केरल बाढ़ : प्राकृतिक आपदा की भयावहता मानवनिर्मित होती है

गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा से शुरू होकर महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के बाद कन्याकुमारी तक जाने वाली 1600 किलोमीटर लंबे इलाके को पश्चिमी घाट पर्वतीय श्रृंखला कहा जाता है. यहां के वन भारतीय मॉनसून की स्थिति को भी प्रभावित करते हैं. इस इलाके के पर्यावरण को लेकर केंद्र सरकार ने माधव गाडगिल समिति गठित की थी. इस समिति की रिपोर्ट 2011 तक आ गई थी, लेकिन यह जारी नहीं हो सकी.

pralayएक राज्य का 80 फीसदी हिस्सा बाढ़ग्रस्त हो, 10 लाख लोग राहत शिविरों में हों, 300 से अधिक मौतें हो जाएं, सड़क-संचार सुविधा ध्वस्त हो गई हो और मीडिया से लेकर सरकार तक इसे सिर्फ प्राकृतिक आपदा का कहर मानकर, कुछ सौ करोड़ रुपए बांट कर शांत हो जाएं, तो निश्चित समझिए कि हम एक और ऐसे ही आपदा के लिए परिस्थितियों का निर्माण कर रहे हैं. यह सच है कि अनुमान से अधिक बारिश और फिर बांध से छोड़े गए पानी की वजह से केरल में यह भयानक बाढ़ आई.

लेकिन केरल की यह बाढ़ इतनी भयावह बन गई, इसमें हम जनता और हम जनता की चुनी सरकारों और सरकारी संस्थानों की भूमिका भी है. वैसे जब खतरा घर में पहुंच जाता है, तब एक अच्छी बात यह होती है कि पूरे देश की जनता पीड़ितों की मदद करने के लिए आगे आ जाती है. केरल की बाढ़ में भी देशभर से लोगों ने मदद पहुंचाई. हालांकि बाढ़ के दौरान अफरातफरी का माहौल ऐसा रहा कि राज्य सरकार भी पूरे भरोसे के साथ यह बताने में असफल रही कि बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों/पीड़ितों की वास्तविक संख्या क्या है. लेकिन स्थानीय और अन्य राज्यों से पहुंचे लोगों समेत सेना के जवानों ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए बाढ़ पीडितों की मदद की.

इधर, केंद्र सरकार ने कहा कि बाढ़ प्रभावित केरल को अभी 600 करोड़ रुपए की रकम अग्रिम सहायता के तौर पर दी जा रही है और आगे भी जरूरत के हिसाब से पैसा दिया जाएगा. प्रधानमंत्री ने 17-18 अगस्त 2018 को राज्य का दौरा किया था और उनके निर्देश पर कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति ने 16 से 21 अगस्त के बीच प्रतिदिन बैठक कर राहत और बचाव कार्यों का जायजा लिया. इसके बाद, केंद्र की तरफ से व्यापक स्तर पर राहत और बचाव अभियान चलाया गया. सबसे बड़े राहत अभियान में 40 हेलीकॉप्टर, 31 विमान, 182 राहत दल, रक्षा बलों के 18 चिकित्सा दल, एनडीआरएफ के 58 दल, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की सात कंपनियां शामिल की गईं. साथ ही, 500 नौकाएं भी राहत कार्य के लिए लगाई गई थीं.

ग़लती कहां हुई?

जुलाई में एक सरकारी रिपोर्ट आई थी. यह रिपोर्ट बताती है कि राज्य जल संसाधनों का प्रबंधन दक्षिण भारतीय राज्यों में सबसे ख़राब स्तर पर है. केरल की स्थिति इस मामले में बहुत खराब है और यह इस मामले में 12वें स्थान पर है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर प्रशासन 30 बांधों से समयबद्ध तरीके से धीरे-धीरे पानी छोड़ता, तो केरल में आई बाढ़ इतनी भयावहता नहीं धारण कर पाती. गौरतलब है कि केरल बाढ़ के दौरान ही 80 से अधिक बांधों से पानी छोड़ा गया था. केरल में 40 से अधिक नदियां बहती हैं.

बांध और जल प्रबंधन एक्सपर्ट हिमांशु ठक्कर के मुताबिक, इडुक्की और इडामाल्यार बांध से पानी छोड़ने से केरल की बाढ़ विनाशकारी बन गई, जबकि पहले से ही वहां भारी बारिश हो रही थी. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी अपनी एक रिपोर्ट में बाढ़ की दृष्टिकोण से केरल को सबसे असुरक्षित 10 राज्यों में रखा था. सवाल है कि जब देश में आपदा प्रबंधन नीतियां हैं, तो फिर ऐसी रिपोट्‌र्स और आकलन पर पहले से ही क्यों नहीं ध्यान दिया जाता है. यह भी सवाल है कि क्या केरल को केंद्रीय जल आयोग ने बाढ़ की चेतावनी दी थी. इसका जवाब है, नहीं. खबर तो यह भी है कि केंद्रीय जल आयोग के पास बाढ़ को लेकर कोई फॉरकास्टिंग-मैकेनिज्म नहीं है, न तो पानी के स्तर को लेकर और न ही पानी का बहाव कितना है इसे लेकर.

