बर्बर राज की आहट

bihar-1याद है हमें जब लालू-राबड़ी के लंंबे शासनकाल के अंत के बाद साल 2005 में नीतीश कुमार की सरकार बनी, तो बिहार के अखबारों ने दुर्गा पूजा के समय सुर्खियां बनाई थी, ‘भय का रावण भागा-रात भर पटना जागा.’ मां दुर्गा के एक बार फिर आने का समय हो गया है. दुर्गा पूजा को लेकर पंडाल सजने लगे हैं, लेकिन अब अखबारों की सुर्खियां कुछ और ही बयां कर रही हैं. दिनदहाड़े हत्या, बलात्कार और बैंक लूट की घटनाओं की खबरों से अखबार पटे पड़े हैं. कहा जा रहा है कि सरकार के संरक्षण में बच्च्यिों की अस्मत लूटी जा रही है. कोर्ट परिसर और राजधानी पटना के पॉश इलाकों में एके-47 की गोलियों से सीना छलनी हो रहा है और सुशासन की सरकार बस एक मूक दर्शक और याचक की भूमिका में नजर आ रही है. हद तो यह है कि सूबे के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी हाथ जोड़कर अपराधियों से फिलहाल अपराध न करने की अपील कर रहे हैं. कहिए तो बेहतर बिहार की तस्वीर खून के धब्बों से बदरंग हो रही है. यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि जंगलराज लौट आया है, पर इतना कहने से परहेज नहीं किया जा सकता कि इसकी आहट सुनाई पड़ने लगी है और अगर सुशासन इसी तरह लाचार और मौन रहा तो एक बार फिर पुराने बिहार की तरह खून से लथपथ सूबे की तस्वीर रोजाना देश और दुनिया के लोग देखेंगे और थू-थू करेंगे.

आखिर बिहार को किसकी नजर लग गई. जिस बिहार को लेकर यह छवि बन गई थी कि बिहार में कुछ हो सकता है, वहीं अब लोग कहने लगे हैं कि यहां कुछ नहीं हो सकता है. नवंबर 2005 में लालू-राबड़ी शासन को खत्म कर नीतीश कुमार एक हीरो की तरह उभरे और छा गए. कानून का डंडा अपराधियों पर ऐसा चला कि या तो वे सूबा छोड़कर भाग गए या फिर सलाखों के पीछे कर दिए गए. दशकों से बिहार में जड़ जमा चुके संगठित अपराधों पर नीतीश कुमार ने ऐसा कानूनी बम गिराया कि अपराधियों की जान पर आफत आ गई और यह सूबा धीरे-धीरे चैन की सांस लेने लगा. नीतीश कुमार ने अपने प्रशासन को खुली छूट दी और साफ कह दिया कि अपराध और भ्रष्टाचार के साथ कोई समझौता नहीं होगा, जीरो टॉलरेंस की नीति को अमल में लाइए और बिहार को अपराध और  भ्रष्टाचारजैसी बीमारियों से मुक्त कर दीजिए. नीतीश कुमार के इस फरमान का ऐसा असर हुआ कि देश दुनिया में बिहार की छवि बदलने लगी. अपने को बिहारी कहने से हिचकने वाले लोग भी अब सीना तानकर खुद को बिहारी कहने लगे.

विकास का माहौल बना और पूरे सूबे में आधारभूत संरचनाओं का ढांचा खड़ा होने लगा. नए स्कूल-अस्पताल बने और सड़कों का जाल बिछा दिया गया. पुल-पुलियों के निर्माण के जरिए नीतीश कुमार ने बिहार के लोगों के जीवन स्तर को सुधारने का भागीरथ प्रयास किया. उन्हें कामयावी भी मिली और इसी का नतीजा था कि सूबे की जनता ने एक बार फिर भारी बहुमत से उन्हें बिहार का मुकुट पहना दिया. नीतीश कुमार के क्रियाकलापों पर बारीक नजर रखने वाले बताते हैं कि अपनी दूसरी पारी में नीतीश कुमार पूरी लय में नहीं थे. यह लय और पूरी तरह से खराब हुई, जब राजद के साथ मिलकर नीतीश कुमार ने सरकार बनाई. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यह गठबंधन टूटा और भाजपा के साथ एक नई सरकार सूबे में अस्तित्व में आई.

