मध्य प्रदेश में कौन हारेगा : मोदी या राहुल

MP-pollमध्य प्रदेश में भाजपा अब तक का सबसे मुश्किल चुनाव लड़ने जा रही है. 15 साल से सत्ता पर जमी भाजपा खुद इस चुनावी घमासान से डरी हुई नजर आ रही है. इतना ही नहीं, भाजपा के जिस कार्यकर्ता महाकुंभ को विश्व का सबसे बड़ा कार्यकर्ता महाकुंभ बताकर प्रचारित किया जा रहा था, उसकी स्थिति बमुश्किल प्रदेश स्तर के कार्यक्रम जितनी ही रही. न तो उसमें लाखों की तादाद में कार्यकर्ता पहुंचे और न ही उनमें वैसा उत्साह दिखा, जो देश के ओजस्वी प्रधानमंत्री की उपस्थिति में दिखना चाहिए था. उल्टे बड़ी संख्या में कार्यकर्ता पीएम मोदी के भाषण के बीच से ही उठकर चले गए. उधर, मध्य प्रदेश में सालों से वनवास काट रही कांग्रेस में वरिष्ठ नेता कमलनाथ ने ऑक्सीजन देकर कुछ दम-खम लौटाने की कोशिश तो की है, लेकिन अब भी वहां के वरिष्ठ नेताओं के बीच चल रही तनातनी के कारण कांग्रेस प्रदेश की बजाए अपनी पार्टी के अंदर की ही राजनीति में उलझी हुई है.

जिस सत्ता विरोधी लहर के कारण कांग्रेस को ज्यादा मजबूती से उभरकर आना चाहिए था, उसकी नैया भी डंवाडोल ही नजर आ रही है. उधर भाजपा के अंदर भी अर्ंतकलह कम नहीं है, लेकिन फर्क बस इतना है कि वहां के नेता सीधे तौर पर शिवराज सिंह का विरोध नहीं कर पा रहे हैं. इन दोनों पार्टियों की कमजोरी का फायदा उठाने के लिए नए और छोटे दल तैयार हो रहे हैं. दो महीने पहले अस्तित्व में आई सपाक्स समाज पार्टी प्रदेश की सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है, वहीं अब तक मध्य प्रदेश में एक भी सीट हासिल न कर सकी आम आदमी पार्टी भी सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है. ऐसा ही माहौल रहा तो तीन से चार फीसदी वोट ये छोटी पार्टियां ले जाएंगी. अगर ऐसा हुआ तो मध्य प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों के चुनावी समीकरणों का खतरे में आना तय है. उधर मायावती ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस के साथ न आने की बात कहकर चुनावों में नया रंग घोल दिया है.

क्यों कम हुई शिवराज की ताक़त

गर्भवती मांओं से लेकर बुजुर्गों तक, हर उम्र के लोगों के लिए ढेर सारी योजनाएं लाकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के गरीब तबके का दिल जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने खुद को प्रदेश की बेटियों के मामा के तौर पर भी अच्छी तरह स्थापित कर लिया. उधर किसानों के खाते में सीधे 3200 करोड़ रुपए डालकर खुद को उनका भी सबसे बड़ा हमदर्द साबित कर दिया है. फिर भी क्या कारण हैं कि भाजपा को लेकर न तो मिडिल क्लास खुश है, न किसान और न हमेशा से भाजपा का पारंपरिक वोटर रहा सवर्ण तबका. पदोन्नति में आरक्षण का मामला ऐसा उछला कि सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकारी कर्मचारी संस्था; सपाक्स ने सपाक्स समाज नाम से पार्टी बनाकर प्रदेश की सारी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए ताल ठोक डाली.

वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटेरिया कहते हैं कि 65 फीसदी लोग जाति के आधार पर वोट करते हैं. इसमें भाजपा जातियों पर धर्म का नशा चढ़ा देती है, ताकि वो इसका फायदा ले सके. क्योंकि जब बात हिंदू और मुस्लिम की होती है, तो बौद्ध, सिक्ख और जैन धर्म के फॉलोअर हिंदू धर्म की छतरी के नीचे आकर भाजपा को ही वोट देते हैं. लेकिन इस बार शिवराज ने इस तबके को बहुत नाराज किया है. इसके पीछे कई कारण हैं, जिसमें भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगी बिजली आदि शामिल हैं. दिल्ली में 200 यूनिट बिजली 550 रुपए में मिल रही है, तो वहीं मध्य प्रदेश में इतनी ही बिजली का बिल करीब 1300 रुपए आता है. जबकि मध्य प्रदेश में सरप्लस बिजली बन रही है. वैकल्पिक ऊर्जा से ही बिजली उत्पादन की बात करें, तो 2016-17 में मध्य प्रदेश में 1,363 मेगा यूनिट बिजली सोलर से, 3,546 मेगा यूनिट बिजली विंड से और 159.11 मेगा यूनिट बिजली छोटे हाइड्रो प्लांट्‌स से बनी.

इस तरह वैकल्पिक स्त्रोतों से बन रही बिजली, मध्य प्रदेश के कुल पावर जनरेशन कैपेसिटी की 19 फीसदी है, जो कि बड़ा आंकड़ा है. लेकिन इसके बावजूद प्रदेश के लोगों को महंगी बिजली मिल रही है. इसके अलावा, मिडिल क्लास और अपर क्लास से वसूले गए टैक्स को शिवराज सरकार केवल गरीबों के लिए योजनाएं चलाकर खत्म कर रही है. मिडिल क्लास को अपने लिए कुछ हासिल होते नहीं दिख रहा है. समाज का पढ़ा-लिखा तबका इस बात से भी बुरी तरह नाराज है कि शिवराज सरकार ने गरीबों के लिए पैदा होने से लेकर मरने तक के लिए इतनी योजनाएं बना दी हैं कि वो क्लास अकर्मण्य हो रहा है, जो कि ठीक नहीं है.

शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी जरूरी सुविधाएं देना अपनी जगह उचित है, लेकिन हर चीज के लिए उनके खातों में पैसे बांटते रहना उन्हें आलसी और अर्कमण्य बनाएगा. उस पर ये सरकार कर्ज लेकर योजनाएं चला रही है. 2018-19 के बजट के मुताबिक प्रदेश सरकार पर 1 लाख 87 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है. इधर, गरीब वर्ग का मानना है कि इन्हें सुविधाएं मिलनी ही चाहिए. इस तरह दोनों अपनी जगह सही हैं, फिर भी विवाद तो है. क्योंकि गरीब कौन है, इसका निर्धारण जब तक पारदर्शिता और सही तरीके से नहीं होगा, सही व्यक्ति को हक नहीं मिलेगा और फायदा कोई दूसरा उठाएगा.

इसके अलावा, प्रदेश में भाजपा के विधायकों के खिलाफ भी वातावरण है, क्योंकि उन्होंने काम ही नहीं किए. ये नाराजगी कार्यकर्ताओं की भी है और आम जनता की भी है. भाजपा कार्यकर्ताओं को अपनी सरकार होने के बाद भी छोटे-मोटे काम कराने के लिए भटकना पड़ता है, वहीं आम जनता के काम तो बिना रिश्वत के हो ही नहीं रहे हैं. केवल शिवराज सिंह की योजनाओं और उनके इमोशनल भाषणों के दम पर तो हर तबके के लोग भाजपा को वोट नहीं देंगे. जाहिर है, इसका बड़ा नुकसान इस साल भाजपा को मध्य प्रदेश में झेलना पड़ सकता है.

खुद अपने ही दुश्मन बने शिवराज

इस बार मध्य प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर उसी तरह है, जैसे दिग्विजय सिंह के 10 साल के कार्यकाल के बाद थी. लेकिन उस वक्त कांग्रेस और दिग्विजय सिंह दोनों का ही तगड़ा विरोध था, अलबत्ता इस बार शिवराज के चेहरे को वोट करने वाला एक अलग तबका है, जो सरकारी योजनाओं से लाभान्वित हुआ है.

राजनैतिक विचारक और विश्लेषक कहते हैं कि कई मामलों में शिवराज ने अपने ही काम करने के तरीके को अपना दुश्मन बना लिया है. एक कांग्रेसी नेता तो यहां तक कहते हैं कि दिग्विजय सिंह ने दूसरी बार सीएम बनने के बाद जो गलतियां की थीं, वही शिवराज दोहरा रहे हैं. कार्यकर्ताओं की अनदेखी करना इसमें सबसे बड़ी गलती है. स्थिति यह है कि पूरे प्रदेश में कार्यकर्ता से लेकर मंत्री तक ज्यादातर लोग सीएम से नाराज हैं. सीएम से खफा एक भाजपा नेता तो यहां तक कहते हैं कि यदि मंत्री गोपाल भार्गव तक की बात नहीं सुनी जा रही है, तो सोचिए कि किसकी सुनी जा रही होगी.

कार्यकर्ताओं की बेरुखी और अनमनाहट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कार्यकर्ता महाकुंभ स्थल जम्बूरी मैदान पर कार्यक्रम से एक दिन पहले भी कार्यकर्ता कम और सरकार के लोग ज्यादा नजर आ रहे थे. कार्यकर्ताओं में वैसा उत्साह ही नहीं था, जैसा होना चाहिए था, क्योंकि उनके कोई काम ही नहीं हो रहे हैं. कार्यकर्ता सम्मेलन में आए एक कार्यकर्ता ने बताया कि सेकंड क्लास के तबादले की फाइल भी भाभीजी; साधना सिंह खुद देख रही हैं. बिना उनके कहे ट्रांसफर के मामलों में पत्ता भी नहीं हिलता. इसपर भी बिना लेन-देन किए तो कोई काम होता ही नहीं है. कार्यकर्ताओं की ये नाराजगी और बुरी तरह हावी ब्यूरोक्रेसी शिवराज सिंह के लिए बहुत नुकसानदेय साबित हो सकती है.

भाजपा के लिए इधर कुआं, उधर खाई

सपाक्स और अजाक्स के मामले में तो सरकार इधर कुआं, उधर खाई की स्थिति में आ गई है. समाज में दो तरह के लोग होते हैं. एक वो तबका होता है, जो केवल वोट देता है, दूसरा वर्ग ऐसे लोगों का होता है, जो समाज को इन्फ्लूएंस करता है. ब्राम्हण, क्षत्रिय, जैन और बनिया ऐसी ही कम्युनिटी हैं, जो समाज को इन्फ्लूएंस करती हैं. प्रदेश में 23 फीसदी सामान्य वर्ग है. सवर्ण खुलकर अपना विरोध जता रहे हैं. हमेशा से भाजपा के लिए वोट बैंक जुटाने में मदद करने वाले साधु-संत भी शिवराज सरकार से नाराज चल रहे हैं. कम्प्यूटर बाबा ने हाल ही में राज्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है. पदोन्नति में आरक्षण का विरोध और एट्रोसिटी एक्ट में बदलाव की मांग कर रही सपाक्स समाज पूरे प्रदेश में अपने उम्मीदवार उतार रही है. जाहिर है, नाराज सवर्णों के लिए यह एक विकल्प की तरह होगा, वरना नोटा तो है ही. खैर, इसे दूसरी नजर से देखें तो इससे कांग्रेस को भी नुकसान हुआ है.

