पार्टी में नंबर दो बने पीके

pk       प्रशांत किशोर के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती दल के लिए एनडीए में अधिक से अधिक सीटें हासिल करने की है. नीतीश कुमार और उनके दल का मानना रहा है कि बिहार एनडीए में जून 2013 तक वे ‘बड़े भाई’ की भूमिका में रहे हैं. जद (यू) नेताओं का ऐसा कहना है कि संसदीय चुनाव हो या विधानसभा चुनाव, जद (यू) हमेशा अधिक सीटें लाती रही है, उस हैसियत की रक्षा की जाए.


बिहार के मुख्यमंत्री और जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने पेशेवरचुनावी रणनीतिकार  प्रशांत किशोर को अपने दल की सदस्यता दिलवाते वक्त कहा कि ‘पीके दल का भावी चेहरा हैं.’ नीतीश कुमार की यह घोषणा जद (यू) के कई ‘चेहरों’ के रंग उड़ाने के लिए काफी थी. जब एक संवाददाता ने नीतीश कुमार के खासमखास सांसद आरसीपी से उसी दिन पूछा कि अब तो दल में ‘आपका कद नीचे हो जाएगा’, तो उनका जवाब था ‘अरे, अब कितना नीचे होगा, चार फीट पांच ईंच तो है ही.’ लेकिन यह जद (यू) के किसी एक नेता की बात नहीं है, बहुतों के कद छोटे कर दिए गए या हो गए हैं. दल सुप्रीमो नीतीश कुमार ने एनडीए में सीटों की हिस्सेदारी को लेकर भाजपा या एनडीए के अन्य घटक दलों से बातचीत करने के लिए पीके को ही अधिकृत किया है.

हालांकि उनके साथ पार्टी के प्रधान महासचिव केसी त्यागी भी हैं. यह तो तय है कि संसदीय और उसके बाद अगले विधानसभा चुनावों को लेकर चुनाव अभियान की रणनीति, पार्टी के कार्यक्रम आदि सारे राजनीतिक मसलों की जिम्मेेदारी पीके की ही होनी है. उन्हें सुप्रीमो नीतीश कुमार के आसपास की अनेक खाली जगहों को तो भरना ही है, साथ ही कई चेहरों को ‘रिप्लेस’ भी करना है. यह काम वे कैसे करते हैं, यह लाख टके का सवाल है. यह काम सहज तो नहीं ही है, इसकी राजनीतिक प्रतिक्रिया के बारे में भी कुछ कहना कठिन है.

बड़ी हैं ज़िम्मेदारियां

प्रशांत किशोर के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती दल के लिए एनडीए में अधिक से अधिक सीटें हासिल करने की है. नीतीश कुमार और उनके दल का मानना रहा है कि बिहार एनडीए में जून 2013 तक वे ‘बड़े भाई’ की भूमिका में रहे हैं. जद (यू) नेताओं का ऐसा कहना है कि संसदीय चुनाव हो या विधानसभा चुनाव, जद (यू) हमेशा अधिक सीटें लाती रही है, उस हैसियत की रक्षा की जाए. इसके लिए संसदीय चुनावों में इन्हें भाजपा से कम से कम एक सीट तो अधिक मिलनी ही चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता है, तो कम से कम भाजपा के बराबर की सीटें तो इस दल को चाहिए ही. भाजपा से अधिक सीट की जद (यू) की मांग पहले ही खारिज हो चुकी है. अब मामला बराबर-बराबर की सीट पर आकर टिक गया है. लेकिन भाजपा इस पर भी सहमत नहीं है. भाजपा नेतृत्व का मानना है कि केंद्र में उसकी सरकार है, इसलिए संसदीय चुनाव में ‘बड़े भाई’ की भूमिका में तो वही है.

