भाग्यशाली प्रधानमंत्री से देश का भाग्य तय नहीं होता

       देश के किसी नेता का भाग्य ऐसा नहीं है कि उसके कार्यकर्ता उसके लिए इतने ज्यादा सपर्पित हों. इसीलिए भारतीय जनता पार्टी बहुत ज्यादा उत्साह में है. भले ही लोगों की थाली में रोटी न पहुंचे, उन्हें नौकरी न मिले, आंतरिक या बाहरी शक्तियां नियंत्रण में न हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. प्रधानमंत्री मोदी का आभामंडल इस तरीके से चमक रहा है कि बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी सार्वजनिक रूप से कहते हैं, ‘हे बिहार के महान अपराधियो, इस पितृपक्ष में थोड़ा सा अपराध कम कर दो. वैसे तो आपलोग अपराध करते ही रहते हो.’ इस वाक्य को जिस गर्व के साथ सुशील मोदी ने कहा है, उससे अब तक तो किसी को शर्म नहीं आई है. न भारतीय जनता पार्टी को, न बाकी राजनेताओं को. ऐसा लगता है कि बिहार के भाजपा नेता अपराधियों के सरपरस्त हैं या सारे अपराध उनकी जानकारी में होते हैं.


 

modi-jiप्रधानमंत्री मोदी इस मामले में सचमुच बहुत भाग्यशाली हैं कि उन्होंने देश में एक ऐसा समर्थक वर्ग तैयार कर लिया है, जिसकी आंखों पर सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी का चश्मा है. उसे सरकार के किए गए वादे कभी याद नहीं आते. सरकार ने क्या-क्या काम किए, इसकी फेहरिस्त उन्हें याद नहीं है. सरकार के किन कदमों की वजह से देश में क्या-क्या समस्याएं पैदा हुईं, इस पर वो ध्यान ही नहीं देते और सरकार के वादा खिलाफी के विरुद्ध किसानों का, नौजवानों का, दलितों का, पिछड़ों का, अल्पसंख्यकों का, गुस्सा उनके लिए कोई मायने नहीं रखता. उनके लिए सिर्फ और सिर्फ एक ही अर्थपूर्ण शब्द है, नरेन्द्र मोदी, जिन्हें वो अगले 50 साल तक प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जाकर प्रधानमंत्री बनाने के लिए कमर कसे हुए हैं.

मैं पहली बार ऐसा उत्साह या अतिउत्साह देख रहा हूं कि अगर प्रधानमंत्री मोदी ये घोषणा करें कि मुझे अगले 50 साल तक प्रधानमंत्री रहना है और आपलोग अपनी उम्र में से 10-10 साल मुझे दीजिए, क्योंकि ईश्वर ने मुझे वादा किया है कि जो मुझे जितने साल देगा, उसकी उम्र में उतने साल जुड़ जाएंगे, तो मैं मानता हूं कि उन्हें कम से कम हजारों साल उम्र का दान देने वाले लोग पांच मिनट के भीतर मिल जाएंगे. ऐसा भाग्य बहुत कम लोगों का होता है, जैसा भाग्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लेकर पैदा हुए हैं.

2018 चुनावी वर्ष है. 2019 तो है ही. इन चुनावों के पहले मीडिया के जरिए, बुद्धिजीवियों के जरिए, लोगों के जरिए इस बात का आकलन होना चाहिए कि पिछले साढ़े चार साल में हमने क्या खोया क्या पाया, कितना आगे बढ़े. लेकिन इसका आकलन तो दूर की बात है, इन सवालों के बारे में बात ही नहीं होती. गुजरात चुनाव के बाद जो सिलसिला शुरू हुआ उसका पहला पड़ाव कर्नाटक का था. इसके बाद कुछ राज्यों के चुनाव आने वाले हैं, जहां की जमीनी हकीकत का जायजा लेने पहले श्री अमित शाह और फिर श्री नरेंद्र मोदी उन राज्यों में गए. बनारस से बात शुरू करें या राजस्थान से बात शुरू करें.