कुछ दिन पहले दिग्विजय सिंह ने यह कहकर नया विवाद खड़ा कर दिया कि ‘सपाक्स समाज को तो खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खड़ा किया है, ताकि इसके जरिए वे पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों जैसे मुद्दों से जनता का ध्यान बंटा सकें.’ इससे ऐसे लोग जो भाजपा और सपाक्स दोनों को छोड़ तीसरे विकल्प के तौर पर कांगे्रस को वोट देने की योजना बना रहे थे, शायद अब वो पीछे हट जाएंगे. अब एक नजर सपाक्स और अजाक्स के सदस्यों की संख्या पर डालते हैं. सपाक्स में करीब 4 लाख सदस्य हैं, जिनमें से ढाई लाख सक्रिय सदस्य हैं. सपाक्स समाज संस्था के अध्यक्ष और रिटायर्ड आईएएस अफसर डॉ. हीरालाल त्रिवेदी कहते हैं कि हमारी लड़ाई दो साल से चल रही है और हमारा चुनाव से कोई लेना-देना भी नहीं था. लेकिन जब सरकार अजाक्स के सपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट में चली गई और उसे चुनाव लड़ने के लिए चार करोड़ रुपए तक दे दिए, तो हमें मजबूरन चुनाव में उतरना पड़ा. सरकार के लिए सपाक्स और अजाक्स दोनों बराबर हैं, वो इस तरह पक्षपात कैसे कर सकती है.

दो महीने पहले महज 8-10 लोगों से शुरू हुई सपाक्स समाज संस्था अब हस्ताक्षर अभियान चलाकर सदस्य बना रही है. संस्था अध्यक्ष का दावा है कि अक्टूबर शुरू होने तक इसके सदस्यों की संख्या 50 लाख तक पहुंच गई है. दो अक्टूबर को संस्था ने अपनी पार्टी की घोषणा कर चुनावी बिगुल भी फूंक दिया है. क्या किसी पार्टी से गठबंधन करेंगे, इस सवाल के जबाव पर हीरालाल त्रिवेदी कहते हैं कि हम न तो सीटें जीतने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं और न ही सरकार बनाने के लिए. हमारा मकसद तो अपनी मांगें मनवाना है. हमें पूरा भरोसा है कि हमारी मांगें उचित हैं और जनता हमारा समर्थन करेगी. कोई भी पार्टी जनता के मुददों पर बात नहीं कर रही, हम केवल इन्हीं मुद्दों पर बात करके अपनी सरकार बनाएंगे. हम प्रदेश को भय और भ्रष्टाचार मुक्त शासन देंगे. वैसे भी कांग्रेस से गठबंधन करने का तो सवाल ही नहीं उठता है, वो तो पहले से ही दौड़ में नहीं है. कांग्रेस पार्टी अपनी पुरानी सीटें बचा ले, वही काफी है.

उधर, अजाक्स वालों का अपना अलग राग है. अजाक्स के जनरल सेक्रेटरी एसएल सूर्यवंशी कहते हैं कि हमारे एक लाख 90 हजार सदस्य हैं. सरकारी नौकरी कर रहे लोगों को एससी-एसटी समाज में आइकन की तरह देखा जाता है. उनकी बात बस्ती वाले मानते हैं, ऐसा सवर्ण समाज के अधिकारी-कर्मचारियों के साथ नहीं होता है. ऐसे में एससी-एसटी का 80 फीसदी वोटबैंक हमारे पास है. मध्य प्रदेश में एससी-एसटी वोटर 40 फीसदी हैं. चूंकि अजाक्स चुनावी मैदान में नहीं उतर रही है, इसलिए अब सवाल उठता है कि उसके लोग वोट किसे देंगे? इस बारे में अजाक्स के जनरल सेक्रेटरी का कहना है कि यदि सरकार हमारी मांगें मान लेती है, तो हम भाजपा को वोट देंगे.

लेकिन यदि नहीं मानी तो किसे वोट देंगे, इसका फिलहाल कोई जबाव उनके पास नहीं है. क्या कांग्रेस को ये वोट देंगे? इस सवाल पर सूर्यवंशी कहते हैं कि यदि वो अपने मेनीफेस्टों में हमारी मांगें शामिल कर लें तब देखेंगे. मेनिफेस्टो में लिखी बातों को पार्टियां कितना पूरा करती हैं, ये बताने वाली बात नहीं है. अजाक्स की तीन प्रमुख मांगें हैं – सरकार सभी पोस्टों का बैकलॉग भरे, पदोन्नति में आरक्षण को यथावत रखे और ओबीसी को भी पदोन्नति में आरक्षण दे. अब शिवराज सरकार यदि अजाक्स की मांगे मानती है, तो सपाक्स नाराज होगी और यदि सपाक्स को सपोर्ट करती है तो अजाक्स का गुस्सा झेलेगी.

फ्लॉप शो साबित हुआ भाजपा का कार्यकर्ता महाकुंभ

भाजपा के कार्यकर्ता महाकुंभ में महज 90 हजार कुर्सियां लगीं थीं और इसमें भी 10 फीसदी से ज्यादा खाली रहीं. यदि भोजन पांडाल, पार्किंग समेत बाकी फ्लोटिंग वर्कर्स को भी जोड़ लें, तो इस महाकुंभ में हिस्सा लेने वालों की संख्या दो-ढाई लाख से ऊपर नहीं पहुंचती. इसके अलावा इस महाकुंभ में कार्यकर्ताओं का मोदी के भाषण के बीच से उठकर जाना और अव्यवस्था फैलाना भी दिखा.

दावा किया गया कि इस महाकुंभ में कार्यकर्ताओं को लाने के लिए 8000 बस, 9000 गाड़ियां और 7 ट्रेनों का इंतजाम किया गया था. लेकिन तब भी कार्यकर्ता नहीं पहुंचे. इतना ही नहीं, कई जगह तो बड़ी-बड़ी बसों में भी मुश्किल से चार-पांच लोग बैठे देखे गए. साथ ही इतने बड़े कार्यक्रम को लेकर कार्यकर्ताओं में कोई खास उत्साह भी नहीं दिखा.

