सरकार को नहीं पता कहां जाना है

modi jiस्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री ने दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से भाषण दिया. यह उनके इस कार्यकाल का अंतिम भाषण था. आम लोग दो कयास लगा रहे थे. एक तबका कह रहा था कि इस बार प्रधानमंत्री कोई बहुत बड़ी घोषणा करने जा रहे हैं, जिससे राजनीतिक नक्शा थोड़ा बदल जाएगा. इससे बेहतर घोषणा कुछ हो नहीं सकती थी. लोगों ने यह भी कयास लगाया कि प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत की घोषणा करेंगे. लेकिन इसकी पूरी तैयारी नहीं थी, अब वे 25 सितंबर को इसकी घोषणा करेंगे.

दूसरे तबके का कहना था कि प्रधानमंत्री इस मौके पर अपना चुनावी अभियान शुरू कर देंगे. लेकिन सच्चाई तो यह है कि जब से मोदी जी चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री बने है, तब से वे और उनकी सरकार लगातार चुनावी मोड में ही है. वे सरकार भी चुनावी मोड में ही चला रहे हैं. उनको कभी यह तसल्ली ही नहीं हुई कि हम सरकार बना चुके हैं. उन्हें लगता है कि हम अभी सरकार बनाएंगे. पता नहीं उनका मंतव्य क्या है, मेरी समझ में तो यह नहीं आया.

भाजपा को 2014 में 282 सीटें मिली थीं. यह स्पष्ट बहुमत था. 1985 के बाद भाजपा पहली पार्टी थी, जिसे इतना बहुमत मिला. कायदे से अगले दिन से ही भाजपा को कांग्रेस का नाम लेना बंद कर देना चाहिए था. उसे कहना चाहिए था कि मैं पांच साल में आपको दिखाता हूं कि क्या हो सकता है देश में, जो कांग्रेस ने अब तक क्यों नहीं किया. या तो भाजपा की हीन भावना थी कि काम कर नहीं पाएंगे, इसलिए लगातार कांग्रेस पर हमला करती रही. यह शायद सही भी था.

हर चीज को बढ़ा-चढ़ा कर बोलना और हर बार कांग्रेस को गाली देना भाजपा की स्ट्रैटजी थी. चार साल में लोग कहने लगे कि कांग्रेस को गाली देकर क्या फायदा, आप क्या करेंगे बताइए? मैं उदाहरण देता हूं- पीयूष गोयल ऊर्जा मंत्री थे. वे कहते थे कि अमुक गांव में आज बिजली आ गई है, जिस गांव में 70 साल से बिजली नहीं आई, वहां आज आ गई. इसका विश्लेषण कीजिए. छह लाख गांव हैं पूरे देश में. जब भाजपा सत्ता में आई थी, तब तीन प्रतिशत गांव, यानि 18 हजार गांव बिजली से वंचित थे, बाकी 97 प्रतिशत गांवों में बिजली आ चुकी थी.

उन्होंने कहा कि हम 18 हजार गांवों में बिजली लाएंगे. उनमें से शायद 14-15 हजार गांव में बिजली आ गई होगी. लेकिन हर बार यह कहना कि अमुक गांव में 70 साल से बिजली नहीं आई थी, हमने ला दी, ठीक है. यह सुन कर जनता इम्प्रेस हो जाएगी, लेकिन छह लाख गांवों में से पांच लाख 82 हजार गांवों में तो बिजली आ ही गई थी. उसका क्या? ये भोथरे दावे हैं. यह कहना कि पहली बार ऐसा हो रहा है, ठीक नहीं है. हर साल का ही दिन भी साल में पहली बार आता है. हर साल का जीडीपी भी पहली बार होगा. सिर्फ पहली बार बोलने से काम नहीं होता है. आपको अनुपात देना पड़ेगा. हर पांच साल में नई सरकार आती है, वो पहले से अच्छा ही करती है. संसाधन आ जाते हैं.

