चुटका परमाणु बिजली संयंत्र विरोधी आंदोलन – आदिवासियों को ज़िंदा रहने का अधिकार चाहिए

ऐसा नहीं है कि आदिवासी क्रिकेट को नापसंद करते हैं. उनके गांवों में बरसों पहले क्रिकेट की आमद हो चुकी

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मनरेगा : ग्रामीण आजीविका के नाम पर सजाधजा झुनझुना! – ऊंचा शोर खुलेआम फ़र्ज़ीवाड़ा?

मनरेगा के नाम पर कहीं खुलेआम फ़र्ज़ीवाड़ा चल रहा है, तो कहीं डेढ़ सौ से अधिक बने शौचालय छह महीने

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ज़ुल्म-ओ-सितम के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रहेगी : अति वंचित समुदायों को जीने का अधिकार चाहिए

भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी, बीमारी और अशिक्षा जैसी तमाम समस्याओं से रोजाना दो-दो हाथ करने वाले अति वंचित समुदाय के लोगों

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ठंड का कहरः बेघरों की मौत

जब तक चौथी दुनिया का यह अंक आपके हाथ में पहुंचेगा, मायावती का हैप्पी बर्थ डे मनाया जा चुका होगा और तब तक उत्तर प्रदेश में रिकार्ड तोड़ सर्दी सैकड़ों लोगों का जीवन भी लील चुकी होगी. ऊंचे महलों में बड़ों का जश्न और फुटपाथ पर मातम. मौत का आंकड़ा अब तक साढ़े तीन सौ की संख्या पार कर चुका है.

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जीने का अधिकार अभियानः जन जागरण के नए प्रयोग की दस्तक

अपने हितों और अधिकारों के लिए आदिवासियों को जगाने और जुटाने का यह अनूठा सामाजिक प्रयोग है. नाम है जीने का अधिकार अभियान, जो मध्य प्रदेश के जबलपुर, कटनी एवं मंडला ज़िलों के ढाई दर्जन से अधिक आदिवासी गांवों में अपने पैर जमाने की तैयारी कर रहा है.

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कंपनी हारी जनता जीती

विकास के नाम पर सरकारों की आंख मूंद कंपनीपरस्ती के इस दौर में अधिसंख्य आबादी के सामने ज़िंदा रहने का संकट सुरसा के मुंह की तरह फैलता जा रहा है. चंद कंपनियों के भले के लिए पहले से ग़रीब-वंचित जनता को और अधिक ग़रीबी और वंचना में डुबो देने की दु:खभरी कहानियां बढ़ती जा रही हैं.

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नक्‍सलवाद, मीडिया और पुलिसः मीडिया को धमकी हद में रहो

सीपीआई (माओवादी) के प्रवक्ता आज़ाद की मुठभेड़ के नाम पर आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा की गई हत्या के बाद अमन एवं इंसाफ़ के पैरोकार सदमे और गुस्से में हैं. इनमें बहुतेरे माओवादियों के हिंसा के रास्ते पर उंगली भी उठाते रहे हैं, लेकिन उससे पहले सरकारों की जनविरोधी नीतियों और उसके प्रतिरोध के बर्बर दमन को ज़रूर कठघरे में भी खड़ा करते रहे हैं.

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आजाद कौन है?

सीपीआई (माओवादी) के प्रवक्ता कामरेड आज़ाद यानी गहरे रंग के और लंबे-दुबले चेरुकुरी राजकुमार नहीं रहे. आंध्र प्रदेश की पुलिस ने अपनी पीठ थपथपाते हुए बताया कि उन्हें आदिलाबाद के जोगपुर जंगल में हुई मुठभेड़ में मार गिराया गया. पुलिस के मुताबिक़, मुठभेड़ सरकेपल्ली गांव इलाक़े में हुई और लगभग चार घंटे तक चली.

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सांसत में विकास

माओवादी नहीं चाहते कि आदिवासियों का भला हो और वे मुख्यधारा में आएं. यह तो बेचारे आदिवासियों को पिछड़ेपन की गिरफ्त में बनाए रखने की साजिश है. उनका इरादा नेक नहीं है. उनके लिए आदिवासी केवल ढाल हैं, मोहरा हैं. उनका इकलौता मक़सद हिंसा के रास्ते सत्ता हासिल करना है.

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माफियाओं से जूझते बालू मजदूर

नाव से लोगों को नदी पार ले जाते, कंधों और पतवारों की जुगलबंदी से नाव खेते, बिखेर कर मछली का जाल फेंकते और शाम के धुंधलके में वापस लौटते मछुवारों की लयबद्ध छवियां बहुत सुहानी लगती हैं. लहरों की धुन पर हिचकोले खाते उनके गीत इस दृश्य को और अधिक दिलकश बनाते हैं.

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मोंगरा बांध का पानी किसके लिए?

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव ज़िले का अंबागढ़ चौकी ब्लॉक. पारा 46 डिग्री को छू रहा था. चिलचिलाती धूप में छह लोगों की टोली पांगरी नामक छोटे से सुदूर आदिवासी गांव से मोंगरा बांध से जुड़े सवाल लेकर सात दिन के पैदल स़फर पर रवाना हुई. प्रचार के लिए किसी ढोल-नगाड़े के बग़ैर और बेहद अनौपचारिक अंदाज़ में. यह सफ़र मोंगरा गांव पहुंच कर ख़त्म हुआ.

