बैंकों का राष्ट्रीयकरण

पिछले कुछ वर्षों से एक और क़िस्म की बैंकिंग प्रणाली भारत में चालू हुई है. यह है सहकारिता बैंक. कुछ किसान, मज़दूर अथवा उपभोक्ता अपने-अपने सीमित दायरे में सहकारिता बैंक खोल लेते हैं. सारे सदस्य थोड़ा-थोड़ा करके अपना फंड जमा करते हैं. शासन से मान्यता मिलने पर सरकार का सहकारी विभाग उस बैंक को पर्याप्त आर्थिक मदद दे देता है.

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मुद्रास्फीति और बैंकिंग

स्टेट बैंक से किसी भी शहर या क़स्बे में आर्थिक सहायता प्राप्त हो सकती है. हालांकि अभी तक स्टेट बैंक का संचालन पूर्ण रूप से राष्ट्रीयकरण की पद्धति पर हुआ नहीं है. अब भी सब ओहदेदार ऑफिसर वर्ग या कर्मचारीगण उसी पुराने साम्राज्य के प्यादे ही हैं, जो पूंजीपतियों के अधीन था. अतएव वर्षों से चली आ रही अपनी आदतों को वे सहसा छोड़ नहीं सकते.

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टकसाल का राष्ट्रीयकरण

आपको ज्ञात होगा कि बैंक, नोट अथवा सिक्के (करेंसी)आज के युग में कितने आवश्यक हैं. किसी भी सभ्य देश का काम इनके बिना चल ही नहीं सकता. सिक्कों में किस अनुपात में कौन सी धातु मिलाई जाए और इस पर कौन से राष्ट्रीय चिन्ह (अशोक स्तंभ) आदि की छाप लगाई जाए, ये सब काम सरकारी टकसाल के हैं.

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मुद्रा की शक्ति और उसकी मान्यता

भारत को आज़ाद हुए 12 साल बीत गए. इन 12 वर्षों में 5 या 6 वित्त मंत्री बदल चुके हैं. हर मंत्री की मुद्रा नीति भिन्न-भिन्न थी.

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सबसे आसान माध्यम

इतना सब कह चुकने के बाद एक मूल प्रश्न खड़ा होता है कि पैसा है क्या? किस चीज को हम पैसा कहें? कोई भला आदमी बहुत पैसे वाला है तो यह पैसा है क्या? अमुक व्यक्ति के पास बहुत रुपया है, यह रुपया है क्या? यानी रुपया-पैसा, धन-दौलत, रकम-वित्त, कुछ भी कहें, यह जानना ज़रूरी है कि इसका स्वरूप क्या है, इसकी रूपरेखा क्या है?

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रुपयों के किराए का नियंत्रण

अर्थशास्त्रियों की गणना अजीब है. उनका कल्पनातीत हिसाब है. जमा पूंजी का हिसाब लगाने के उनके तरीक़े को अगर आप ग़ौर से देखें तो यही लगेगा कि ऐसी बातें करने वालों को क्यों न जल्दी से पागलखाने भिजवा दिया जाए. उदाहरण स्वरूप, अगर एक बैंक के पास लोगों के खातों में जमा रुपये, मान लीजिए 5 करोड़ हैं तो वे अर्थशास्त्री कहते हैं कि 5 करोड़ जमा हैं. ऐसा होने से 5 करोड़ उस बैंक की साख बन गए.

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शेयर बाज़ार का जुआ

अब मान लीजिए कि आप थोड़े-बहुत जुआरी भी हैं. आप जुए से अत्यंत नफरत करते हों तो भी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था के ढांचे को समझने के लिए जुए की जानकारी भी आवश्यक है. शेयर बाज़ार में व्यापार के अलावा एक विशेष खेल खेला जाता है, जिसे सट्टा कहते हैं. इसमें खयाली शेयरों की खयाली क़ीमतें दी-ली जाती हैं.