यह भ्रमित सरकार है

भाजपा वाले बोलते हैं कि इतना किलोमीटर रोड हम रोज बनाते हैं और वे इतना बनाते थे. आप पहले के भी तो आंकड़े दीजिए. 1952 में तो एक किलोमीटर भी नहीं बन रहा था. यह क्या है? आप क्या कहना चाहते हैं जनता से? आपने एक बात भी ऐसी नहीं की है, जो हुई नहीं थी और आपने शुरू की है. शायद दो चीजें हैं- एक, एलईडी बल्ब. वो भी पहले शुरू हो गया था, लेकिन किसी को पता नहीं था कि ये कितना किफायती हो सकता है. आपने ये काम किया. उसका क्या परिणाम हुआ, पता नहीं है. लोगों के बिजली बिल कितने कम हुए, किसी को नहीं मालूम. मेरे पास कोई आंकड़े नहीं हैं. दूसरा, स्वच्छ भारत. यह प्रधानमंत्री का काम नहीं है. यह एनजीओ का काम है, पंचायत का काम है, नगरपालिका/नगर निगम का काम है.

लेकिन पीएम ने यह काम अपने हाथ में लिया और गांधी जी का नाम लेकर लिया. स्वच्छ मतलब क्या? कूड़े के ढेर नहीं हो, नाली साफ हो. मोदी जी ने इसका अर्थ लगा लिया कि बाहर जो लोग शौच के लिए जाते हैं, न जाएं, तो स्वच्छता हो जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं है. वो एक अलग समस्या है. उसमें प्राइवेसी की प्रॉब्लम है, औरतों की दिक्कत है. यह काम भी करना चाहिए, लेकिन इससे स्वच्छता आ जाएगी, जरूरी नहीं. आपने शौचालय बना दिया. पैसा दे दीजिए, बन जाएगा लेकिन इससे स्वच्छता नहीं आएगी. आज भी भारत उतना ही गंदा है. हां कुछ-कुछ शहर साफ हुए, जहां म्यूनिसिपाल्टी अच्छी होगी, जहां के लोग अच्छे होंगे, जहां की पंचायत अच्छी होगी, जहां एनजीओ काम करेगी, वहां सफाई होगी.

हम मुम्बई शहर में रहते हैं. बाकी देश की तुलना में मुम्बई का ट्रैफिक व्यवस्थित है. लेकिन आपके स्वच्छता अभियान से यहां कुछ हो गया हो, ये तो मैं नहीं कह सकता. कुछ फायदा हुआ है. कुछ इलाकों में मैं देखता हूं कि सफाई है, क्योंकि जो म्यूनिसिपल वर्कर हैं, वे कामचोर थे, तो सरकार ने बाहर के लोगों को कॉन्ट्रैक्ट दे दिया. वैसे ये अलग चर्चा का विषय है कि इस देश में कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम को पहले बैन कर दिया गया था, क्योंकि यह कर्मचारियों के खिलाफ था. हालांकि यह तो देश को फैसला करना है कि कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम ठीक है या नहीं. यह एक बडा सवाल है, जिस पर किसी ने चर्चा नहीं की.

स्वच्छता को लेकर आंकड़े फेंकने का सिलसिला आज भी जारी है. लाल किले से दिए गए भाषण में भी दुर्भाग्यवश मोदी जी ने कई ऐसे आंकड़े दिए, जिनका कोई मतलब नहीं है. एक उज्ज्वला योजना है. इसके आंकड़े अफसरों के पास होते हैं. मोदी जी नेता हैं, वे कुछ भी बोल सकते हैं, दूसरी पार्टी वाले भी बोल सकते हैं, लेकिन अफसर गलत नहीं बोल सकते हैं. नीति आयोग या सांख्यिकी विभाग झूठ नहीं बोल सकते हैं. इस भाषण से मार्जिनल फायदा हुआ है, ज्यादा फायदा नहीं हुआ है.

