स्मिता पाटिल ने बेहतरीन अभिनय के दम पर लोगों के दिलों पर राज किया

नई दिल्ली (प्रवीण कुमार)- हिंदी सिने जगत में गजब की एक्ट्रेस थीं स्मिता पाटिल. स्मिता पाटिल का जन्म 17 अक्टूबर 1955 को पुणे (शिरपुर), डिस्ट्रीक धुले, महाराष्ट्र में हुआ था. फिल्म, टेलीविज़न और थियेटर हर तरफ स्मिता ने अपनी अदाकारी का जादू बिखेरा हुआ था. स्मिता ने अपने करियर में लगभग 80 हिंदी और मराठी फिल्में की. स्मिता की क़ाबिलियत का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि वे अपने जीवन में दो बार नेशनल फिल्म अवार्ड और एक बार फिल्मफेयर अवार्ड भी जीतीं. 1985 में स्मिता पाटिल को पद्मश्री से नवाज़ा गया, जो भारत का चौथा सबसे बड़ा सिविलियन ऑनर अवार्ड है.

मात्र 10 साल के बॉलीवुड करियर में अपने बेहतरीन काम के दम पर लोगों के दिलों पर राज करने वाली एक्ट्रेस स्मिता पाटिल आज भी अपने चाहने वालों के दिलों में बसती हैं. स्मिता को बॉलीवुड की सबसे सफल अभिनेत्रियों में से एक माना जाता है. वे किसी भी रोल को बखूबी निभाने में माहिर थीं. श्याम बेनेगल की फिल्म चरणदास चोर से बॉलीवुड में डेब्यू करने वाली स्मिता ने भले ही महज़ 31 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया हो, लेकिन उनकी ज़िंदगी बहुत बड़ी थी. मंथन -1977, भूमिका-1977, आक्रोश- 1980, चकरा-1981, चिदंबरम- 1985, और मिर्च मसाला- 1985, उनके जीवन की कुछ सर्वश्रेठ फिल्में हैं.

आज भी जब कभी बॉलीवुड के संवेदनशील कलाकारों का ज़िक्र होता है, तो उनमें स्मिता पाटिल का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है. सिनेमा के आकाश पर स्मिता एक ऐसे सितारे की तरह हैं, जिन्होंने अपने सहज और सशक्त अभिनय से कॉमर्शियल सिनेमा के साथ-साथ समानांतर सिनेमा में भी अपनी एक ख़ास पहचान बनाई थी. उनकी जिंदगी के कुछ ऐसे खास पहलू भी हैं, जिनके बारे में बेहद कम लोग जानते होंगे.

ऐसा ही एक खास किस्सा फिल्म मंथन की शूटिंग के दौरान का है. फिल्म की शूटिंग राजकोट से बाहर की जा रही थी. शूटिंग के दौरान स्मिता पाटिल गांव की औरतों के साथ उन्हीं के कपड़े पहनकर बैठी हुई थीं, वहां पर शूटिंग देखने के लिए कॉलेज के कुछ बच्चे आए और उन्होंने पूछा कि इस फ़िल्म की हीरोइन कहां हैं? किसी ने स्मिता की तरफ़ इशारा किया कि वो है, फ़िल्म की हीरोइन, तो उस स्टूडेंट ने कहा कि क्या तुम मज़ाक कर रहे हो, ये गांव की औरत किसी बॉम्बे फ़िल्म की हीरोइन कैसे हो सकती है. यही ख़ासियत थी स्मिता की. वो जो भी करती थीं उस रोल में ढल जाती थीं. वो जो भी कैमरे के सामने करतीं, वो उसका हिस्सा बन जाता था.

फ़िल्म मिर्च मसाला उनके निधन के बाद रिलीज़ हुई, लेकिन इस फ़िल्म में निभाए गए सोन बाई के क़िरदार को उनके  बेहतरीन कार्यों में से एक माना जाता है. इसी फ़िल्म ने निर्देशक केतन मेहता को अन्तरराष्ट्रीय ख्याति दिलवाई. केतन मेहता बताते हैं कि मिर्च मसाला मेरी तीसरी फ़िल्म थी और जब मुझे पता चला कि मेरी स्क्रिप्ट नेशनल फ़िल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन से एप्रूव्ड हो गई है, तो मैं लोकेशन देखने गुजरात गया. उस फ़िल्म में मिर्च का एक अहम रोल है.

