राफेल पर गोपनीयता और चुप्पी का मतलब क्या है

अगर आप कह रहे हैं कि राफेल डील साफ है, तो फिर बताइए रुपए कहां से आए. मैं पर्सनल आरोप-प्रत्यारोप के खिलाफ हूं. बोफोर्स का जब मामला आया था, तब मैं विपक्ष में था. मैंने कभी नहीं कहा कि राजीव गांधी ने पैसे लिए हैं. उस समय विपक्ष कहता था कि रिश्वतखोरी हुई है, तो कांग्रेस कहती थी कि ये देश को कमजोर करने की साजिश है, बोफोर्स दुनिया का सबसे बढ़िया तोप है. आज भाजपा कह रही है कि विपक्ष पाकिस्तान की मदद कर रहा है. मैं नहीं कहता कि फाइटर जेट नहीं खरीदना चाहिए. सवाल प्रॉसेस का नही हैं, सवाल तो रिश्वतखोरी का है. भाजपा वैसे ही ध्यान भटका देती है, जैसे कांग्रेस करती थी. राफेल खरीद की प्रक्रिया यूपीए सरकार ने शुरू की थी, भाजपा कंटिन्यू कर रही है, इसमें झगड़ा कहां है. झगड़ा है पैसे का.


rafel-1चुनाव नजदीक है. ये पहली सरकार है, जो साढ़े चार साल के कार्यकाल के बाद भी पारदर्शिता शब्द में विश्वास नहीं रखती. पहले जो प्रधानमंत्री विदेश जाते थे, प्रेस को साथ लेकर जाते थे. लेकिन मोदी जी ने कह दिया है कि हम प्रेस को नहीं ले जाएंगे. ठीक है, आपकी च्वाइस है. लेकिन वे ये भी नहीं बताते कि आपके प्रतिनिधिमंडल में कोई उद्योगपति था या नहीं. यानि पारदर्शिता शब्द से इन्हें मतलब ही नहीं है. लेकिन जो छुप कर किया जाए वो गुनाह है. राफेल डील ले लीजिए. मैं जो कहने जा रहा हूं, वह किसी प्रेस ने नहीं लिखा है और मुझसे सहमत भी नहीं होगा. मान लीजिए फ्रांस सरकार ने भारत सरकार से पूछा कि इंडिया का कौन उद्योगपति है, जिससे हम बात कर सकें. भारत सरकार ने अनिल अंबानी का नाम दिया. गलत क्या है इसमें. गलत ये है कि मन में चोरी है.

डिफेंस तो पब्लिक सेक्टर में है. इस सरकार ने छह निजी लोगों को लाइसेंस दिया. जब फ्रांस ने पूछा तो आपने उन छह नामों में से एक नाम का संकेत कर दिया. जाहिर है, आपको किसी न किसी उद्योगपति का नाम ही देना है, जिसके पास संसाधन हो, योग्यता हो, क्षमता हो. अब सरकार कह रही है कि हमने नाम नहीं दिया. फिर फ्रांस से खबर आई कि भारत सरकार ने अनिल अंबानी का नाम दिया. इस पर भारत सरकार ने आक्षेप लगाना शुरू कर दिया. क्यों? क्योंकि आपके मन में चोर है. आपके पास आत्मविश्वास नहीं है. आप समझते हैं कि यहां-वहां की बात करके दुबारा सत्ता में आ जाएंगे. ये जनता है. जनता सब समझती है. अब राफेल डील में इन्होंने रिश्वत ली कि नहीं, इसका कोई सबूत नहीं है. लेकिन इनके व्यवहार से लगता है कि इन्होंने रिश्वत ली है.

मोदी जी और अमित शाह जी समझ नहीं रहे हैं. बिल्ली आंख बद कर के दूध पीती है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि दुनिया देख नहीं रही है. आपका तो भंडाफोड़ तो हो चुका है. राफेल डील में आपने पैसा लिया या नहीं, इसका कोई सबूत नहीं है. लेकिन भाजपा बड़े पैमाने पर खर्च कर रही है, यह तो दिख रहा है. भाजपा ने 2014 के चुनाव के बाद हजारों करोड़ का खर्च किया है. किसी पार्टी ने आज तक इतना खर्च नहीं किया. भाजपा ने साढ़े चार साल में ऑफिसियली जितना खर्चा किया है, उसका तो हिसाब ही नहीं है. वो बिना चोरी के, बिना रिश्वतखोरी के, उद्योगपतियों से लिए बिना, हो ही नहीं सकता.