देश में 70 साल से जो योजनाएं चल रही हैं, वही चलेंगी, तरीके थोड़े बदल सकते हैं, उन्हें थोड़ा इनोवेट किया जा सकता है. इसमें मोदी जी की भी गलती नहीं है. कोई और देश दुनिया में तो है नहीं, जिससे हम तुलना कर सकें, क्योंकि इतनी आबादी कहीं नहीं है. एक है चीन, जिसकी आबादी हमसे ज्यादा है. वो भी प्राचीन संस्कृति है. उसकी समस्याएं भी हमारी तरह ही हैं. लेकिन हम उससे तुलना नहीं कर सकते हैं. जो चीन कर सकता है, वह मोदी जी नहीं कर सकते हैं. क्यों? क्योंकि भारत में लोकतंत्र है, चीन में नहीं है.

उनके प्रेसिडेंट ने जो कह दिया, वह पत्थर की लकीर है. क्या मोदी जी ऐसा बोल सकते हैं? क्या वे यह बोलने की हिम्मत कर सकते हैं कि डेमोक्रेसी बहुत हो गई, प्रोग्रेस करना है तो डेमोक्रेसी नहीं रहनी चाहिए? यह बोलने की ताकत नहीं है उनमें. आपका चार साल का कार्यकाल है, वह असमंजस में फंस गया. आपको समझ में नहीं आया कि आप हिंदू उत्थान करना चाहते हैं, देश की जीडीपी बढ़ाना चाहते हैं, देश को खुशहाल करना चाहते हैं या क्या करना चाहते है? इन सबमें कंफ्यूज हो गए आप.

नेशनल काऊ पॉलिसी क्यों नहीं बना रहे?

एक तरफ आरएसएस है. भाजपा की पैरेंट ऑर्गनाइजेशन. देखिए क्या विडंबना है. ये लोग पहले मुसलमान, क्रिश्चियन और कम्युनिस्ट को दुश्मन मानते थे. अब ऐसा नहीं बोलते हैं. वेे भी समझ गए कि ये तो होगा नहीं. आरएसएस का एक प्रेशर है. दूसरी तरफ, एक फ्रिन्ज विंग है. उसे गाय को लेकर शक भी हो जाए, तो किसी आदमी को जान से मार देते हैं. गोशाला चलाना, बुढ़ी गायों की सेवा करना सनातन धर्म का एक हिस्सा है. लेकिन जो लोग गोमांस खाते हैं, उनसे हमारा क्या विरोध? ये उनके खानपान का हिस्सा है. सरकार चार साल में काऊ पॉलिसी नहीं बना सकी. बनाना चाहिए था. आज भी सरकार चाहे तो एक काऊ पॉलिसी बना सकती है.

जाते-जाते यही एक ढंग का काम कर दे सरकार. मोदी जी एक नेशनल काउ पॉलिसी बना दें. वीर सावरकर जो भाजपा के सबसे बड़े आइडियोलॉग हैं, उन्होंने कहा था कि काउ इज अ यूजफुल एनिमल, जबतक किसान के काम का है. मोदी जी 200 गाय लेकर गए थे रवांडा, उन्हें भेंट करके आए हैं. क्यों भेंट करके आए हैं, कत्ल करने के लिए न? जब तक गाय दूध देगी, ठीक है, उसके बाद वे क्या करेंगे गाय का? रवांडा के लोग तो गोशाला नहीं खोलेंगे. वहां गोशाला स्कीम नहीं है. वे कत्ल करे देंगे गायों का. हिन्दुस्तानी नस्ल की गाय देकर आए हैं, मोदी जी कत्ल करने के लिए. ये कौन सी नीति है मोदी जी की.