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अतिरिक्त धन का मायाचक्र

अब राष्ट्र के लिए महत्व की बात है-कि नई-नई कंपनियां खोलकर नए-नए काऱखाने या फैक्टरियां लगाई जाएं, उत्पादन बढ़ाया जाए, उसमें ही फालतू पड़े सब रुपयों का उपयोग होना चाहिए. मान लीजिए आपके पास 5 लाख रुपये फालतू पड़े हैं. आप शेयर बाज़ार में किसी कंपनी के शेयर ख़रीदते हैं.

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रुपयों से ख़रीदे गए रुपये

पूंजी बाज़ार वह जगह है, जहां साल भर की कमाई एकमुश्त रकम के बदले ख़रीदी या बेची जाती है. एक हज़ार रुपये में आप कितनी कमाई ख़रीद सकते हैं, यह भाव रोज़ाना बदलता रहता है. और किसी दिन एकमुश्त रकमें कम हैं तो ज़्यादा कमाई ख़रीद सकते हैं.

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पूंजी बाज़ार

फिर भी, मान लीजिए आपके पास थोड़े रुपये फालतू पड़े हुए हैं, तो आप उनका किस तरह से इंवेस्टमेंट करते हैं, इसकी चालू प्रणाली कैसी है, इसका ज़रा अवलोकन कर लें. जहां आपका रुपया काम में लाया जाता है या इंवेस्ट होता है, उस संस्था को पूंजी बाज़ार कहते हैं. कहते हैं, फिर भी यह कोई इस तरह का बाज़ार नहीं है जहां हाट लगी हो.

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दुष्टतापूर्ण नीति

भारत में तो एक तरह से यह स्थिति आ गई है कि शासन को भारतीय राष्ट्रीय मज़दूर संघ ही चला रहा है. कोई भी काम हो, अगर उसके अधिकारीगण कराना चाहेंगे तो फौरन हो जाएगा, चाहे वह काम क़ानूनन वैध हो अथवा अवैध. कोई मिल, फैक्ट्री या कारखाना कितने ही वर्षों से नुक़सान में चल रहा हो, मज़दूर आवश्यक संख्या से बहुत ज़्यादा हों, यहां तक कि धीरे-धीरे मिल की सारी पूंजी समाप्त हो जाए, पर इन श्रमिक संघों के कान पर जूं नहीं रेंगेगी.

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नवीनीकरण का विरोध

नई मशीनरी का परिणाम है कम मज़दूरों से अधिक काम करवा सकना. उससे मज़दूरों की ज़रूरत न रहने से कटौती या छंटनी होती है. जो लोग बेकार होते हैं, वे कभी भी नहीं चाहेंगे कि नई मशीनरी लगाई जाए. जो काम करते रहें, उन्हें अधिक वेतन दें तथा हमें निकाल बाहर करें. युक्तीकरण का सबसे बड़ा विरोध इसी बुनियाद पर हो रहा है. नवीनीकरण में सबसे बड़ी बाधा इन मज़दूरों की छंटनी है.

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मालिक बड़ा या श्रमिक बड़ा

हर धंधे में एक श्रमिक का औसत कार्यभार निर्धारित होना आवश्यक है. मालिक लोग तो, मान लीजिए, ऐसे एक मज़दूर को चुन लेते हैं, जो बहुत ज़्यादा मेहनत करता है या निपुण है, जो सबसे ज़्यादा काम करता है, और उसी को पैमाना बनाकर वे चाहते हैं कि हर श्रमिक का कार्यभार उतना ही हो.

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काम रोको

यह सही है कि इससे जनता को कष्ट और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. अभी हम श्रमिक संघ प्रणाली का विश्लेषण कर रहे हैं. इसके कई पहलू अभी तक बाक़ी रह गए हैं. मज़दूरों के किसी भी आंदोलन को सफल बनाने के लिए सविनय अवज्ञा के तरीक़े हैं, जैसे टूल्स डाऊन, स्टे-इन-स्ट्राइक आदि.

