पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर टकराव

भारत का समाजवादी लोकतंत्र प्रतिनिधित्व की राजनीति में अच्छी तरह रचा-बसा है. यहां विशेषज्ञों की सभा और समिति के बारे में आमतौर पर यह माना जाता है कि वे स्थितियों को बेहतर ढंग से समझते हैं. बनिस्बत उनके जो ऐतिहासिक तौर पर सत्ता प्रतिष्ठान में निर्णायक भूमिका रखते हैं. यह सब एक प्रक्रिया के तहत होता है. इसमें प्राथमिकताएं सुनिश्चित होती हैं, योजनाओं का मूल्यांकन किया जाता है और विकास के रास्ते तैयार किए जाते हैं.

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सशर्त क्लियरेंस से नहीं थमेगा विनाश

यह बात कितनी महत्वपूर्ण है और इसकी फिक्र किसे है कि पिछले सत्र के दौरान भारतीय संसद ने एक अलग ही इतिहास रचा. पिछले सत्र के दौरान लोकसभा ने महज़ 7 घंटे ही काम किया. यह सब कुछ ऐसे समय के बाद हुआ, जब पर्यावरण और कृषि से जुड़े कुछ अत्यंत ही महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे.

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न्‍याय के लिए हम कहां जाएं

कुछ ही दिन पहले की बात है, जब सुबह-सुबह मेरे पास एक फोन आया. गुजरात के मुंद्रा समुद्र तट से मेरे एक मित्र ने फोन किया और एक ऐसा सवाल किया, जिसका जवाब हमें पहले ही मिल गया होना चाहिए था. कच्छ के मुंद्रा तटीय क्षेत्र की पारिस्थितिकीय संरचना वैसे ही कमज़ोर हो चुकी है, इसके बावजूद इस इलाक़े में 300 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट को ग़लत तरीक़े से एन्वॉयरोंमेंटल क्लियरेंस दे दिया गया. स्थानीय मछुआरे समुदायों ने इसके विरोध में अपनी सारी ताक़त लगा दी, लेकिन मेरे मित्र ने सूचना दी कि प्लांट को लेकर काम शुरू किया जा रहा है. उसने मुझसे यह भी पूछा कि मामले की अगली सुनवाई कब होनी है. मैंने उसे यह समझाने की भरपूर कोशिश की कि हम आज असहाय होकर क्यों रह गए हैं, लेकिन मेरा अंदाज़ा है कि ऐसी परिस्थितियों से रूबरू लोगों को समझाना खासा मुश्किल होता है, खासकर यदि वे ऐसी परियोजनाओं से सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हों. मैं उसे यह कैसे समझा सकती थी कि थर्मल प्लांट को पर्यावरणीय क्लियरेंस दिए जाने के ख़िला़फ जिस संस्थान में मामला दर्ज किया गया है, वह अब अस्तित्व में ही नहीं है. फिर उन्हें यह भी कैसे समझाया जा सकता है कि पुराने निकाय की जगह जिस नए निकाय का गठन किया जाना है और जहां इस मामले की सुनवाई होनी है, उसका गठन अभी तक नहीं किया गया है.

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पॉस्को परियोजना: घपलेबाज़ी की अंतहीन कहानी

उड़ीसा में 54000 करोड़ के निवेश से स्टील प्लांट लगाने को प्रयासरत पॉस्को कंपनी की अनैतिक कार्रवाइयों की लिस्ट का़फी लंबी है. प्लांट के लिए फॉरेस्ट क्लियरेंस में घपलेबाज़ी की बात अभी पुरानी भी नहीं हुई थी कि एक और मामला सामने आ गया. स्थानीय लोगों के प्रतिरोध का समर्थन कर रहे सिविल सोसायटी समूहों ने यह खुलासा किया कि पॉस्को ने खनन कार्य के लिए क्लियरेंस नहीं लिया है.

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पॉस्‍को परियोजनाः विरोध और स्‍वीकृतियों का इतिहास

कई बार कुछ खास तारीखें इतिहास में अहम बनकर रह जाती हैं. 28 जुलाई, 2010 को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने मौजूदा दौर की सबसे ज्यादा विवादित रही औद्योगिक परियोजनाओं में से एक के प्रस्तावित स्थल पर अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य वनवासियों के फॉरेस्ट राइट्‌स एक्ट 2006 के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए एक चार सदस्यीय कमेटी का गठन किया.

