जब तोप मुकाबिल होजरुर पढेंसंपादकीय

अगले छह महीने बाद भारत बदलने वाला है

modi and rahul for changing india
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मानना चाहिए कि अगले छह महीने में भारत बदलने वाला है. कहने वाले तो कह रहे हैं कि भारत बदल गया है. पर मुझे लगता है कि प्रमाणिक रूप से अभी छह महीने और लगेंगे, जब संपूर्ण भारत बदल जाएगा और वहां से हम विश्व गुरु बनने के रास्ते पर कदम बढ़ा देंगे. विश्व गुरु ही नहीं, बल्कि महाशक्ति बनने के रास्ते पर हम अगला कदम बढ़ा देंगे. यह मैं इस विश्वास से इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आजादी के आंदोलन से लेकर अबतक जो भारत की जनता में या भारत के नेताओं में नहीं हुआ, वो अब हो रहा है.

महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत में सिर्फ न करने की शक्ति जनता ने पैदा कर ली है. हम हर चीज को बिना सोचे समझे तर्क की कसौटी पर कसे स्वीकार कर लेते हैं. इसके खिलाफ गांधी ने एक मंत्र दिया था, ‘टू से नो…’ अन्याय के खिलाफ, अत्याचार के खिलाफ झूठ के खिलाफ अपना हाथ खड़ा करो और अगर कुछ नहीं कर सकते हो, तो एक शब्द है, नहीं. मैं इसका साथ नहीं देता या मैं इससे सहमत नहीं हूं. कम से कम यह कहो. भारत की जनता में पहला बदलाव पिछले चार साल में यही देखने को मिला है कि हम अब उस सत्य के खिलाफ ना नहीं कहते जो सत्य हमें परोसा जा रहा है. हम अपनी आंख से देखे हुए पर विश्वास नहीं करते हैं, बल्कि हमें जो प्रतीकों में दिखाया जा रहा है, उसे हम सत्य मानकर उसपर सबसे ज्यादा विश्वास करते हैं. यह भारतीय समाज में बदलाव की पहली निशानी है.

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भारतीय समाज के बदलाव की दूसरी निशानी यह है कि हमसे जो वादे हुए या देश जो वादे हुए उन वादों को हम न देखते हैं न सुनते हैं न याद करते हैं. हमने मान लिया है कि हमसे जो वादे हुए वो तो यूं ही थे. उन वादों पर बात करना, उनपर ध्यान देना समय की बर्बादी है. भारतीय समाज में यह भावना पूरी तरह से घर कर गई है कि उन वादों को लेकर सवाल पूछना हमें देश-प्रेम से अलग चरित्र वाला व्यक्ति बना देगा, वादे चाहे जैसे भी हों. वादों ने हमें चाहे जितने सपने दिखाए हों, लेकिन हम मान बैठे हैं कि वादे चुनाव में तो होते ही हैं और चुनाव के बाद जब उन वादों को लेकर देश चलाने वाले यह कहें कि हमने उन वादों को पूरा कर दिया है, तो हम बड़ी आसानी से मान लेते हैं कि हां ये वादे पूरे हो गए हैं. जो यह कहता है कि वादे कहां पूरे हुए हैं, वह व्यक्ति इस बदले हुए समाज का दुश्मन बन जाता है. इसलिए दूसरा परिवर्तन यह हुआ है कि जो हमसे कहा गया जो हमसे वादे किए गए उन वादों को विश्लेषण का विषय न बनाएं, बल्कि अब जो हमसे कहा जा रहा है कि देश में यह हो गया है और इस तरह से देश बदल गया है, उसपर बिना अपना मस्तिष्क लगाए विश्वास कर लें. यह भारतीय समाज के बदलने की दूसरी निशानी है.

भारतीय समाज के बदलने की तीसरी निशानी यह है कि लोकतंत्र को चौराहे पर खड़ा करके उसका रास्ता बदल देना चाहिए. अब तक भारत में यह माना जाता था कि लोकतंत्र में परस्पर संस्थाएं एक दूसरे की कमियों को दूर करती हैं और अगर कोई एक उसी संस्था गलत दिशा में जाए तो दूसरी संस्थाएं उसे आगाह कर देती हैं. कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के बीच संतुलन बना रहे, इसे हम अबतक लोकतंत्र की बुनियादी शर्त मानते थे. अगर इन तीनों में भी कोई सामंजस्य, समन्वय न हो और ये अलग दिशा की तरफ चलें, तो हम एक चौथे संस्था के ऊपर भरोसा करते थे, जिसका नाम प्रेस था, जिसे अब मीडिया के नाम से बुलाया जाता है. प्रेस से अपेक्षा थी कि वो इन तीनों संस्थाओं के उन कमजोर कदमों के बारे में देश को आगाह करेगा, जो भारतीय समाज को लोकतांत्रिक रास्ते से दूर ले जा रहे हैं. लेकिन अब समाज बदल गया है.

