लिए महागठबंधन बना लिए हैं. विपक्षी दलों के बढ़ते जनाधार को देख मुख्यमंत्री दास की नींद गायब हो गयी है. इधर, विपक्षी दलों की एकजुटता में कुछ दरार भी पड़ती नज़र आ रही है. यह दरार हाल ही में पूर्व मंत्री एनोस एक्का को सजा मिलने के बाद रिक्त हुई कोलेबिरा विधानसभा सीट पर उम्मीदवारी को लेकर है.

दरअसल एनोस एक्का को सजा मिलने के साथ ही झारखंड मुक्ति ने अपनी दावेदारी ठोक दी है. वहीं कांग्रेस ने भी इस सीट को लेकर दावेदारी जताई है. इस सीट को लेकर महागठबंधन में पेंच फंस रहे हैं और कभी भी महागठबंधन में दरार पड़ सकती है. झामुमो नेताओं का अपना ही तर्क है. पार्टी के महासचिव सुप्रीयो भट्टाचार्य का मानना है कि पार्टी ने जिन कार्यकर्ताओं से फीडबैक लिया है, उसके मुताबिक़ झामुमो की स्थिति काफी मजबूत है, ऐसे में झामुमो का स्वाभाविक दावा बनता है. पार्टी उपचुनाव की तैयारी में है, वैसे महागठबंधन में सभी बातें तय होने पर ही झामुमो अपने उम्मीदवारों के नाम की घोषणा करेगा. चुनाव के मद्देनज़र प्रभारी भी नियुक्त कर दिए हैं. जमीनी स्तर पर कोलेबिरा में भी तैयारी है. महागठबंधन में शामिल दलों के राग अलग-अलग हैं. अगर पार्टियों ने आपस में समझौता नहीं किया तो इसका असर आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर पड़ना तय है.

वैसे, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मोदी फैक्टर को शिकस्त देने के लिए सभी विपक्षी पार्टियों को एकजुट रहने की ज़रूरत है. 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और झामुमो के बीच तालमेल नहीं होने का परिणाम दोनों पार्टियां देख चुकी हैं. इस चुनाव में भाजपा ने जोरदार जीत दर्ज की थी. चौदह लोकसभा सीटों में से 12 पर भाजपा ने अपना केसरिया झंडा लहराया जबकि दो सीटों पर झामुमों ने अपनी जीत दर्ज कराई. ठीक इसी तरह के परिणाम विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिले थे. झारखंड गठन के बाद भाजपा पहली बार बहुमत में आयी. अब विपक्षी पार्टियां इसे दोहराना नहीं चाह रही हैं और यही कारण है कि सभी पार्टियां एकजुट होना चाह रही है.

अगले साल होने वाले चुनाव में सभी दलों की नज़रें आदिवासी एवं महतो वोटों की तरफ हैं. लगभग 70 प्रतिशत मतदाता इसी जाति से आते हैं. मुस्लिम का वोट महागठबंधन को ही जाना तय है, वैसे तीन तलाक मुद्दे को लेकर भाजपा भी मुस्लिम महिलाओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए जीजान से जुट गई है. भाजपा इस बार हर हाल में चुनावी किला फतह करने में लगी हुई है. चुनावी नैया पार कराने को लेकर कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है. पार्टी सरकारी योजना का लाभ लेने वालों की भी सूची तैयार कर रही है. भाजपा नेताओं का मानना है कि केन्द्र एवं राज्य सरकार की ओर से चलाई जा रही जनकल्याणकारी योजनाओं के लाभुकों की संख्या झारखंड में एक करोड़ से अधिक है, इसलिए पार्टी इन एक करोड़ लाभुकों को वोट बैंक में तब्दील करने को लेकर एक ठोस रणनीति पर जुट गई है. लाभुकों के परिजनों से भी संपर्क कर उन्हें भी पार्टी का पक्षधर बनाया जा सकता है.