उसने एक फॉर्मूला दिया है, जिसके मुताबिक बिहार की 40 संसदीय सीटों में से 20 पर भाजपा के उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे, जबकि बाकी 20 सीटों पर जद (यू) व अन्य घटक दल. जद (यू) को इस पर भी आपत्ति है. अगर उसे वह मान भी लेती है, तो उसकी अपेक्षा है कि वह कम से कम 17 सीट लड़े. बाकी तीन सीटें लोक जनशक्ति पार्टी को दे दी जाएं. उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और उसके बागी सांसद अरुण कुमार को वह एनडीए में बनाए रखने के पक्ष में नहीं है. इससे लोजपा तो सहमत नहीं ही है, भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी नहीं चाहता कि रालोसपा को एनडीए से बाहर का रास्ता दिखाया जाए. उसका मानना है कि इससे उपेन्द्र कुशवाहा के महागठबंधन में जाने का रास्ता तो साफ हो ही जाएगा, साथ ही पिछड़ा मतदाता समूह के एक तबके में गलत संदेश जाएगा. पीके के लिए इस हालत में नीतीश कुमार की इच्छा के अनुरूप उनके राजनीतिक वक़त की रक्षा आसान नहीं होगा.

यह तो पहला मोर्चा है. जैसा कि सभी सुप्रीमोवादी दलों में होता है, जद (यू) में भी होता रहा है. दल के उम्मीदवारों का चयन हालांकि नीतीश कुमार खुद करेंगे, पर उसमें सबसे अधिक अगर किसी एक की चलेगी तो पीके की ही चलेगी. 2015 में बिहार में कैबीनेट गठन के समय भी जद (यू) कोटे के मंत्रियों के चयन में उनकी ही सबसे अधिक चली थी. दल के अनेक मंत्री चुनाव में उम्मीदवारी तो चाहते ही हैं, कई पुराने नेता, पूर्व सांसद व पुराने विधायक भी संसदीय चुनाव में उम्मीदवारी चाहते हैं.

गत विधानसभा चुनावों के दौरान पीके ने दल के नेताओं के बारे में एक डोजियर तैयार किया था, वह इस बार भी फिर काफी काम दे सकता है, पर यह हालत उनके लिए नई परेशानी लेकर आएगी. पिछले विधानसभा चुनावों में पर्दे के पीछे रह कर वे सारा कुछ करते रहे, लेकिन इस बार वह हालत नहीं है, संसदीय चुनाव में वे उम्मीदवार होते हैं, तो दूसरी परेशानी भी सामने आएगी. उनसे पीड़ित राजनेताओं का समूह गोलबंद हो सकता है. यह गोलबंदी मामूली नहीं होगी. इन सबके साथ बिहार की राजनीति का शाश्वत विभाजक अगड़ा-पिछड़ा अपनी जगह तो है ही. अगर संसदीय चुनावों को दरकिनार कर दें, तब भी व्यवहारिक व सक्रिय राजनीति की नई पारी उनके लिए कितनी सुकूनभरी होगी, यह कहना कठिन है.

रणनीतिकार से नेता तक का स़फर

प्रशांत किशोर अब तक पर्दे के पीछे रहकर राजनीति का खेल देखते रहे हैं. आठ साल तक संयुक्त राष्ट्रसंघ के जनस्वाथ्य कार्यक्रमों के तहत कई देशों का काम करने के बाद भारत में वे सरकार के साथ मिल कर कुछ काम करना चाहते थे, पर वे अपनी कोशिश में सफल नहीं हो सके. इसी क्रम में गुजरात के भाजपा नेताओं और उनके जरिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तक वे पहुंचे. जहां 2012 के विधानसभा चुनाव की गहमागहमी शुरू हो रही थी. चुनावी रणनीति को लेकर उनके कुछ सुझावों ने नरेंद्र मोदी का ध्यान आकृष्ट किया और उन्होंने अपनी चुनावी रणनीति तैयार करने के लिए पीके से बातचीत की.

फिर बात बनी और नरेन्द्र मोदी की 2012 विधानसभा चुनाव की रणनीति पीके के संरक्षण में तैयार हुई. चुनाव पूर्व के सारे कार्यक्रम, यात्राएं, चुनाव के लिए सारे नारे उनकी टीम ने ही तैयार किए थे. चुनाव में मोदी को सफलता मिली, जिसने दोनों के रिश्ते को अतिरिक्त मजबूती दी. गुजरात की धरती पर बना यह सम्बन्ध आगे बढ़ा और संसदीय चुनावों में मोदी की कोर टीम का पीके एक महत्वपूर्ण किरदार बन गए. 2014 के संसदीय चुनाव से कोई एक साल पहले प्रशांत किशोर ने पेशेवरों की अपनी टीम के सदस्यों से साथ मिल कर मोदी की सहमति से एक स्वयंसेवी संगठन- ‘सीटीजन्स फॉर अकाउंटेबुल गवर्ननेंस’ (सीएजी) का गठन किया.