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ट्रेड यूनियन की आवश्यकता और इतिवृत्त

किस तरह मज़दूर पूंजीवादी उद्योगपतियों का मुक़ाबला कर सका, इसका इतिवृत्त है. यह ज़ाहिर था कि कोई स्त्री या पुरुष, जो काम करता हो, नौकरी करता हो, अकेले जाकर मालिक के साथ न बहस कर सकता है, न मुक़ाबला. मालिकों का नपा-तुला यही जवाब होता है कि अगर इस मज़दूरी और स्थिति में तुम काम नहीं करोगे तो तुम्हारे भाई दूसरे सैकड़ों करने वाले तैयार हैं.

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स्त्रियों की मज़दूरी का मूल्यांकन

फिर कल-काऱखानों के चल निकलने के कारण स्त्री कामगारों की संख्या बढ़ी, लेकिन बाज़ार में इनकी मज़दूरी का भाव पुरुषों की अपेक्षा निम्न स्तर का ही रहा. मालिकों की दलील यह थी कि यदि हमें मज़दूरों की ज़रूरत ही हो तो हम पुरुषों को ही क्यों न रखें और फिर सस्ती दर में औरतें काम करने के लिए राज़ी भी तो हैं. उनके इस उत्तर में सुदृढ़ तर्क का अभाव भले हो, इसने स्त्रियों को मज़दूरी की आवश्यकता के कारण सस्ती दर पर काम करने के लिए बाध्य कर दिया.

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फैक्टरी एक्ट

भारत में भी इस सदी की शुरुआत में, अंग्रेजों की पहल से फैक्टरी एक्ट्‌स बने और लागू हुए. इन क़ानूनों की कृपा से यह हुआ कि निश्चित उम्र से कम उम्र के बालकों से कोई काम कतई नहीं लिया जा सकता था. स्त्रियों को कुछ निश्चित काम ही करने हैं. गर्भवती स्त्री को या बच्चे की मां के लिए निर्धारित खुराक का प्रबंध अनिवार्य है. हर मज़दूर के काम करने के घंटे निश्चित कर दिए गए थे. कारखाना या फैक्टरी के चालू रहने का समय निर्धारित हो गया था. कारखाने या फैक्टरी में कोई भी मशीन या हथियार ऐसे हों, जिनसे मज़दूरों को चोट आने का ख़तरा हो तो उन्हें अच्छी तरह बचाव के साधन के साथ रखना अनिवार्य कर दिया गया.

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वर्ग युद्ध

मध्यम वर्ग का या उत्पादन करने वाला कोई भी व्यवसायी जिस तरह से अपने जीवन निर्वाह के लिए अपना माल बेचना आवश्यक समझता है, उसी तरह एक मज़दूर भी अपना माल-असबाब बेचे बिना जीवन निर्वाह नहीं कर सकता. उसका माल-असबाब उसका श्रम ही है. उसकी जितनी ज़्यादा क़ीमत मिल सके, उतना ही उसके लिए अच्छा है, जितनी कम मिले, उतना ही बुरा है.

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पीड़ित श्रमिक वर्ग

मध्यम वर्ग के संबंध में तो कह चुके. अब लीजिए ग़रीब वर्ग को, जो भूखे हैं, मज़दूर हैं, श्रमिक हैं, भीड़ हैं, चाहे जो कह लीजिए. दुनिया में किसी देश का हो, किसी जाति का हो, स्त्री हो या पुरुष, ऐसा व्यक्ति जिसके पास निज की कोई ज़मीन-जायदाद न हो, न जिसकी कोई पूंजी हो, जिसे अपने जीवन निर्वाह के लिए दूसरों के यहां नौकरी करनी पड़े, काम का मूल्य या भाड़ा लेकर काम करना पड़े, इन सबको सभ्य भाषा में श्रमिक वर्ग कहते हैं.

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कंपनियों का अवतरण

ये मध्यम वर्ग के लोग जो शुरू-शुरू में छुटभैय्या, कारिंदों या मंत्रियों के रूप में सामने आए थे, धीरे-धीरे स्वयं व्यापार करने लगे. एक तऱफ पूंजीपतियों की पूंजी थी, दूसरी तऱफ मज़दूर की मेहनत थी. दोनों का उपयोग करते हुए या दोनों का ही शोषण करके इस वर्ग ने अपना अधिपत्य सारे व्यापार और उद्योग पर जमा लिया.