राजस्थान में अमित शाह जी की सभा में कुर्सियां खाली थीं. जो सभा में आए, वे लाए गए थे. उनमें उत्साह नहीं था. बनारस में अमित शाह और योगी जी बैठे रहे. खाली कुर्सियों को संबोधित किया. हर कुर्सी पर रखा नास्ता लोगों के मुंह की जगह किसी और के पेट में चला गया. कुर्सियां भी खाली रहीं और नास्ते का पैकेट भी बिना स्वागत के वहां पड़ा रहा. स्वयं प्रधानमंत्री मोदी जब अपने चुनाव क्षेत्र में गए तब कुर्सियां खाली थीं. जैसे ही उन्होंने उपलब्धियों का वर्णन किया, वैसे ही लोग सभा स्थल से उठकर जाने लगे. अगली पंक्तियों में बैठे लोग भी जाने लगे. स्वयं प्रधानमंत्री जी को अपील करनी पड़ी, थोड़ी देर और बैठ जाइए. लेकिन लोगों ने उसे बिल्कुल अनसुना कर दिया. ताजा किस्सा मध्य प्रदेश का है.

वहां पर देश को सूचना देने वाले टेलीविजन चैनल, अखबार, विशेषज्ञ उपस्थित थे. वो लगातार एक ही बात कहते रहे कि लाखों लोगों की भीड़ है, 13 लाख लोगों का जमावड़ा है. पर किसी ने ये नहीं बताया कि कितने लोग आए और कितनी कुर्सियां खाली थीं. खाली कुर्सियों के फोटोग्राफ या वीडियो क्लीपिंग सोशल मीडिया पर दिखाई दिए. लेकिन जिम्मेदार मीडिया, राष्ट्रीय मीडिया, मध्य प्रदेश के शिवराज मीडिया ने इसके बारे में एक भी शब्द नहीं बताया कि सचमुच हालात क्या हैं. मंच पर प्रधानमंत्री ने कितनी बार शिवराज सिंह से बातचीत की और वहां बैठकर वो अमित शाह से किन समस्याओं पर चर्चा करते रहे, इसे सभा में बैठे कार्यकर्ताओं ने ध्यान से देखा. उन्हें लगा कि प्रधानमंत्री मोदी, शिवराज सिंह चौहान को कोई तरजीह नहीं दे रहे हैं.

आखिर लोग क्यों अब अमित शाह जी और प्रधानमंत्री की सभाओं में नहीं आ रहे हैं? इसका विश्लेषण किए बिना घोषणाएं होती हैं कि मैदान छोटा पड़ गया. आपने इतिहास बना दिया, आपने कांग्रेस को हटा दिया. सवाल कांग्रेस को हटाने और कांग्रेस को लाने का नहीं है. एक बात को अमित शाह और प्रधानमंत्री बार-बार दोहरा रहे हैं, जैसे लगता है कि देश में कांग्रेस का शासन है और वो कांग्रेस के शासन को हटाने के लिए कैंपेन कर रहे हैं. वो जानबूझ कर लोगों को याद नहीं दिलाते की लोगों ने कांग्रेस को सत्ता से 2014 में क्यों हटाया था? 2014 में सत्ता से सिर्फ इसलिए हटाया था कि कांग्रेस की कार्यशैली लोगों की जिंदगी पर, पेट पर बहुत भारी पड़ गई थी.

यहीं पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाग्य सामने आता है. एक मुखर वर्ग, भले ही छोटा हो, लेकिन वो प्रभावी है, जो सोशल मीडिया पर, अखबारों में, टेलीविजन पर सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा देखना चाहता है. वो मोदी को सफलता का प्रतीक मानता है, मोदी के रहते पाकिस्तान पर भारत की जीत का स्वप्न देखता है, 370 की समाप्ति का सपना देखता है और कश्मीर समस्या का समाधान भी मोदी को ही मानता है.

प्रधानमंत्री मोदी जब कहते हैं कि विश्व में भारत की आज इतनी ज्यादा साख है, तब लोग साख की परिभाषा नहीं पूछते. साख अगर होती तो हमारे देश में विदेशी निवेश आ चुका होता. पर अफसोस की बात ये है कि हम जिन आंकड़ों को देते हैं, विश्व की आर्थिक संस्थाएं अगले दिन उस आंकड़े का खंडन कर देती हैं. मैं पुनः दोहराना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री मोदी सर्वाधिक भाग्यवान व्यक्ति के रूप में उभरे हैं, क्योंकि उनके किसी भी निगेटिव चीज को लोग देखना ही नहीं चाहते. भाग्य उनके साथ है. एक बार मुझसे प्रसिद्ध अभिनेत्री और पूर्व राज्यसभा सदस्य रेखा ने कहा था कि भाग्य बहुत बड़ी चीज है.