संसदीय चुनावों के पहले ही मोदी के चेहरे की मार्केटिंग के लिए छोटे-बड़े कई कार्यक्रम किए गए. इनमें सबसे चर्चित रहा ‘रन फॉर यूनिटी’. मोदी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित होने के बाद कई कार्यक्रम किए गए. इनमें ‘चाय पर चर्चा’ सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहा. इसमें चाय बेचनेवाले के पुत्र होने की मोदी की पृष्ठभूमि का कारगर भावनात्मक उपयोग किया गया. इसके अलावा, ‘3-डी रैलियां’, ‘मंथन’ आदि कार्यक्रम भी कराए गए. भाजपा के नेताओं पर भरोसा करें, तो सोशल मीडिया के व्यापक और बेहतर चुनावी उपयोग की रणनीति भी प्रशांत किशोर के निर्देशन में तैयार की गई थी.

संसदीय चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा की ऐतिहासिक जीत में प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीति का योगदान कितना रहा और कितना यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार व उसके खिलाफ आम लोगों के गुस्से का, यह कहना कठिन है. लेकिन मोदी के नेतृत्व में भाजपा की इस जीत के लिए पीके को खूब वाह-वाही मिली और इसके साथ ही विभिन्न दलों में उच्च तकनिकी ज्ञान संपन्न पेशेवर चुनावी रणनीतिकारों की खोज भी तेज हुई. विशेषकर भाजपा विरोधी राजनीतिक समूहों में. मोदी के साथ पीके का सम्बन्ध तो ठीक था और अब भी है, पर उनकी टीम के कुछ महत्वपूर्ण राजनेताओं के साथ वे सामंजस्य भी नहीं बैठा सके, इसलिए अलग हो गए.

उन्हीं दिनों नीतीश कुमार से उनका संपर्क हुआ फिर सम्बन्ध बना. नीतीश कुमार ने 2015 की विधानसभा चुनावों को लेकर उनसे बातचीत की, बात बनी और प्रशान्त किशोर उनके साथ हो लिए. यह नई जिम्मेदारी मिलने के साथ ही उन्होंने नई संस्था बनाई- ‘इंडियन पीपुल्स एक्शन कमिटी’ (आइपीएसी). गुजरात विधानसभा के साथ-साथ संसदीय चुनावों के अनुभव ने बिहार विधानसभा में शासक समूह के लिए चुनावी रणनीति तैयार करने में उनकी काफी मदद की. यहां का एक नारा ‘बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो’ काफी चला. जद (यू) का राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ गठबंधन था, जिसे महागठबंधन कहा गया.

इस महागठबंधन के कारण बिहार विधानसभा में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का आक्रामक चुनाव अभियान कोई रंग नहीं दिखा सका और न ही भाजपा विरोधी वोटों में किसी प्रकार का विभाजन हुआ. सत्ता की आकांक्षा से भरी भाजपा को गंभीर पराजय का सामना करना पड़ा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर की टीम की अहमियत को समझ कर चुनाव के बाद भी बिहार के ‘विकास और सुशासन’ के बहाने उन्हें और उनकी टीम को अपने से जोड़ कर रखने की नीति बनाई और उन्हें मुख्यमंत्री का परामर्शी नियुक्त किया और कैबीनेट मंत्री का दर्जा दिया गया. बिहार विकास मिशन की स्थापना हुई, जिसका प्रधान पीके को बनाया गया. पर एक दिन अचानक पीके बिहार से निकल गए. बताते हैं कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की राजनीतिक हैसियत उन्हें रास नहीं आ रही थी.