मोदी जाते-जाते, कार्यकर्ताओं को ‘मेरा बूथ, सबसे मजबूत’ का नारा तो दे गए, लेकिन अब कार्यकर्ता इस नारे को जमीन पर उतारने में कितना दम-खम दिखाते हैं, ये तो चुनाव के नतीजे ही बताएंगे. इसके अलावा, इस मौके पर नमो एप भी लॉन्च किया गया, जिसके जरिए कार्यकर्ताओं को चुनाव सम्बन्धी जानकारियां उपलब्ध कराई जाएंगी.

ज़िक्र्र-ए-उमा भारती

चुनाव से जुड़ी इस कवरेज के दौरान एक कमाल का अनुभव ये भी रहा कि चाहे भाजपा हो, कांग्रेस हो या फिर अन्य राजनैतिक विश्लेषक-विचारक. सभी ने एक न एक बार उमा भारती के नाम का जिक्र जरूर किया. भाजपा के पास प्रदेश में यदि मास-लीडर की छवि वाला शिवराज सिंह के अलावा कोई अन्य चेहरा है, तो वो हैं- उमा भारती. लोग कहते हैं कि आज भी यदि वे जंगल में भी खड़ी हो जाएं, तो वहां उनके फॉलोअर जुट जाते हैं. लेकिन अपने अनिश्चितता भरे व्यवहार और प्रशासनिक क्षमता में कम पड़ने के कारण पार्टी ने उनको कहीं भी आगे नहीं किया. उमा भारती का ये दर्द कार्यकर्ता महाकुंभ में छलका भी. अपने भाषण में वे बोलीं कि ‘मैंने इस कार्यक्रम में आने का निर्णय एक दिन पहले ही लिया. मैंने सीएम शिवराज सिंह चौहान को फोन करके पूछा कि यदि मेरे आने से कोई लाभ होता हो, तो मैं आऊं, वरना रहने दूं.’ तब सीएम ने उन्हें खुद व्यक्तिगत तौर पर आने के लिए कहा, इसलिए वे कार्यकर्ता महाकुंभ में सम्मिलित हुईं. गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में करीब 70 से 80 सीटें ऐसी हैं, जहां लोधी वोटबैंक जबरदस्त है, वो भी खासतौर पर बुंदेलखंड में.

यदि छोटे दल भाजपा को हराने के लिए चुनाव लडेंगे तो क्या…

बसपा के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार कहते हैं कि हम भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे. किसी भी कीमत पर भाजपा को चौथी बार सरकार नहीं बनाने देंगे. ऐसा ही कुछ राग आम आदमी पार्टी का भी है. अब सवाल उठता है कि यदि इन सबका मकसद भाजपा को हराना है, तो फिर इनका इरादा कहीं कांगे्रस के साथ गठबंधन करके सरकार में आने का तो नहीं है. इस मामले में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार आलोक अग्रवाल कहते हैं कि ‘हम किसी भी कीमत पर कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेंगे. यदि दिल्ली की तरह दोबारा चुनाव कराने की स्थिति बनी, तो भी हम चुनाव को ही चुनेंगे, न कि गठबंधन को.

या फिर मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएंगे.’ हालांकि बसपा के नेता कर्नाटक और उत्तराखंड की तरह उम्मीद कर रहे हैं. जहां एक-दो सीटें मिलने पर भी बसपा के विधायकों को मंत्री बनने का मौका मिल गया. लेकिन मायावती के कांग्रेस को दो टूक ना कहने के बाद मध्य प्रदेश में बसपा के नेताओं का ये सपना भी टूट गया है. उल्टे स्थिति ऐसी बन गई है कि पिछली बार गठबंधन के चलते जो चार सीटें बीएसपी को मिली थीं, उनमें से दो पर इस बार जीतना भी मुश्किल हो जाएगा. इससे कांग्रेस को फायदा ही होगा. ऐसा माना जा रहा है कि अब कांग्रेस, जद (यू), जयस, गोंडवाना जैसी पार्टियों को साथ लेकर महागठबंधन की तरफ जा सकती है.

तीन-तीन चेहरे, पर मुख्यमंत्री कैंडिडेट कोई नहीं

मध्य प्रदेश कांग्रेस के पास ज्योतिरादित्य सिंधिया का लोकप्रिय युवा चेहरा है, तो कमलनाथ का मैनेजमेंट और दिग्विजय सिंह का मजबूत जनाधार है. चुनाव के लिए सबसे अहम ये तीनों चीजें होने के बाद भी कांग्रेस मध्य प्रदेश में कमजोर स्थिति में है. भाजपा के पास शिवराज का चेहरा है, जिसका एक विशेष तबके में चमत्कारिक महत्व भी है, लेकिन कांग्रेस ऐसे चेहरे से अब तक महरूम है. ये महरूमी अपने आप को सीएम कैंडिडेट मान रहे तीनों कांग्रेसी नेताओं को तो अखर ही रही है, कार्यकर्ताओं और जनता के लिहाज से भी खटक रही है, क्योंकि चुनावों में चेहरे का अपना वोटबैंक होता है.

कमलनाथ के आने के बाद प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में कुछ दिनों तक तो माहौल ठीक रहा, क्योंकि मध्य प्रदेश कांग्रेस में इनकी छवि सर्वमान्य नेता की रही है. इसके अलावा वे काफी सीनियर भी हैं. एक कांग्रेसी नेता उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जब कमलनाथ पहली बार सांसद बने थे, तब ज्योतिरादित्य नौ साल के थे. ऐसे में आपसी मतभेदों से बुरी तरह जूझ रही कांग्रेस को समेटने के लिए इनसे बेहतर विकल्प कोई नहीं था. लिहाजा, इनके आने के बाद कुछ दिन तो सब ठीक चला, लेकिन बाद में फिर झगड़े शुरू हो गए. हालांकि इनकी वरिष्ठता के कारण कई कांग्रेसी नेता इनके सामने खुलकर तो अपनी नाराजगी नहीं जता पा रहे हैं, लेकिन अपनी नाराजगी जताने के कई अन्य तरीके इन्होंने खोज लिए हैं. कई नेताओं ने तो पीसीसी आना ही बंद कर दिया है. इनमें अरुण यादव, मानक अग्रवाल आदि शामिल हैं.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि लोग भाजपा से गुस्साए हैं और कांग्र्रेस को वोट देना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस इसके लिए तैयार ही नहीं है. सभी नेता आपस में ही भिड़े हुए हैं. इससे जुड़े कुछ मजेदार किस्से भी प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में और इसके बाहर सुनने को मिले. प्रदेश के संगठन की बागडोर संभालने के बाद कमलनाथ ने एक प्रेस कांफ्रेंस की, जिसका बिल साढ़े छह लाख रुपए आया और इसका भुगतान पार्टी फंड से किया गया. लेकिन जब सिंधिया ने प्रेस कांफ्रेंस की, तो उसका साढ़े चार लाख रुपए का बिल यह कह कर वापस करा दिया गया कि वे खुद पेमेंट करें.

