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हमीं सो गए दास्तां कहते कहते… अलविदा, कादर खान!

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2019 का पहला सूरज अभी निकलने की तैयारी ही कर रहा था. पूरी दुनिया में नये साल के जश्न मनाया जा रहा था. तभी अचानक एक मनहूस खबर सोशल मीडिया पर गर्दिश करने लगी. खबर यह थी कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के महान कलाकार कादर खान का कनाडा के एक अस्पताल में सोमवार की शाम 6 बजे देहांत हो गया. कादर खान के चाहने वालों ने इस खबर पर विश्वास नहीं किया. उन्हें लगा कि पहले भी कई बार उनकी मौत की अफवाहें सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी हैं और हर बार की तरह इस बार भी उनके पुत्र सरफ़राज़ इस खबर का खंडन कर देंगे. लेकिन जब काफी वक़्त गुजर गया और सरफ़राज़ की तरफ से कोई खंडन नहीं आया और कई विश्वसनीय स्रोतों ने उनकी मौत की पुष्टि कर दी तो फिर किसी के लिए इस खबर पर विश्वास न करने की कोई वजह बाक़ी नहीं रही. और इस तरह हिंदी सिनेमा के आसमान पर 5 दशकों तक पूरे आबोताब से चमकने वाला यह सितारा हमेशा के लिए डूब गया.

कादर खान का जन्म  22 अक्टूबर 1937 को काबुल (अफगानिस्तान) में हुआ था. उनके पिता अब्दुर्रहीम खान कंदहार के रहने वाले थे, जबकि उनकी मां इकबाल बेगम पिशिन (बलोचिस्तान) की रहने वाली थीं. कादर खान का बचपन मुबई में गुज़रा. उन्होंने स्थानीय म्युनिसिपल स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की. उसके बाद इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग से मास्टर’स डिप्लोमा इन इंजीनियरिंग की. 1970 के दशक के शुरुआती कुछ वर्षों तक वो एमएच साबू दिद्दिक कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में लेक्चरर रहे.

फ़िल्मी दुनिया उनका पदार्पण कुछ फ़िल्मी अंदाज़ में ही हुआ था. कादर खान को ड्रामे करने का शौक था. एक ड्रामे के मंचन के दौरान फिल्म कॉमेडियन आगा की नज़र उन पर पडी. आगा उनके काम से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शहंशाह-ए-जज्बात दिलीप कुमार से उनकी सिफारिश. दिलीप साहब भी उनके काम से प्रभावित हुए और कादर खान अपनी दो फिल्मो “सगीना” और “बैराग” के लिया साइन कर लिया. यह वो मौक़ा था जिसने कादर खान को फिल्म इंडस्ट्री से परिचय करवाया. उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने तकरीबन 300 फिल्मों में बतौर एक्टर काम किया और तकरीब 250 फिल्मों की पटकथा लिखी.

कहा जाता है की अमिताभ के सुपरस्टारडम में कादर खान का बहुत बड़ा योगदान है. और यह सिर्फ कहने की बात नहीं है. यदि अमिताभ की सुपरहिट फिल्मों का नाम लिया जाए जिनकी वजह से अमिताभ सुपरस्टार बने तो उनमें मुकदर का सिकंदर, अमर अकबर अन्थोनी, देश प्रेमी, सुहाग, परवरिश, लावारिस, शराबी, कुली आदि फिलोम के नाम ज़रूर लिए जायेंगे. इन सभी फिल्मों के डायलॉग कादर खान ने लिखे थे.

चौथी दुनिया परिवार से भी कादर खान का एक खास रिश्ता रहा है. डेली मल्टीमीडिया के बैनर तले बनी फिल्म “हो गया दिमाग का दही” उनकी आखिरी फिल्म साबित हुई. इस फिल्म की पटकथा चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय ने लिखी थी. वो फौजिया अर्शी द्वारा निर्देशित इस फिल्म के को-प्रोडूसर भी थे. दरअसल, कादर खान ने अपनी दो सुपरहिट फिल्मों शमा और परछाईं की रीमेक के राइट्स भी डेली मल्टीमीडिया को दे दी थी. इस बात का ज़िक्र उन्होंने संतोष भारतीय को दिये अपने (शायद आखिरी) इंटरव्यू में भी किया था. आप वह इंटरव्यू यहां देख सकते हैं:

जब कादर खान की तबियत बहुत ज़यादा बिगड़ गई तो संतोष भारतीय की कोशिशों से ही उन्हें पतंजलि योगपीठ ले जाया गया था. पतंजलि योगपीठ में कादर खान द्वारा बिताये गए पलों को पतंजलि योगपीठ के सह-संस्थापक आचार्य बालकृष्ण ने यूं याद किया:

कहते हैं कलाकार कभी नहीं मरता. कादर खान ने भी अपने पीछे अपने कामों की इतनी शानदार फिहरिस्त छोड़ी है जो उनके नाम को अमर रखने के लिए काफी है. शायद ऐसे ही कलाकारों के लिए शायर ने कहा है:

बड़े शौक़ से सुन रहा था ज़माना

हमीं सो गए दास्तां कहते कहते.

शफीक आलम Editor|User role
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