अगर भाग्य आपके साथ हो और आप किसी को जूते भी मारें, तो लोग कहेंगे वाह, क्या अदा से जूते मार रहा है, और भाग्य साथ नहीं हो तो आप पूजा भी करें तो लोग कहेंगे कि इसको पूजा करने का तरीका भी नहीं मालूम. आज प्रधानमंत्री मोदी के साथ भाग्य है. इसीलिए भारतीय जनता पार्टी के भीतर अंदरूनी युद्ध जिस स्तर पर चल रहा है, उस स्तर पर तो कभी किसी दल में देखा ही नहीं गया. जनरल वी सी खंडूरी, जो संसदीय समीति के अध्यक्ष थे, उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने हटा दिया है. यह अभूतपूर्व काम हुआ. क्योंकि जनरल खंडूरी ने सेना के पक्ष में रिपोर्ट दी. अब श्री मुरली मनोहर जोशी को हटाने की तैयारी हो रही है, क्योंकि मुरली मनोहर जोशी ने जिस तरह से प्राक्लन समिति को ईमानदारी के साथ निष्पक्ष ढंग से चलाया है, उसकी चारों तरफ तारीफ हो रही है.

लेकिन वो तारीफ भारतीय जनता पार्टी को या उसके नेतृत्व को पच नहीं रही है. अब उन्हें भी हटाने की कोशिश हो रही है. पार्टी के भीतर कौन क्या बनाया जाता है, उसका अनुभव है या नहीं है, वो पार्टी में किस तरह की संस्कृति बढ़ाना चाहता है, ये सारे तथ्य अपने आप में प्रश्नवाचक दायरे में हैं. लेकिन भारतीय जनता पार्टी में अंदरूनी कलह, अंदरूनी संघर्ष, राज्यों के नेतृत्व की सफलता-असफलता चर्चा का विषय नहीं है. चर्चा का विषय सिर्फ एक है और वह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके हर असफल काम को सफल बनाने के लिए हो रहा सक्षम कैंपेन, खासकर सोशल मीडिया पर, क्योंकि जिसे हम मेनस्ट्रीम मीडिया कहते हैं, वो तो चरणचुम्बी हो गया है, ऐसा दिखाई दे रहा है.

देश के किसी नेता का भाग्य ऐसा नहीं है कि उसके कार्यकर्ता उसके लिए इतने ज्यादा सपर्पित हों. इसीलिए भारतीय जनता पार्टी बहुत ज्यादा उत्साह में है. भले ही लोगों की थाली में रोटी न पहुंचे, उन्हें नौकरी न मिले, आंतरिक या बाहरी शक्तियां नियंत्रण में न हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. प्रधानमंत्री मोदी का आभामंडल इस तरीके से चमक रहा है कि बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी सार्वजनिक रूप से कहते हैं, ‘हे बिहार के महान अपराधियो, इस पितृपक्ष में थोड़ा सा अपराध कम कर दो.

वैसे तो आपलोग अपराध करते ही रहते हो.’ इस वाक्य को जिस गर्व के साथ सुशील मोदी ने कहा है, उससे अब तक तो किसी को शर्म नहीं आई है. न भारतीय जनता पार्टी को, न बाकी राजनेताओं को. ऐसा लगता है कि बिहार के भाजपा नेता अपराधियों के सरपरस्त हैं या सारे अपराध उनकी जानकारी में होते हैं. जब मैं ये लिख रहा हूं, तब तक सुशील मोदी ने इस पर कोई खेद जाहिर नहीं किया है और न ही ये कहा है कि वे बोलना कुछ और चाहते थे लेकिन बोल कुछ और गए. सुशील मोदी ऐसे आदमी हैं नहीं. पर जब देश में निजाम ऐसा हो, तब सुशील मोदी अगर ये कहें तो इससे हमें देश में शुरू हो गए नए सांस्कृतिक तेवर को पहचानने में कोई भूल नहीं करनी चाहिए

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.
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संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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