गंगोत्री क्षेत्र में गंभीर पर्यावरणीय खतरे की आशंका

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ये नारे उत्तराखंड के सुदूर पर्वतीय व तिब्बत सीमा से लगे गांवों में सुनाई दे रहे हैं. पेड़ों की रक्षा के लिए उठी महिलाओं की यह सामूहिक आवाज फिर चिपको आंदोलन की दस्तक दे रही है. दरअसल, हाल के वर्षों में विदेशों में फेल हो चुके विकास के मॉडल्स भारत में लागू करने के प्रयास किए जा रहे हैं. और यह जुगत जो उत्तराखंड के लिए विनाशकारी साबित हो रही है. उत्तराखंड में ऑल वेदर रोड के नाम से (चारधाम यात्रा) 4 लेन की 24 मीटर की रोड बनाने के नाम पर लाखों पेड़ों की बलि दी जाने वाली है.

चारों तीर्थ स्थलों को एक छोर से दूसरे छोर तक जोड़ने के लिए बनाई जा रही इस रोड से भूक्षरण के नए क्षेत्र तो बन ही रहे हैं साथ ही गंगोत्री मार्ग में धरासू बैंड से गंगोत्री तक 200 से अधिक नए खतरनाक भूक्षरण क्षेत्र भी बन चुके हैं. हालंकि असली तस्वीर बरसात के बाद ही साफ होगी, लेकिन इतना तय है कि यह रोड बहुत बड़ा पारिस्थितिकी संकट खड़ा करने जा रही है. अभी तक हजारों हरे देवदार व अन्य प्रजाति के पेड़ काट दिए गए हैं. राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के निर्देश के विरुद्ध सड़क के मलवे को नदी में जाने से रोकने के कोई कारगर उपाय नहीं किए गए हैं. इससे क्षेत्र में बेहद संकरी पहाड़ियों के बीच से गुजर रही गंगा के कभी भी अवरुद्ध होने का ख़तरा हो गया है.  इन हजारों पेड़ों के कटने के बाद क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर जो खतरनाक प्रभाव पड़ेगा, उसे गंगा मईया ही जान सकेंगी. जबकि तथाकथित विशेषज्ञ सच्चाई से लोगों को गुमराह ही करेंगे.

गौरतलब है कि गंगोत्री से नीचे भैरव घाटी और उसके बाद हर्षिल के  20 किमी के क्षेत्र में 24 मीटर की रोड बनाने के लिए हजारों (अपुष्ट सूत्रों के अनुसार 6-10 हजार) पेड़ काटे जाएंगे. दरअसल इस प्रक्रिया में एक पेड़ की आड़ में कई गुना पेड़ काटे जाते हैं. कुल मिलाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध हर्षिल की शामत आने वाली है. गंगोत्री से जुड़ी यह घाटी अपने सुंदर जंगल, रसीले सेब,  बुग्यालों और ग्लेशियरों के अलावा गंगाजी के चौड़े फाट के कारण पर्यटकों में काफी लोकप्रिय है. वैसे यहां घाटी की सड़क पहले से ही काफ़ी अच्छी है, ऐसे में उसे बहुत कम पेड़ों के नुकसान से पर्याप्त चौड़ा किया जा सकता है. लेकिन अगर सरकार पर 24 मीटर की चौड़ाई का पागलपन चढ़ा रहा तो इस पूरे इलाके को बर्बादी से बचाना मुश्किल है. इस से पर्यावरण को तो नुकसान होगा ही, साथ ही भविष्य में गंगा के उद्गम के ग्लेशियरों से लेकर सेब उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की पूरी आशंका है.  इससे आगे 7 किमी झाला से सुक्खी बैंड तक, सरकार जो करने जा रही है, वह पेड़, पर्वत, ग्लेशियर, वन्य पशु-पक्षियों और सीमांत ग्रामीणों आदि सभी के लिए बेहद अनिष्टकारी है.

फिलहाल मौजूदा सड़क गंगाजी की घाटी में झाला से सुक्खी गांव की चढ़ाई कर नीचे घाटी में सुक्खी बैंड पर गंगाजी के किनारे पहुंच जाती है. करीब 10-12 किलोमीटर की ऊंचाई वाला यह रास्ता भारत-चीन युद्ध के बाद बना था क्योंकि तब यही विकल्प था. सुक्खी बैंड से आगे घाटी में पहाड़ी पूरी तरह कच्ची थी, जिस पर लगातार भूक्षरण होता रहता था और आज भी होता रहता है. उस दौरान सड़क बनाने वाले इंजीनियरों ने सुक्खी बैंड से सड़क को (करीब 2700 मीटर समुद्र तल) ऊंचाई पर स्थित सुक्खी गांव जसपुर पुराली लाते हुए पुनः घाटी में स्थित झाला गांव में मिला दिया. इस तरह सड़क से इन गावों को सम्पर्क रास्ता मिल गया.

कालांतर में गांववालों ने सड़क के किनारे छोटे-छोटे होटल व  रेस्टोरेंट आदि खोल लिए. इस तरह उन्हें एक स्थायी रोजगार मिल गया. इस आमदनी और गांवों में सेब, लोबिया, राजमा आदि नगदी फसलों के उत्पादन से इनका जीवनयापन हो रहा है. इन चार गांवों की करीब 2500 की आबादी में सरकारी नौकरियों में गिनती के ही लोग हैं, अधिकांश गांव में ही रहकर गुजर बसर कर रहे हैं. भले ही सरकार ने इसके लिए आयोग गठित कर दिया हो लेकिन पलायन होने या रोकने के प्रमुख कारण क्या होते हैं, इसका अंदाजा इन गांवों को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है.