अपराध का पोषक बना भ्रष्टाचार

कहा जाता है कि भ्रष्टाचार और अपराध एक दूसरे के पूरक हैं. जिस समाज में भ्रष्टाचार अधिक होगा, वहां अपराध भी बढ़ेगा. इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि हिंसा या अपराध का पोषण भ्रष्टाचार के सहारे होता है. ऐसे में अगर बिहार की बात करें, तो तमाम कोशिशों के बावजूद यहां न तो अपराध कम हुआ है और न ही भ्रष्टाचार रुकने का नाम ले रहा है. बीते कु छ महीनों में भ्रष्टाचार की लम्बी श्रृंखला उजागर हुई है. इनमें सृजन नामक एनजीओ से जुड़ा दो हजार करोड़ का घोटाला, शौचालय निर्माण घोटाला, महादलित विकास फंड घोटाला आदि शामिल हैं. इसी तरह पिछले छह महीनों में अपराध की घटनाओं में कहीं कोई कमी नहीं आई है. दर्जनों बैंक लूट की घटनाओं के साथ सूबे में अपराध का ग्राफ रोजाना बढ़ रहा है. पिछले दो महीने में घटित कुछ आपराधिक घटनाओं ने बिहार को शर्मशार करना शुरू कर दिया. मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड ने अचानक बिहार को जंगलराज की सुर्खियों में ला दिया.

कहा गया कि सरकार की नाक के नीचे लड़कियों का बलात्कार होता रहा और सब कुछ जानते-समझते हुए भी सरकार सोई रही. ठीक उसके बाद सीतामढ़ी कोर्ट परिसर में डबल मर्डर कांड का अपराधी संतोष झा एके-47 से भून दिया गया. यह आग बुझी भी नहीं थी कि पूर्णिया बाल सुधार गृह में दो बच्चों की हत्या कर दी गई. हद तो तब हो गई जब अति सुरक्षित क्षेत्र कोतवाली थाना पटना के पास शहाबुद्दीन के शूटर तवरेज को भून दिया गया. इसके बाद जब पूर्व मेयर समीर सिंह मुजफ्परपुर में एके-47 से छलनी हुए, सूबे के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी अपराधियों से हाथ जोड़कर यह अपील करते नजर आए कि फिलहाल हत्या करना छोड़ दीजिए. सुशासन का दम भरने वाली सरकार के नंबर दो की यह अपील बताती है कि नीतीश सरकार का इकबाल कितना घट गया है.

अपराध का राजनीतिक समीकरण

नीतीश कुमार के काम करने के तरीके को समझने वाले लोगों का कहना है कि भाजपा के साथ गठबंधन के बाद प्रशासनिक फैसलों में मुख्यमंत्री का दबदबा कम हुआ है. इसे नीतीश कुमार की राजनीतिक मजबूरी के तौर पर देखा जा सकता है. भाजपा के साथ अपनी इस नई पारी में नीतीश कुमार सब कुछ अपने मनमुताबिक नहीं कर पा रहे हैं. न केवल भाजपा, बल्कि अपनी पार्टी के कुछ नेताओं का भी दबाव नीतीश कुमार के ऊपर होता है. अपने एक मित्र के साथ अनौपचारिक बातचीत में नीतीश कुमार कह रहे थे, ‘अरे क्या करें, मुंगेर में कुछ बदलिए तो ललन बाबू को दिक्कत है और मधेपुरा में कुछ करिए तो विजेंद्र बाबू को. बिहार में काम करना इतना आसान नहीं है.’

सभी जानते हैं कि डीजीपी का नाम फाइनल करने में मुख्यमंत्री को भाजपा के भारी दबाव का सामना करना पड़ा. भाजपा के बड़े नेताओं के जिलों में प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती में नीतीश कुमार स्वतंत्र तौर पर निर्णय नहीं ले पा रहे हैं. गठबंधन सरकार चलाने की मजबूरी ने नीतीश कुमार के हाथ बांध रखे हैं. इसका काफी बुरा असर सूबे की कानून व्यवस्था पर पड़ रहा है. लालू प्रसाद कहते हैं कि ‘सरकार हनक से चलती है पर यह सरकार तो मिमिया रही है, अपराधियों के आगे हाथ जोड़ रही है.’ जहानाबाद के सांसद अरुण सिंह का कहना है कि ‘सरकार किस मुंह से सुशासन की बात करती है. दिनदहाड़े एके-47 से गोलियां निकल रहीं हैं और सरकार कहती है कि सब कुछ नियंत्रण में है.’