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जो बोलेगा, सो झेलेगा

हिंदी के मशहूर लेखक एवं नाटककार मुद्राराक्षस बेहद गुस्से में थे. आक्रामक मुद्रा और तीखे स्वरों में लगभग चीखते हुए उन्होंने सवाल किया कि यह देश किसका है, किसके लिए है. हत्यारे, लुटेरे, बलात्कारी, दलाल, तस्कर खुलेआम घूम रहे हैं. मुसलमानों का क़त्लेआम कराने वाला आदमी गुजरात का मुख्यमंत्री है. बाल ठाकरे मुसलमानों की हत्या किए जाने की लगातार अपील करता है और केंद्रीय मंत्री बेशर्म होकर उसके दरवाज़े मत्था टेकने पहुंच जाता है. लेकिन जो इस देश और देश की जनता को बचाने के लिए जुटते हैं, उन्हें देशद्रोही की कतार में खड़ा कर दिया जाता है.

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सरकार कंपनियों के आगे नतमस्‍तक

छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव गदगद हैं कि बड़े उद्योग राज्य पर बहुत मेहरबान हैं और अब तक कोई चार लाख करोड़ रुपये का निवेश कर चुके हैं. छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बने बस एक ही दशक तो पूरा हुआ है और कामयाबी का इतना बड़ा पहाड़ खड़ा कर दिया गया.

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सच की जुबान पर सरकार का पहरा

केंद्र सरकार की इस बेताला धुन पर कई राज्य सरकारें जुगलबंदी कर रही हैं कि माओवादी अमन और तऱक्क़ी के जानी दुश्मन हैं, देश और समाज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं. यह न्याय और अधिकार की आवाज़ को कुचल देने का आसान हथियार है. विकास के नाम पर ग़रीब-वंचित आदिवासियों का सब कुछ हड़प लेने की सरकारी मंशा के ख़िला़फ जो खड़ा हो, माओवादी का ठप्पा लगाकर उस पर लाठी-गोली बरसा दो या फिर उसे जेल पहुंचा दो.

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क्या वे सजग प्रहरी हैं?

इस बात पर बहस हो सकती है कि किसी आदमी के लिए कुत्ता किसिम का, कुत्ता कहीं का जैसा जुमला गाली है या व़फादारी की पदवी. गांव-गली के कुत्ते अपने इलाक़े की पहरेदारी करते हैं. कहीं भी कोई ग़ैर मामूली हरक़त हुई कि वे चौकन्ने हो जाते हैं और ज़रूरत पड़ी तो भौंकने भी लगते हैं कि होशियार-ख़बरदार.

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खामोश! यह छत्तीसग़ढ है

अस्पताल में शंबो को थोड़ी राहत मिली तो उसे बच्चों की याद सताने लगी. इलाज लंबा चलना था और अभी दूसरे ऑपरेशन भी बाक़ी थे. तय हुआ कि वह दंतेवाड़ा में हिमांशु कुमार के आश्रम में रहेगी और दिसंबर के अंत तक अगले ऑपरेशन के लिए दिल्ली वापस आ जाएगी. अभी तक वह पहली अक्टूबर के सदमे से उबर नहीं सकी थी और गुमसुम रहती थी.

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जन सुनवाई का सामना क्यों जरूरी?

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल नरसिंहन ने कभी नहीं चाहा कि केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम सात जनवरी की दंतेवाड़ा जन सुनवाई में हिस्सा लें. इस बात का गवाह है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखा गया उनका वह पत्र, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री से यह कहा कि गृहमंत्री जैसे अति विशिष्ट शख्स के दौरे से माओवादियों के ख़िला़फ जारी अभियान में रुकावट पैदा होगी.

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इंसाफ की आवाज पर पाबंदी

चिंता यह कि ऑपरेशन ग्रीन हंट की धमक ने आदिवासियों को आतंक और असुरक्षा के गहरे अंधेरे में धकेल देने का काम किया है. नतीजा यह कि विस्थापन की भगदड़ बेतहाशा फैल रही है, गांव के गांव उजड़ रहे हैं.

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पंडवानी की नई आवाज बुधन बाइ मेश्राम

पंडवानी महाभारत की कथा का संगीत रूपक है. फिलहाल, कोई 40 साल से कथावाचक की भूमिका में महिलाएं हैं. इतनी महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद सच यह है कि दूसरे बाक़ी कलाकारों की तरह पंडवानी गायिकाएं भी केवल दिहाड़ी की मज़दूर होती हैं.

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दहशत का दूसरा नाम सलवा जुडुम

बड़ी मुश्किल यह है कि आदिवासी नक्सली ख़तरे को समझ नहीं पा रहे और अपने पहाड़-जंगल की गोद को छोड़ कर सलवा जुडुम की छत्रछाया में रहने को तैयार नहीं. इस इनक़ार का मतलब है कि आदिवासी नक्सली हैं या नक्सलियों के असर में हैं और उनके मददगार हैं. उन्हें सबक सिखाने की ज़रूरत है.

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डा. बिनायक सेन क्या नक्सली हैं.

अगली 14 मई को डा. बिनायक सेन को रायपुर जेल में बतौर कैदी दो साल पूरे हो जाएंगे. इस मौके पर देश के तमाम हिस्सों में और विदेशों में भी उनकी रिहाई की मांग के लिए बड़े कार्यक्रम आयोजित किये जाने की तैयारियां जारी हैं. इसी कड़ी में गुजरे 16 मार्च से रायपुर जेल के बाहर हर सोमवार को गिरफ्तारी देने का कार्यक्रम शुरू हो चुका है. इसी दिन यानी 16 मार्च को कोलकाता और दिल्ली में भी उनकी रिहाई के लिए बड़ी संख्या में विभिन्न क्षेत्रों और तबकों के लोग जुटे. 22 नोबल पुरस्कार विजेता एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्था भी उनकी रिहाई चाहती है.

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