देश को एक दिशा में नहीं हांक सकते

70 साल की बात रहने दीजिए. उससे पहले देश कौन चला रहा था? ब्रिटिश चला रहे थे, मुगल चला रहे थे. कैस चला रहे थे वे? उन्होंने यहां आकर स्टडी किया कि यहां के लोगों की मानसिकता क्या है? उसके बाद वे इसी में ढल गए. बाबर, अकबर या ब्रिटिश सब इसी राह पर चले. मोदी जी को इतिहास पढ़ना चाहिए. इनमें से कोई भी हिन्दुस्तान को बदल नहीं पाया. सब हिन्दुस्तान के ढांचे में ढल गए. हां वे कुछ अपनी चीजें ले आए, जैसे वास्तुकला, खानपान आदि. इस देश में यदि आप भ्रमण करें, तो हर हिस्से में अलग-अलग वास्तुकला है. इसमें मुसलमानों का बहुत योगदान है. चाहे वे मुगल हों या कोई और. आप इस देश को एक दिशा में नहीं हांक सकते. एक जैसा नहीं बना सकते. यह देश विभिन्नताओं का मिश्रण है. यहां का हर राज्य अलग है. भूगोल अलग है, खानपान अलग है, संस्कृति अलग है.

यही तो भारत की खासियत है. अब आप अमेरिका जाइए. कार में ड्राइव करिए. एक शहर आएगा, एक पेट्रोल पंप होगा, मैकडोनाल्ड की दुकान होगी. पता नहीं चलेगा कि कौन सा शहर है. सब एक जैसे हैं. आपको किसी से नाम पूछना पड़ेगा. क्या हमें भारत को वैसा ही अमेरिका बनाना है? भाजपा के कुछ लोग भारत को शंघाई बनाना चाहते हैं, कभी अमेरिका बनाना चाहते हैं. आखिर आप क्या चाहते हैं? याद रखिए, ये हिन्दुस्तान है, हिन्दुस्तान रहेगा. 250 साल में मुगल कुछ नहीं कर पाए, 90 साल में ब्रिटिश कुछ नहीं कर पाए. आप क्या कर देंगे? कुछ नहीं कर सकते हैं आप.

जो सबसे हास्यास्पद बात लगती है इस सरकार में, वो यह कि सरकार कहती है कि हम न्यू इंडिया बना देंगे. लेकिन हकीकत यह है कि नहीं बना सकते हैं. ब्रिटिश ने कोशिश की थी, दिल्ली को न्यू दिल्ली बनाने की. क्या कर पाए? एक एरिया में पार्लियामेंट हाउस और मकान बना दिया, लेकिन दिल्ली को चेंज नहीं कर पाए. ट्राई भी नहीं किया उन्होंने. चांदनी चौक और जामा मस्जिद सब वैसे ही हैं. लाल किला भी वहीं है और आप भी वहीं से भाषण दे रहे हैं. आपको ये नहीं लगा कि शाहजहां के बनाए हुए लाल किले से मैं भाषण क्यों दे रहा हूं? आपकी पार्टी तालमेल तोड़ने में लगी हुई है. कभी बोलती है कि ताजमहल तेजोमहल था, कभी बोलते हैं मकबरा है, फिर आप लालकिले से भाषण क्यों देते हैं. चेंज कर देते आप इसे भी. आप कहिए कि हम तो सोमनाथ मंदिर से भाषण देंगे देश का.

मोदी सरकार ने जो पहला मुद्दा उठाया, वो था भ्रष्टाचार से मुक्ति का. यही गलत है. भ्रष्टाचार किसे कहते हैं? भ्रष्टाचार वो होता है कि जो मेरा हक है, वो मैं लेने जाऊं और उसके लिए मुझे किसी को रिश्वत देनी पड़े, यह है भ्रष्टाचार है. इसे भाजपा सरकार मिटाने की बात कर रही है. आप एक उदाहरण दे दीजिए कि भारत में जिसका जो हक है, वो उसे बिना पैसा खर्च किए मिलता है. क्या ऐसा कोई उदाहरण मिलेगा? पूरा देश भ्रष्ट है.

