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असम समझौता लागू करने के लिए केंद्र ने बनाई उच्‍च स्‍तरीय समिति

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असम में जारी विरोध के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने केंद्रीय कैबिनेट के निर्णय और बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खुले ऐलान के संबंध में 1985 के असम समझौते के अनुच्‍छेद-6 के क्रियान्‍वयन पर विचार के लिए उच्‍चस्‍तरीय समिति गठित कर दी है. समिति में दो अवकाशप्राप्‍त आईएएस अधिकारी, असम साहित्‍य सभा के दो पूर्व अध्‍यक्ष, असम के महान्‍यायवादी, एक पूर्व संपादक, एक शिक्षाविद, संयुक्‍त सचिव गृह मंत्रालय और असम समझौते पर दस्‍तखत करने वाले छात्र संगठन आसू के एक प्रतिनिधि को शामिल किया गया है. समिति से छह माह में अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है.

गृह मंत्रालय की घोषणा के मुताबिक पूर्व आईएएस एमपी बेजबरुवा की अध्‍यक्षता में बनी इस समिति में पूर्व आईएएस सुभाष दास, असम साहित्‍य सभा के पूर्व अध्‍यक्ष डॉ. नगेन सइकिया व रंग्‍बंग तेरांग, पूर्व संपादक डीएन बेजबरुवा, असम के महान्‍यायवादी रमेश बरपात्रगोहाई, शिक्षाविद् डॉ. मुकुंद राजबंशी और आसू के प्रतिनिधि सदस्‍य होंगे. इसके अलावा समिति में केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक संयुक्‍त सचिव स्‍तर का अधिकारी सदस्‍य सचिव होगा. असम सरकार समिति को आवश्‍यक प्रशासनिक एवं अन्‍य सहयोग प्रदान करेगी.

असम समझौते के अनुच्‍छेद 6 का उद्देश्‍य असमिया लोगों की सांस्‍कृतिक, सामाजिक, भाषाई पहचान और विरासत को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक सुरक्षा प्रदान करना है.

बीते बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट ने इस समिति के गठन के प्रस्‍ताव को मंजूरी दी थी. इसकी घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब भाजपा सरकार असम में नागरिकता कानून (संशोधन) विधेयक 2016 को लेकर तीखे और राज्‍यव्‍यापी आलोचना का सामना कर रही है. इस विधेयक में तीन पड़ोसी देशों बांग्‍लादेश, अफगानिस्‍तान और पाकिस्‍तान से वहां के अल्‍पसंख्‍यक गैर-मुस्लिम आप्रवासियों को भारतीय नागरिकाता के योग्‍य बनाने का प्रस्‍ताव है.

ब्रह्मपुत्र घाटी के ऊपरी और निचले असम के तमाम इलाके, जहां इस विवादित विधेयक के पूरी तरह विरोध में हैं, वहीं बराक घाटी में इसे व्‍यापक समर्थन मिल रहा है. बीती 4 जनवरी को बराक घाटी के मुख्‍य शहर सिलचर में लोकसभा चुनाव पूर्व रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ तौर पर कहा कि यह विधेयक पास कराया ही जाएगा. उसी के बाद समूची ब्रह्मपुत्र घाटी में मानो उबाल आ गया है. भाजपा को छोड़ सभी राजनीतिक दल, छात्र-किसान और जातीय संगठन आंदोलन मोड में आ गए हैं. विधेयक को जातिध्‍वंसी, असम विरोधी और विभाजनकारी मानासिकता वाला बता इसे किसी भी कीमत पर स्‍वीकार नहीं करने की हुंकार जारी है.

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