दरअसल, नीतीश कुमार अफसर के चश्में से बिहार को देख रहे हैं, जिस दिन वे जनता के चश्मे से बिहार को देखेंगे उन्हें बिहार की हकीकत का अहसास हो जाएगा. चर्चा यह भी है कि भाजपा को यह लगता है कि नीतीश कुमार की छवि को जितना धक्का लगेगा, सीट शेयरिंग में वे उतने ही नियंत्रण में रहेंगे. लोकसभा चुनाव चूंकि नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा जाना है, इसलिए नीतीश की छवि का कोई प्रतिकूल असर चुनाव परिणामों पर नहीं पड़ेगा. उलटे नीतीश कुमार जी-जान से एनडीए को विजयी बनाने का प्रयास करेंगे, ताकि विधानसभा चुनाव के लिए जमीन तैयार की जा सके.

कानून व्यवस्था बनाए रखने में नीतीश कुमार के हाथ बंधे हैं, इसे अब जमीन पर महसूस किया जाने लगा है. अफसरों पर उनके आदेशों का वैसा असर नहीं हो रहा है, जो कुछ साल पहले हुआ करता था. एनडीए में रहने के बावजूद, उपेंद्र कुशवाहा कई दफा बिहार की गिरती कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा चुके हैं. सवर्णों के मार्च पर हुए लाठीचार्ज के खिलाफ भाजपा सांसद सी पी ठाकुर अनशन करने जा रहे हैं. कहा जाए तो एनडीए के सहयोगी दल भी नीतीश कुमार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. हालांकि जद (यू) के नेता बार-बार आरोप लगा रहे हैं कि राजद के लोग साजिश के तहत आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं. पूर्व सांसद रघुवंश सिंह कहते हैं कि ‘नीतीश कुमार अपनी नाकामियों के लिए राजद पर दोष मढ़ रहे हैं.

पुलिस प्रशासन अब उनके बस में नहीं है. उन्हें तत्काल इस्तीफा देकर नया चुनाव कराना चाहिए.’ जाहिर है, कानून-व्यवस्था को लेकर नीतीश की जितनी फजीहत होगी, उसका सीधा लाभ एनडीए के सहयोगी दलों को मिलेगा, खासकर इमेज बनाने में. उपेंद्र कुशवाहा को सीएम के तौर पर प्रोजक्ट होना है, तो नीतीश कुमार को हटना होगा और भाजपा को नीतीश कुमार को काबू में करना है, तो उनके सुशासन के दावे को कमजोर दिखाना होगा, भले ही इसके लिए जिम्मेदार कोई भी हो.

अपराध का सामाजिक समीकरण

चर्चा आम है कि दारू और बालू ने नीतीश कुमार का भट्‌ठा बैठा दिया है. शराबबंदी और बालूबंदी ने सूबे में अपराध को निश्चत तौर पर बढ़ाया है. गौरतलब है कि शराब और बालू के कारोबार पर यादव समाज का दबदबा रहा है. दोनों ही कारोबार में अकूत कमाई के कई रास्ते हैं, जिनसे यह समाज तेजी से फल-फूल रहा था. लेकिन नीतीश कुमार ने दोनों ही कारोबार पर ताला लगाकर इस समाज के एक बहुत बड़े तबके को नाराज कर दिया. खासकर बालू पर रोक के कारण निर्माण कार्य से जुड़े अन्य समाज के लोग भी नीतीश कुमार को कोस रहे हैं. इन दोनों कारोबार पर निचले स्तर से जुड़े लोगों ने लाचारी में एक बार फिर अपराध का रास्ता चुन लिया. इधर एससी-एसटी एक्ट में हुए संशोधन से अगड़ी जाति के युवकों में भी नाराजगी है. सवर्णों की रैली पर जिस  बेरहमी से लाठीचार्ज हुआ, उससे इस समाज में गुस्सा है. सीपी ठाकुर तो इस मामले को लेकर अनशन भी करने वाले हैं. हालत यह है कि नीतीश कुमार को समाज के सभी आक्रमक जाति समूहों का विरोध झेलना पड़ रहा है, जिसकी झलक अपराध की अलग-अलग घटनाओं में साफ दिखाई पड़ रही है. नीतीश कुमार ने सभी डीएम और एसपी के साथ आपात बैठक कर स्थिति को सुधारने का निर्देश दिया है.