आम आदमी को प्रधानमंत्री से क्या मतलब है? छोटा आदमी राशन की दुकान पर जाएगा, उसको पैसे देने होंगे, ड्राइविंग लाइसेंस लेने जाए तो पैसे देने पड़ेंगे, हर जगह पैसे की जरूरत पड़ेगी. क्या-क्या करेंगे आप. आप एक काम कर सकते हैं और कुछ कोशिश की इस सरकार ने इस दिशा में. डिजिटल और ऑनलाइन. इससे रिश्वतखोरी थोड़ी कम हो जाएगी. लेकिन उसकी भी सीमाएं मालूम होनी चाहिए. कुछ गांव में एटीएम छोड़िए, सबसे नजदीक बैंक 10 किलोमीटर दूर है. उस पर भी आपने नोटबंदी कर दी और लोगों को रुला दिया.

एमएसपी अंतिम समाधान नहीं है

मोदी जी को चाहिए कि अब वापस देखें. आगे राज करना है तो टेम्परेचर कम करिए. हिन्दुस्तान का कैरेक्टर चार हजार साल पुराना है. उस कैरेक्टर में जो चीज फिट बैठती है, वही काम करिए. भारत कृषि प्रधान देश है. सरकार ने किसानों के लिए कुछ नहीं किया. आज भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं. पहले तो उन्हें लोन मिलता नहीं है और अगर लोन मिल भी जाता है, तो वे चुका नहीं पाते हैं. बाढ़ आ जाती है, फसल बर्बाद हो जाती है, अच्छी फसल होती है, तो दाम कम हो जाते हैं.

किसान हर तरफ से पिस रहा है. आप मॉडल नहीं बना पाए. मैं मानता हूं कि पहले की भी सरकारें कोई मॉडल नहीं बना पाईं. पहले की सरकार का मॉडल क्या था?  मिनिमम सपोर्ट प्राइस जैसा एक मैकेनिज्म शुरू किया गया. उससे कुछ फायदा हुआ किसान को, लेकिन वह कोई समाधान नहीं है, केवल लीपापोती है. मिनिमम सपोर्ट प्राइस कृषि नीति को सफल बनाने का तरीका नहीं है. समाधान देना मेहनत का काम है. कई जगह छोटी खेती है, हर किसान छोटी सी जमीन के लिए ट्रैक्टर नहीं खरीद सकता है. किसान लोन लेने जाए, तो गारंटी चाहिए.

जमीन की कीमत अपने आप बढ़ गई है. पांच लाख की जमीन आज 25 लाख की हो गई है. लेकिन बैंक ऋृृण देने के लिए उस जमीन की कीमत पांच लाख ही लगाते हैं. ये क्या बात है? हर सरकार में एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट है, कृषि विज्ञान केन्द्र हैं. तंत्र अपना सब ठीक है, लेकिन वह तंत्र काम सीमित करता है. राधामोहन सिंह कृषि मंत्री हैं. पहले वे रोज टीवी पर आते थे. बाद में जैसे मोदी जी को लगा कि उनका ज्यादा नाम हो रहा है, तो उन्हें सीमित दायरे में बांध दिया गया. सरकार अगर आज किसान को मदद नहीं देगी, तो किस देश में इतनी ताकत है कि 125 करोड़ लोगों को खाना सप्लाई कर दे.

अमित शाह पर अंकुश लगाएं

अमित शाह का एक इंटरव्यू देख रहा था. एंकर ने राफेल डील तथा यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी के आरोपों को लेकर सवाल पूछा. जवाब सुनिए. अमित शाह कहते हैं कि वे इसलिए आरोप लगा रहे हैं कि वे बेरोजगार हैं, उनके पाास नौकरी नहीं है उनके पास. इसका मतलब है कि निर्मला सीतारमण नौकर हैं. उन्हें नौकरी मिल गई है. यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और प्रशांत भूषण सम्मानित व्यक्ति हैं. सिन्हा और शौरी अटल जी की सरकार में माननीय मंत्री रह चुके हैं. साथ ही अन्य महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं.

