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पुराने कब्र खोदकर शव दफनाने को मजबूर अफ्रीकी

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शवों को दफनाने को लेकर कई बार यह सवाल चर्चा में आता है कि जब जमीन ही नहीं रहेगी, तो शव कहां दफनाए जाएंगे. अभी दक्षिण अफ्रीका का जोहानेसबर्ग ऐसी ही समस्‍या से दो चार हो रहा है. जोहानेसबर्ग में शवों को दफनाने के लिए कब्रों की कमी हो गई है, जिसके कारण ज्यादातर लोग अपने मृत परिजन के अंतिम संस्कार के लिए पहले से बनी कब्रों को दोबारा खोद रहे हैं. हर हफ्ते करीब 50 से 60 कब्रें दोबारा खोदी जा रही हैं, ताकि पहले से दफन किए गए शव के ऊपरी हिस्से में एक और शव को दफनाया जा सके.

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जोहानेसबर्ग दक्षिण अफ्रीका का आर्थिक हब माना जाता है. एक तरफ तो जनसंख्या बढ़ ही रही है, वही दूसरी तरफ विदेशी भी बड़ी संख्‍या में यहा पहुंच रहे हैं. इस वजह से इसके शहरी इलाकों में जनसंख्‍या का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है. शहर में कब्रिस्तानों का प्रबंधन करने वालों का कहना है कि लोग बड़ी संख्या में यहां रहने के लिए आ रहे हैं, जिनमें विदशी नागरिक भी शामिल हैं, इसलिए कब्रों के लिए खाली जगहें तेजी से गायब हो रही हैं. उनका कहना है कि अगर जनसंख्या पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो अगले 50 सालों में शवों को दफनाने के लिए कोई जगह ही नहीं बचेगी.

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गौरतलब है कि करीब तीन दशक पहले डरबन में भी यही समस्या सामने आई थी. हालांकि वहां राजनीतिक हिंसा और एचआईवी/एड्स के कारण मरने वालों की बढ़ती संख्या की वजह से यह समस्‍या पैदा हुई थी. शफ दफनाने में आने वाली इस समस्‍या को देखते हुए अब इसके विकल्‍प को लेकर भी चर्चा होने लगी है. हालांकि, अफ्रीकी समुदायों में शवों को जलाने को अप्राकृतिक और गैर-पारंपरिक माना जाता है. लोग इसे नरक की आग में जलने जैसा मानते हैं. कुछ और पारंपरिक लोगों का मानना है कि इंसान को पूरा शारीरिक रूप में ही भगवान के पास पहुंचना चाहिए न कि राख के रूप में.

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आम लोगों में तो इसे लेकर मतभेद है, लेकिन इस बड़ी समस्‍या से निपटने के लिए सरकार कई पहलुओं पर विचार कर रही है. यह भी कहा जा रहा है कि कब्रों की भारी कमी से निपटने के लिए सरकार जल्द ही एक कानून का प्रस्ताव दे सकती है. इसके तहत, जमीन को जबरदस्ती कब्जे किया जा सकेगा. इसमें रंगभेद और उपनिवेशवाद के बाद पैदा हुई असमानता को खत्म करने के उपायों का भी प्रावधान है.

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