लेकिन इसके बावजूद, हालात बहुत सुधरे हुए नहीं दिखते हैं. सुशासन के साथ विकास का नीतीश कुमार का नारा हाशिये पर जा रहा है और सत्ता के शीर्ष पर बैठकर मुख्यमंत्री केवल निहार रहे हैं. उनकी आंखों के सामने सुशासन की हत्या हो रही है और वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं. सूबे के राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों में नीतीश कुमार ऐसे उलझ गए हैं कि सुशासन उनकी बांहों में ही दम तोड़ रहा है. बिहार को नीतीश कुमार से ढेरों उम्मीदें हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि मुख्यमंत्री तमाम बाधाओं को दूर कर 2005 वाले तेवर में आएंगे और सुशासन के साथ विकास वाले अपने मूलमंत्र को बचा ले जाएंगे. अगर ऐसा न हुआ, तो न बिहार बचेगा और न बिहारी.


मैं अपराधियों से भी हाथ जोड़ कर आग्रह करूंगा कि कम से कम पितर-पक्ष में तो छोड़ दीजिए. बाकी दिन तो आप, मना करें न करें, कुछ न कुछ करते रहते हैं.

-सुशील मोदी, उप-मुख्यमंत्री, बिहार


भाजपा नेताओं से जुड़े हैं समीर हत्याकांड के तार

बिहार को जातीय संघर्ष में झोंकने की तैयारी!

-सुरेश  त्रिवेदी

यूं तो बिहार और अपराध का रिश्ता काफी पुराना है, लेकिन मुजफ्फरपुर के पूर्व मेयर समीर कुमार की 23 सितम्बर को हुई सनसनीखेज़ हत्या ने बिहार में बढ़ रहे अपराधों की एक नई इबारत लिख दी है. सरेशाम हुई इस दिल दहलाने वाली घटना को अंजाम देने वाले अपराधियों और उनके आकाओं के नाम आम लोगों की जुबान पर हैं, लेकिन पुलिस उन्हें सीधे दबोचने के बजाए तरह-तरह की कहानियां गढ़ने में जुटी हुई है. सूत्रों का दावा है कि इस हत्याकांड के तार भाजपा के कुछ रसूखदार नेताओं से भी जुड़े हैं. बताते हैं कि इस हत्याकांड की जांच के लिए गठित एस.आई. टी. द्वारा अब तक गिरफ्त में लिए गए छह संदिग्धों ने भी हत्या की सुपारी देने वाले आकाओं के नाम जांच एजेंसी के सामने कबूल किए हैं. लेकिन मामला भाजपा नेताओं से जुड़ा होने के कारण पुलिस अभी असली गुनहगारों पर हाथ डालने से कतरा रही है.

दरअसल, पूर्व मेयर समीर कुमार की हत्या की पृष्ठभूमि आठ साल पुराने नवरुणा हत्याकांड से जुड़ी है. रहस्यमय परिस्थितियों में हुई एक लड़की की हत्या के इस मामले की जांच सी.बी.आई. कर रही है. इस हत्याकांड में कई बड़े और रसूखदार नाम संदेह के घेरे में हैं. शक की सुई पुलिस के एक आला अधिकारी पर भी है. पूर्व मेयर समीर इस हत्याकांड में महत्वपूर्ण गवाह थे. वे 28 सितम्बर को इस केस के बतौर गवाह अदालत में पेश होने वाले थे. कहा जाता है कि इस गवाही को लेकर एम.एल.सी. दिनेश सिंह खासे परेशान थे. चर्चा है कि इसी वजह से दिनेश सिंह ने पूर्व मेयर के सारे राजनैतिक और व्यावसायिक विरोधियों को एकजुट किया और फिर करीब डेढ़ महीना पहले पूर्व मेयर समीर कुमार की हत्या की पटकथा लिखी गई.

