वुड चॉपिंग

इस बार का स्पोट्‌र्स ऑफ द वीक है वुड चॉपिंग. वुड चॉपिंग यानी लकड़ियों की कटाई. पहले पहल तो इस खेल को देखकर लगता है कि शायद यह मज़दूरों का खेल है या फिर शहरों से दूर बसी उस आबादी का, जिसे लकड़ियों में खाना बनाना होता है. लेकिन जैसे ही अमेरिका और आस्ट्रेलिया में होने वाली वुड चॉपिंग चैंपियनशिप में शामिल होते हैं तो आप जान जाते हैं कि यह शौक़ीन मिज़ाज लोगों का एक अजूबा खेल है.

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स्नोबॉल फाइटिंग

इस बार का स्पोट्‌र्स ऑफ द वीक है स्नोबॉल फाइटिंग. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर होता है कि यह एक फाइटिंग गेम है. एक ऐसा फाइटिंग गेम, जिसमें न तो मुक्कों से लड़ाई होती है और न हथियारों से. स्नोबॉल फाइटिंग में बर्फ को हथियार बनाया जाता है. इसमें दो टीमें एक-दूसरे पर बर्फ के गोलों की बौछार करती हैं और फिर होता है स्नोबॉल में बर्फ और खेल का दोहरा मज़ा. वैसे आप लोगों ने बचपन में कई बार पिलो फाइट यानी तकियों की लड़ाई वाला खेल ज़रूर खेला होगा.

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वाइफ कैरिंग (भारयस्यमीथम)

इस बार के स्पोर्टस ऑफ द वीक का नाम है वाइफ कैरिंग. यानी अपनी बीबी को अपने कंधों में उठाना. स़िर्फ उठाना ही नहीं उसे अपने कंधों पर सवार करके एक रेस भी लगानी होती है इस खेल में. यह खेल दुनिया भर के खेलों में काफी दिलचस्प माना जाता है. मूलरूप से फिनलैंड में जन्मे इस खेल की लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. आज यह स्पोर्ट कई विदेशी मुल्कों से निकलकर भारत में भी पहुंच चुका है.

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टो रेसलिंग

इस बार का स्पोट्‌र्स ऑफ द वीक है टो रेसलिंग. रेसलिंग के बारे में तो सभी जानते हैं, लेकिन यह खेल आम रेसलिंग से काफी अलग है. मसलन जिस तरह रेसलिंग में दो प्रतिद्वंद्वी आमने-सामने आकर अपने पूरे शरीर का दम-खम दिखाते हैं, इस खेल में खिलाड़ियों को वैसा नहीं करना पड़ता.

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राष्‍ट्रीय वीरता पुरस्‍कार-2011 जज़्बे की कोई उम्र नहीं होती

अगर दिल में बहादुरी का जज़्बा हो तो उम्र की ज़ंजीरें बहुत कमज़ोर हो जाती हैं. राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार-2011 के लिए चयनित नन्हें जांबाज़ों के कारनामे कुछ यही बयां करते हैं. राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार इस बार 24 बच्चों को दिया गया. इनमें कुछ बच्चों को यह पुरस्कार मरणोपरांत दिया गया.

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अंडर वॉटर हॉकी

भारत में स्पोट्‌र्स का जिक्र अमूमन क्रिकेट पर ही आकर ख़त्म हो जाता है. नाम के लिए भले ही हॉकी राष्ट्रीय खेल है, लेकिन सबसे ज़्यादा शर्मिंदगी देश को इसी खेल में उठानी प़डती है. रही बात फुटबॉल, बॉक्सिंग, कबड्डी, टेनिस और शतरंज जैसे खेलों की, तो इनकी बात स़िर्फ ओलंपिक और कॉमनवेल्थ जैसे आयोजनों तक सीमित रहती है.

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भ्रष्टाचार का चस्का और आम आदमी

सही मायनों में अपनी आवाज़ को सीधे संवाद के ज़रिये जन-जन तक पहुंचाने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम आज भी नाटक को ही माना जाता है. नाटक मंचन और इसी की एक विधा नुक्कड़ नाटकों के ज़रिये न स़िर्फ दर्शकों से सीधा संवाद होता है, बल्कि उसी व़क्त नाटक की विषयवस्तु से संबंधित सारी जानकारी भी मिल जाती है.

