व्यक्तित्व विकास की पहली पाठशाला

पुस्तक लिखना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण है कि लेखक ने अपनी पुस्तक के जरिये पाठकों को, समाज को आख़िर

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अद्भुत अभिव्यक्ति और जिजीविषा का अनूठा दस्तावेज़

आत्मकथा-हमारे पत्र पढ़ना की लेखिका, कवयित्री एवं कथाकार उर्मिल सत्यभूषण का जन्म पंजाब के गुरुदासपुर ज़िले में बीसवीं शताब्दी के

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निशाना बनाने में भेदभाव क्यों?

प्रत्येक लेखक-रचनाकार-कलाकार अपनी कृति-रचना-प्रस्तुति में वही कुछ कहने का प्रयास करता है, जो वह देश में, समाज में, अपने इर्द-गिर्द

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बेलगाम और बदज़ुबान जनप्रतिनिधि

पिछले दो सालों के दौरान अखिलेश सरकार को जितनी चुनौतियां बाहर से नहीं मिलीं, उससे कहीं ज़्यादा पार्टी के कार्यकर्ताओं,

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मत भूलिए, आप सरकार के चेहरे हैं

बीते 5 जून को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में बीडीसी की बैठक के दौरान ब्लॉक प्रमुख राजेश यादव से कहासुनी हो जाने पर समाजवादी पार्टी के विधायक हाजी इऱफान के भाई हाजी उस्मान एवं उनके समर्थकों ने गोलीबारी कर दी, जिससे कई लोग जख्मी हो गए.

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जहां चाह, वहां राह

एक अच्छी कोशिश हमेशा प्रशंसनीय होती है, लेकिन जब ऐसी कोई कोशिश नए और संसाधनों का अभाव झेलने वाले लोग करते हैं तो वे दो-चार अच्छे शब्दों और शाबाशी के हक़दार ख़ुद-बख़ुद हो जाते हैं. त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका समसामयिक सृजन इसकी मिसाल है.

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नवांकुरों का साहस भरा प्रयास

यह कौशल तिवारी की उस कविता की शुरुआती पंक्तियां हैं, जिसमें उन्होंने सड़क को आधार बनाते हुए व्यक्ति की महत्वाकांक्षा पर रोशनी डालने का प्रयास किया है और जो एक ऐसी साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हुई है, जिसने अभी-अभी जन्म लिया है.

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दिल्ली पुस्तक मेला : पाठकों के जोश से बाज़ार को उम्मीद

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कहा था, मैं नरक में भी पुस्तकों का स्वागत करूंगा, क्योंकि ये जहां रहती हैं, वह जगह अपने आप स्वर्ग हो जाती है. इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन एवं द फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स के संयुक्त तत्वावधान में प्रगति मैदान में बीते 27 अगस्त से 04 सितंबर तक चले 17वें दिल्ली पुस्तक मेले में आए असंख्य लोगों ने कमोबेश यही संदेश दिया कि पुस्तकें आज भी मनुष्य की सच्ची मित्र हैं.

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टिकैत नेता नहीं, नायक थे

किसान बदला नहीं लेता, वह सारे ज़ुल्म सह जाता है. वह तो स़िर्फ जीने का अधिकार भर चाहता है. पुलिस ने जो ज़ुल्म किया है, उससे किसानों का हौसला और बढ़ा है. किसान जानता है कि राजीव गांधी ने दुश्मन जैसा व्यवहार किया. किसानों की नाराज़गी उनको सस्ती नहीं पड़ेगी. किसान लड़ेगा, फिर लड़ेगा, दोनों हाथों से लड़ेगा. सरकार की बंदूक़ें और लाठियां किसानों के क़दम नहीं रोक पाएंगी.

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तमिलनाडुः भ्रष्टाचार पर जनता का कहर बरपा

तमिलनाडु में जनता ने करुणानिधि और कांग्रेस गठजोड़ को एक सिरे से नकार दिया है. डीएमके की यह 1991 के बाद अब तक की सबसे बुरी हार है, जब राजीव गांधी की हत्या हुई थी. यह डीएमके के 1967 से अब तक के राजनीतिक इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा झटका है.

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आम आदमी के दुःख-दर्द की किताब

कोई माने या न माने, लेकिन सच यही है कि कविता की कोई शास्त्रीय परिभाषा नहीं होती. वह हर पंक्ति कविता है, जो तरीक़े से आम आदमी के दु:ख-दर्द की बात करती है, घर-आंगन की बात करती है, समाज के काले पक्ष पर रोशनी डालती है और देश-दुनिया के प्रति अपनी चिंता को ज़ाहिर करती है.

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पर्व नहीं,हम बदले हैं

बात ज्यादा पुरानी नहीं है. यही कोई सात-आठ साल पहले मैं कानपुर (उत्तर प्रदेश) से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक में कार्यरत था. होली का मौका था, मैं घर पर अपने कमरे में बैठा पुराने अ़खबार पलट रहा था.

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कवि, कविता और समाज

कहते हैं कि जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंच कवि. सच भी है, कवि अपनी कल्पना के ज़रिए किसी विषय के उस बिंदु तक जा पहुंचता है, जिस पर आमजन की नज़र शायद जाती हो. कैसे संभव हो पाता है यह सब? कवि अपनी कविता और ख़ुद को समाज के साथ कैसे जोड़ता है? विभिन्न मौक़ों पर उसकी मनोस्थिति क्या होती है?

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दबंगों के दमन में पीडि़त महिला ने चौथी दुनिया को लिखा पत्रः भरोसे का हलफनामा

पति ने अपना मानसिक संतुलन क्या खोया, विजय रानी की मानों क़िस्मत ही रूठ गई. दबंगों की गिद्धदृष्टि उसकी संपत्ति पर आकर टिक गई. पहले उन्होंने उसके नाबालिग बेटे को बरगलाया, फिर पति बेचेलाल को बहला-फुसला कर अगवा कर लिया और उसकी आधी ज़मीन अपने नाम बैनामा करा ली.

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स्मृति शेष: गुलशन बावरा : मेरे देश की धरती सोना…

वर्ष 1973 में आई फिल्म जंजीर का वह दृश्य याद कीजिए, जिसमें एक जोशीला नौजवान पुलिस इंस्पेक्टर (अमिताभ बच्चन) सड़क हादसे में स्कूली बच्चों की मौत की गवाह एवं चाकू-छुरी में धार रखकर अपना जीवनयापन करने वाली लड़की (जया भादुड़ी) को अपने घर में शरण देता है.

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इस भटकाव की वजह क्या है

बीती 15 नवंबर को राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत ने एक ऐसे शिक्षक को एक लाख रुपये मुआवजे की सजा से दंडित किया, जिसने आज से 12 वर्ष पहले एक छात्र को पूरे दिन निर्वस्त्र ख़डा रखा था. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रतिभा रानी ने अपने फैसले में उक्त शिक्षक को निर्देश दिया कि वह बतौर मुआवजा एक लाख रुपये पीड़ित छात्र को अदा करे. घटना 25 मई 1997 की है.

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