पूर्व मेयर की हत्या के पीछे प्रॉपर्टी माफियाओं के बीच छिड़ी हिंसक-प्रतिस्पर्धा भी एक ख़ास वजह बताई जा रही है. सच्चाई यह है कि मुजफ्फरपुर का मेयर बनने के बाद समीर दबंग लोगों का एक ग्रुप बनाकर खुद प्रॉपर्टी के कारोबार में लग गए थे. उनके प्रॉपर्टी के धंधे में सुशील, आशुतोष शाही, अरुण ठाकुर और उद्धव साझीदार थे. पिछले दिनों उन्होंने सहारा समूह की एक बड़ी प्रॉपर्टी खरीदने की डील की. इस डील में अन्य लोगों के अलावा श्याम नंदन मिश्र ने भी पैसा लगाया था. किन्हीं कारणों से यह लैंड-डील रद्द हो गई. इसके बाद जब श्याम नंदन ने अपने डेढ़ करोड़ वापस मांगे, तो पूर्व मेयर ने अपने पालतू गुंडों से श्याम नंदन की पिटाई करा दी. इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी राजनैतिक पहुंच और दबदबे के बूते श्याम नंदन को एक झूठे मुकदमें में जेल भी भिजवा दिया. श्याम नंदन इससे आग बबूला हो गया और समीर से अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए रात दिन तड़पने लगा. कहा जाता है कि बदले की आग में झुलस रहे श्याम नंदन ने ही पूर्व मेयर समीर की हत्या की सुपारी के लिए पैसों का प्रबंध किया.

समीर हत्याकांड की जड़ में एक और वजह भी बताई जा रही है. आज से तकरीबन डेढ़ साल पहले सर सी.पी.एन. सिंह की एक जमीन का समीर गुट से सौदा हुआ. इस बेशकीमती जमीन को हासिल करने में दो और दबंग भू-माफियाओं शम्भू एवं मंटू की भी दिलचस्पी थी. जब यह डील आगे नहीं बढ़ी, तो मंटू और गोविन्द नाम के एक अपराधी ने मिलकर झगड़ा खड़ा कर दिया, जिससे यह सौदा भी रद्द हो गया. मंटू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जबकि शंभू ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. जेल से बाहर आने के बाद शंभू और मंटू के बीच किसी बात को लेकर मतभेद हो गया. नतीजतन, शंभू ने तो जरायम की दुनिया से किनारा कर लिया, लेकिन मंटू ने अपना धंधा जारी रखा. उसने गोविन्द के साथ मिलकर नया गुट बनाया और प्रॉपर्टी के बिजनेस में जोर-शोर से लग गया. मंटू सी.पी.डब्लू.डी के ठेकेदारों और दूसरे प्रॉपर्टी डीलरों पर अपनी धौंस ज़माना चाहता था. उसकी हसरत प्रॉपर्टी बिजनेस का शहंशाह बनने की थी. इस पूरे गोरखधंधे में गोविन्द उसका मुखौटा था.

बहरहाल, जमीन की खरीद-फरोख्त के धंधे में जब प्रतिस्पर्धा बढ़ी, तो पूर्व मेयर समीर के खिलाफ उनके सारे विरोधी लामबंद हो गए. उन्हें एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई एम.एल.सी दिनेश सिंह ने. दिनेश सिंह अपने राजनीतिक भविष्य के लिए सबसे बड़ा कांटा समीर को ही मानते थे. खासकर नवरुणा हत्याकांड में वे समीर की गवाही को अपने खिलाफ अहम सबूत मानते थे. दिनेश सिंह की चिंता यह थी कि अगर समीर ने तनकर गवाही दे दी, तो नवरुणा कांड में वे जरूर नप जाएंगे. राजनैतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि समीर जल्द ही कांग्रेस में शामिल होने वाले थे, क्योंकि पूर्व मेयर का जिले के सवर्ण मतदाताओं पर गहरा प्रभाव था. इसलिए भी वे लगातार दिनेश सिंह की आंखो की किरकिरी बने हुए थे.