जब मैंने वहां जाकर देखा कि मिर्च का सीजन शुरू हो चुका है और ये सीज़न दो महीने बाद ख़त्म हो जाएगा, तो मैं भाग कर बॉम्बे आया और स्मिता से मिला और ये सारी बातें उन्हें बताईं और कहा कि अगर हम चूके  तो अगले साल तक इंतजार करना होगा. स्मिता ने किसी भी तरह और फ़िल्मों की डेट आगे बढ़ा दी और इस फ़िल्म की शूटिंग शुरू की.

उनका नाम स्मिता रखे जाने के  पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है. असल में जन्म के समय उनके चेहरे पर मुस्कराहट देख कर उनकी मां विद्या ताई पाटिल ने उनका नाम स्मिता रख दिया. यह मुस्कान आगे चलकर भी उनके  व्यक्तित्व का सबसे आकर्षक पहलू बना.

स्मिता पाटिल अपने गंभीर अभिनय के लिए जानी जाती हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि फ़िल्मी परदे पर सहज और गंभीर दिखने वाली स्मिता पाटिल असल ज़िंदगी में बहुत शरारती थीं. बताया जाता है कि वे निजी ज़िंदगी में बहुत साधारण थीं. उनके  अंदर ऐसी कोई चाहत नहीं थी कि वे कोई बहुत बड़ी स्टार बनें. ज़िंदगी के प्रति गंभीर होने के साथ-साथ वे बहुत शरारती थीं, बहुत मस्ती करती थीं, उन्हें गाड़ी चलाने का बहुत शौक था. यही कारण है कि 14-15 साल की उम्र में ही उन्होंने चुपके  से ड्राइविंग सीख ली.

फ़िल्मों में आने से पहले स्मिता पाटिल बॉम्बे दूरदर्शन में मराठी में समाचार पढ़ा करती थीं. समाचार पढ़ने से पहले उनके लिए साड़ी पहनना ज़रूरी होता था और स्मिता को जीन्स पहनना अच्छा लगता था, तो स्मिता अक्सर न्यूज़ पढ़ने से पहले जीन्स के ऊपर ही साड़ी लपेट लिया करती थीं.

स्मिता पाटिल को जहां उनके  किरदारों के लिए सराहा गया, वहीं दूसरी तरफ़ एक्टर और पॉलिटिशियन राज बब्बर से जुड़े उनके सम्बन्ध को लेकर उनकी आलोचना भी की गई. उनके  बारे में लोगों ने कहा कि उन्होंने राज बब्बर और नादिरा बब्बर की शादी तुड़वा दी. कहा जाता है कि स्मिता पाटिल की मां स्मिता और राज बब्बर के रिश्ते के ख़िलाफ़ थीं. वे कहती थीं कि महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ने वाली स्मिता किसी और का घर कैसे तोड़ सकती है. स्मिता के लिए उनकी मां रोल मॉडल थीं. लेकिन राज बब्बर से अपने रिश्ते को लेकर स्मिता ने मां की भी नहीं सुनी. उनकी मां को इस बात का दुःख था कि आखिरी समय में उनका रिश्ता अपनी बेटी से ख़राब हो गया. प्रतीक के जन्म के कुछ दिनों बाद 13 दिसंबर 1986 को स्मिता का निधन हो गया.

स्मिता को वायरल इन्फेक्शन की वजह से ब्रेन इन्फेक्शन हुआ था. प्रतीक के पैदा होने के बाद वो घर आ गई थीं. वो बहुत जल्द हॉस्पिटल जाने के लिए तैयार नहीं होती थीं, कहती थीं कि मैं अपने बेटे को छोड़कर हॉस्पिटल नही जाऊंगी. लेकिन जब ये इन्फेक्शन बहुत बढ़ गया, तो उन्हें जसलोक हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया. स्मिता के अंग एक के बाद एक फ़ेल होते चले गए. हालांकि राजबब्बर के साथ रिश्ता भी कुछ बहुत सहज नहीं रह गया था. स्मिता अपने आखिरी दिनों में बहुत अकेला महसूस करती थीं.

स्मिता पाटिल की एक आखिरी इच्छा थी. उनके  मेक अप आर्टिस्ट दीपक सावंत बताते हैं- स्मिता कहा करती थीं कि दीपक, जब मैं मर जाउंगी तो मुझे सुहागन की तरह तैयार करना. ये बहुत दुखद है कि एक दिन मैंने उनका ऐसे ही मेकअप किया. शायद ही दुनिया में ऐसा कोई मेकअप आर्टिस्ट होगा जिसने इस तरह से मेकअप किया हो. मरने के बाद उनकी अंतिम इच्छा के मुताबिक़, स्मिता के शव का सुहागन की तरह मेकअप किया गया था.

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