झारखंडः फिर खुलेगी गठबंधन की कलई

प्राकृतिक तापमान में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ झारखंड में सियासी गर्मी भी तेज़ी से बढ़ रही है. आगामी 12 जून को होने वाले हटिया विधानसभा क्षेत्र उपचुनाव को लेकर सूबे में राजनीतिक वातावरण बदला-बदला सा दिख रहा है. सत्तारूढ़ एवं विपक्षी पार्टियों ने हटिया के दंगल में उतरने की तैयारी लगभग पूरी कर ली है.

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झारखंडः कोड़ा प्रकरण पर सियासत गरमाई

झारखंड के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में राज्य के पूर्व मंत्री मधु को़डा के साथ हुए हादसे के बाद सूबे में राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है. कभी अपने विधायकों का समर्थन देकर को़डा को मुख्यमंत्री का ताज पहनाने वाली कांग्रेस का भी पुराना को़डा प्रेम जाग उठा. बस फिर क्या था, को़डा प्रकरण पर राज्य के कांग्रेसी नेता सत्तासीन सरकार की खिंचाई करते नज़र आए.

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झारखंड: रेल परियोजनाओं की कछुआ चाल

खनिज संसाधनों के मामले में देश के सबसे धनी सूबे झारखंड में शायद ही ऐसी कोई योजना है, जो समय पर पूरी हुई हो. एक वर्ष के भीतर पूरी हो जाने वाली योजनाएं 3 से लेकर 5 साल तक खिंच जाती हैं. योजना के लिए प्राक्कलित राशि भी दोगुनी से तीन गुनी हो जाती है. राजनीतिक अस्थिरता, सुस्त एवं भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी, असामाजिक तत्वों का हस्तक्षेप और शासन में इच्छाशक्ति का अभाव जैसे कारण इस समस्या के मूल में हैं.

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झरियाः पहचान बनाने की जद्दोजहद

वर्ष 1952 में झरिया में आयोजित साहित्य सम्मेलन में राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कविता हाहाकार की ये पंक्तियां पढ़ी थीं. आधी सदी बाद ये पंक्तियां झरिया पर सटीक बैठ रही हैं. झरिया के नीचे लगी आग और इसके विस्थापन को लेकर यहां हाहाकार मचा हुआ है. राष्ट्र के औद्योगिक विकास में मेरुदंड की भूमिका निभाने वाला झरिया कोयलांचल आज अपनी पहचान बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है.

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अतिक्रमण की आग और झारखंड

अतिक्रमण हटाओ अभियान ने राज्य में खासी उथल-पुथल मचा दी है. राजधानी रांची हो या औद्योगिक नगरी जमशेदपुर, बोकारो हो या देवघर, हर तऱफ इस अभियान ने अमन-चैन को ख़तरा पैदा कर दिया है. इस मामले में सियासी रोटियां भी जमकर सेंकी जा रही हैं. बीते 27 अप्रैल को धनबाद भी अचानक दहक उठा.

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आखिर कब तक बहेगा खून

खनिज बहुल प्रदेश झारखंड अपने गठन से ही नक्सली हिंसा का शिकार होता आया है. स्थापना वर्ष 2000 से अब तक सूबे में जितनी सरकारें आईं, सभी ने नक्सलियों पर नकेल कसने की बातें दोहराईं, मगर समस्या विकराल होती गई और नक्सली बलशाली होते गए.

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रंग बदलती राजनीति

झारखंड की राजनीतिक हवा इन दिनों बदली हुई है. मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को शपथ लिए तीन माह हो गए. शपथ ग्रहण के छह महीने के भीतर उन्हें चुनाव जीतकर विधानसभा आना है. इसलिए राज्य में विधानसभा एवं लोकसभा के एक-एक उपचुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो गई है. फलत: सूबे में सियासी सरगर्मी बढ़ रही है. बीते 11 सितंबर को अर्जुन मुंडा ने झारखंड के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. बतौर मुख्यमंत्री मुंडा की यह तीसरी पारी है. जमशेदपुर लोकसभा सीट से सांसद अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए राज्य की किसी भी विधानसभा सीट से जीत हासिल करना आवश्यक है. राज्य के मुखिया पद पर आसीन हुए मुंडा को ढाई महीने बीत जाने तक चुनाव की कोई चर्चा ही नहीं थी, परंतु गत 30 नवंबर को जमशेदपुर की खरसावां विधानसभा सीट से भाजपा विधायक मंगल सिंह सोय ने इस्ती़फा दे दिया. उन्होंने अर्जुन मुंडा के चुनाव लड़ने के लिए सीट छोड़ी है. उनका इस्ती़फा स्वीकार भी कर लिया गया है. इसी के साथ मुंडा के चुनाव लड़ने, न लड़ने या सीट की उपलब्धता न होने जैसी अटकलों पर विराम लग गया. कुछ लोगों को यह भी लग रहा था कि मुंडा का हाल भी शिबू सोरेन जैसा न हो जाए. उल्लेखनीय है कि पिछली सरकार में सोरेन मुख्यमंत्री पद पर काबिज़ थे. उन्हें मुख्यमंत्री बने रहने के लिए विधानसभा चुनाव जीतना अनिवार्य था, मगर झामुमो प्रमुख होने के बावजूद पार्टी के किसी विधायक ने उनके लिए सीट नहीं छोड़ी. यहां तक कि उनके विधायक पुत्र एवं पुत्रवधू ने भी उनके लिए सीट की क़ुर्बानी नहीं दी. ठीक इसके विपरीत अर्जुन मुंडा के साथ ऐसी स्थिति नहीं थी. मुख्यमंत्री मुंडा अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत से ही खरसावां सीट से जीतते आ रहे हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में वह जमशेदपुर सीट से सांसद चुने गए. झारखंड में नवंबर 2009 में हुए विधानसभा चुनाव में मुंडा की सरपरस्ती में खरसावां सीट से मंगल सिंह सोय ने जीत हासिल की थी. जीतने के पश्चात विधायक मंगल सिंह सोय का पहला बयान यही था कि जब भी अर्जुन मुंडा कहेंगे, तब वह सीट उनके लिए छोड़ देंगे. अब जब सोय ने मुंडा के लिए सीट छोड़ दी है तो राज्य में दो उपचुनावों की संभावना बन गई है. विधानसभा में आने के लिए मुंडा खरसावां विधानसभा सीट से लड़ेंगे और साथ ही जमशेदपुर संसदीय सीट से इस्ती़फा देंगे. इस वजह से सूबे में कानाफूसी और लॉबिंग तेज हो गई है. लड़ने के इच्छुक विभिन्न उम्मीदवार जहां टिकट पाने के लिए ताल ठोंक रहे हैं, वहीं राज्य की विभिन्न पार्टियां जोड़तोड़ में जुट गई हैं. सूबे में जलवायु का तापमान गिर रहा है, वहीं इसके उलट भावी चुनाव के कारण राजनीतिक तापमान बढ़ रहा है.

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भ्रष्‍टाचार के अंधेरे से मुक्ति कब मिलेगी?

जिस तरह तकनीकों के देश जापान में सर्वाधिक भूचाल आता है, उसी प्रकार खनिजों के राज्य झारखंड में सर्वाधिक राजनीतिक जलजला आता है. इसीलिए यह सूबा निरंतर सियासी अस्थिरता का दंश झेल रहा है. राज्य गठन के 10 साल के अंदर यह तीसरा राष्ट्रपति शासन है.

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