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पूंजी-विकास के माध्यम

इस परिस्थिति को संभालने के लिए, जैसा स्वाभाविक है, एक तीसरी श्रेणी, जो इन दो श्रेणियों का जोड़-तोड़ बैठा सके, खड़ी हुई. यह तीसरी श्रेणी मध्यम श्रेणी के नाम से पुकारी जाती है. यह मध्यम श्रेणी किस तरह से उत्पन्न हुई, इसका भी विचित्र इतिहास है. राजा, ठाकुर या जमींदार भूमि के स्वामी थे.

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मनुष्य का यंत्रीकरण

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने आदमी को एक तरह से मशीन बना दिया है. उदाहरण के लिए घर में काम आने वाली सुइयां या कीलें आज से 200 वर्ष पहले ग्राम का कोई लोहार बनाता था. उसके बनाने में जो साजो-सामान लगता था, उसको प्राप्त करने से लेकर तैयार सुई या कील घर- घर जाकर बेचकर पैसा इकट्ठा करने तक का सारा काम वह स्वयं या उसका परिवार कर लेता था.

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सहकारी अर्थव्यवस्था की प्राचीन परंपरा

एक और आवाज़ आजकल जोरों से उठाई जा रही है, वह है सहकारिता आंदोलन की. सहकारिता आंदोलन देश के लिए, राष्ट्र के हर व्यक्ति के लिए उपादेय है, बशर्ते कि इस पद्धति का ईमानदारी से अनुसरण किया जाए.

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पूंजी की निर्धारित सीमा

पूंजी संपत्ति पूंजीवाद का मूल स्तंभ है. इसे मिटाना ही होगा. इस श्रेणी में प्रधानत: दो ही संपत्तियों का समावेश होता है- (1) ज़मीन जायदाद, (2) पूंजी. भारत सरकार ने जबसे समाजवादी अर्थव्यवस्था को अपना ध्येय घोषित किया है, प्रथम कक्षा के लिए कई संशोधन हुए हैं, नए क़ानून बने हैं.

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भ्रष्टाचार बनाम परपीड़न

भारत में सरकारी ऑफिसरों का, नीचे से ऊपर तक सब ही का, नैतिक स्तर काफी गिरा हुआ है. उसको सुधारने में अभी काफी समय लगेगा. पर जब तक यह नहीं होता, समान वित्त वितरण की योजना रुक नहीं सकती.

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बेकारी की समस्या

सामान वित्त वितरण तो दरकिनार, आज तो भारत में सबसे बड़ी समस्या बेकारी की है. तृतीय पंचवर्षीय योजना सफलतापूर्वक संपादित हो जाने के बाद भी योजना आयोग को आशा है कि 2 करोड़ नए रोज़गार पैदा हो जाएंगे

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विदेशी आर्थिक सहायता शुद्ध स्वार्थ से प्रेरित

कोई भी पूंजीवादी उद्योगपति, किसी भी देश का वासी क्यों न हो, अपनी पूंजी तब ही लगाएगा, जब उसे उसकी सुरक्षा और उससे लाभ होने का पूरा विश्वास हो. अगर भारत सरकार की नीति उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की रही तो कोई भी बाहरी पूंजीवादी अपना एक रुपया भी भारत में नहीं लगाएगा.

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सर्वोदय अर्थव्यवस्था

राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने अपनी अर्थव्यवस्था का जो स्वरूप बतलाया था, उसे सर्वोदय अर्थव्यवस्था की संज्ञा मिली है. शायद यह व्यवस्था भारत की दयनीय दशा को देखते हुए इस देश के लिए उपयुक्त और आदर्श मान भी ली जाए.

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राष्ट्र और पूंजी

ध्‍यान देने की बात यह है कि ये पूंजीवादी धनिक उन्हीं चीज़ों में अपने रुपये लगाते हैं या दूसरों से लेकर लगाते हैं, जहां इनको जल्दी से जल्दी ज़्यादा से ज़्यादा मुना़फा नज़र आता है. देश के लिए क्या काम करना अच्छा है, इसमें इनकी तनिक भी आस्था नहीं.

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