Post Retirement Truth:  आखिर सच बोलने की ये ताकत कहां छुपी होती है

OP RAWAT

मौजूदा दौर Post Truth का है या नहीं, इस पर बहस हो सकती है. लेकिन ये दौर Post Retirement Truth का है, इसमें कोई शक नहीं है. Post Retirement Truth, यानी नौकरी से अवकाश प्राप्त होने की बाद किसी बडे सरकारी बाबू की आत्मा का जागना.

हालिया उदाहरण है, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत. भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर ओपी रावत के रहते ही नोटबंदी हुई थी. सरकार का मानना था कि नोटबंदी से कालाधन पर लगाम लगेगा. नोटबंदी के बाद के 2 साल में कई राज्यों के चुनाव हुए. स्थानीय चुनाव भी हुए. चुनाव में भारी मात्रा में कालाधन के इस्तेमाल की खबरें सामने आई. लेकिन, तब मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत को वह ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ, जो रिटायरमेंट के चन्द दिनों बाद ही मिल गया. उनका हालिया बयान है कि नोटबंदी से चुनाव में कालेधन का उपयोग थमा नहीं है बल्कि पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार अधिक मात्रा में कालाधन बरामद किया गया.

अब सवाल ये है कि जिन मुख्य चुनाव आयुक्त महोदय पर विपक्ष का ये आरोप रहता था कि वे चुनाव तिथियों का ऐलान भी सत्तारूढ दल की सहूलियत से करते है, अचानक रिटायरमेंट के बाद वो वैसा सच क्यों बोलने लगे, जिसे उन्हें बहुत पहले बोल देना चाहिए था.

इसी तरह एक और बडे अधिकारी थे, अरविंद सुब्रह्मण्‍यम, भारत के प्रधानमंत्री के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार. उन्होंने आज तक इस बात का खुलासा नहीं किया है कि नोटबंदी पर उनसे राय ली गई थी या नहीं? लेकिन अपने पद से हटने के बाद श्री सुब्रह्मण्‍यम नोटबंदी पर जम कर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं. नोटबंदी को वे अर्थव्यवस्था के लिए एक झटका मानते है. उनका मानना है कि नोटबंदी के कारण ही विकास दर 7 तिमाही के सबसे निचले स्तर 6.8 फीसदी पर आ गई. सुब्रह्मण्‍यम ने एक किताब लिखी हैं, जिसका नाम है, ‘ऑफ काउंसिल: द चैलेंजेज ऑफ द मोदी-जेटली इकोनॉमी’. इसी किताब में उन्होंने नोटबंदी को ले कर ये राय रखी है.

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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस श्री जोसेफ कूरियन ने रिटायरमेंट के दो दिन बाद यह कह कर देश को चौंका दिया कि तत्कालीन सीजेआई श्री दीपक मिश्रा कहीं बाहर से नियंत्रित हो रहे थे. हालांकि, जस्टिस कूरियन के लिए Post Retirement Truth वाली बात इसलिए नहीं की जा सकती है, क्योंकि अपने पद पर रहते हुए श्री जोसेफ, चार जजों वाली उस प्रसिद्ध प्रेंस कांफ्रेंस का हिस्सा थे, जिसमें तत्कालीन चीफ जस्टिस श्री दीपक मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाए गए थे.

ऐसा नहीं है कि इस तरह की खबरें कोई आजकल ही आ रही है. अतीत की सरकारों में भी ऐसी खबरें आती रही है. मसलन, संजय बारू की किताब एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर को ही ले. श्री बारू प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे. वे इस पद पर 2004 से 2008 तक रहे. पद से हटने के बाद उन्होंने उक्त किताब लिखी. इस किताब में उन्होंने खुलासा किया कि अपने मंत्रिमंडल पर और यहां तक कि पीएमओ पर भी मनमोहन सिंह का पूर्ण नियंत्रण नहीं था. बारू बताते है कि श्री सिंह ने उनसे कहा था कि इससे भ्रम पैदा होता है और पार्टी अध्यक्ष (सोनिया गांधी) ही सत्ता की केन्द्र हैं. सरकार पार्टी के प्रति जवाबदेह बन गई है.

बहरहाल, ये चन्द उदाहरण भर से ही समझा जा सकता है कि Post Retirement Truth क्या बला है. ये एक ऐसा सत्य है, जो नौकरी करते रहने के दौरान कहीं अंतर्मन में छुपा होता है और रिटायर होने के बाद अक्सर प्रकट हो जाता है. आमतौर पर इसके कई फायदे भी हैं. इस तरह के Post Retirement Truth उजागर करने वाले अधिकारी कई बार मशहूर लेखक भी बन जाते हैं या फिर नेता भी.

 

 

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