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जैव विविधता क़ानून में बदलाव और ग्रीन ट्रिब्यूनल

दो जून 2010 को भारत का ग्रीन ट्रिब्यूनल क़ानून अस्तित्व में आ गया. 1992 में रियो में हुई ग्लोबल यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन एन्वॉयरमेंट एंड डेवलपमेंट के फैसले को स्वीकार करने के बाद से ही देश में इस क़ानून का निर्माण ज़रूरी हो गया था.

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यूं ही बहता रहेगा अथिरापल्ली का पानी!

केरल में पश्चिमी घाट स्थित वझाचल के जंगलों में बहने वाली चलाकुडी नदी को छोड़ते हुए मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ रही हूं. मेरे दिल में एक अजीब तरह की चिंता घर करती जा रही है. मैं जो लिख रही हूं, इसे पढ़ने वालों में कम लोग ही यहां तक आए होंगे. लेकिन, जो लोग मेरे अनुभवों के साझीदार हैं, वे इसकी अहमियत समझ सकते हैं.

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जैव विविधता और जैव प्रौद्योगिकी के बीच का घालमेल

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकार यानी एनबीए ने उत्तराखंड के देहरादून डॉल्फिन इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल एंड नेचुरल साइंसेस के साथ एक समझौता किया है. उसने तीन जनवरी 2008 को अमेरिका स्थित लिबेनन में मास्कोमा कॉरपोरेशन को जैविक संसाधन हस्तांतरित करने के लिए समझौते की यह प्रक्रिया पूरी की.

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पर्यावरण से संबंधित फैसलों में हितों का टकराव

भारत का समाजवादी लोकतंत्र प्रतिनिधित्व की राजनीति में अच्छी तरह रचा-बसा है. यहां विशेषज्ञों की सभा और समिति के बारे में आमतौर पर यह माना जाता है कि वे स्थितियों को बेहतर ढंग से समझते हैं. बनिस्बत उनके, जो ऐतिहासिक तौर पर सत्ता प्रतिष्ठान में निर्णायक भूमिका रखते हैं. यह सब एक प्रक्रिया के तहत होता है. इसमें प्राथमिकताएं सुनिश्चित होती हैं, योजनाओं का मूल्यांकन किया जाता है और विकास के रास्ते तैयार किए जाते हैं.

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इस जलवायु में कोई बदलाव नहीं

वर्ष 2009 भारतीय वन क्षेत्र, तटीय इलाक़ों और कृषि योग्य भूमि के लिए बेहद अव्यवस्थित रहा. इस वर्ष लगभग हर महीने उद्योग और बुनियादी ढांचों के निर्माण की 100 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई. नतीजतन आवास, जीविका और उन पर अपने अधिकारों की लड़ाई का नज़ारा हर तरफ़ देखने को मिला.

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अल्‍फांजो आम का भविष्‍य अधर में है

अल्फांजो आम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. भारतीय खेती में इसकी ख़ास अहमियत मानी जाती है. यह आमदनी का एक बड़ा ज़रिया भी है. दशकों से इसने दुनिया के खाने की थाली में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. भारत में अल्फांजो को हापूस के नाम से भी जाना जाता है. और, कई लोग तो इसकी कहानियां सुनकर ही बड़े हुए हैं. लेकिन, यही आम भारतीय आम आदमी के लिए उपलब्ध नहीं हो पाता है

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केलो नदी को बचाने की जरूरत

ख़मरिया गांव भारत के बाक़ी गांवों से कम भाग्यशाली नहीं है. इसकी सा़फ-सुथरी गलियां, सलीके से बनाए गए मिट्टी के घर यह बताते हैं कि दूसरे ग्रामीण इलाक़ों की समृद्धि किस तरह हो सकती है. केलो नदी इसी

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मॉल यानी आधुनिक युग की नई इमारतें

क्रिसमस के भीड़भाड़ वाले दिन दिल्ली में नए युग की इमारतों के बीच टहलते हुए मुझे एक बार फिर महसूस हुआ कि इस जगह से मेरा कोई रिश्ता नहीं है. महज़ इतना ही नहीं, टहलते व़क्त मेरा एक पुराना डर एक बार फिर से सामने आने लगा.

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