दिनकर जयंती आयोजन पर विवाद

 

अगर हम बिहार के कला संस्कृति विभाग के सालाना कैलेंडर को देखें, तो उसके मुताबिक दिनकर के जन्मदिन पर एक कार्यक्रम का आयोजन उनके पैतृक गांव सिमरिया में होना था, जिसका नाम दिनकर साहित्य उत्सव था और इसके आयोजन का जिम्मा जिला प्रशासन पर था. इस आयोजन का बजट 10 लाख रुपए रखा गया था. अब सवाल यही उठता है कि बिहार सरकार के इस आयोजन का नाम और स्थान कैसे और किसके आदेश पर बदला गया. इस बारे में जब मंत्री ऋषि से बात की गई, तो उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि इसमें विभाग की अनुमति नहीं के बराबर है, अगर अनुमति ली गई होती तो मेरी जानकारी में रहता.


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अपनी कविता में खुद को अपने समय का सूर्य घोषित करने पर रामधारी सिंह दिनकर विवादों में नहीं आए थे, महाभारत के मूल पाठ में कर्ण के चरित्र को अलग तरीके से अपनी रचना में पेश करने के बावजूद दिनकर को लेकर विवाद नहीं हुआ था, हिंदी भाषा को लेकर उनके विचारों पर गैर हिंदी भाषियों ने कभी कोई विवाद नहीं खड़ा किया. दिनकर की राष्ट्रवादी अवधाराणाओं को लेकर भी विवाद करने की कोशिश हुई, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. दरअसल उनकी कई कविताओं में उग्र राष्ट्रवाद के स्वर भी मुखर होते हैं.

उनकी रचनाओं में इस उग्र राष्ट्रीयता के पीछे अपने गौरवशाली अतीत का भान और मान था. संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर ने अतीत के इस गौरव को बेहद करीने और सलीके से सजाया है. दिनकर साहित्य में मार्क्सवाद की सत्ता की गुलामी को भी तैयार नहीं थे. दिनकर की राष्ट्रवाद की अवधारणा के संदर्भ में कुछ लोग कहते हैं कि वो नफरत की बुनियाद पर टिका है, लेकिन ऐसा कहकर विवाद खड़ा करने की कोशिश करनेवाले भी सफल नहीं हो पाए. दिनकर ने अपनी अवधारणा में घृणा को राष्ट्रीयता की बुनियाद बताया था, लेकिन उसको उद्धरणों से स्पष्ट भी किया था. दिनकर का मानना था कि बहुधा राष्ट्रीयता का जन्म घृणा से होता है.

उन्होंने इस संदर्भ में नेपिलियन का उदाहरण दिया था और कहा था कि नेपोलियन की हुकूमत के खिलाफ लोगों में एकता हुकूमत से घृणा की वजह से आई थी. इसी तरह से उन्होंने कहा था कि आजादी के पहले भारत में राष्ट्रीयता इस वजह से पनपी कि यहां के लोग अंग्रेजों से घृणा करने लगे थे. अब यहां अगर पूरे संदर्भ से काटकर सिर्फ ये बताया जाए कि दिनकर की राष्ट्रीयता का आधार घृणा है, तो यह उनके साथ अन्याय होता.

कुछ लोगों ने उनके साथ ये अन्याय करने की कोशिश की थी, लेकिन वो परवान नहीं चढ़ पाई. दिनकर ने अपने लेखों में टैगोर की राष्ट्रीयता और अंतराष्ट्रीयता की अवधारणा पर भी विचार करते वक्त अपनी मान्यताओ को सामने रखा है. दिनकर की एक कविता भी है, राष्ट्रदेवता का विसर्जन, जिसमें उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि राष्ट्रीयता अगर अंतराष्ट्रीयता के खिलाफ खड़ी हो रही हो तो उसका विदा होना बेहतर है. कहना ना होगा कि दिनकर विश्व शांति और मैत्री की वकालत भी कर रहे थे. ये उदाहरण इस वजह से दिए जा रहे हैं, ताकि पाठकों के सामने ये बात रखी जा सके कि दिनकर को लेकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की जाती रही है.