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क्या यह आर्थिक शक्ति का अश्लील प्रदर्शन है !

आख़िरकार तमाम ब्रेकरों को पार करते हुए बुद्धा सर्किट में फॉर्मूला वन रेस का महाआयोजन संपन्न हो गया. रेस के बाद अंतराष्ट्रीय पॉप स्टार लेडी गागा का शो भी धूमधड़ाके के साथ रात भर चला.

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सोलर लैम्प प्रोजेक्ट : जिंदगी संवारती रोशनी

बचपन से ही विकलांगता से अभिशप्त लोग हमेशा किसी अन्य की मदद के मोहताज रहते हैं. उनके लिए न कोई सरकारी योजनाएं बनाई जाती हैं और न उन्हें सहारा देने के लिए परिवारीजन ही आगे आते हैं. ऐसे में उनका जीवन अभिशप्तता के उस जाल में उलझ जाता है, जिससे बाहर निकलना उनके लिए नामुमकिन होता है.

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रफ्तार के जानलेवा खेल

जहां एक तऱफ भारत में पहली बार फॉर्मूला रेसिंग के आयोजन को लेकर लोगों में उत्साह और खुशी है. वहीं बहुत सारे देश ऐसे भी हैं, जहां रफ्तार के इस खेल ने लोगों को मातम में डूबो दिया. जी हां, बात चाहे फॉर्मूला रेस की हो या फिर बाइक रेसिंग की, दोनों ही खेलों ने हाल में कई घरों के चिराग़ बुझा दिए हैं.

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बड़े आयोजनों का बड़ा फ़र्क़

फॉर्मूला वन रेस के आयोजन से कुछ ही दिनों पहले चौथी दुनिया ने इस आयोजन में आने वाली अड़चनों पर चर्चा की थी. इस रेस में कहीं ब्रेकर तो नहीं शीर्षक से प्रकाशित उस ख़बर में कई बिंदुओं पर आशंका जताई गई थी

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मुंबई इंडियंस : चैंपियंस के चैंपियंस

अभी हाल ही चेन्नई में ट्‌वेंटी-20 चैंपियंस लीग में मुंबई इंडियंस ने अपनी बादशाहत कायम कर ली. यह पहला मौक़ा था, जब मुंबई इंडियंस ने ट्‌वेंटी-20 का फाइनल जीतकर खिताब पर क़ब्ज़ा किया.

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भारत में पहली बार फॉर्मूला रेस : कहीं इसमें कोई ब्रेकर तो नहीं

आगामी 30 तारी़ख को कई भारतीय शूमाकर फॉर्मूला ट्रैक पर रेसिंग करते दिखाई देंगे. यह रेस इस बार भारतीय मेजबानी के तहत ग्रेटर नोएडा के बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट पर होगी. यह भारत के लिए पहला मौक़ा होगा, जब इस देश में फॉर्मूला रेस होगी.

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कंट्रोवर्शियली योर्स : एक हीरो का विलेन बनना

कुछ तैराक ऐसे होते हैं, जो मझधार में तो ख़ूब तैरते हैं, पर किनारे आकर डूब जाते हैं और कुछ, जो मझधार से लेकर किनारे तक डूबते- तैरते रहते हैं, लेकिन आख़िर में बुरी तरह से डूबते हैं. रावलपिंडी एक्सप्रेस के नाम से मशहूर शोएब अख्तर उन तैराकों में आते हैं

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जीत का गम और हार की ख़ुशी

जब भारतीय क्रिकेट टीम ने विश्वकप जीता था, तब न स़िर्फ उसे पर्याप्त फीस मिल रही थी, बल्कि उस पर पूरे देश की राज्य सरकारों एवं उद्योगपतियों समेत कई लोगों ने ईनामों की बौछार कर दी थी. इस सबके बावजूद टीम इंडिया प्रबंधन द्वारा दी गई फीस से संतुष्ट नहीं थी

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क्रिकेट और करिश्माई चश्मा

क्रिकेट बाज़ार और परिवर्तन की चरम सीमा से गुजर रहा है. यह खेल अब तक राष्ट्रीय खेल हॉकी समेत अन्य खेलों को तो हाशिए पर ढकेल ही चुका है और अब अपने ही फॉर्मेटों के साथ बदलाव कर रहा है.