सूत्रों का दावा है कि हितों के टकराव की जद में सिर्फ और सिर्फ पूर्व मेयर समीर ही थे. लिहाजा, उन्हें रास्ते का सबसे बड़ा कांटा मानकर हटाने का ताना-बाना बुना गया. तकरीबन डेढ़ माह पहले दिनेश सिंह की सरपरस्ती में पटना के एक होटल में श्याम नंदन, जुगनू ओझा, गोविन्द और एक अन्य अपराधी के बीच समीर कुमार को ठिकाना लगाने की साजिश रची गई. इसके लिए बाकायदा हत्या की सुपारी दी गई. हमलावर अपराधियों को हथियार, संभवतः एके-47 गोविन्द ने मुहैया कराई, जबकि पैसों का इंतजाम श्याम नंदन ने किया.

घटना के दिन हमलावरों ने पूर्व मेयर समीर का अखाड़ा घाट के करीब बने उनके होटल से पीछा करना शुरू किया. इस होटल के सामने बने एक प्राइवेट नर्सिंग होम से उनपर नज़र रखी जा रही थी. समीर के हर मूवमेंट की खबर भाड़े के हत्यारों को कोई और नहीं, बल्कि इसी नर्सिंग होम का एक कंपाउंडर दे रहा था. बताते हैं कि इसी नर्सिंग होम में घटना के कुछ दिन पहले गोविन्द की पत्नी ने अपने बच्चे को जन्म दिया था.

खबर तो यह भी है कि हत्या को अंजाम देने के बाद हमलावरों ने अपने हथियार जौहरी बाज़ार में रखे. बाद में उन्हें असली ठिकाने पर पहुंचाने का काम हनुमान और कृष्णा ने किया. इनमें हनुमान फिलहाल एस.आई.टी. की गिरफ्त में है, जबकि कृष्णा फरार बताया जाता है. सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि समीर हत्याकांड में इस्तेमाल की गई एके-47 रायफल दरअसल मंटू शर्मा की है, जिसे उसने अपने पार्टनर गोविन्द को दे रखा था. सूत्रों के मुताबिक़, हत्या में प्रयुक्त हथियार अभी भी गोविन्द के करीबी दोस्त विशाल जौहरी के पास हैं, जिसकी जौहरी कोठी में दुकान है. पुलिस अगर कृष्णा, कंपाउंडर और विशाल जौहरी को पकड़कर कड़ाई से पूछ-ताछ करें तो न केवल इस हत्याकांड की परत-दर-परत सच्चाई खुल सकती है, बल्कि हत्याकांड के असली गुनहगारों के चेहरे भी बेनकाब हो जाएंगे.

लोगों का यह मानना है कि दिनेश सिंह का कोई राजनैतिक दीन-ईमान नहीं है. वे सुविधा और सम्बन्धों की सियासत करते हैं. तभी तो वे खुद जद (यू) से एमएलसी हैं, जबकि उनकी पत्नी अभी भी भाजपा में हैं. सूत्र बताते हैं कि दिनेश सिंह का बिहार पुलिस मुख्यालय में तैनात दो चर्चित आईपीएस अधिकारियों के घर और दफ्तर भी काफी आना-जाना है. हत्याकांड के एक अन्य संदिग्ध गोविन्द से भी इन दोनों अधिकारियों के नजदीकी रिश्ते थे और वो भी अक्सर पुलिस मुख्यालय आता-जाता था. सूत्रों का दावा है कि अगर पुलिस मुख्यालय में लगे सीसीटीवी की पिछले दो महीनें की फुटेज खंगाली जाए, तो समीर हत्याकांड में सबकुछ दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.

दिलचस्प बात यह है कि समीर हत्याकांड के बाद बिहार में एक नए जातीय-संघर्ष की भूमिका लिखने की तैयारी चल रही है. बेहद शातिराना अंदाज में इसे सवर्ण बनाम पिछड़ा का रूप देने की कोशिशें तेज हो गई हैं. चूंकि पूर्व मेयर समीर अगड़ी भूमिहार बिरादरी के हैं, इसलिए हवा यह फैलाई जा रही है कि नीतीश सवर्णों के दुश्मन हैं और इसीलिए पूरे बिहार में सवर्णों को ही चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है. मुजफ्फरपुर में फिलहाल समीर हत्याकांड अगड़ा बनाम पिछड़ा का रंग लेता जा रहा है. कहा जाता है कि इस हत्याकांड को सवर्ण बनाम पिछड़ा बनाने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी भाजपा के ही कुछ नेता ले रहे है.

