निराश होने की ज़रूरत नहीं है

हम इतने पराजयवादी क्यों हो गए हैं? माना कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने कॉमनवेल्थ के नाम पर पैसों की लूट के इस हैरतअंगेज और उपहास योग्य घोटाले की परतें खोलकर रख दीं, लेकिन इससे क्या होता है. दुनिया भर के मीडिया ने भारत की छवि की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और वी एस नायपॉल के उस सपने को हक़ीक़त में तब्दील कर दिया, जिसे उन्होंने पहली बार एन एरिया ऑफ डार्कनेस में काग़ज़ पर उतारा था, लेकिन इसमें इतना निराश होने की क्या ज़रूरत है?

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सेना दुश्मन नहीं है

खुद को बचाने की कोशिश में अक्सर लोग अनजाने में अपने पैरों पर ख़ुद ही कुल्हाड़ी मार लेते हैं. उमर अब्दुल्ला अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. आज कश्मीर जिस आग में जल रहा है, उसके लिए वह ख़ुद को दोषी नहीं क़रार दे सकते. ऐसा करना उनके राजनीतिक करियर, जिसकी शुरुआत वंशवाद की नींव पर हुई और जिसके दम पर वह सिलेब्रिटी के दर्जे में शामिल हो गए, को पूरी तरह ख़त्म नहीं तो बुरी तरह प्रभावित ज़रूर कर सकता है.

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प्रधानमंत्री जी, अहम से बचिए

क्‍या यह सच है? उनके प्रशंसक पहले भी ऐसा कहते रहे हैं, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि ख़ुद मनमोहन सिंह भी स्वयं को भारत का सबसे अच्छा प्रधानमंत्री मानने लगे हैं? ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि प्रधानमंत्री आत्मप्रशंसा में विश्वास नहीं करते. लेकिन यदि यह सच है तो फिर उन्होंने ऐसा क्यों कहा कि उनका मंत्रिमंडल नेहरू और इंदिरा के मंत्रिमंडलों से बेहतर है.

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नायक विहीन हो गया पाकिस्तान

ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों को अपनी हैसियत का पता नहीं है. वे यह नहीं जानते कि नायक विहीन हो चुके इस मुल्क के युवाओं की वे आ़खिरी उम्मीद हैं. पाकिस्तान में अब तक केवल दो ही ऐसे राजनेता हुए हैं, जिन्होंने जनमानस को प्रेरित किया है, मुहम्मद अली जिन्ना और जुल्फिकार अली भुट्टो.

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कांग्रेस के युवराज का नया राजनीतिक पैंतरा

क्‍या राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी के ख़िला़फ अभियान छेड़ दिया है? स्पष्ट शब्दों में कहें तो कांग्रेस के युवराज, जिन्हें उनके कई समर्थक भगवान कृष्ण के आधुनिक अवतार के रूप में देखते हैं, ने कहीं कांग्रेस-नीत सरकार के स्थापित सत्ता केंद्रों को चुनौती देना शुरू तो नहीं कर दिया है? ऐसा सत्ता केंद्र, जिसके शीर्ष पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके गृह मंत्री पी चिदंबरम बैठे हुए हैं.

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व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है भ्रष्टाचार

लंबे शोध और दुनिया भर में दूरदराज के इलाक़ों का दौरा करने के बाद संसद की सर्वदलीय समिति आख़िर इस नतीजे पर पहुंच ही गई कि पूरी दुनिया में बारिश केवल भारत में ही होती है. समिति का यह काम काबिलेतारी़फ है, क्योंकि उसे सिंगापुर, बाली, लॉस एंजेलिस, न्यूयॉर्क, लंदन और बर्लिन के अलावा सप्ताहांत में हेलसिंकी जैसे दुर्गम इलाक़ों तक का भ्रमण करना पड़ा.

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कश्मीर समस्या का हल बातचीत से ही संभव

यदि 15 अगस्त के दिन राष्ट्रीय अवकाश नहीं होता तो हम में से कितने लोग इस दिन को याद रखते? हम खुले तौर पर इसे माने या न माने, लेकिन इस साल स्वतंत्रता दिवस रविवार के दिन पड़ने से अधिकांश लोग निराश थे. उन्हें लगा, जैसे उनके साथ धोखा हुआ है.