ज्योतिरादित्य सिंधिया चाहते थे कि बतौर सीएम कैंडिडेट उनका नाम घोषित कर दिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.  इससे वे भी संतुष्ट नहीं हैं. चुनावी प्रचार को लेकर भी सिंधिया का जनता से संपर्क अच्छी तरह नहीं हो पा रहा है. पन्ना के पास पवई में सिंधिया ने मुकेश नायक को कैंडिडेट घोषित कर दिया, जिसे लेकर कमलनाथ ने तुरंत कहा कि कोई भी नेता ऐसा नहीं कर सकता है. कैंडिडेट का सेलेक्शन केवल हाईकमान ही करेगा. इसी तरह, 12 सितंबर को देपालपुर में सिंधिया ने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया, जिसमें करीब 5000 लोग पहुंचे. इस कार्यक्रम को हफ्ता भर भी नहीं बीता और देपालपुर में ही कमलनाथ ने किसी अन्य कांगे्रस कार्यकर्ता के लिए सभा कर दी, जिसमें सिंधिया की सभा से ज्यादा लोग पहुंच गए.

इस वाकये के बाद तो दोनों नेताओं के बीच खींचतान और बढ़ गई. खैर, इस सबसे फायदा हुआ अजय सिंह राहुल भैया को. कहा जाता है कि कमलनाथ की सिंधिया के साथ तनातनी बढ़ने के बाद अब अजय सिंह को पीसीसी में काफी बुलाया जाने लगा है. वरना इससे पहले तक पीसीसी से बमुश्किल एक फर्लांग की दूरी पर रहने वाले अजय सिंह कभी-कभार ही पीसीसी में दिखते थे.

इसी तरह, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को भी पार्टी हाईकमान दरकिनार करने में जुटा हुआ है. राहुल गांधी की भोपाल में हुई संकल्प यात्रा के स्वागत में लगे सभी कांग्रेसी नेताओं के बड़े-बड़े कटआउट्‌स के बीच दिग्विजय सिंह के कटआउट कहीं नजर नहीं आए. ये मामला मीडिया ने खूब उछाला. तब दिग्विजय सिंह ने यह कहकर बात संभाली कि उन्होंने खुद ही अपने कटआउट्‌स लगाने के लिए मना किया था. लेकिन कांग्रेस के एक और नेता के कटआउट इस कार्यक्रम से गायब थे और ये बात पार्टी हाईकमान को भी नागवार गुजरी. जनरल सेक्रेटरी दीपक बावरिया के कटआउट भी इस यात्रा के स्वागत में कहीं नहीं दिखे. तब राहुल गांधी ने इस मामले की जांच करने के लिए दिल्ली से टीम भेजी, जिसने दिल्ली जाकर असलियत बताई कि किसी ने जान-बूझकर ऐसा किया है.

इस संकल्प-यात्रा के किस्से यहीं खत्म नहीं होते. इस यात्रा के पूरे इंतजामात के लिए पांच करोड रुपए दिए गए थे और जिम्मेदारी कमलनाथ के नजदीकी नेता सुरेश पचौरी को दी गई थी. सुरेश पचौरी ने रोड शो का जिम्मा अपने पास रखा और सभास्थल की तैयारी का काम अपने कुछ नजदीकी लोगों को दे दिया, इसके लिए 50 लाख रुपए भी दिए. कार्यक्रम के दौरान सुरेश पचौरी के लोग इस तरह हर जगह छाए रहे कि कमलनाथ के नजदीकी लोग भी पिक्चर से गायब हो गए. इसके बाद तो कमलनाथ और पचौरी के समर्थकों के बीच ही तनातनी हो गई. इसके बाद एक अन्य कांग्रेसी नेता ने यह कहकर नई बहस छेड़ दी कि जितने काम के लिए 50 लाख रुपए खर्च किए गए, वो तो 10 लाख रुपए में ही हो जाता. खैर, ऐसे तो कई किस्से पीसीसी में आजकल आम हैं.

मध्य प्रदेश में अपने चरम पर है भ्रष्टाचार

प्रदेश के एक आईपीएस अधिकारी बताते हैं कि राज्य में भ्रष्टाचार चरम पर है. इससे ज्यादा भ्रष्टाचार पहले कभी नहीं हुआ. साथ ही, अब वो सिस्टेमेटाइज भी हो गया है. भ्रष्टाचार इतने व्यवस्थित तरीके से चल रहा है कि सोचकर ही आश्चर्य होता है. हर स्टेप पर बैठे लोगों का हिस्सा तय है और वो समय से उन तक पहुंच भी जाता है. इधर आम जनता, इस भ्रष्टाचार के कारण शिवराज सिंह से खार खाए बैठी है. कार्यकर्ता अलग नाराज हैं. बुद्धिजीवी वर्ग का कहना है कि वैसे भी लोकतंत्र में रोटेशन बना रहना चाहिए. एक पार्टी को 15 साल का वक्त देना पर्याप्त है. अब सरकार बदलनी चाहिए. इससे नई सरकार पर खुद को साबित करने का भरपूर दबाव होगा, जिसका फायदा जनता के हर वर्ग को मिलेगा.