लेकिन इस बार दिनकर को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, उसकी साहित्यिक और गैर-साहित्यिक दोनों वजहें हैं. राष्ट्रकवि दिनकर की जयंती बीते 23 सितंबर को थी. दिनकर जी के गांव सिमरिया में और बेगूसराय में उनपर केंद्रित कार्यक्रम हुए. दिनकर जी के जन्मदिन पर बेगूसराय का कार्यक्रम आयोजन के पहले विवादों में आ गया था. पहला विवाद शुरू हुआ दिनकर पर बेगूसराय में आयोजित कार्यक्रम से. इस कार्यक्रम का आयोजन बिहार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग की तरफ से किया गया.

कार्यक्रम से सम्बन्धित कार्ड में बिहार की पूर्व मंत्री मंजू वर्मा की गरिमामय उपस्थिति का कार्ड छपते ही, यह विवादों में आ गया. दरअसल, मुजफ्फरनगर बाल सुधार गृह में मंजू वर्मा के पति का नाम उछलने के बाद उनको मंत्रिपद से हटा दिया गया था. समारोह का कार्ड सार्वजनिक होते ही सोशल मीडिया पर इसे लेकर सवाल उठने शुरू हो गए. इस समारोह में मंजू वर्मा की गरिमामय उपस्थिति में प्रगतिशील लेखकों का जमावड़ा हो रहा था, जिसमें खगेन्द्र ठाकुर, अरुण कमल, आलोक धन्वा, अखिलेश जैसे घोषित वामपंथी लेखकों की उपस्थिति होनी थी. समारोह का निमंत्रण कार्ड वितरित होने के बाद दो बातों को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा हुई. दिनकर पर होनेवाले आयोजन में वामपंथी लेखकों की इतनी बड़ी संख्या में उपस्थिति को लेकर फेसबुक पर टिप्पणियां आने लगीं.

और दूसरी मंजू वर्मा की गरिमामय उपस्थित को लेकर. सबसे दिलचस्प टिप्पणी आई कि मुजफ्फरपुर बालिका संरक्षण गृह मामले में जिस मंत्री को नीतीश कुमार ने नहीं बख्शा, उनकी ही गरिमामय उपस्थिति में बेगूसराय में क्रांति के ककहरा की पाठशाला लगेगी. इसके अलावा भी कई तरह के आरोप उछले, जिनमें मानदेय आदि को लेकर भी बातें हुईं, लेकिन उनका कोई अर्थ नहीं है. बड़ा सवाल तो मंजू वर्मा की उपस्थिति को लेकर उठा था.

जब मंजू वर्मा की उपस्थिति को लेकर तंज कसे जाने लगे और उस कार्यक्रम में जानेवाले लेखकों की घेरेबंदी शुरू हुई, तो वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा और लेखक प्रेम कुमार मणि ने इस समारोह में जाने से इंकार कर दिया, लेकिन क्रांति के ध्वजवाहक रहे कई लेखक बेगूसराय पहुंचे. बाद में पता चला कि मंजू वर्मा वहां नहीं पहुंची. ये आभासी दुनिया पर उठा एक ऐसा विवाद था, जिसने वामपंथी लेखकों को कठघरे में खड़ा कर दिया.

बेगूसराय में आयोजित दिनकर जयंती समारोह के वामपंथीकरण का आरोप भी लगा. जिस विचारधारा के लोगों ने दिनकर का लंबे समय तक मूल्यांकन नहीं होने दिया और ना ही किया, उसी विचारधारा के लेखकों को दिनकर के सम्मान में बुलाने पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने विरोध भी जताया. भाजपा के नेताओं ने आरोप लगाया कि जिला प्रशासन ने बगैर किसी कोर कमेटी के गठन और बगैर सलाह मशविरा के जिला साहित्य अकादमी के अध्यक्ष, जो कि प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हैं, की राय पर आमंत्रित वक्ताओं के नाम तय कर दिए.