सरकार चाहती है कि झाला गांव से उत्तरकाशी की ओर सुक्खी बैंड तक सड़क को सीधा कर दिया जाए. भले ही इसके लिए पर्यावरण व पहाड़ी प्रवासी दोनों ही दरकिनार कर दिए जाएं. योजना के अनुसार सुक्खी बैंड से गंगा घाटी में भूक्षरण क्षेत्र की ओर थोड़ा आगे तक सड़क बनाकर गंगा के दाहिने किनारे में चौड़ी सड़क बनाकर उसे सीधे झाला गांव के बाहर पुल पार सड़क में मिला दिया जाए. इससे सड़क की लम्बाई कम हो जाएगी और वाहनों को ऊंचाई पर नहीं चढ़ना पड़ेगा. एक तर्क और दिया जा रहा है कि सुक्खी गांव की चढ़ाई में पड़ने वाले सात बैंड कम हो जाएंगे, जिससे युद्ध सामग्री को ले जाना आसान हो जाएगा. इस परियोजना का यही वह क्षेत्र है जहां सबसे ज्यादा विरोध है. मौजूदा हालातों को देखते हुए यह विरोध जायज भी लगता है. 1962 के  भारत-चीन युद्ध के बाद जब तिब्बत से सटे इस सीमान्त क्षेत्र में सड़क बनाने की आवश्यकता हुई तो यहां के ग्रामीणों ने सड़क बनाने के लिए अपनी उपजाऊ ज़मीन दे दी थी. इतना ही नहीं सेना का रसद सेन्टर बनाने के लिए गांव बसाने योग्य समतल जमीन भी बिना किसी मुआवजे के सरकार को ख़ुशी-ख़ुशी दे दी थी.

अब यदि सड़क सुक्खी टाप के गावों को न जाकर सीधे गंगा घाटी से मिल जाएगी तो इन गांवों में चारधाम यात्रा के भरोसे बने रोजगार के साधन होटल व रेस्टोरेंट बंद हो जाएंगे. सेब और पहाड़ी फलों व नगदी फसलों की बिक्री व बाजार पहुंच पर नकारात्मक असर पड़ेगा. जिसका गांववालों ने जबरदस्त विरोध किया है. वे लगातार मौजूदा सड़क को थोड़ा चौड़ा कर,  मोड़ों की कटान करके चौड़ा करने की मांग कर रहे हैं, ताकि सड़क और गांव का रोजगार बना रहे, अन्यथा पलायन तय है. युद्ध सामग्री की सप्लाई के तर्क को ग्रामीण इस बात से काटते हैं कि जब करगिल और सियाचिन जैसे दुरूह क्षेत्रों में भारी युद्ध सामग्री पहुंच सकती है, तो यहां तो पहले से ही अपेक्षाकृत पर्याप्त सड़कें हैं. गांववाले इस योजना को अपने अस्तित्व से जोड़कर देख रहे हैं. सुक्खी की रोड नहीं तो गांव में रोजगार नहीं के दावे के साथ वह लगातार मंत्रियों, जनप्रतिनिधियों से मिल रहे हैं. उनका कहना है कि यदि गंगाजी के दाहिने किनारे में 80-90 डिग्री पर खड़ी चट्टानों को काटकर सड़क बनाई गई, तो हजारों पेड़ काटे जाएंगे और ग्लेशियर वाला पूरा पहाड़ गंगा में आ सकता है. जिससे गंगाजी अवरुद्ध हो सकती हैं. साथ ही अगर यहां झील बनी तो यह क्षेत्र के लिए खतरनाक होगा. प्रस्तावित क्षेत्र सालों से मानवरहित होने के चलते हिमालयी उच्च पशु-पक्षियों का नैसर्गिक प्रवास भी है. ऐसे में सड़क बनने से पशु-पक्षियों का यह प्रवास क्षेत्र बुरी तरह से प्रभावित होगा.

ग्रामीण इस के लिए लम्बा संघर्ष करने के मूड में हैं. अभी एनजीटी ने पेड़ कटान पर अस्थाई रोक लगाई हुई है. वह इस पर स्थाई रोक लगाने के लिए एनजीटी के सदस्यों, सामाजिक संगठनों से सम्पर्क कर रहे हैं. हाल ही में विख्यात गांधीवादी जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित गांधी शान्ति प्रतिष्ठान की पूर्व अध्यक्षा सुश्री राधा बहन के नेतृत्व में सैकड़ों महिलाओं सहित क्षेत्रीय ग्रामीणों ने दो सभाएं करके सड़क के लिए काटे जाने वाले देवदार आदि के पेड़ों को बचाने के संकल्प के तौर कर उनमें रक्षा सूत्र बांधे हैं. वह किसी भी सूरत में नई सड़क न बनने देने और पेड़ों को बचाने के लिए कटिबद्ध हैं. हालांकि वे इस सड़क के लिए विकल्प भी दे रहे हैं, जिसमें मौजूदा सड़क की ऊंचाई और मोड़ों को ख़त्म करने तथा गंगोत्री मार्ग के लिए जसपुर, पुराली से मुखबा तक के लिए बन रही रोड के विकल्प सम्मलित हैं.

—  गंगोत्री क्षेत्र से लौटकर इस्लाम हुसैन