सत्ता विरोधी लहर के भरोसे है कांग्रेस

कांग्रेस ने जिस तरह से चुनाव को लेकर ढीला रवैया अपनाया है, उसे देखते हुए ज्यादातर लोगों का मानना है कि वो केवल सत्ता विरोधी लहर के भरोसे बैठी है. खैर, कुछ हद तक कांग्रेस की ये सोच सही भी है, क्योंकि पिछले चुनावों पर नजर डालें तो किसे पता था कि भाजपा बहुमत से इतनी ज्यादा सीटें ले जाएगी. दिग्विजय सिंह को हराते वक्त भी भाजपा के खाते में 173 सीटें आई थीं, जिसमें सबसे बड़ा योगदान सत्ता विरोधी लहर का था. इसे लेकर चुनावी विश्लेषक गिरिजाशंकर कहते हैं कि चुनाव पॉलीटिकल साइंस का नहीं, बल्कि सोशल साइंस का विषय है. लोग किस तरह चुनावों में अपनी प्रतिक्रिया देंगे, इस पर हार-जीत का निर्णय होता है.

अब सत्ता विरोधी लहर को मापने का कोई पैमाना तो है नहीं, लिहाजा इससे कांग्रेस को कितना फायदा होगा, ये अंदाजा लगाना ही गलत है. भले ही लोग सत्तारूढ़ दल के विधायक से लेकर पार्षद और सरपंच तक से खुश न हों, लेकिन शिवराज सिंह की भले आदमी की छवि उनके पक्ष में जाती है. वे मेहनती नेता हैं. मुश्किल के वक्त जनता के पास भले ही गवर्नमेंट मशीनरी मदद के लिए बाद में पहुंचे, शिवराज जरूर मौके पर लोगों के आंसू पोंछने के लिए पहले पहुंच जाते हैं.

कुल मिलाकर देखें तो सत्तारूढ़ दल के खिलाफ जीत दर्ज करने की जो आग और भूख कांग्रेस में होनी चाहिए वो कहीं नजर नहीं आ रही. व्यापम जैसे बड़े घोटाले को कांग्रेस सही तरीके से छू भी नहीं पाई, उसे मुद्दा बनाना तो दूर की बात है.

ये होंगे चुनावी मुद्दे

भाजपा के पास सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा सरकार के तीन कार्यकाल के काम गिनाना है. सारी योजनाओं से मिले लाभों को जन-जन तक पहुंचाना है. वहीं कांग्रेस बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और किसानों की समस्याओं को मुद्दा बना रही है. मंदसौर में किसानों की मौत के बाद किसान काफी नाराज हैं. इसके अलावा, मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी भावांतर योजना भी बुरी तरह फ्लॉप रही है. बीज पाने से लेकर बिजली, फसलों का सही मूल्य न मिलने जैसी किसानों की ढेरों समस्याएं हैं.

शिवराज सिंह ने खेती को लाभ का धंधा बनाने के सपने तो खूब दिखाए, लेकिन उनमें से कोई भी पूरा नहीं कर पाए और इसकी भरपाई वे किसानों के खाते में पैसे डालकर करने की कोशिश करते रहे. इतनी समस्याओं के बाद भी किसानों के पास वोट देते वक्त पहले विकल्प के रूप में शिवराज ही नजर आते हैं. उन्हें इम्मीद है कि शायद भविष्य में उनके खातों में और पैसे आएं. वैसे भी शिवराज सिंह के पास किसानों को खुश करने के लिए इसके अलावा फिलहाल कोई अन्य तरीका है भी नहीं है.

सपाक्स और अजाक्स के अपने मुद्दे हैं. वहीं बसपा का कहना है कि वो भाजपा को हराने के लिए काम करेगी, क्योंकि उनके कार्यकाल में दलितों के साथ बुरा व्यवहार हुआ. निर्दोष दलितों को मारा गया. आम आदमी पार्टी भी भाजपा को हराने के लिए दिल्ली में किए गए कामों की दुहाई देगी. इसके अलावा वो शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी, किसानों और गरीबों की समस्याओं को मुद्दा बनाएगी. आप नेता आलोक अग्रवाल कहते हैं कि दिल्ली में चुनाव लड़ते वक्त हमारे सामने जो समस्याएं थीं, वो अब नहीं हैं. गांव-गांव में लोग आम आदमी पार्टी, अरविंद केजरीवाल और हमारे चुनाव चिन्ह झाड़ू को जानते हैं. हमें केवल अच्छे फंड की जरूरत है.

मीडिया पर जमकर पैसा बहा रही है शिवराज सरकार

यह तो जगजाहिर है कि शिवराज सिंह ने पिछले 13 सालों में जमकर पैसा बनाया और अब चौथी बार सत्ता में आने के लिए उसका भरपूर इस्तेमाल भी कर रहे हैं. खबरें मैनेज करने के लिए मीडिया पर जमकर पैसा लुटाया जा रहा है. प्रदेश के एक प्रमुख हिंदी दैनिक को ही अब तक करीब 60 करोड़ रुपए के विज्ञापन मिल चुके हैं. जाहिर है, बाकी हिंदी-अंग्रेजी अखबारों को भी तगड़े विज्ञापन मिले होंगे. इस रेस में वेबसाइट्‌स भी अखबारों से पीछे नहीं रहीं. चुनावों के आते ही नए अखबार-चैनल आने का चलन तो हमेशा से रहा है, इस बार दौड़ में वेबसाइट्‌स भी बडी संख्या में शामिल हुई हैं. वैसे पिछले तीन-चार सालों में शिवराज सरकार ने वेबसाइट्‌स के लिए सरकारी विज्ञापन पाने के नियमों में कुछ ढील भी दी है. करीब दो साल पहले कुछ अनाधिकृत और अयोग्य वेबसाइट्‌स को 14 करोड़ रुपए के विज्ञापन देने का मामला भी जोर पकड़ा था. इनमें से कई वेबसाइट रिटायर्ड ऑफिसर्स और नेताओं के परिजन भी चला रहे थे.


कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकतीहै दिग्विजय सिंह  की अनदेखी

अब बात करते हैं दिग्विजय सिंह की, जिन्हें केवल कटआउट से गायब नहीं किया गया, बल्कि प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में ही पीछे ढकेलने की कोशिश की जा रही है. इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि उनके दो बार के मुख्यमंत्री कार्यकाल में मिस्टर बंटाधार की जो छवि बनी है, वो उनके खिलाफ जाती है. लिहाजा, उन्हें फ्रंट पर न लाना ही बेहतर होगा. लेकिन दिग्विजय सिंह के मामले में एक बात कोई नहीं नकार पा रहा कि प्रदेश में उनके जितने जनाधार वाला कोई नेता कांग्रेस में नहीं है. वे एक ऐसे नेता हैं, जिनका मध्य प्रदेश के कम से कम 50 हजार से ज्यादा गांवों में संपर्क है और ये संपर्क केवल नाम का नहीं है, बल्कि गहरे जुड़ाव वाला है. इस मामले में एक भाजपा नेता तक ने एक बार कहा था कि ‘प्रदेश में दिग्विजय सिंह ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जो 50 हजार गांवों में कम से कम 2 लोगों को उनके पहले नाम से जानते हैं.’ इतने बड़े जनाधार वाले नेता को दरकिनार करने का खामियाजा जाहिर है, कांग्रेस को उठाना पड़ेगा. चार महीने तक 120 सीटों पर घूमकर दिग्विजय सिंह ने जो नर्मदा यात्रा की, उसके नफे-नुकसान को लेकर बात करना भी जरूरी है. इस यात्रा में दिग्विजय सिंह ने अपनी पत्नी अमृता राय के साथ जो सैंकड़ों किलोमीटर नापे, उसका कितना फायदा दिग्विजय को हुआ और कितना कांग्रेस को, इस पर लोगों की अलग-अलग राय है.

45 साल से पॉलीटिकल रिर्पोटिंग में सक्रिय और चुनावी विश्लेषक गिरिजाशंकर कहते हैं कि ‘यदि इतना बड़ा नेता चार महीने तक गांव-गांव और शहर-शहर घूमता है, फिर तो उसके पास सत्तारूढ़ दल के खिलाफ अब तक इतने मुद्दे इकट्‌ठे हो जाने चाहिए थे कि कांग्रेस के पास इस यात्रा के सिवाय अन्य कोई विषय ही नहीं बचता. लेकिन इस यात्रा की न तो वैसी मार्केटिंग की गई और न वैसे फायदे लिए गए.’ वहीं दूसरी तरफ एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता का कहना है कि ‘दिग्विजय सिंह ने इस यात्रा से अपने संवाद और संपर्क दोनों ही दोबारा जिंदा कर लिए हैं, लेकिन वे अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं. उन्हें इंतजार है कि आलाकमान उनके महत्व को समझे और उन्हें बुलाए.’ अब आलाकमान उन्हें बुलाता है या नहीं, ये तो वक्त ही बताएगा. लेकिन चुनावी पंडितों की मानें, तो दिग्विजय सिंह की अनदेखी कांग्रेस की हार में बड़ा रोल निभा सकती है.


क्यों ख़फा-़ख़फा हैं मोदी शिवराज सिंह से!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान से खफा हैं. ऐसी नाराजगी दर्शाती कई फोटो पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया में जमकर वायरल हुईं. ये बात तो तय है कि पिछली मुलाकातों में मोदी ने शिवराज के प्रति अपनी नाराजगी अपने चेहरे के हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज से बखूबी जाहिर की. ऐसा ही नजारा कार्यकर्ता महाकुंभ में भी नजर आया. करीब डेढ़ घंटे तक अगल-बगल बैठे मोदी-शिवराज ने एक बार भी न तो बात की और न ही स्वागत के दौरान मोदी ने शिवराज से मिलने में कोई गर्मजोशी दिखाई. भाजपा के नेता इसके पीछे दो प्रमुख कारण गिनाते हैं. पहला, शिवराज ने तब तक चुनावों के लिए कोई काम नहीं किया, जब तक कि उनका नाम हाईकमान ने सीएम कैंडिडेट के तौर पर घोषित नहीं कर दिया. इसे लेकर शिवराज ने भारी दबाव बनाया था. इतना ही नहीं, पांचों साल चुनावी मोड में रहने वाले शिवराज सिंह 2018 के चुनाव के लिए कुछ महीने पहले, जुलाई में ही सक्रिय हुए और 14 जुलाई से जन-आर्शीवाद यात्रा पर निकले. जबकि इससे पहले हर चुनाव में एक साल पहले ही चुनावी बिगुल फूंक देनी की उनकी प्रथा रही है.

दूसरा कारण है, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद पर राकेश सिंह को लाने के लिए अपना इस्तीफा तक देने की धमकी देना. पहले इस पद के लिए कैलाश विजयवर्गीय और नरोत्तम मिश्रा के नामों पर सबकी सहमति बनी थी, लेकिन सीएम इन दोनों को दरकिनार कर अपनी पसंद के नेता राकेश सिंह को इस पद पर ले आए. इतना ही नहीं, पिछले 13 सालों के दौरान शिवराज सिंह ने मध्य प्रदेश में अपने समकक्ष तो छोड़िए दूसरी और तीसरी पंक्ति तक के नेताओं को नहीं टिकने दिया. इसके कारण भाजपा के नेता इनसे खासे नाराज हैं. इनकी नाराजगी जायज भी है कि वो मुख्यमंत्री बनने के लिए आखिर कब तक इंतजार करें. इसके अलावा, 13 साल से सत्ता के सिंहासन पर बैठे शिवराज सिंह ही प्रदेश में एकमात्र ऐसे नेता हैं, जो चुनाव में इतना फंड लगा सकते हैं. ऐसी स्थितियों के चलते भाजपा के पास मध्य प्रदेश में सीएम पद के लिए शिवराज सिंह के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था.