उसके बाद, पीके कांग्रेस से जुड़े और पंजाब विधानसभा चुनावों की रणनीति बनाने के लिए उन्हें कैप्टन अमरिन्दर सिंह के साथ लगा दिया गया. वहां रहते ही उत्तर प्रदेश में उन्हें कांग्रेस की रणनीति बनाने को कहा गया. पंजाब में जीत और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के बाद वे कुछ दिनों तक किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े. पर यह गैप लंबा नहीं रहा. आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस के सुप्रीमो जगमोहन रेड्‌डी ने 2019 में राज्य की सत्ता हासिल करने के ख्याल से चुनावी रणनीति बनाने के लिए पीके को अपने साथ किया. उनका यह काम अब भी चल रहा है. दिल्ली के एक समाचार पत्र के अनुसार जद (यू) में शामिल होने और नीतीश कुमार के खास राजनीतिक रणनीतिकार होने के बावजूद वे आइपीसीए के ‘मेंटर’ बने रहेंगे.

प्रशांत किशोर की पृष्ठभूमि का यह लंबा विवरण देने का एक खास मकसद है. साफ है कि हवा का रुख चुनावी रणनीतिकार के रूप में उनकी सफलता का बड़ा कारण रहा है. 2012 में गुजरात में कमजोर विपक्ष बनाम आक्रामक नरेंद्र मोदी की लड़ाई थी. 2014 के संसदीय चुनावों में भाजपा और नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक जीत में मोदी की आक्रामक चुनावी रणनीति व ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ की शैली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित भाजपा का सघन प्रचार अभियान जितना जिम्मेदार रहा, उससे कहीं अधिक कांग्रेस और यूपीए सरकार की विफलताएं, भ्रष्टाचार की नित नई कथाएं और उसका निष्क्रिय बना रहना जिम्मेदार रहा. यूपीए-2 के अंतिम तीन वर्ष तो कहीं से सरकार के होने का आभास ही नहीं दे रहे थे.

इस राजनीतिक  पृष्ठभूमि में मोदी का नया और कल्पनाशील नेतृत्व सामने आया था. हां, पीके की टीम ने प्रचार अभियान को नई तकनीकी और वैज्ञानिक पद्धति से लैस किया. बिहार में वे और उनकी टीम नीतीश कुमार के लिए ही काम करती दिखी, महागठबंधन के लिए नहीं. आम जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के ख्याल से ‘सात निश्चय’ कार्यक्रम उनकी टीम की ही देन है, जिसे नीतीश कुमार के नाम से तैयार और घोषित किया गया था. हालांकि बाद में, जद (यू) के कार्यक्रम के तौर पर घोषित होने के बाद, महागठबंधन ने इसे स्वीकार कर लिया. बिहार के विकास के लिए ‘दृष्टि पत्र’ (विजन डक्यूमेंट) तैयार करने को लेकर करोड़ों रुपए खर्च हो गए. यह काम बिहार विकास मिशन को प्रशांत किशोर के नेतृत्व में ही करना था, पर नहीं हो सका. हिंदी-पट्‌टी के सबसे प्रखर राज्य बिहार में नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी के पराजय का एक मात्र कारण यह था कि भाजपा विरोधी वोट एकजुट रहे. पर महागठबंधन की इस जीत में राजनेताओं का एक तबका पीके की बड़ी भूमिका देखता है.

पंजाब की सत्ता में कांग्रेस की वापसी का बड़ा कारण, अकाली दल की सरकार से मतदाता की नाराजगी थी. इसलिए इन चारों चुनावों में जीत के अनेक कारणों में एक प्रशांत किशोर की रणनीति भी रही, पर वही नहीं, इसके बरअक्स, उत्तर प्रदेश में क्या हुआ यह बताने की जरूरत नहीं है. प्रशांत किशोर की पृष्ठभूमि यह भी बताती है कि राजनीतिक विचारधारा विशेष का पक्षधर होने से ज्यादा वे एक पेशेवर चुनावी रणनीतिकार हैं. इसलिए ऐसी स्थिति में जद (यू) के राजनीतिक मंच पर अपने किरदार को वे किस तरह पेश करते हैं, यह देखना बाकी है. यह भी देखना है कि जो लोग अभी उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हैं, आगे उनकी राय क्या होती है. पर यह सब तो बाद की बात है, फिलहाल वे जद (यू) में नम्बर दो की हैसियत में हैं, बधाई.

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