भाजपा भूमि अधिग्रहण बिल एवं सीएनटी एसपीटी संशोधन बिल को लेकर ज्यादा चिंतित है. भाजपा का मानना है कि इस बिल को लेकर विपक्षी दलों ने एकजुट होकर इसे जनविरोधी करार देने की कोशिश की है. ऐसे में इस बिल के सम्बन्ध में मतदाताओं को यह समझाने की ज़रुरत है कि यह बिल जनहित में ही लाया जा रहा था और इस बिल के आने से राज्य का समुचित विकास होता. पार्टी ने इस कार्य को अंजाम तक पहुंचाने के लिए भारतीय जनता युवा मोर्चा को एक बूथ, दस यूथ का टास्क दिया है. इस तरह पार्टी ने अपनी युवा इकाई को अहम जिम्मेदारी सौंपी है. झाजयुमो के राष्ट्रीय मंत्री सह झारखंड प्रभारी गौरव तिवारी ने युवाओं को यह कहा कि एक बूथ पर दस ऐसे युवा कार्यकर्ताओं की टीम बनाए, जिनके पास स्मार्टफोन एवं मोटर साईकिल हो, वे पंचायत स्तर पर जाकर सरकार की नीतियों एवं योजनाओं के बारे में जानकारी दें.

जिन पंचायतों में भाजपा समर्थक मुखिया एवं जनप्रतिनिधि नहीं हैं, उन क्षेत्रों में वर्तमान प्रतिनिधि के खिलाफ मोर्चाबंदी और आंदोलन की योजना तैयार करने की बात कही गयी है. पार्टी ने लाखों सदस्यों को जोड़ने, सोशल मीडिया में वाट्‌सएप ग्रुप बनाने, नमो ऐप से जोड़ने, युवा अधिवेशन आयोजित करने सहित अन्य टास्क सौंपे हैं. पार्टी ने झारखंड में 51 प्रतिशत वोट बैंक के लिए गांवों को चुनाव के पहले आदर्श गांव बनाने का फैसला लिया है. पार्टी ने नरेन्द्र मोदी एवं रघुवर दास के नेतृत्व में चल रही विकास योजनाओं के दम पर नाराज़ आदिवासियों को अपने पक्ष में करने में पूरी ताकत झोंक दी है. इसके लिए आदिवासियों के भगवान के रूप में पार्टी अपने आप को पेश कर रही है.

आदिवासी शहीदों के गांव को आदर्श ग्राम बनाने के लिए आदिवासी ग्राम विकास समिति बनाकर इन्हें योजना बनाने और पूरा करने की जिम्मेदारी दे रहे हैं. वैसे भाजपा के संगठन मंत्री धर्मपाल का भी मानना है कि पार्टी की रणनीति 51 प्रतिशत वोट हासिल करने की है. इसके लिए सांसदों का रिपोर्ट कार्ड भी बनाया जा रहा है. पार्टी अपने संगठन को भी मजबूत करने में लगी हुई है. असंतुष्ट नेताओं के सवाल पर उन्होंने कहा कि बड़े परिवार में मतभेद तो होते ही रहते हैं. वैसे पार्टी के सभी नेताओं को टास्क दिया गया है और सभी की यह जिम्मेदारी बनती है कि लोकसभा की सभी 14 सीटों पर परचम लहराने के लिए भेदभाव भूलकर एकजुट होकर काम करें.

अगर ग्राउंड स्तर पर देखा जाए तो भाजपा के वर्तमान 12 में से 8 सांसदों की स्थिति अपने-अपने क्षेत्र में कमज़ोर दिखायी पड़ रही है. पिछले चुनाव में नरेन्द्र मोदी फैक्टर की वजह से चुनाव तो जीत गए पर क्षेत्र की जनता के बीच विश्वास कायम रखने में पूरी तरह से विफल रहे. वर्तमान सांसदों का टिकट कटने की भनक मिलते ही भाजपा सांसदों ने हाईकमान से मिलकर अपना दुखड़ा रोया. भाजपा सांसदों ने संगठन महामंत्री रामलाल और सह संगठन महामंत्री सौदान से सामूहिक मुलाकात की. इस बैठक के दौरान कई सांसदों ने यह खुलकर कहा कि सरकार के साथ सांसदों की कोई बैठक नहीं होती.

रघुवर सरकार हमारी सुनती ही नहीं है, पूरी तरह से संवादहीन है, इसे दूर होना चाहिए. पार्टी सांसदों ने अपना दुखड़ा सुनाते हुए यह कहा कि राष्ट्रीय महामंत्री राम माधव और अरुण सिंह के झारखंड दौरे के दौरान इन समस्याओं को रखा गया था, लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हुआ. जब सांसद की बातें सरकार नहीं सुन रही है और योजनाएं नहीं ली जा रही हैं तो वे जनता के बीच किस मुंह से जाएं. उन्होंने जनाधार कम होने की वजह रघुवर सरकार को ही बताया. अब यह देखना है कि भाजपा सरकारी योजनाओं के बल पर अपनी चुनावी नैय्या किस तरह पार लगाती है, क्योंकि हर सरकार जनता के लिए कल्याणकारी योजनाएं लाती है, पर भाजपा इन योजनाओं के लाभुकों को अपना समर्थक मान रही है और उसे अपने पक्ष में करने में लगी हुई है.