अगर आप कह रहे हैं कि राफेल डील साफ है, तो फिर बताइए रुपए कहां से आए. मैं पर्सनल आरोप-प्रत्यारोप के खिलाफ हूं. बोफोर्स का जब मामला आया था, तब मैं विपक्ष में था. मैंने कभी नहीं कहा कि राजीव गांधी ने पैसे लिए हैं. उस समय विपक्ष कहता था कि रिश्वतखोरी हुई है, तो कांग्रेस कहती थी कि ये देश को कमजोर करने की साजिश है, बोफोर्स दुनिया का सबसे बढ़िया तोप है. आज भाजपा कह रही है कि विपक्ष पाकिस्तान की मदद कर रहा है. मैं नहीं कहता कि फाइटर जेट नहीं खरीदना चाहिए. सवाल प्रॉसेस का नही हैं, सवाल तो रिश्वतखोरी का है. भाजपा वैसे ही ध्यान भटका देती है, जैसे कांग्रेस करती थी.

राफेल खरीद की प्रक्रिया यूपीए सरकार ने शुरू की थी, भाजपा कंटिन्यू कर रही है, इसमें झगड़ा कहां है. झगड़ा है पैसे का. यूपीए सरकार कहती है कि हमने इतने में लिया, भाजपा इतने में ले रही है. निर्मला सीतारमण कहती हैं कि ये नेशनल सिक्योरिटी है. भाजपा रास्ते से भटक गई है. इनके मंत्री कहते हैं कि राहुल गांधी पाकिस्तान की मदद कर रहे हैं. आप क्या बात कर रहे हैं? कहीं तो रुकिए. कुछ अंकुश तो लगाइए. पाकिस्तान की मदद कौन करेगा इंडिया में? निर्मला सीतारमण कहती हैं कि कुछ ताकतें हैं जेएनयू में, जो देश को तोड़ना चाहती हैं. यदि आप इतने कमजोर हैं, तो गद्दी से हटिए. ये देश आपके वश का नहीं है. अगर स्टूडेंट्‌स की नारेबाजी से देश को खतरा है, तो आपको देश की समझ ही नहीं है. पैसे का हिसाब आपको देना पड़ेगा. चुनाव आ रहा है. अगर इसमें भी उसी पैमाने पर खर्चा हुआ, तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा.

मैं नहीं कहता हूं कि चुनाव फ्री होना चाहिए. खर्चा होना चाहिए, लेकिन एक सीमा में. आदमी की ईमानदारी खरीदने के लिए पैसा खर्चा शुरू हुआ, तो वो पूंजीवाद का भी गंदा रूप हो जाएगा. सामंतवाद हो जाएगा. ये लोकतंत्र है. आप राजा नहीं हैं, आप प्रजा हैं. आप खुद को प्रधानसेवक बोलते हैं. मैं तो प्रधानमंत्री बोलता हूं. प्रधानसेवक आडंबर लगता है मुझे. आप प्रधानमंत्री हैं, मंत्री हैं, लेकिन राजा नहीं हैं. राजा तो जनता है. जनता ने पांच साल के लिए आपको चुना है. आप बताइए कि आपने अब तक क्या किया. लेकिन यहां तो सबकुछ सिक्रेट है. आरटीआई में आप पूछिए, जवाब मिलेगा कि सिक्योरिटी का मसला है. पीएमओ में कितना खर्चा हुआ, नहीं बताएंगे. क्यों नहीं बताएंगे? मैं सरकार में भी रह चुका हूं. मैं मानता हूं कि सरकार को अपनी गरिमा रखनी चाहिए.

आज आप बोलते हैं कि कांग्रेस अलोकतांत्रिक है. वो तो आपके ही टैक्टिस अपना रही है. आप करें तो सही, वो करें तो गलत. ये तो नहीं हो सकता है. इतनी सिक्रेसी तो कांग्रेस ने भी नहीं रखी कभी. इंदिरा गांधी के समय में एक केस आ गया. मोहन राम एक एमपी थे. उन्होंने शराब लाइसेंस के लिए एक रेकमेंडेशन कर दिया. हल्ला हो गया. विपक्ष ने कहा कि सरकार फाइल दिखाए हाउस में. इंदिरा गांधी ने कहा कि सरकार की फाइल हाउस के पटल पर नहीं रखी जा सकती. अपोजिशन लीडर ने कहा ये बात ठीक है. ये गलत परंपरा हो जाएगी तो क्या हो? ये तय हुआ कि विपक्ष के कुछ नेता को स्पीकर अपने कमरे में बुलाए, मंत्री लाकर उनको फाइल दिखाएं. ये लोकतंत्र है. आपका लोकतंत्र क्या है? जाओ कर लो जो तुम्हारे मन में है. हम तो ऐसे ही चलेंगे. ये लोकतंत्र नहीं है. ये लोकतंत्र का मुखौटा भी नहीं है. ये एक भद्दा मजाक है जनता के साथ.