आरोप यह है कि भाजपा इसी बहाने नीतीश की सुशासन बाबू की बची-खुची साख को खत्म कर उन्हें राजनैतिक रूप से ठिकाने लगाने की कोशिश कर रही है. सवाल यह भी है कि देशभर में सुर्खियां बटोरने वाले इस हत्याकांड के असली गुनाहगारों को दबोचने में एस.आई.टी. अब तक नाकाम क्यों रही है. अचरज इस बात का भी है कि हत्या में जिस तरह के अत्याधुनिक हथियार इस्तेमाल किए गए थे, वे बिना पुलिस या केंद्रीय एजेंसियों की मिलीभगत के मुंगेर के सरकारी कारखाने से निकलकर अपराधियों के हाथों तक कैसे पहुंच गए? इसीलिए यह सवाल उठना भी लाज़मी है कि कहीं पूर्व मेयर समीर कुमार की हत्या के तार बिहार भाजपा के प्रभावशाली नेताओं से तो नहीं जुड़े हैं?


ज़मीन कारोबार की कोख से निकलीं गोलियां

इस बार मुजफ्फरपुर में गरजी एके-47 की तड़तड़ाहट की गूंज बहुत दूर तलक गई है. समीर के खून के छींटे केवल हत्यारों के चेहरे पर ही नहीं, बल्कि कई सफेदपोशों के चमकते कुर्ता-पजामे पर भी पड़े हैं. हत्या के बाद स्थानीय राजनीतिक हलकों में सन्नाटे के पीछे जबर्दस्त शोर महसूस किया जा रहा है. यह किसी तूफान का भी संकेत हो सकता है और अगर साजिशकर्ताओं का रसूख समीर पर भारी पड़ गया, तो उनकी मौत की गूंज इस तूफान में गुम भी हो सकती है.

समीर कुमार का परिचय कई पदनामों से देना जरूरी है, क्योंकि हत्या के पीछे का राज हर पदनाम के साथ ढूंढ़ा जा रहा है. समीर ने बतौर मेयर मुजफ्फरपुर में अपनी खास उपस्थिति दर्ज कराई थी. अभी आम जनता के बीच वे इसी चेहरे के रूप में पहचाना जाना पसंद करते थे. राजनैतिक और बाहुबल दोनों क्षेत्रों में मुजफ्फरपुर के पुरोधा माने जाने वाले रघुनाथ पांडेय के बाद नगर निगम का ताज समीर कुमार के माथे पर ही सजा था. उस समय नगर परिषद हुआ करता था और रघुनाथ पांडेय उसके अध्यक्ष हुआ करते थे. 2002 में मुजफ्फरपुर नगर निगम बना और समीर कुमार उसके पहले मेयर बने. पिछले 11 साल से वे किसी राजनैतिक पद पर नहीं थे, लेकिन इसके समानांतर कई अन्य क्षेत्रों में अपनी जगह बनाने को बेताब थे.

अपनी राजनैतिक उपस्थिति दर्ज कराते रहने के लिए 2014 में वे बसपा से लोकसभा चुनाव भी लड़े. इससे पहले वे निर्दलीय विधानसभा का चुनाव लड़ चुके थे. पार्टी और परिणाम दोनों संकेत कर रहे थे कि अन्य क्षेत्रों में बने रहने के लिए उन्हें यह सब करना जरूरी है. इधर शहर में जमीन का कारोबार अफीम की तरह लोगों को मदमस्त करता जा रहा था. राजनीति की कई बड़ी हस्तियां प्रोपर्टी डीलिंग में घुसती चली गईं. एक सफल रणनीतिकार होने के कारण समीर कुमार ने भी इस बड़े सिंडिकेट में अपनी जगह बना ली. मेयर बनने के पहले वे सामान्य ठेकेदार थे. बाद में इसमें मजबूत हाथ आजमाया और सफल भी रहे.