आरोप तो ये भी लगे कि जिन लोगों ने दिनकर की रचनात्मकता पर कोई काम नहीं किया है, उनको भी देश के अन्य शहरों से बुलाया गया. ये सवाल भी पूछे गए कि कवि गोष्ठी में आमंत्रित कवियों के चयन का आधार क्या था. भाजपा नेताओं के इन बयानों का प्रतिवाद बेगूसराय के जिलाधिकारी राहुल कुमार ने किया. अखबारों में छपे उनके बयान के मुताबिक, दिनकर पर आयोजित कार्यक्रम के लिए लेखकों को कला संस्कृति और युवा विभाग की ओर से आमंत्रित किया गया था. उनके मुताबिक इन लेखक और कवियों को 2014 के अखिल भारतीय काव्य समारोह और 2015 के अखिल भारतीय कथा समारोह में भी आमंत्रित किया गया था.

संभव है कि जिलाधिकारी ने उसी सूची से लेखकों को आमंत्रित कर लिया होगा. इस बावत जब सूबे से संस्कृति मंत्री कृष्ण कुमार ऋषि से बात की गई, तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि बेगूसराय में दिनकर जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं के नाम संस्कृति विभाग ने नहीं तय किए थे. जब उनका ध्यान जिलाधिकारी के बयान की तरफ दिलाया गया, तो उन्होंने डीएम के बयान को गलत करार दिया. खैर ये मुद्दा तो बयानबाजी में उलझ कर रह जाएगा, सचाई शायद ही बाहर आ पाए, लेकिन इससे इतर जो सवाल खडे हो रहे हैं, वो ज्यादा संगीन हैं.

दरअसल अगर हम बिहार के कला संस्कृति विभाग के सालाना कैलेंडर को देखें, तो उसके मुताबिक दिनकर के जन्मदिन पर एक कार्यक्रम का आयोजन उनके पैतृक गांव सिमरिया में होना था, जिसका नाम दिनकर साहित्य उत्सव था और इसके आयोजन का जिम्मा जिला प्रशासन पर था. इस आयोजन का बजट 10 लाख रुपए रखा गया था. अब सवाल यही उठता है कि बिहार सरकार के इस आयोजन का नाम और स्थान कैसे और किसके आदेश पर बदला गया. इस बारे में जब मंत्री ऋषि से बात की गई, तो उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि इसमें विभाग की अनुमति नहीं के बराबर है, अगर अनुमति ली गई होती तो मेरी जानकारी में रहता.

तो क्या अब इस बात की जांच की जानी चाहिए कि स्थान और नाम परिवर्तन कैसे हुआ. दिनकर की जन्मस्थली सिमरिया में कार्यक्रम होने का अपना एक अलग महत्व होता और साहित्यिक दृष्टि से एक घटना भी होती कि जिस विचारधारा के लोगों ने दिनकर को उनके जीवन काल में हमेशा हाशिए पर रखने की कोशिश की उसी विचारधारा के पोषक दिनकर की जन्मभूमि पर जाकर कवि की रचनात्मकता की तारीफ कर रहे हैं. लेकिन ये हो नहीं पाया. सिमरिया में एक कार्यक्रम हुआ अवश्य लेकिन वो अलग था, उस कार्यक्रम में राज्यसभा के मनोनीत सांसद राकेश सिन्हा शामिल हुए, उन्होंने वहां पुस्तकालय को 10 लाख रुपए का अनुदान देने की घोषणा भी की.

वामपंथियों पर प्रहार भी किए. क्या संस्कृति विभाग और इसके मंत्री कृष्ण कुमार ऋषि इस बात की जांच करवाएंगे कि किसके कहने और आदेश पर कैलेंडर में बदलाव किया गया. साहित्य जगत तो जानना चाहेगा. जानना तो जनता भी चाहेगी कि एनडीए के शासन काल में राज्य सरकार का कार्यक्रम अलग और भाजपा का कार्यक्रम अलग, ये कैसे और क्यों?

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