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क्रोध और इतिहास की आग में जलता कश्मीर

जनरल अशफाक कयानी को अगस्त, 1971 में पाकिस्तानी सेना में प्रवेश मिला था. सेना में उनके समतुल्य दूसरे फोर स्टार जनरल तारिक़ मजीद हैं, जो सात अक्टूबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं. चीफ ऑफ जनरल स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल खालिद शमीम वाईं अगले साल 8 अक्टूबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं और कयानी से कुछ महीने ही जूनियर हैं.

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कॉमनवेल्थ गेम्स का खेल से कोई रिश्ता नहीं है

हम कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण तथ्य को शायद नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, समस्या खेलों के साथ नहीं है, बल्कि समस्या तो कॉमनवेल्थ के साथ है. कॉमनवेल्थ के गठन की शुरुआत में ब्रिटेन खेलों के आयोजन को लेकर गंभीर रहता था, क्योंकि यह उपनिवेशों की प्रगति को जानने का एक अच्छा ज़रिया था, लेकिन अब तो महारानी की भी इसमें कोई रुचि नहीं है.

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प्रधानमंत्री काग़ज़ की नाव के कप्तान न बन जाएं

इसे मनमोहन सिंह का सबसे बड़ा विरोधाभास कहिए या फिर उनकी सबसे बड़ी मजबूरी, लेकिन सच्चाई यही है कि उनकी गठबंधन सरकार की शक्ति उनकी कमज़ोरी में ही निहित है. गठबंधन इसी वजह से टिका है कि प्रधानमंत्री का अपने सहयोगियों पर कोई नियंत्रण नहीं है. एक मंत्री के हाथ टेलीकॉम घोटाले में सने मिलते हैं, लेकिन वह बेशर्मी से आरोपों से इंकार कर देता है.

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हमारे नेता पॉल द ऑक्टोपस से सबक लें

मौजूदा समय में जर्मनी की सबसे मशहूर शख्सियत बन चुका पॉल द ऑक्टोपस भारतीय राजनीति में भी प्रवेश कर चुका है और यह दिल को सुकून देने वाली बात है.

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देश की हालत की चिंता किसे है

रोमन साम्राज्य के सम्राट बस दो ही चीजों से डरते थे, असभ्य एवं अशिष्ट जनता और रोम के अंदर खाद्य पदार्थों की कमी. जनता पर नकेल कसने के लिए सेना की मदद ली जाती थी तो खाद्यान्नों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए खुद राजा चौकन्ना रहता था.

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उमर अब्दुल्ला कश्मीर को खो रहे हैं

एक वैचारिक युद्ध जीतने में कितना व़क्तलगता है? उच्च वर्ग के शासकों की सेनाओं के बीच एक पारंपरिक मुक़ाबला हमेशा से होता आया है. और यह तब तक चलता रह सकता है, जब तक सैनिकों के मन में यह विचार ज़िंदा रहे कि यह लड़ाई वे अपने आका के हित में लड़ रहे हैं.

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राजनीति दिखावा ही तो है…

सत्ता राजनीति में गोंद का काम करती है. यही वजह है कि सत्ता में बनी सरकारें अक्सर सुसंगठित होने का आभास देती हैं जबकि विपक्षी दल आमतौर पर बिखरे हुए नज़र आते हैं. स्वार्थ सिद्धि के मौजूदा दौर में एकता बनाए रखने के लिए विचारधारा की कोई अहमियत नहीं होती.

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एंडरसन ने भारतीय कानून और व्यवस्था का म़जाक उड़ाया

भोपाल गैस कांड पर पिछले दिनों अदालत के फैसले के बाद 7 दिसंबर 1984 को यूनियन कार्बाइड के मुखिया वारेन एंडरसन को देश से बाहर भेजने का मुद्दा गरमाया, तो सरकार एक विश्वसनीय बहाना तलाश करने लगी.

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भोपाल का फैसला राजनीतिक-न्यायिक-सामाजिक धो़खा

भोपाल मामले का निर्णय 7 जून, 2010 को नहीं हुआ, इसका फैसला तो दिसंबर, 1984 में हुए हादसे के चार दिनों बाद ही हो गया था, जब एंडरसन को चोरी-छुपे राज्य सरकार के एक विमान में बैठा कर पहले भोपाल से बाहर और फिर देश से भी बाहर अमेरिका भेज दिया गया था. तबसे लेकर अब तक हम न्याय के नाम पर खेले जा रहे इस गंदे खेल को अपनी आंखों से देख रहे हैं, जिसमें सरकार, पुलिस और सुप्रीम कोर्ट सहित पूरा न्यायिक तंत्र शामिल है. इस खेल में सुप्रीम कोर्ट का शामिल होना सबसे ज़्यादा चौंकाता है, क्योंकि किसी राजनीतिज्ञ या पुलिस अधिकारी के मुक़ाबले एएम अहमदी जैसे मुख्य न्यायाधीश से हम ज़्यादा पारदर्शी आचरण की अपेक्षा रखते हैं.