लाभुकों को अपने पक्ष में करने की भाजपा की रणनीति पर विपक्षी दलों ने जमकर भाजपा पर हमला किया है. झामुमो नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भाजपा पर आरोप लगाया कि अपने स्वार्थ के लिए भाजपा काम कर रही है. योजनाओं का लाभ तो इससे पूर्व की सरकारों ने भी तो जनता को दिया, पर कभी भी इसे भुनाने का प्रयास नहीं किया, जबकि भाजपा जनता को अपने पक्ष करने के लिए लाभुकों का इस्तेमाल कर रही है, वैसे भाजपा इसमें कभी सफल नहीं हो सकती.

इधर, महागठबंधन ने भी भाजपा की घेराबंदी करनी शुरु कर दी है. भाजपा को हराने के लिए घोर विरोधी झामुमो एवं झाविमो भी एक साथ मंच पर आ गए हैं. कांग्रेस, झामुमो, झाविमो, राजद और वामदलों ने मिलकर भाजपा को हराने के लिए गठबंधन बनाया है. भाजपा को शिकस्त देने के लिए विपक्ष हर तरह के समझौते कर रहा है. झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी का झामुमो से छत्तीस का आंकड़ा है, लेकिन उन्होंने भी मौके की नजाकत भांपते हुए झामुमो से हाथ मिला लिया है.

वैसे, इस बार महागठबंधन मज़बूत स्थिति में दिखायी पड़ रहा है. रघुवर सरकार द्वारा लाए गए भूमि संबंधी कानून एवं धर्मान्तरण तथा इसाई के मुद्दों को विपक्ष द्वारा पूरी ताकत के साथ उठाया जा रहा है. इसका लाभ विपक्षी दलों को मिलता दिख रहा है और भाजपा को इस चुनाव में काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है. अब देखना है कि भाजपा सरकारी योजना के लाभुकों को अपने पक्ष में करने में किस हद तक सफल हो पाती है.  फिलहाल तो भाजपा नेता लाभुकों पर टकटकी लगाए बैठे हैं. अब ये लाभुक वोट में परिवर्तित होते हैं या नहीं, यह तो चुनावी नतीजों के बाद ही साफ़ होगा.

सांसदों का रिपोर्ट कार्ड बना रही है भाजपा, जीतने की गारंटी पर टिकट

प्रदेश भाजपा अपने वर्तमान सांसदों का रिपोर्ट कार्ड बना रही हैं. सात बिंदुओं पर उनका एसेसमेंट हो रहा है. इसमें सांसदों की उम्र, उनका स्वास्थ्य, चार वर्षों में आम लोगों के साथ उनकी कनेक्टिविटि, क्षेत्र में उनकी सक्रियता और परफॉर्मेंस, पार्टी कार्यक्रमों में उनकी सहभागिता और बदलते राजनीतिक हालात में उनकी जीत का प्रतिशत आदि बिंदुओं पर उनका मूल्यांकन हो रहा है. जीतने की गारंटी होने पर ही उन्हें फिर से टिकट मिलेगी. पर टिकट कटने के पहले उन्हें विश्वास में लेते हुए दूसरी सीटों पर पड़ने वाले इसके प्रभाव का आकलन भी किया जाएगा. जीतने की गारंटी को लेकर पार्टी ने सर्वेक्षण भी कराया है.

प्रदेश के 14 संसदीय क्षेत्रों में से 12 जगहों पर भाजपा के सांसद हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस बार सभी 14 सीटें जीतने का लक्ष्य दिया है. परफॉर्मेंस और जीतने की गारंटी को देखते हुए कतिपय वर्तमान सांसदों का टिकट काटने का संकेत भी वे दे गए हैं. संथाल की तीन संसदीय सीटों में से दुमका और राजमहल से झामुमो के सांसद हैं. इन दोनों सीटों को भाजपा इस बार हर हाल में जीतना चाहती है. इसके लिए पूर्व के उम्मीदवारों पर दांव खेला जाए या उन्हें बदला जाए, इस पर भी मंथन जारी है. आने वाले 6 महीनों में इन सबको उक्त पैमाने पर खुद को सौ प्रतिशत फिट दिखाना होगा.

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