कराची में भी आजादी से पहले खेली जाती थी कुमाऊं की अनोखी रामलीला

उत्तराखंड के कुमाऊं की पहाडि़यों में घूमने के लिए वैसे तो अप्रैल और मई का महीना अच्छा माना जाता है, क्योंकि उस दौरान उत्तर भारत के ज्यादातर जगहों पर लू चलती है, लेकिन अल्मोड़ा और इसके आस-पास की ज्यादातर जगहों का मौसम सुहाना होता है. ऐसे में घूमने का समय के लिए अक्टूबर का महीना भी परफेक्ट है. अक्टूबर माह का आकर्षण है इस क्षेत्र में होने वाली संगीतमय रामलीला.

कुमाऊं की रामलीला                                          

यहां की रामलीला अब से लगभग डेढ़ सौ साल पहले प्रारंभ हुई थी. यूनेस्को ने इस रामलीला को दुनिया का सबसे लंबा ऑपेरा घोषित करके इसे विश्र्व सांस्कृतिक सूची अर्थात वर्ल्ड कल्चरल हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया है. पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोकमानस में रची-बसी रही यह रामलीला विशुद्ध मौखिक परंपरा पर आधारित है. गाई जाने वाली रामलीला होने के कारण संगीत इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है. संगीत में प्रधानत: हारमोनियम और ढोलक या तबले का ही प्रयोग होता रहा है. इस रामलीला में अभिनय से ज्यादा जोर गायन पर रहता है.

रामलीला मतलब संगीतमय उत्सव

इसमें खासतौर से उन्हीं कलाकारों को अभिनेता के तौर पर लिया जाता है, जिन्हें गायन और संगीत का ज्ञान हो. नि:शब्द रात्रि में जब पहाड़ों की वादियों में कलाकारों के मधुर गायन की आवाज़ गूंजती है, तो दर्शक एक अलग ही दुनिया में पहुंच जाते हैं. अधिकतर रामलीलाओं में पुरुष ही स्त्री-पात्र भी निभाते रहे हैं, हालांकि अब कहीं-कहीं महिलाओं को भी इसमें शामिल किया जाने लगा है. राम की कथा कहने वाली इस रामलीला की एक दिलचस्प बात यह है कि इसकी शुरुआत हर रोज श्रीकृष्ण की रासलीला से होती है.

कराची में कुमाऊंनी रामलीला

कुमाऊंनी रामलीला की इस परंपरा की नींव अल्मोड़ा में पड़ी, लेकिन धीरे-धीरे यह देश में अन्य स्थानों पर भी फैल गई. प्रवासी कुमाऊंनियों द्वारा यह रामलीला दिल्ली, लखनऊ, मुरादाबाद, झांसी इत्यादि में खूब खेली जाती रही है और बहुत लोकप्रिय भी रही है. इस रामलीला से जुड़े पुराने लोग बताते हैं कि आज़ादी के पहले यह रामलीला कुमाऊंनी लोगों द्वारा कराची तक में भी खेली जाती रही. कुमाऊं के बाहर भी इसके लोकप्रिय होने का कारण बहुत चौंकाने वाला है. यह रामलीला कुमाऊंनी लेखकों द्वारा लिखी जाने पर भी बृजभाषा में लिखी गई है, जो उत्तर भारत के बड़े हिस्सों में आसानी से समझी जाती है. इस रामलीला ने आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े रहे कुमाऊं क्षेत्र के विकास में भी अद्भुत योगदान दिया है. वैसे बता दें कि दिल्ली तथा उत्तर भारत के अन्य शहरों में रहने वाले कुमाऊंनी लोग हर वर्ष अपने-अपने नगरों में आयोजित होने वाली रामलीला की आय को संस्थाओं और अपने पैतृक क्षेत्र के गांवों के स्कूलों तथा अन्य सामाजिक संस्थानों के विकास के लिए भेजते हैं.

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