मिजोरम विधानसभा चुनाव, कांग्रेस-भाजपा की हार-जीत से आगे मुद्दे और भी हैं

mizoramदेश में एक साथ कई राज्यों के विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ की चर्चा तो खूब हो रही है, लेकिन मिजोरम विधानसभा चुनाव की कहीं कोई चर्चा नहीं है. यह क्षेत्र पूर्वोत्तर भारत का एकमात्र कांग्रेस शासित राज्य है और यहां भी ऐसी समस्याएं हैं, जिन्हें आप जान कर चकित रह जाएंगे.

40 विधानसभा सीट वाले इस राज्य में भाजपा का अब तक खाता भी नहीं खुल पाया है. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 34 सीटों पर जीती थी और राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी मिजो नेशनल फ्रंट को पांच सीटें मिली थीं. मिजोरम का यह आगामी विधासभा चुनाव कांग्रेस के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है. पूर्वोत्तर में यह कांग्रेस के लिए अंतिम राज्य है, जहां उसकी सरकार है. यह राज्य भी अगर कांग्रेस के हाथों से निकल जाता है, तो पूरा पूर्वोत्तर कांग्रेसमुक्त हो जाएगा. पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़ों के अनुसार देखा जाए, तो राज्य में कांग्रेस को ही अधिकतर सीटें मिली थीं. दूसरा मसला यह भी है कि अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद असम समेत कई पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा की सरकारें बना चुकी हैं. मणिपुर एवं त्रिपुरा जैसे राज्य, जहां पहले भाजपा का कोई नामोनिशान नहीं था, वहां भाजपा अपनी सरकार बना चुकी है. ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि मिजोरम जैसे राज्य में भाजपा का प्रदर्शन कैसा रहता है.

चुनावी मुद्दे

इस बार का प्रमुख चुनावी मुद्दा अवैध घुसपैठ का मामला हो सकता है, क्योंकि पड़ोसी देशों मसलन म्यांमार, बांग्लादेश और नेपाल से लगातार अवैध घुसपैठ हो रही है. 2016 में भी यही मुद्दा असम विधानसभा चुनाव में देखा गया था. 2017 में मिजोरम की भाजपा ईकाई ने स्थानीय कांग्रेस की सरकार से अनुरोध किया था कि पड़ोसी देशों से आए घुसपैठियों को पहचानकर उन्हें वापस भेजा जाए. वहां के सामाजिक एवं छात्र संगठनों ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की थी कि वे इस बात के लिए आश्वस्त करें कि अवैध घुसपैठियों, खासकर बांग्लादेश से आए चकमाओं को वापस भेजा जाएगा. इसके अलावा बेरोजगारी राज्य का दूसरा बड़ा मुद्दा है. राज्य में पर्याप्त नौकरियां नहीं हैं. गरीबी भी यहां बड़ा मुद्दा है. राज्य में 20.40 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं. गरीबी के मुख्य दो कारण है. पहला अविकसित कृषि कार्य और दूसरा अकुशल मजदूर. राज्य के आदिवासी झुम व पहाड़ों को काटकर और जलाकर खेती करते हैं. जबकि यह खेती करने का अविकसित तरीका है.

राजनीतिक इतिहास

पहले मिजोरम असम का हिस्सा था. 1972 में यह एक संघ शासित प्रदेश बना. बाद में केंद्र सरकार, मिजोरम सरकार और पूर्व अलगाववादी संगठन मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ. इस समझौते के तहत 20 फरवरी 1987 को मिजोरम को संपूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ. इस तरह मिजोरम देश का 23वां राज्य बना और यहां का पहला विधानसभा चुनाव 1987 में 40 सीटों पर हुआ था.

हालांकि मिजो नेशनल फ्रंट ने 1998 और 2003 के चुनाव जीते थे. मुख्यमंत्री ललथनहावला के नेतृत्व में 2008 से कांग्रेस सत्ता में है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने मिजोरम से एकमात्र संसदीय सीट जीती थी.

