सवर्ण और दलित टकराव के मुहाने पर मध्य प्रदेश की सियासत, जातिगत पेंच से पशोपेश में कांग्रेस-भाजपा

एससी एसटी एक्ट में बदलाव को लेकर दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दलित संगठनों द्वारा तीखा विरोध किया गया था. इसके खिलाफ दलित संगठनों ने 2 अप्रैल को भारत बंद का ऐलान किया था, जिस दौरान सबसे ज्यादा हिंसा मध्य प्रदेश के ग्वालियर और चंबल संभाग में हुई थी. इस दौरान हुई हिंसक झड़पों में करीब आधे दर्जन से अधिक लोगों की मौत हो गई थी. दलित संगठनों की प्रतिक्रिया और आगामी चुनावों को देखते हुए कानून को पूर्ववत रूप में लाने के लिए केंद्र सरकार ने संसद में एससी-एसटी संशोधन बिल पेश किया, जिसे दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया गया. इसके बाद से लगातार स्वर्ण संगठनों की प्रतिक्रिया सामने आ रही है. सरकार के इस फैसले के खिलाफ 6 सितंबर को सवर्ण संगठनों द्वारा भारत बंद का ऐलान किया गया.

मध्य प्रदेश में इस बंद को भी अच्छा-ख़ासा असर देखने को मिला. इसके बाद से मध्य प्रदेश में अगड़े बनाम पिछड़े की बहस हावी है और इससे सियासी जमातें उलझन में हैं. चुनावी साल में होने वाली इस उठापटक से प्रदेश के सियासी मिजाज में बदलाव देखने को मिल रहा है. यहां की राजनीति में कभी भी उत्तर प्रदेश और बिहार की तरह जातिगत मुद्दे हावी नहीं रहे हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों के चलते इस बार इसमें बदलाव देखने को मिल रहा है. दरअसल, एससी-एसटी संशोधन विधेयक पारित होने का सबसे तीखा विरोध मध्य प्रदेश में ही देखने को मिल रहा है, जिसके घेरे में कांग्रेस और भाजपा दोनों हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर चप्पल फेंके जाने और उनके जनआशीर्वाद रथ पर पथराव जैसी घटनाएं तेजी से बदलते हुए माहौल को दर्शाती हैं.

सवर्णों की प्रतिक्रिया

चुनाव के मुहाने पर खड़े मध्य प्रदेश में सवर्ण संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया से सियासी दल हैरान हैं. भाजपा-कांग्रेस दोनों ही दलों के नेताओं को जगह-जगह सवर्णों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है. जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान शिवराज सिंह चौहान की बस पर पथराव और एक सभा के दौरान उन पर जूता फेंकने जैसी घटनाएं हो चुकी हैं. भाजपा द्वारा इसे लेकर पहले कांग्रेस पर आरोप लगाया गया था कि ये हमला कांग्रेस ने कराया है. खुद शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि कांग्रेस मेरे ख़ून की प्यासी हो गई है. लेकिन बाद में करणी सेना ने ऐलान किया कि सीधी की सभा में सीएम शिवराज सिंह पर जो जूता फेंका गया वो किसी कांग्रेसी ने नहीं बल्कि ‘माई के लाल’ ने फेंका था. दरअसल, शिवराज ने कहा था कि ‘कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता.’

उनके इस बयान के जवाब में करणी सेना ने खुद को ‘माई का लाल’ घोषित कर लिया. इसी तरह से मुरैना में भाजपा नेता प्रभात झा का घेराव किया गया और उनके ऊपर चूड़ियां फेंकी गईं. टीकमगढ़ में भाजपा की बैठक में घुसकर हंगामा किया गया और वहां मौजूद भाजपा नेता  प्रह्लाद पटेल को काले झंडे दिखाए गए. कांग्रेस को भी इस विरोध और गुस्से का सामना करना पड़ रहा है. मुरैना में कमलनाथ को काले झंडे दिखाए जा चुके हैं और रतलाम में  ज्योतिरादित्य सिंधिया के काफिले का घेराव किया जा चुका है. प्रदेश के ग्वालियर, चंबल व मालवा जिले के कई गावों में लोगों ने पोस्टर लगाए हैं, जिसमें लिखा है, ‘यह सामान्य वर्ग का गांव है, कृपया वोट मांगकर शर्मिंदा ना करें.