उनके बारे में यह कहना कि नौकरी नहीं मिली, इसलिए ऐसा बोल रहे हैं, क्या बेतुकी बात है. लोकतंत्र साथियों से चलता है, सहयोग से चलता है, सद्भाव से चलता है, नौकर से नहीं चलता. अमित शाह क्या अजूबे हैं, मैं नहीं जानता. अहमदाबाद में तो कोई उनके लिए अच्छी बातें तक नहीं करता. उन पर मोदी जी को अंकुश लगाना चाहिए कि पार्टी प्रेसिडेंट रहते हुए वे अपनी भाषा पर संयम रखें. यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ने आपको आईना दिखा दिया, तो खराब नहीं लगना चाहिए.

मैंने पहले भी कहा था कि इस देश में बड़ी ताकत है. यहां की जनता जनार्दन में इतनी ताकत है कि दोबारा मोदी जी को पूर्ण बहुमत देने की गलती नहीं करेगी. इस सरकार ने हिन्दुस्तान की संस्कृति को रौंदा है. यह बात ठीक है कि जो सरकार चुनाव जीतेगी, वो अपनी नीति लागू करेगी. लेकिन सरकार को संस्थानों में लोगों को नियुक्त करने में काबिलियत तो देखनी चाहिए. सरकार यह नहीं कह सकती कि पहले से जो थे, वे सब कांग्रेसी थे, इसलिए उन्हें हटाकर अपना आदमी लाना है, भले ही वह आदमी मूर्ख हो. जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर ये एक ऐसे आदमी को बना देते हैं, जो कहता है कि छात्रों की प्रेरणा के लिए बाहर टैंक होनी चाहिए. सरस्वती की मूर्ति नहीं याद आई, यूनिवर्सिटी के बाहर टैंक की जरूरत महसूस हुई. क्या आप देश को पुलिस स्टेट बनाना चाहते हैं?

…तो कश्मीर पाकिस्तान में होता

कश्मीर में मोदी सरकार ने क्या किया? महबूबा सरकार से समर्थन वापस ले लिया. उसके बाद वहां राज्यपाल शासन लग गया. क्या राज्यपाल शासन में स्थिति सुधर गई है? आम कश्मीरी आज भी परेशान हैं. भाजपा वाले कहते हैं कि सरदार पटेल पहले प्रधानमंत्री होते, तो कश्मीर समस्या नहीं होती. यह आधा सच है. पटेल जी पहले प्रधानमंत्री होते तो कश्मीर डिस्प्यूट तो नहीं होता, लेकिन कश्मीर पाकिस्तान में होता, हिन्दुस्तान में नहीं होता.

उनकी मान्यता थी कि हिंदू-मुस्लिम के नाम पर जब देश अलग हुआ है, तो कश्मीर जाए तो जाए. नेहरू कश्मीरी पंडित थे, शेख अब्दुल्ला वहां के अनचैलेंज्ड लीडर थे, इसलिए कश्मीर रह गया भारत के पास. भाजपा वालों के दिमाग में क्या चल रहा है, समझना बहुत मुश्किल है. एक तरफ आप नेहरू को क्रिटिसाइज करते हैं. नेहरू के समय में डायनेस्टी नहीं थी. 1964 में उनका देहांत हुआ, लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बन गए. इंदिरा गांधी की आलोचना भाजपा वाले नहीं करते, क्योंकि पाकिस्तान के टुकड़े कर दिए थे इंदिरा गांधी ने.