पर्यावरणविद केरल के इस भयानक बाढ़ की कुछ और भी वजहें मानते हैं. उनका मानना है कि जंगलों की कटाई ने भी बाढ़ की इस भयावहता को बढ़ा दिया. भारत के अन्य राज्यों में भी बाढ़ का कहर विनाशकारी बना है, जहां वनों की अंधाधुंध कटाई हुई है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, केरल की बाढ़ से एक नए खतरे का पता चलता है और वह है बांधों से पैदा होने वाला ख़तरा. पर्यावरणविदों का मानना है कि अगर हमने बाधों का संचालन और प्रबंधन ठीक से नहीं किया, तो आने वाले समय में ऐसी आपदाएं आती रहेंगी. नवंबर 2015 में चेन्नई की बाढ़ के जो मूल कारण थे, 2018 के केरल की बाढ़ के भी तकरीबन वही कारण हैं. केरल में बारिश और बाढ़ के बाद आई भीषण तबाही के पीछे यहां के विकास मॉडल और पर्यावरणीय चिंताओं को नजरअंदाज करना भी प्रमुख कारण माना जा रहा है.

इस भयंकर बाढ़ से अब तक 20 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है. केरल में इस मॉनसून सीजन में 42 फीसदी ज्यादा बारिश हुई. तीन जिलों को छोड़कर बाकी के 11 जिलों में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई. इडुैक्की में सबसे ज्यादा बारिश हुई, जो सामान्य से 92 फीसदी ज्यादा है. पलक्कड में 72 फीसदी, तो कोट्‌टायम में 51 फीसदी ज्यादा बारिश हुई. जानकारों के मुताबिक, बांधों के संचालन में भी गड़बड़ी हुई. बांधों से धीरे-धीरे पानी छोड़ने के बजाय इंतजार किया गया. जब जलाशय लबालब हो गए, तब बांधों के गेट खोले गए, जिनसे निकले पानी की तेज धारा सैकड़ों जिंदगियों को रौंदते हुए गुजरी. प्रदेश के 80 बांध जब लबालब हो गए, तब गेट खोले गए. बांधों से बड़ी मात्रा में अचानक पानी छोड़ने से हालात और बिगड़ गए.

सरकारी लापरवाही

साइंटिस्ट माधव गाडगिल के मुताबिक, केरल आपदा की वजह मानवीय भी है. उन्होंने कहा है कि अत्यधिक बारिश के अलावा केरल में पिछले कुछ सालों में हुआ विकास भी इस बाढ़ की विभीषिका को न झेल पाने की वजह बना है. उनका कहना है कि अगर समुचित कदम उठाए गए होते, तो यह देखने को नहीं मिलता. सरकार ने गाडगिल समिति की अनदेखी भी की है, जो खतरे की मूल वजह बताती है.

गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा से शुरू होकर महाराष्ट, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के बाद कन्याकुमारी तक जाने वाली 1600 किलोमीटर लंबे इलाके को पश्चिमी घाट पर्वतीय श्रृंखला कहा जाता है. यहां के वन भारतीय मॉनसून की स्थिति को भी प्रभावित करते हैं. इस इलाके के पर्यावरण को लेकर केंद्र सरकार ने माधव गाडगिल समिति गठित की थी. इस समिति की रिपोर्ट 2011 तक आ गई थी, लेकिन यह जारी नहीं हो सकी. जब गाडगिल समिति का राज्यों ने विरोध किया, तो सरकार ने कस्तूरीरंगन समिति का गठन किया. इसने अप्रैल, 2013 में गाडगिल समिति पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी. इसने गाडगिल समिति की कई सिफारिशों को बदल दिया था.

गाडगिल समिति ने पश्चिमी घाटों को पारिस्थितिकी के लिए पूरी तरह संवेदनशील घोषित किया था और यहां पर सीमित खनन का पक्ष लिया था. गाडगिल समिति ने तो पूरे पश्चिमी घाट को ईको सेंसेटिव जोन (ईएसजेड) के तौर पर चिह्नित किया था, लेकिन कस्तूरीरंगन समिति ने इसकी तीन श्रेणियां बनाईं. कस्तूरीरंगन समिति ने ईएसजेड में पश्चिमी घाट के 37 प्रतिशत हिस्से को चिह्नित किया, जो करीब 60,000 हेक्टेयर का था और यह गाडगिल समिति के प्रस्तावित 1,37,000 हेक्टेयर से कम है. गाडगिल समिति ने कृषि क्षेत्रों में कीटनाशकों और जीन संवर्धित बीजों के उपयोग पर रोक लगाने से लेकर पनबिजली परियोजनाओं को हतोत्साहित करने और वृक्षारोपण के बजाय प्राकृतिक वानिकी को प्रोत्साहन देने की सिफारिशें की थी.

