किस बात की चेतावनी दे रहा है कोहरा? उफ, ये कोहरा!

पिछले का़फी समय से मौसम का मिज़ाज लगातार बदल रहा है. पृथ्वी के किसी क्षेत्र में बहुत अधिक बाढ़ आ रही है, कहीं बहुत अधिक तू़फान आ रहे हैं, तो कहीं बहुत अधिक ठंड व गर्मी पड़ने लगी है. भारत में भी यह असर बाढ़, सूखे व ठंड में तीव्रता के रूप में देखा जा सकता है. उत्तरी भाग में सबसे अधिक तीक्ष्ण प्रभाव यहां की कष्टप्रद सर्दी है.

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संकट में विज्ञान पत्रिकाएं

आज देश में राजनीति, खेल, आर्थिक, महिला जगत, घर-परिवार, स्वास्थ्य, ऑटो मोबाइल, कंप्यूटर, पर्यावरण, सूचना प्रौद्योगिकी और फिल्म आदि विषयों पर अनेक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं, किंतु विज्ञान एक ऐसा विषय है, जिसमें सरकारी पहल के बावजूद बहुत प्रगति नहीं हुई.

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गंगोत्री में ही गंगा मैली

हर धर्म की अपनी मान्यताएं-परंपराएं होती हैं. आस्था को विज्ञान की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता, किंतु ऐसा भी नहीं कि उसमें कोई तर्क न हो. यदि धर्म न हो तो समाज में समरसता, भाईचारा और उल्लास देखने को न मिले.

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गढ़वाल का पशु बलि मेलाः जनहित याचिका से जागा प्रशासन

उत्तराखंड के गढ़वाल ज़िले के थैलीसैण विकास खंड के बुंखाल मेले में पशु बलि रुकवाने को लेकर पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री मेनका गांधी द्वारा उच्च न्यायालय नैनीताल में दायर जनहित याचिका पहली बार प्रशासन की मुस्तैदी का सबब बनी.

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समाजसेवा ने रासमणि को रानी बना दिया

यह यथार्थ है कि जिस अनुपात में भारत में धनकुबेरों की संख्या बढ़ी है, उस मुक़ाबले वे अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों के निर्वहन में पीछे होते चले गए. पहले आज के जैसे धनाढ्‌य तो नहीं थे, किंतु उनके चिंतन में समाज का दु:ख-दर्द भी होता था, इसीलिए वे अपनी क्षमता अनुसार अपनी आय का एक अंश सामाजिक कार्यों में लगा देते थे.

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कला का राजनीति से कोई नाता नहीं

यदि आज के हालात में बस्तर जाने के नाम पर कुछ लोगों को सिहरन होने लगे तो ग़लत नहीं होगा, किंतु व्यापक संदर्भ में ऐसा नहीं है. नक्सली हिंसा के चलते इस क्षेत्र के बारे में दुनिया में एक दूसरी ही छवि बनी है, लेकिन बस्तर की अपनी ही दुनिया है. ऐसी दुनिया, जहां प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने वाले लोग रहते हैं, जहां आज भी छल-प्रपंच एवं आडंबर का नामोनिशान नहीं है.

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