मैं समझता था कि अरुण जेटली विद्वान आदमी हैं. लेकिन उनसे फायनेंस मिनिस्टरी ठीक से नहीं चली. कुछ लोग कहते हैं कि पीएमओ चला रही थी फायनेंस मिनिस्टर. व्यक्ति इमपॉर्टेंट नहीं है. देश की अर्थव्यवस्था को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया गया है. अमेरिका बहुत खुश है कि भारत में इज ऑफ डूइंग बिजनेस है. लेकिन इज ऑफ डूइंग बिजनेस और इज ऑफ क्लोजिंग बिजनेस हम एक साथ नहीं चला सकते हैं. हमारे यहां एक कारखाना बंद होगा, तो दो हजार आदमी नौकरी से हट जाएंगे और दस हजार आदमी लोग भूखे मरने लगेंगे.

दूसरी तरफ देश को तोड़ने का काम हो रहा है. दो मुसलमान लड़कों को सौ पुलिस वाले गोली मार रहे हैं. इससे ज्यादा गंदी बात क्या हो सकती है. लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रहा. यूपी में योगी सरकार जब से आई है, 86 लोगों को पुलिस ने गोली मार दिया. यदि पुलिस की गोलियों से क्राइम रुक जाता है, तो दुनिया में क्राइम होता ही नहीं. क्राइम रोकने के लिए विश्लेषण करना पड़ेगा. मैं भी मीडिया का हिस्सा रहा हूं. मेरे मन में फ्री प्रेस के लिए बड़ी इज्जत है. इस चुनाव के बाद सबसे ज्यादा प्रहार होगा, तो वो प्रेस पर होगा. क्यों? क्योंकि साढ़े चार साल में प्रेस ने दिखा दिया कि वो बिकाऊ नहीं है, बल्कि बहुत कम दाम में बिकाऊ है.

एक भी अखबार सत्ता के खिलाफ नहीं लिखता है. सारे अखबार लिखना बंद कर दिए, तो वायर, प्रिंट ये सब निकले हैं ऑनलाइन, जो कुछ हिम्मत दिखाते हैं. एनडीटीवी के खिलाफ इनफोर्सेमेंट, सीबीआई लगा दी गई. इसी सब के लिए गांधी जी जेल गए थे क्या? यही हमारी आजादी है क्या? फिर तो ब्रिटिश ही ठीक थे, वो भी यही करते थे. आपने हर जगह सीमा पार कर दी. लोकतांत्रिक हक खत्म कर दिया आपने. आधार का जजमेंट आया. हालांकि वह जजमेंट बहुत अच्छा नहीं है. लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि यह टोटली इलिगल है. वह जजमेंट तो नहीं होगा, क्योंकि बहुमत की चलेगी. लेकिन आपने जो सारे स्टेप लिए, सब शक के दायरे में हैं. इस सरकार का इकबाल खत्म हो गया है, सरकार खत्म नहीं हुई है.

चोरी इंसान का स्वभाव है. जब राहुल गांधी बोल रहे हैं कि देश का चौकीदार चोर है, तो ऑब्जेक्शन हो रहा है. अरे आप तो नेहरू को आज भी गाली दे रहे हैं, जिनका अंतिम संस्कार 1964 में हो गया है. फिर आज आपको चोर बोलने पर मिर्ची क्यों लग रही है? पता नहीं शीतकालीन सत्र चलेगा या नहीं. मेरी अक्ल तो यही कहती है कि आप तीन राज्यों के चुनाव के साथ आम चुनाव भी करवा ही लीजिए. आपकी भी जान छुटे देश की भी जान छुटे. छह महीने देश और चलाना बहुत कठिन काम है. पॉलिटिकल डिबेट का स्तर और नीचे मत गिराइए, काफी नीचे गिर चुका है.

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