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सुधरे नहीं तो सिधर जाएगी भाजपा

भारतीय जनता पार्टी एक अलग ही उलझन में फंसी नज़र आ रही है. यह एक ऐसे सट्टेबाज़ की तरह दिख रही है, जिसने एक फुटबॉल मैच में जितना नुक़सान उठाया, उससे कहीं ज़्यादा उसे एक्शन रिप्ले में गंवाना पड़ा. पार्टी की जो वास्तविक ग़लती थी, वह एक भ्रम था, लेकिन जो ग़लती भाजपा आज कर रही है, वह उसकी नासमझी है.

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ज़िंदा होते तो गांधी पेन पर हंसते बापू

दुनिया की सबसे मशहूर और सबसे क़ीमती कलमें बनाने वाली कंपनी ने एक ऐसे आदमी के नाम पर एक लाख रुपये की कलम बनाने का फैसला क्यों किया, जिसने सारी उम्र हाथ से बने कपड़ों के अलावा और कुछ नहीं पहना? कंपनी ने महात्मा गांधी का सम्मान करने का फैसला इसलिए नहीं किया कि किसी नए सर्वे में यह कहा गया हो कि दुनिया भर के करोड़पति-अरबपति अचानक अहिंसा के अग्रदूत बन गए हों.

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क्या मीडिया सुप्रीम कोर्ट से ज़्यादा ताक़तवर है?

सर्वोच्च न्यायालय अपने नाम, जो इसे सर्वोच्च बताता है, के मुक़ाबले कम ही सर्वोच्च है. यह फांसी की सजा तो सुना सकता है, लेकिन ख़ुद फांसी नहीं दे सकता. सरकार अदालत के आदेश को न मानने की हिम्मत तो नहीं करती, लेकिन सरकार के पास उसे उलटने का विकल्प हमेशा मौजूद रहता है.

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पटकथाएं लिखने के बाद अमर सिंह अब अभिनय करेंगे

राजनीति में उम्र को मापने के लिए घटनाओं का इस्तेमाल होता है, समय का नहीं. साझेदारियां और आपसी सहयोग बरक़रार रहें, इसके लिए संबंधों में आंतरिक विश्वास का होना ज़रूरी है, ताकि वे ग़लतफहमियों और संदेहों के दायरे से बाहर निकल सकें. राजनीति की नसों में ख़ून नहीं बहता, बल्कि पारा बहता है.

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पाकिस्तान समय सीमा तय करे

मई के इस महीने में एक ओर जहां मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब को फांसी की सज़ा सुनाई गई, वहीं दूसरी ओर भारत और पाकिस्तान ने शांति प्रक्रिया में बातचीत के लिए एक नई मेज तलाश ली है, लेकिन क्या इसके लिए कोई समय सीमा भी तय की गई है? वास्तव में, मेजें तो कई तैयार हैं.

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जासूस, जिसने भारत को डरा दिया

माता हारी होने के लिए ख़ूबसूरत होना पहली शर्त नहीं है, आपको बस उपलब्ध होना चाहिए. नीदरलैंड में पैदा हुई और पेरिस में पली-बढ़ी मार्गरेट जेले पहले विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की एक एजेंट थी, जिसने जासूसी को जिस्मानी रिश्तों के परिप्रेक्ष्य में नई पहचान दी. लेकिन जेले वास्तव में बेडौल शरीर की मलिका थी, जिसे ख़ूबसूरत न होने के कारण एक डांसिंग ग्रुप में जगह नहीं मिली थी और मजबूरी में उसे एक सर्कस में काम करना पड़ा था.