भाजपा का डबल स्टैंडर्ड

इस देश में मोदी जी दो काम कभी नहीं कर पाएंगे. एक, गांधी और नेहरू को यहां की लोगों के दिल और दिमाग से हटाने का और दूसरा खुद को लोगों के दिल और दिमाग में स्थापित करने का. ये दो बातें पक्की हैं. आप इंदिरा गांधी से अच्छा राज करिए, मनमोहन सिंह से अच्छा राज करिए. स्वागत है इसका. हां, मोदी जी की तारीफ करनी पड़ेगी कि उनके डर से आरएसएस व भाजपा वाले गांधी के खिलाफ नहीं बोल पा रहे हैं. यह अच्छा है कि कम से कम गांधी को गाली देने की इनकी प्रवृति अभी तो फिलहाल बंद है.

जब ये सत्ता में नहीं रहेंगे, तो फिर शुरू हो जाएगी यह प्रवृति. भाजपा वाले डायनेस्टी शब्द का यूज करते हैं और इसलिए राहुल गांधी पर निशाना साधते हैं. दूसरी तरफ, तमिलनाडु में जा कर करुणानिधि के बेटे स्टालिन से सहयोग भी मांगते हैं. भाजपा वालों ने यह सवाल क्यों नहीं उठाया कि करुणानिधि के देहांत के बाद अगले अध्यक्ष का चुनाव हो, न कि स्टालिन का मनोयन. ये डबल स्टैंडर्ड क्यों?

आज सबसे बड़ी दो समस्याएं क्या हैं? गरीबी और बेरोजगारी. लोगों को नौकरी नहीं मिल रही है. मोदी जी ने कहा हम दो करोड़ जॉब हर साल देंगे. लेकिन पांच साल में बीस हजार जॉब भी नहीं दे पाए. अब तो चुनाव का समय आ गया है. सरकार चाहती है कि विदेशी निवेश इंडिया में आ जाए और कानून ऐसा बनाती है कि निवेश आना तो छोड़िए, वापस निकल कर जा रहा है विदेशों में. सरकार को कम से कम कानून तो सोच समझ कर बनाना चाहिए. सवाल है कि जो पैसा कर्ज के रूप में फंस गया है, उसे वसूलना है या कर्जदार को जेल में डाल कर पैसा भी डूबो देना है. सरकार यह तय नहीं कर पा रही है. कोई पार्टी अपने कैडर को नुकसान नहीं पहुंचाती है.

भाजपा ने तो व्यापारियों का ज्यादा नुकसान कर दिया. भाजपा ने फिर एक शब्द बोलना शुरू कर दिया है, महागठबंधन. महागठबंधन क्यों होना चाहिए? प्रेसिडेंट इलेक्शन थोड़े ही है यहां पर. हर कंस्टीट्‌यूेंसी में इलेक्शन होगा, हर स्टेट में होगा. किसी गठबंधन की जरूरत नहीं है. पब्लिक उसको चुनेगी, जहां लगेगा कि आशा की किरण दिख रही है. जातियों का समीकरण बहुत महत्वपूर्ण है. भाजपा को लेकर यह संदेश निकलता है कि यह अपर कास्ट की पार्टी है, ब्राह्मणों की पार्टी है और गरीबों व दलितों का दमन करने वाली और मुसलमानों को त्रस्त करने वाली पार्टी है, इससे चुनाव जीतना मुमकिन नहीं है.

आरएसएस और भाजपा वालों की असली मंशा है कि वन पर्सन वन वोट ही गलत है. वोट का अधिकार केवल ऊंची जाति वालों और पैसे वालों को होना चाहिए. लेकिन भाजपा वाले या आरएसएस वाले ये बात खुलेआम बोल सकते हैं क्या? सरकार को फिलहाल देश के बारे में सोचना चाहिए. समस्या के समाधान की दिशा में सोचना चाहिए. चुनाव अब नजदीक ही है. देखते हैं, क्या होता है.

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