खैर, कार्यकर्ता महाकुंभ में मोदी ने अपनी नाखुशी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के समक्ष जाहिर करने में कोई कमी भी नहीं बरती. न तो वे सीएम से एक बार भी बात करते नजर आए और न ही उनकी बॉडी लैंग्वेज से कोई सकारात्मक संकेत मिला. पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर से उनकी गर्मजोशी भरी मुलाकात ने जरूर सीएम समेत कई नेताओं के चेहरे पर शिकन ला दी है.


ये है चुुनावी गणित

मध्य प्रदेश में कुल 5 करोड़ 3 लाख वोटर्स हैं. इसमें 8 फीसदी वोटर नए जुड़े हैं. 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 44.85 फीसदी और कांग्रेस को 36.38 फीसदी वोट मिले थे. बसपा का वोट शेयर 6.29 फीसदी रहा था. वहीं सीटों की बात करें, तो 2003 में जब भाजपा ने मध्य प्रदेश में 10 साल बाद वापसी की थी, तो सत्ता विरोधी लहर और उमा भारती के चेहरे के चलते 173 सीटों पर जीत दर्ज की थी. इसके बाद 2008 के चुनावों में 143 सीटें मिलीं और लगातार तीसरी बार जब सत्ता में आई, तो जनता ने 165 सीटों से भाजपा को नवाजा. आखिरी विधानसभा चुनाव में करीब आठ फीसदी का जो गैप रहा है, उसे भरना इस बार कांग्रेस के लिए कुछ खास मुश्किल नहीं होगा. चूंकि बसपा से इस बार कई दलित संगठन नाराज हैं और वो अपना वोट ऐसी पार्टी को देना चाहते हैं, जो सत्ता में आ सके.

लिहाजा, चुनावी पंडितों का मानना है कि यदि कांग्रेस अच्छी तरह मेहनत करे, तो इस बार बसपा के आधे वोट आराम से कांग्रेस के खाते में आ सकते हैं. इसके अलावा, यदि कांग्रेस अजाक्स के वोट पाने में भी कामयाब रही, तो उसके लिए सत्ता का सफर और भी आसान हो जाएगा. आम आदमी पार्टी, सपाक्स समाज जैसे दल भी चार फीसदी वोट शेयर ले सकते हैं. इसके अलावा, सत्ता विरोधी लहर तो है ही. इन सबको मिला लें, तो कांग्रेस आठ फीसदी वोट बैंक के गैप को खत्म करने की दूरी पूरी कर सकती है.

चुनावी मैनेजमेंट की बात करें, तो शिवराज सिंह चौहान ने गवर्नमेंट मशीनरी, पार्टी, मीडिया सभी को मैनेज करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. इस तरह तो उनकी स्थिति प्रदेश में सर्वव्यापी जैसी है. वहीं पार्टी संगठन पर भी उन्होंने अपना दबाव बनाने की पूरी कोशिश की है. अलबत्ता मोदी की नाराजगी और अमित शाह के चाणक्य बुद्धि पर शिवराज का कोई वश नहीं है. ऐसे में टिकट डिस्ट्रिब्यूशन में शिवराज सिंह कितना हस्तक्षेप कर पाते हैं, ये तो उम्मीदवारों की लिस्ट ही बताएगी.

भाजपा के नेताओं की ही मानें, तो विधायकों के खिलाफ जिस तरह का माहौल है, उस लिहाज से जीत के लिए कम से कम 70 से 100 सीटों पर कैंडिडेट बदलना बहुत जरूरी है. यदि कैंडिडेट बदलने का आंकड़ा 50 सीटों तक भी न पहुंच पाया तो भाजपा की हार तय है.   दबी जुबान से सभी कह रहे हैं कि सपाक्स समाज के चुनाव में उतरने का फायदा भाजपा को मिलेगा. लेकिन पांच फीसदी तक सपाक्स समाज को मिले वोट भाजपा को फायदा देंगे वहीं इससे ज्यादा का वोट शेयर भाजपा को हार की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ा देगा.

ऐसी ही स्थिति कांग्रेस को लेकर भी है. वहां तो नेताओं के पसंदीदा लोगों को टिकट बांटने के दौरान प्राथमिकता देने का चलन पुराना रहा है. यदि इस बार भी मध्य प्रदेश में सक्रिय तीन-चार नेताओं की पसंद को ही प्राथमिकता दी गई, तो कांग्रेस की एक बार फिर हार निश्चित है और इस बार ये हार ऐसी होगी जैसे कांग्रेस जीत का सेहरा खुद भाजपा की झोली में डाल दे, क्योंकि मतदाता इस बार बदलाव की बयार चाहते हैं. यानि कि जिस भी पार्टी में सीटों की बंदरबांट होगी, उसका बड़ा फायदा दूसरी पार्टी को मिलेगा.

वैसे इसकी गुंजाइश कांग्रेस में ज्यादा है, क्योंकि जब सीएम कैंडिडेट घोषित न हो, मुद्दों को सही तरीके से उठाया न गया हो, तो ऐसे में कैंडिडेट ही अहम हो जाता है. इस मामले में भाजपा की स्थिति ठीक है, क्योंकि उसके पास कम से कम सीएम कैंडिडेट तो तय है. जहां तक बात राहुल गांधी की है, तो उनमें भले ही परिपक्वता बढ़ी है, लेकिन अब भी मध्य प्रदेश में उनकी छवि ऐसी नहीं है कि उनके कहने भर से लोग कांग्रेस को वोट दे दें.

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