इसके अलावा 20,000 वर्ग मीटर से अधिक बड़ी इमारतों के निर्माण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की बात कही थी. पनबिजली परियोजनाओं के बारे में समिति ने नदियों में पर्याप्त जल प्रवाह और परियोजनाओं में अंतराल की भी कठिन शर्तें तय की थी. गाडगिल कमेटी ने कहा कि कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण होने और वनों के कम होने से कई जलाशयों में सिल्ट जमा हो गई थी. डॉ. गाडगिल मानते हैं कि इडुक्की बांध इसका उदाहरण है कि कैसे पूरे कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण हो गया है. गौरतलब है कि केरल में इसी बांध से अधिकतम तबाही फैली है. उन्होंने कहा है कि केरल के अलावा उत्तराखंड में हो रहा निर्माण भी चिंता का विषय है.

गाडगिल कमेटी रिपोर्ट की अनदेखी पड़ी भारी

गाडगिल रिपोर्ट में पूरे पश्चिमी घाट को पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील घोषित करने की सिफ़ारिश की गई थी. पश्चिमी घाट को तीन ख़ास पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील जोन में विभाजित किया गया था. रिपोर्ट में कहा गया था कि पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील जोन वन में बड़ी स्टोरेज वाला कोई भी नया बांध नहीं बनाया जाना चाहिए. रिपोर्ट के मुताबिक, इस जोन में अथिराप्पिल्ली और गुंडिया हाइडल प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण की मंज़ूरी नहीं दी जानी चाहिए. अगर इस रिपोर्ट के सुझावों पर सरकार अमल करती, तो पूरे इलाके में अंधाधुंध खनन और निर्माण का काम काम रुक जाता, नदियों के किनारे निर्माण नहीं होता और दलदली जमीनों का अतिक्रमण नहीं होता. लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया.

सरकार ने फिर कस्तूरीरंगन कमेटी बना दी, जिसने गाडगिल रिपोर्ट को कमजोर बना दिया. कस्तूरीरंगन कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर पर्यावरण मंत्रालय ने पश्चिमी घाट के क़रीब 57 हज़ार वर्ग किलोमीटर इलाके को ही पर्यावरण के लिहाज़ से संवेदनशील माना. इस पूरे इलाके में खनन, बड़े निर्माण, थर्मल पावर प्लांट और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर पूरी तरह पाबंदी लग गई. केरल में इसके तहत, 13,108 वर्ग किलोमीटर में पाबंदी लगनी थी, लेकिन केरल सरकार ने इसका विरोध किया. इसके बाद, केरल के पश्चिमी घाट में पड़ने वाला सिर्फ 9994 वर्ग किलोमीटर इलाका ही नोटिफाई किया गया. नतीजा, आज केरल में आई बाढ़ की विभिषिका के रूप में देखने को मिल रहा है.

घर लौट रहे लोग, अब भी 10 लाख राहत शिविर में

बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे केरल में जिंदगी अब धीमी गति से ही सही, पटरी पर वापस लौटने लगी है. देश-विदेश से लोग सीएम फंड में पैसा भेज रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक, 23 अगस्त तक इस फंड में 539 करोड़ की राशि जमा हो चुकी थी. राहत शिविरों में रह रहे लोग अपने घरों को वापस लौटने लगे हैं. हालांकि राज्य के 2,770 बाढ़ राहत शिविरों में अब भी 10.40 लाख लोग रह रहे हैं. बाढ़ का पानी कम होने के बाद अब तक पिछले कुछ दिनों में करीब पांच लाख लोग अपने घर जा चुके हैं.

मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा है कि राज्य सरकार अब प्रभावित लोगों के पुनर्वास और प्रदेश के दोबारा निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर रही है. राज्य में सफाई प्रक्रिया के बारे में उन्होंने कहा कि सफाई अभियान पहले से ही शुरू हैं और अब तक 37,000 से ज्यादा कुएं और 60,000 से ज्यादा घर साफ किए जा चुके हैं. उन्होंने कहा कि बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद करके हम ओणम त्योहार का उत्सव मनाएंगे. ऐसी योजनाएं बनाई जा रही हैं कि लोगों को बाढ़ से क्षति पहुंचे घरों के पुनर्निर्माण के लिए ब्याज मुक्त ऋण दिया जाए.

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