वे कोल्ड स्टोरेज के भी मालिक थे. मगर उन्हें सबसे अधिक रियल एस्टेट का धंधा ही रास आया. मुजफ्फरपुर और उत्तर बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार में ही सन 2000 के  बाद रियल एस्टेट का धंधा ‘वन टू का फोर’ वाला हो गया, फिर सारे माफियाओं का रुख इस ओर होने लगा. ब्लैक का व्हाइट करने का यह सबसे सुरक्षित ठिकाना या निवेश था. इसलिए राजनेता और ब्यूरोक्रेट इसमें निवेश करने लगे. उनका पैसा सुरक्षित रहे और बढ़ता रहे इसके लिए उनका संरक्षण भी मिलता रहा. विपक्ष और सत्ताधारी नेता इस मुद्दे पर एक मंच पर आ गए. मुजफ्फरपुर में सत्ताधारी पार्टी के बड़े नेताओं ने शहर पर कब्जा जमाना शुरू किया. यहीं से शुरू हुआ नेताओं, भू-माफियाओं और अपराधियों का गठजोड़. साथ ही शुरू हो गया जमीन पर कब्जे और हत्या का सिलसिला.

23 सितम्बर को शाम सात बजे शहर के बीचोंबीच चंदवाड़ा के लकड़ीढ़ाही मोहल्ले में दो बाइक सवार बदमाशों ने समीर कुमार को एके-47 से भून डाला. समीर उस वक्त अखाड़ाघाट स्थित अपने होटल से बेला के नंद विहार कॉलोनी स्थित अपने आवास जा रहे थे. बदमाशों ने समीर के सिर और सीने में 16 गोलियां दागी, जबकि उनके ड्राइवर को 11 गोलियां लगीं. कार के सामने के शीशे पर 22 गोलियों के निशान मिले हैं. एक साथ 49 गोलियां दागी गईं. इससे हत्यारों की मंशा का अंदाजा लगाया जा सकता है. उत्तर बिहार में एके-47 का गरजना अब चौंकाता नहीं है. दो साल पहले 6 अप्रैल 2016 को मुजफ्फरपुर में ही बड़े ठेकेदार और रियल एस्टेट के कारोबारी अतुल शाही को उनके घर के सामने ही एके-47 से भून दिया गया था. ऐसे कई और मामले हैं. मगर समीर की हत्या सामान्य आपराधिक ट्रेंड से हटकर दिखती है. मुजफ्फरपुर छोटन शुक्ला, बृज बिहारी, अशोक सम्राट, सूरज भान, नरेश सिंह, ओंकार सिंह जैसे चर्चित कुख्यातों की कर्मभूमि (आपराधिक) भूमि रही है. इनमें से लगभग सभी आमने-सामने की लड़ाई लड़ते रहे. शार्गिद तो इनके भी होते थे, मगर इन्हें भाड़े के शूटर की जरूरत नहीं पड़ती. उत्तर बिहार में इनके बाद संतोष झा, शंभू-मंटू, अंजनी ठाकुर जैसे गिरोहों ने जगह बनाई. सबने किसी ने किसी राजनेता और साहबों को अपना आका बनाया और अपराध की दुनियां में राज करना शुरू किया.

स्थापित नेताओं के साथ समीर का बना सिंडिकेट

पिछले 20 वर्षों में मुजफ्फरपुर में बड़ा सिंडिकेट तैयार हुआ. इस सिंडिकेट का मुख्य काम जमीन का कारोबार था. इसमें एक बड़े राजनेता सिरमौर के रूप में सामने आए और जिला परिषद से लेकर नगर निगम तक की सरकार में किंग मेकर की भूमिका निभाने लगे. सूबे में उनकी पहुंच सत्ता से लेकर विपक्ष तक में समान रूप से है. इस सिंडिकेट में कई पूर्व विधायक और कई पार्टियों से चुनाव लड़ चुके नेता भी शामिल हैं. अपराधियों के बिना उनका सिक्का नहीं चल सकता था, इसलिए वे अपराधियों को संरक्षण देते रहे. समीर उस सिंडिकेट का हिस्सा बन गए. जिसकी जमीन पसंद आ गई उस पर अपना खूंटा ठोक देना और अगर किसी ने न कहने की हिम्मत जुटाई, तो उसे मौत के घाट उतार देना उस सिंडिकेट के लिए आम बात थी. नवरुणा और कहनानी जैसी चर्चित हत्याएं जमीन कारोबार की कोख से ही निकलीं.

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