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देश भर से आई आवाज़: मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के ख़िला़फ अन्ना हजारे का आमरण अनशन किसी कुंभ से कम नहीं है. जिस तरह कुंभ किसी एक जगह पर न होकर प्रयाग से लेकर नासिक, उज्जैन और हरिद्वार में संपन्न होता है

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टीम इंडियाः चारों खाने चित्त

अभी कुछ ही दिनों पहले भारत के ख़िला़फ दूसरे टेस्ट में जीत दर्ज करने के बाद इंग्लैंड की तऱफ से दो ऐसे अप्रत्याशित वाकए सामने आए, जो भारतीय मीडिया और कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों को नागवार गुजरे. पहली बार जब इंग्लैंड टीम ने एक प्रेस कांफ्रेंस में यह दावा किया था कि हम पूरी सीरीज में भारत का सूपड़ा साफ कर देंगे.

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हार का ठीकरा किसके सिर

अब टीम इंडिया इंग्लैंड के साथ अपने आख़िरी टेस्ट मैच का अंजाम चाहे जो भी देखे, लेकिन 3-0 की हार से हुआ आगाज़ यह बताने के लिए काफी है कि भारतीय क्रिकेट टीम की न तो लाज बची है और न ताज. ताज तो उसने अपने शर्मनाक प्रर्दशन के साथ ही गंवा दिया था, लेकिन लाज गंवाई उसने हार का ठीकरा बेमतलब की बातों पर फोड़कर.

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हॉकी सिर्फ नाम का राष्ट्रीय खेल

कहते हैं जब कोई भी संस्थान या व्यक्ति अपने पतनके दौर से गुज़रता है तो एक दिन उसका उत्थान भी होता है, यानी उतार-च़ढाव की स्थिति सब पर लागू होती है. अगर नहीं लागू होती है तो वह है हमारी भारतीय हॉकी टीम. जी हां, दुनिया में हर बदहाल संस्था और टीम के दिन बहुर सकते हैं, लेकिन भारतीय हॉकी टीम के बारे में यही कह सकते हैं कि यह फिर से कामयाबी का सवेरा शायद ही कभी देख सके.

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क्रिकेट, विज्ञापन और फजीहत

जब खिलाड़ियों पर सफलता और पैसे का नशा चढ़ता है तो फिर सारी नैतिकता दांव पर लग जाती है. उस दौरान यह भी ध्यान नहीं रहता है कि क्या सही और क्या ग़लत. दिखाई देता है तो स़िर्फ पैसा. उसके लिए भले ही किसी को अपमानित करना पड़े या फिर किसी को गाली ही क्यों न देनी पड़े. हाल में दो शराब कंपनियों के विज्ञापन के बाद भारतीय टीम के दो खिलाड़ियों में उपजा विवाद कुछ यही कहानी बयान करता है

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टेस्ट सीरीज भारत–वेस्टइंडीज : जीते हैं पर शान से नहीं

वेस्टइंडीज दौरे पर टीम इंडिया ने सीरीज अपने नाम कर फतह तो हासिल कर ली, लेकिन कई मायने में इस जीत को का़फी फीकी कहा जा सकता है. फीकी इसलिए, क्योंकि जिस मुक़ाम और रैंकिंग पर टीम इंडिया आज ख़डी है, उस जगह पर इस टीम से कंप्रोमाइज करने की उम्मीद शायद किसी को नहीं थी.

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बीडी मजदूर : जीवन में खुशहाली कब आएगी

किसी भी देश की आर्थिक उन्नति उसके औद्योगिक विकास पर निर्भर करती है. अगर वह किसी विकासशील देश की बात हो तो वहां के लघु उद्योग ही उसके आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं. भारत भी एक विकासशील देश है. ज़ाहिर है, भारत के विकास की कहानी के पीछे भी इन्हीं उद्योगों का योगदान है, लेकिन अब भारत धीरे-धीरे विकासशील देशों की कतार में का़फी आगे आ चुका है.

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डोपिंग का जाल : सिर्फ खिलाडी और कोच दोषी नहीं

भारत के ज़्यादातर खेल पहले से ही क्रिकेट के मायाजाल में फंसकर खुद के अस्तित्व के लिए तरस रहे हैं, ऐसे में डोपिंग के बढ़ते मामलों ने उन उभरते हुए खेलों और खिलाड़ियों को हाशिए पर डालने का काम किया है, जो किसी तरह क्रिकेट के बाज़ार के बीच अपने स्वर्ण पदकों की बदौलत अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे.