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छह महीने के बाद हम देखेंगे कि कैसे पिछले चार साल में प्रेस ने इस बदलाव में अहम रोल निभाया है. उसने सवाल ही नहीं पूछे, उसने तीनों संस्थाओं के अंतरविरोधों के ऊपर लिखा ही नहीं. उसने तीनों संस्थाओं के आपसी सामंजस्य को बिगाड़ने वाले तरीकों को गलत ही नहीं कहा, बल्कि खुद निर्णायक की भूमिका निभाने की जगह उनका पिछलग्गू हो गया. यह भारतीय समाज के बदलने की तीसरी बड़ी निशानी है. भारतीय समाज के अंदर संवैधानिक संस्थाएं चाहे जैसा काम करेें, उसे लेकर हमारे मन में सवाल नहीं उठते हैं. चाहे वो इलेक्शन कमीशन हो, चाहे वो विधायिका हो, न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो या फिर सर्वोच्च न्यायालय. हम इनके दिशा भ्रमित होने को सही मानते हैं और लोकतांत्रिक सिद्धांतों की कसौटी पर कभी उन्हें कसते नहीं. चूंकि हम ऐसा नहीं करते हैं, इसलिए ये सारी संस्थाएं मनमाने तरीके से जनता की आकांक्षाओं से दूर लोकतांत्रिक मानकों से अलग जा रही हैं. शायद यही भारत के बदले समाज का नया चरित्र है. इसलिए हमने इसे सहजता से स्वीकार कर लिया.

एक और जो बदले हुए समाज का चिन्ह हमें दिखाई पड़ रहा है, वो ये कि अब सर्वोच्च न्यायालय अपने फैसले न्याय के आधारभूत सिद्धांतों के आधार पर नहीं देगा, बल्कि जनआकांक्षाओं के उफान के आधार पर देगा. अगर गांव में किसी को डायन मानकर गांव वाले सर्वसम्मति से पीट देते हैं या कोई पंचायत किसी को मौत की सजा दे देती है या भीड़ किसी को पीट-पीट कर मार देती है (जिसे मॉब लीचिंग कहते हैं) या फिर जनभावना किसी निशान की बात करती है और सर्वोच्च न्यायालय इन सबकी जांच करता है, तो ये अब जनविरोधी माना जाएगा. अगर कोई जज जनविरोधी फैसला दे देता है, तो भारतीय समाज के कोप का भाजन बन सकता है. न्यायपालिका के लिए भी दिशा निर्देश अब राजनीतिक दल देंगे. कुछ दल के अध्यक्षों ने तो दिशा निर्देश देना शुरू कर दिया है. भारतीय समाज के मन में कोई चिंता नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय के दिए हुए फैसलों पर अगर सरकार अमल नहीं करवा पाती है, तो ये सरकार की कमजोरी या उसका दोष नहीं है, सरकार जो कर रही है उसके हिसाब से न्यायालय अपने कदम क्यों ठीक नहीं कर रहा है. आगे आने वाला बदला हुआ भारत इन सिद्धांतों के आधार पर कसौटियां तय करेगा.

सबसे बड़ा बदलाव का चिन्ह भारत का विपक्ष है. विपक्ष के पास ऐसा कोई मुद्दा नहीं है, जिनपर वे सवाल पूछ सकें. आने वाले लोकतंत्र का चेहरा जो अगले छह महीने के बाद हमारे सामने होगा, उसमें विपक्ष नाम की कोई चीज नहीं होगी और विपक्ष के लोग विपक्ष के नाम पर सत्तारूढ़ पार्टी की बी टीम बने दिखाई देंगे. लोकतंत्र में विपक्ष का सत्ता से कम महत्वपूर्ण स्थान नहीं है. दुनिया के बहुत सारे देशों में विपक्ष अपना मंत्रिमंडल बनाता है. उसका एक प्रधानमंत्री होता है, एक गृह मंत्री होता है और संपूर्ण मंत्रिमंडल होता है, लेकिन भारत में छह महीने के बाद का लोकतंत्र विपक्षविहीन होगा और विपक्ष के नाम पर सत्तारूढ़ शक्तियों का ही एक अलग चेहरा सामने आएगा. इसलिए मैं ये देख रहा हूं कि छह महीने के बाद का हिन्दुस्तान कैसा होगा.

इसमें बुरा नहीं लग रहा है, बल्कि मुझे लग रहा है कि भारत के लिए यह आवश्यक है. अगर इस देश की जनता सवाल पूछना बंद कर दे, नजर रखना बंद कर दे, पढ़ना बंद कर दे, ज्ञान की जगह सूचना के आधार पर अपना काम करने लगे, तो फिर सत्य की सारी कसौटियां ही खत्म हो जाएंगी. अब सत्य की एक ही कसौटी रहेगी कि जो सरकार ने कहा या जो सत्तारूढ़ शक्तियों ने कहा, अगर हम उसे नहीं मानते हैं या उसे पूरा नहीं करते हैं, तो हम उस बदले हुए समाज का हिस्सा नहीं बन पाएंगे और हम इस देश में एक तरफ अकेले ढकेल दिए जाएंगे. इसलिए छह महीने के बाद के भारत के लिए अपने महान देशवासियों को शुभकामनाएं. बहुत बहुत शुभकामनाएं.

संतोष भारतीय Contributor|User role
संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.
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संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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