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थरूर का इस्ती़फा कहानी का अंत नहीं है

भारतीय मीडिया में अब तक के सबसे अनोखे सोप ओपेरा एवं सनसनीखेज क्राइम थ्रिलर से अचंभित और रोमांचित हो रहे लोगों के बारे में यही कहा जा सकता है कि उन्होंने शायद अगाथा क्रिस्टी की लिखी मर्डर ऑन द ओरिएंट एक्सप्रेस नहीं पढ़ी. उन्होंने इसके फिल्मी रूपांतरण में अल्बर्ट फिनी और पीटर उस्तीनोव को हरक्यूल पॉयरट के किरदार में भी नहीं देखा है.

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हैलो शशि मोदी, ललित थरूर से मिलिए

शशि थरूर के करियर पर नज़र डालें तो इसमें विरोधाभासों की कोई कमी नहीं है. चार साल पहले थरूर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव पद के लिए मनमोहन सिंह के चुने हुए उम्मीदवार थे. कूटनीति के क्षेत्र में दुनिया भर में सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले इस पद के लिए उनकी उम्मीदवारी को लेकर विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री को मना किया था, क्योंकि थरूर के जीतने की संभावना नहीं के बराबर थी, फिर भी मनमोहन अपने फैसले पर क़ायम रहे.

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गृहमंत्री जी, आप अपनी ज़िम्मेदारियों से भाग नहीं सकते

अधिकतर ग़लतियां अक्सर दिमाग़ से शुरू होती हैं. यह सभी जानते हैं कि सुरक्षा मामलों में गृहमंत्री पी चिदंबरम अमेरिकी नीति के बड़े हिमायती हैं. इस नीति में अपनी कमियों पर ख़ास ध्यान नहीं दिया जाता, लेकिन सुरक्षा का यह फार्मूला अमेरिका में मुख्य रूप से विदेशी चुनौतियों से निबटने के लिए तैयार किया गया था, न कि अंदरूनी समस्याओं से मुक़ाबला करने के लिए.

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यूपीए युवावस्था के मुहासों से परेशान है

साल 2010 अभी अपने युवावस्था में ही है. केंद्र सरकार के चेहरे पर अचानक नज़र आने लगे मुहासों की वजह भी कहीं यही तो नहीं है? यह न तो लाइलाज है और न ही ज़्यादा गंभीर. बस एक छोटी सी चाहत कि इस खुजलाहट और धब्बे वाले चेहरे के बिना ज़िंदगी शायद ज़्यादा आसान और हसीन होती.

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हेडली से 26 नवंबर की पूरी सूची मांगें

डेविड कोलमैन हेडली उर्फ दाऊद गिलानी उर्फ जाने क्या-क्या. अलग-अलग पहचान और विश्वासों के साथ केवल एक चीज के प्रति ही हेडली प्रतिबद्ध रहा है, धोखा और अविश्वास के आधुनिकतम सिद्धांतों के प्रति. यह सही है कि आप उसे विश्व के सर्वश्रेष्ठ अपराधियों की श्रेणी में नहीं रख सकते.

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माया, श्रेय और सम्मान

किसी रविवार की अलसायी सुबह को मायावती, जिन्हें आजकल गहनों की जगह रुपयों की माला ज़्यादा भाने लगी है, पर आप कितना गुस्सा हो सकते हैं. बात उस दिन की है, जब मायावती की जय-जयकार हुई और देखते ही देखते रुपयों से गुंथी माला उनके गले में पहना दी गई. यदि इस घटना पर बने कार्टूनों की संख्या पर ग़ौर करें तो गुस्से का सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

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केवल उद्देश्य अच्छा होने से बात नहीं बनती

ज्‍यादा उत्साह स्पष्ट लक्ष्यों का कोई विकल्प नहीं है. महिला आरक्षण बिल की नेकनीयती को लेकर कोई संदेह नहीं, समस्या तो बिल के प्रावधानों को अमल में लाने के तरीक़ों पर है. ऐसा लगता है, जैसे राजनीतिक रूप से सही दिखने की चाहत में राजनीतिक वास्तविकताओं को परे रख दिया गया है.

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सर्विस इकोनोमी या सर्वेंट इकोनोमी

कुछ दिन पहले प्रकाशित एक किताब के मुताबिक़ आज से सौ साल पहले इंग्लैंड में घरेलू नौकर रोजगार का सबसे बड़ा स्त्रोत था. साधारण सा दिखने वाला यह तथ्य एक वर्ग-आधारित समाज में व्याप्त असमानता का सटीक चित्रण करता है और विक्टोरियन एवं उसके बाद के समाज में धन और सत्ता के बीच नजदीकी रिश्तों के बारे में भी बताता है.

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