विकास दर ही नहीं सरकार की नियत भी शक के दायरे में

सरकार ने 2006 से 2012 के दौरान के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि दर के आंकड़ों को कम कर दिया है. गौर तलब है कि इस दौरान कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए-1 और यूपीए-2 सरकारें सत्ता में थीं. हालांकि इन आंकड़ों में कमी को लेकर कांग्रेस की नाराज़गी स्वाभाविक है, लेकिन कई स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों ने भी सरकारी गणना की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किये हैं.

दरअसल, 2015 में सरकार ने यूनाइटेड नेशनस सिस्टम ऑफ़ नेशनल अकाउंट के सुझावों के आधार पर देश की जीडीपी की गणना के लिए एक नई पद्धति अपनाई थी. साथ ही आर्थिक गतिविधियों के आंकलन को और बेहतर बनाने के लिए सकल मूल्य संवर्धन (ग्रॉस वैल्यू एडेड मेजर) के  उपाय को अपनाया था. इन नई पद्धतियों को अपनाने के क्रम में जब जीडीपी की गणना का आधार वर्ष 2004-05 के बजाए 2011-12 किया गया  था, तो उस समय भी उस की काफी आलोचना हुई थी. आलोचकों का कहना था कि सरकार अपनी नाकामियां छुपाने के लिए नई पद्धतियां अपना रही है.

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तीन साल बाद आज एक बार फिर केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) द्वारा जारी विकास दर के आंकड़े विवादों में हैं. सीएसओ ने 2006 और 2012 के बीच के बैक सिरीज के आंकड़ों के आधार पर यूपीए के कार्यकाल के जीडीपी विकास दर को घटा दिया है. नए आंकड़ों के मुताबिक 2006 और 2012 के बीच औसत विकास दर 6.7 फिसद बताई गई है, जबकि पूर्व के आंकड़े कहते हैं कि यूपीए-1 और यूपीए-2 के कार्यकाल में विकास दर क्रमशः 8.1 और 7.46 प्रतिशत थी. सीएसओ के ताज़ा आंकड़ों की एक खास बात यह है कि मोदी सरकार के पहले चार साल के कार्यकाल का औसत विकास दर 7.35 प्रतिशत दिखाया गया है.

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यहां सवाल यह उठता है कि आखिर सीएसओ ने इन आंकड़ों को कम क्यों किया? क्या इस के लिए उसपर कहीं से दबाव था? यह सवाल इस लिए भी उठ रहा है क्योंकि आज से तकरीबन एक वर्ष पहले राज्य सभा में भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने एक कार्यक्रम के दौरान अपनी ही सरकार पर एक बड़ा आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि सीएसओ के आला अफसरों पर दबाव डाल कर सरकार ने जीडीपी के गलत आंकड़े पेश करवाए हैं, ताकि यह साबित किया जा सके कि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है. ऐसे में जब सत्ता पक्ष का एक ज़िम्मेदार सांसद इतने गंभीर आरोप लगा रहा हो, तो मौजूदा आंकड़ों के संदर्भ में भी सरकार की नियत पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है. खास कर तब, जब सरकार खुद यह स्वीकार कर रही है कि बैक सिरीज आंकड़ों के मूल्यांकन की एक से अधिक विधि हो सकती है. ऐसे में सरकार लाख दावा करे कि उसने जीडीपी गणना के लिए सबसे बेहतर विधि अपनाई है, उसपर विश्वास करने में किसी को भी झिझक हो सकती है.

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जिस तरह से बैक सिरीज के आंकड़े जारी किये गए उसपर भी विपक्षी दलों और अर्थ शास्त्रियों ने संदेह जताया है, खास तौर पर इनके जारी करते समय नीति आयोग के अधिकारीयों की मौजूदगी पर. हालांकि अपने स्पष्टीकरण में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा कि सरकार ने उनके विभाग से कहा था कि वो इन आंकड़ों को एक नज़र दे ले, ताकि यदि आंकड़ों की गणना में या गणना के  लिए अपनाई गई विधि में किसी तरह की त्रुटी है तो सरकार उसको ठीक कर सके. उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए सरकार उन्हें अधिकृत कर सकती है, लिहाज़ा आंकड़ों को जारी करते समय नीति आयोग की उपस्थिति कोई आपत्तिजनक बात नहीं है.

अब आखिर में यह सवाल कि क्या यह मामला राजनीति से प्रेरित है? तो इसका सीधा सीधा जवाब है कि अब तक कांग्रेस यह दावा करती रही है कि उसके कार्यकाल में विकास दर 10 प्रतिशत के अंक तक पहुंच गया था, जबकि मौजूदा सरकार नए मानक अपनाने के बावजूद 7 प्रतिशत से आगे नहीं निकल पा रही है. ऐसे में सरकार की यह रणनीति हो सकती है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए-1 और यूपीए-2 सरकारों के विकास दर के आंकड़ों को कम कर और अपने कार्यकाल के आंकड़ों को अधिक दिखा कर उसका राजनैतिक लाभ लिया जा सके तथा कांग्रेस को घेरा जा सके. लेकिन भले ही सरकार आंकड़ों का प्रदर्शन कर इसका राजनैतिक लाभ उठा ले लेकिन अर्थव्यवस्था पर इसका कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ता नहीं दिख रहा है.

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