हम नोटा को वोट देंगे.’ प्रदेश में इन दिनों यह नारा भी काफी चर्चा में है कि ‘अपना सिक्का निकला खोटा, वोट फॉर नोटा.’ सवर्ण आंदोलन के दौरान कई धर्म गुरु भी खुलकर सामने आए हैं. कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर इसमें बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं. पिछले दिनों वे अपने एक विवादित बयान को लेकर काफी चर्चा में रहे, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘दो महीने का समय हमने लिया है, अगर हमें हल मिल गया तो हम कुछ नहीं करेंगे, अगर नहीं मिला तो वो करेंगे जो भारत के इतिहास में कभी हुआ ही नहीं.’ शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने भी बयान दिया है कि भाजपा को सिर्फ वोट की चिंता है. एससी-एसटी एक्ट में संशोधन तो समाज को बांटने का षड्यंत्र है.’

बैकफुट पर भाजपा

भाजपा बुनियादी तौर पर सवर्णों की पार्टी मानी जाती रही है और यही उसका मूल वोटबैंक भी है, लेकिन आज उसका मूल वोटर ही खार खाए बैठा है. देश और प्रदेश में भाजपा ही सत्ता में है, इसलिए एससी-एसटी अत्याचार निरोधक कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने का सबसे ज्यादा विरोध भी भाजपा और उसके नेताओं को ही झेलना पड़ रहा है. हालांकि केवल एससी-एसटी अत्याचार निरोधक कानून ही नहीं है, जो भाजपा के गले की हड्‌डी बना हुआ है. मध्य प्रदेश में सवर्णों के इस गुस्से की एक पृष्ठभूमि है. दरअसल, दिग्विजय सिंह की सरकार द्वारा 2002 में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति को पदोन्नति में आरक्षण देने को लेकर कानून बनाया गया था, जिसे बाद में  शिवराज सरकार द्वारा भी लागू रखा गया. बाद में इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जिस पर 30 अप्रैल 2016 को जबलपुर हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया और मध्य प्रदेश लोक सेवा (पदोन्नति) नियम 2002 को निरस्त कर दिया. साथ ही 2002 से 2016 तक सभी को रिवर्ट करने के आदेश दिए.

इसके बाद इस नियम के तहत करीब 60 अजा-जजा के लोकसेवकों की पदोन्नति पर सवालिया निशान लग गया. हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अजा-जजा वर्ग के संगठन अजाक्स ने भोपाल में एक बड़ा सम्मेलन किया था, जिसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बिना बुलाए पहुंच गए थे. उन्होंने वहा मंच से हुंकार भरा था कि हमारे होते हुए कोई माई का लाल आरक्षण समाप्त नहीं कर सकता. इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पीटिशन लगा दिया और साथ ही शिवराज सिंह ने ऐलान भी किया था कि सुप्रीम कोर्ट में केस नहीं जीत पाए, तो भी प्रमोशन में आरक्षण जारी रखेंगे भले ही इसके लिए विधानसभा में नया कानून बनाना पड़े. फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है.

016 में शिवराज सरकार के दलितों को पुरोहित बनाने के फैसले को लेकर भी विवाद की स्थिति बनी थी, जिसमें अनुसूचित जाति, वित्त एवं विकास निगम द्वारा राज्य शासन को भेजे गए प्रस्ताव में कहा गया था कि अनुसूचित जाति की आर्थिक व सामाजिक उन्नति और समरसता के लिए युग पुरोहित प्रशिक्षण योजना शुरू किया जाना प्रस्तावित है, जिसमें दलित युवाओं को अनुष्ठान, कथा, पूजन और वैवाहिक संस्कार का प्रशिक्षण दिया जाएगा. ब्राह्मण समाज द्वारा इसका प्रदेशभर में तीखा विरोध किया गया, जिसके बाद मध्य प्रदेश के संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्रा को बयान देना पड़ा था कि ‘मध्य प्रदेश में दलितों को कर्मकांड सिखाने की कोई योजना प्रस्तावित नहीं है.’

सपाक्स बनाम अजाक्स

मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों का जाति के आधार पर विभाजन हो गया है, जिसमें एक तरफ सपाक्स (सामान्य पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक कल्याण समाज संस्था) के बैनर तले सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग के कर्मचारी हैं, तो दूसरी तरफ अजाक्स (अनुसूचित जाति जनजाति अधिकारी कर्मचारी संघ) के बैनर तले अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के कर्मचारी हैं. प्रदेश में करीब 7 लाख सरकारी कर्मचारी हैं, जिसमें अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के कर्मचारियों की संख्या करीब 35 फीसदी और सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग के कर्मचारियों की संख्या 65 फीसदी बताई जाती है, यानि सपाक्स से जुड़े कर्मचारियों की संख्या ज्यादा है. हालांकि पिछड़ा वर्ग के कर्मचारी किसके साथ हैं, इसे लेकर अभी भ्रम की स्थिति बनी हुई है. सपाक्स और अजाक्स दोनों दावा कर रहे हैं कि पिछड़ा वर्ग उनके साथ है, जबकि दूसरी तरफ पिछड़ा वर्ग के सामाजिक संगठनों में इसे लेकर एकराय देखने तो नहीं मिल रही है. पिछड़ा वर्ग के कुछ लोग सपाक्स को समर्थन दे रहे हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जो अजाक्स के साथ होने की बात कह रहे हैं.