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ये बदलाव कितने जरूरी हैं

व्‍यापार का एक सिद्धांत यह होता है कि जैसे ही व्यापारी को महसूस हो कि उसके बिजनेस की चमक फीकी पड़ने लगी है, वह या तो अपना बिजनेस बदल दे या उसे जल्द ही रेनोवेशन की प्रक्रिया में लाए. आजकल क्रिकेट के व्यापारीकरण से तो सभी वाकिफ हैं. यह बिजनेस भी अपनी लोकप्रियता और मुनाफे के शिखर पर है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से भारतीय क्रिकेट टीम ने इतना क्रिकेट खेला कि लोग खेल से ही उकताने लगे.

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विवादों ने तोड़ी करियर की कमर

वेस्टइंडीज क्रिकेट इस व़क्त अपने उसी दौर से गुजर रहा है, जिस दौर से भारतीय हॉकी टीम गुजर रही है. लगातार हार का सामना और खिलाड़ियों के बढ़ते विवाद ने इस टीम को आज ऐसे मुक़ाम पर खड़ा कर दिया है, जहां इसके भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे हैं. क्रिकेट से लगाव रखने वाले हर एक शख्स को वेस्टइंडीज क्रिकेट का स्वर्णिम दौर याद होगा.

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अ‍लविदा

कुछ खेल ऐसे होते हैं जो खिलाड़ियों को नाम, दाम और शौहरत दिलाते हैं और कुछ खिलाड़ी ऐसे भी होते हैं जिनके नाम से उस खेल की पहचान जुड़ जाती है. फुटबॉल का नाम लेते ही आम फुटबॉल प्रेमियों के ज़ेहन में पहला नाम पेले का आता है और पेले के बाद माराडोना, लेकिन नई पी़ढी के लिए अगर कोई नाम इस तरह का है तो वह निश्चित तौर पर रोनाल्डो का है.

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टीम इंडियाः सब कुछ ठीक नहीं है

पिछले दिनों भारत ने जब विश्व कप जीता तो लगा कि टीम इंडिया अपने बेहतरीन दौर में चल रही है, लेकिन अब लगता है कि सब कुछ बदल गया है. इस वक़्त टीम इंडिया विवादों और संकटों के ऐसे दलदल से गुज़र रही है, जिसमें लगभग हर खिलाड़ी फंसा हुआ है. कुछ दिनों पहले ख़बर आई थी कि वेस्टइंडीज़ दौरे के लिए जाने वाली भारतीय टीम में वीरेंद्र सहवाग भाग नहीं लेंगे.

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भद्रजनों की अभद्रता

क्रिकेट को देश की जनता धर्म मानती है तो थ्योरी में इसे जेंटलमैन गेम का दर्जा दिया गया है. कुछ लोग इसे सामंतों को खेल बताते हैं, जिसमें दो सामंती खेलते हैं और बाकी खिलाड़ी मज़दूरी करते हैं. लेकिन अब क्रिकेट को लेकर एक नई परिभाषा ग़ढी जा रही है. अब इसे पैसा, ग्लैमर और विवादों का पिटारा माना जा रहा है. ज़ाहिर है, इस नई परिभाषा में क्रिकेटर भी ख़ुद को सांचे में ढालने की कोशिश कर रहे हैं.

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वर्ल्‍डकप, आईपीएल और अब वेस्‍टइंडीज

अब इसे पैसे कमाने की कभी न ख़त्म होने वाली भूख कहें या कुछ और, लेकिन इतना तो तय है, अब क्रिकेट लगता है कि कभी ख़त्म नहीं होगा. मतलब आईपीएल ख़त्म होगा तो वर्ल्डकप, वर्ल्डकप ख़त्म तो आईसीएल, फिर 20-20 वर्ल्डकप और फिर विदेशों में दौरे. एक दौर था, जब साल में क्रिकेट के नाम पर एक-दो सीरीज़ और एकाध दौरे का कार्यक्रम हुआ करता था और बाक़ी व़क्त कहा जाता था कि अब क्रिकेटर अभ्यास मैच खेलेंगे और समय मिला तो परिवार के साथ छुट्टियां मनाएंगे.

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