प्रमुख नेता और दल

मिजोरम के सबसे प्रमुख नेता बेशक मुख्यमंत्री ललथनहावला हैं. 79 वर्षीय यह कांग्रेसी नेता पांच बार से मिजोरम का मुख्यमंत्री है. यहां के  दूसरे प्रमुख नेता हैं, नेता प्रतिपक्ष वनलालजॉमा. ये मिजो नेशनल फ्रंट के नेता हैं. वर्तमान में मिजो नेशनल फ्रंट,  नार्थ ईस्ट रीजनल पोलिटिकल फ्रंट, जो पूर्वोत्तर के सारे राजनीतिक पार्टियों का संगठन है, में शामिल है. लेकिन इस विधानसभा चुनाव के लिए उसने भाजपा के साथ चुनावपूर्व गठबंधन करने से इंकार कर दिया है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है या नहीं? हालांकि इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी शायद नए राजनीतिक दल और गठबंधन ही साबित होंगे.

बहरहाल, कई राजनीतिक गठबंधन बनाए गए हैं. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे और भी नई राजनीतिक दल उभरेंगे. राज्य के सेवानिवृत्त धार्मिक पुरोहितों, सरकारी कर्मचारियों और वरिष्ठ पत्रकारों ने मिलकर एक नई राजनीतिक पार्टी जोरम एक्जोडस मूवमेंट (जेईएम) बनाई है. पार्टी ने ऐलान किया कि वे जोरम नेशनलिस्ट पार्टी को  मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेस के साथ जोरम पीपुल्स मूवमेंट के बैनर तले संयुक्त करेंगे.

भ्रष्टाचार विरोधी निगरानी रखने वाली संस्था पीपुल्स राइट्‌स टू इंफोर्मेशन एंड डेवलपमेंट इंप्लीमेंटेशन सोसाइटी ऑफ मिजोरम भी राजनीतिक पार्टी पीपुल्स रिप्रजेंटेशन फॉर आईडेंटिटी एंड स्टेटस ऑफ मिजोरम के रूप में परिवर्तित कर दी गई. अपने दो सदस्यों के साथ मारालैंड डेमोक्रेटिक फ्रंट 25 अक्टूबर 2017 को मारा ऑटोनोमस डिस्ट्रिक काउंसिल के चुनाव में भाजपा के साथ आ गया, जो पहले विरोधी खेमे मिजो नेशनल फ्रंट के साथ गठबंधन में था. एमडीएफ के अध्यक्ष एम लाइको ने इस बाबत कहा कि पार्टी ने भाजपा के साथ इसलिए गठबंधन किया ताकि राज्य में और ऑटोनोमस डिस्ट्रिक काउंसिल में शासित पार्टी कांग्रेस को चुनौती दी जा सके. इससे पहले 2008 और 2013 में उनका एमडीएफ मिजो नेशनल फ्रंट के साथ गठबंधन था.

क्या है ब्रू शरणार्थी मुद्दा

राज्य में ब्रू शरणार्थी मुद्दा भी सरकार के गले की फांस बना हुआ है. इस मुद्दे को लेकर हमेशा से सरकार की किरकिरी होती रही है. गौरतलब है कि वर्ष 1997 में एक मिजो वन अधिकारी की हत्या के बाद शुरू हुई जातीय हिंसा के बाद ब्रू आदिवासी त्रिपुरा के कंचनपुर और पानिसागर के शरणार्थी शिविरों में अपना जीवन काट रहे हैं. दरअसल, 32000 से अधिक रियांग आदिवासी शरणार्थियों को स्थानीय भाषा में ब्रू कहते हैं. इनमें से 11500 मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में शामिल किया गया था, लेकिन विधानसभा की 40 सीटों में से महज 10 निर्वाचन क्षेत्रों में ही इनका नाम शामिल है.

मिजोरम के मम्मित जिले से आए ब्रू जनजाति के लोग अल्पसंख्यक हैं. मिजो वन्य अधिकारी ललजाउमलियाना की हत्या के बाद भड़की हिंसा के कारण ये लोग पलायन करने को मजबूर हुए थे. हालांकि इस घटना के पीछे भूमिगत ब्रू नेशनल लिबरेशन फ्रंट (बीएनएलएफ) का हाथ था. उस समय बीएनएलएफ पश्चिमी मिजोरम के ब्रू बहुल क्षेत्रों में एक स्वायत्त जिला परिषद के निर्माण के लिए मिजोरम के अंदर एक विद्रोही आंदोलन की अगुवाई कर रहा था. पिछले साल अधिकारिक तौर पर त्रिपुरा के कैंपों में 5413 परिवारों के 32857 ब्रू जनजातियों की पहचान स्थानीय मिजोरम के निवासियों के रूप में की गयी थी. और उनकी घर वापसी की बात भी कही गयी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यह कार्य स्थगित कर दिया गया था.

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