बहरहाल, सपाक्स शिवराज सरकार के खिलाफ खड़ी नजर आ रही है, जबकि अजाक्स को शिवराज सिंह की सरकार का संरक्षण मिला हुआ है. सपाक्स के संरक्षक हीरालाल त्रिवेदी ने प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि अजाक्स से जुड़े अफसरों का गुट महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिव जे.एन. कंसाटिया और वरिष्ठ आईएएस अफसर इकबाल सिंह बैस के संरक्षण में जातिगत भेदभाव फैलाने का काम कर रहा है. इसी तरह से इस साल जुलाई माह में अजाक्स के पूर्व प्रान्तीय अध्यक्ष एव स्थायी सदस्य डॉ. जगदीश सूर्यवंशी ने वर्तमान में अजाक्स के प्रान्तीय अध्यक्ष जे.एन. कंसोटिया पर शिवराज सरकार के प्रभाव में काम करने का आरोप लगाते हुए समानान्तर अजाक्स का गठन कर लिया था. बहरहाल, सपाक्स की नाराजगी शिवराज और भाजपा पर भारी पड़ सकती है. सपाक्स चित्रकूट, मुंगावली और कोलारस विधानसभा के

उपचुनाव में सरकार के खिलाफ अभियान चला चुका है. इन तीनों जगहों पर भाजपा की हार हुई थी, जिसमें सपाक्स अपनी भूमिका होने का दावा कर रहा है. सपाक्स ने प्रदेश की सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान करते हुए प्रदेश की जनता को तीसरा राजनैतिक विकल्प देने का दावा किया है. इसकी घोषणा करते हुए सपाक्स के प्रवक्ता विजय वाते ने कहा है कि हमने चुनाव आयोग में अर्जी देकर राजनीतिक दल के रूप में मान्यता मांगी है. मान्यता और चुनाव चिन्ह मिलने के बाद सपाक्स प्रदेश की सभी 230 विधानसभा और 29 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगा, हम अपने दम पर लड़ेंगे और जीतेंगे. जानकार मानते हैं कि अगर सपाक्स चुनाव लड़ता है, तो इससे भाजपा को नुकसान हो सकता है, क्योंकि सपाक्स उस सवर्ण तबके के वोटरों में ही सेंध लगाएगा, जिसे भाजपा का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है.

किसपर कितना असर का पेंच

जानकार मानते हैं कि सर्वणों के गुस्से का सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा का ही होना है. भले ही वे कांग्रेस को वोट न दें और नोटा का विकल्प चुनें, वोट तो भाजपा का ही कटेगा. हालांकि कांग्रेस के लिए भी यह कोई राहत वाली स्थिति नहीं है. पिछले कुछ महीनों से वो जिन मुद्दों पर शिवराज सरकार को घेरने की कोशिश कर रही थी, वो पीछे छूटते हुए नजर आ रहे हैं. किसान, भ्रष्टाचार, नोटबंदी, जीएसटी और कुपोषण जैसे मुद्दे फिलहाल नेपथ्य में चले गए हैं. ऐसे में कांग्रेस को नए सिरे से सियासी बिसात बिछाने की जरूरत महसूस हो रही है. शायद इसी वजह से कांग्रेस द्वारा बहुत सधे हुए तरीके से सवर्णों के साथ सहानुभूति का संदेश दिया जा रहा है.

इस संबंध में मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ का हालिया बयान काबिले गौर है, जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘कांग्रेस किसी के साथ अन्याय नहीं होने देगी, जहां एक्ट का दुरुपयोग हुआ है, कांग्रेस उसका विरोध करती है, हमारा प्रयास सवर्णों को मनाने का है, पार्टी चाहती है कि सबके साथ न्याय हो.’ भाजपा की तरफ से भी सर्वणों  को मनाने की कवायद शुरू हो गई है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कहा है कि ‘हमारी संस्कृति समरसता की रही है, हमारी जड़ों में सामाजिक समरसता है, हमें इसे किसी भी तरह टूटने या बिखरने नहीं देना है.’ इस संबंध में भाजपा सांसद आलोक संजर ने बयान दिया है कि सवर्णों की नाराजगी को दूर किया जाएगा.

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