उत्तर प्रदेशः जंग में कौन किसके संग

विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही चौक-चौराहों और सरकारी दफ़्तरों में राजनीतिक चर्चाओं का माहौल गरमाने लगा है. हालांकि चुनाव में अभी काफी समय बाक़ी है, लेकिन राजनीतिक दल अपनी गोटियां सेट करने और क्षेत्रीय दलों से गठबंधन की कोशिश में जुट गए हैं. कई नौकरशाह भी चुनावी समर में ताल ठोकने को तैयार हैं.

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जनता त्रस्‍त, अपराधी मस्‍त, सरकार पस्‍त

जिस प्रदेश में ग़रीबी चरम पर हो, बच्चे रोटी और कपड़े के मुफ्त वितरण में यूं झपट पड़े कि काल के ग्रास बन जाएं, उस प्रदेश के किस नेता को हम धन्यवाद दें और किस देवी-देवता को हम अपना नैवैद्य अर्पित करें, किस मज़ार पर जाएं हम चादर चढ़ाने? जहां भुखमरी, कंगाली और बदहाली बच्चों से उनका हंसता-खेलता बचपन छीन ले और बूढ़ों को फुटपाथ पर मरने के लिए छोड़ दे, हाड़ तोड़ मेहनत के बावजूद किसान भूखे सोएं, अपराधी सरेआम अबला की अस्मत लूटें और कॉलर चौड़ा कर खुलेआम घूमें.

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साधु-संत के वेश में खूंखार अपराधी

एक दौर ऐसा था कि धर्म क्षेत्र से जुड़े साधु-संत मायावी प्रलोभनों से दूर रहकर समाज को संस्कारित व धार्मिक बनाने में अपनी महती भूमिका निभाते हुए स्वयं सात्विक-सरल जीवन जीते थे. काम, क्रोध, मद लोभ को त्याग कर दूसरों को प्रेरणा देते हुए खुद का जीवन दूसरों के हितार्थ होम कर देते थे.

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कल चमन था आज वीरान हुआ चंबलः ये डकैत थे या बागी

चंबल जो कि खूंखार डकैतों के शरण स्थली के रुप में जाना जाता था, आजकल वीरान सा है. उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के ज़्यादातर दस्यु गिरोहों के खात्मे के चलते दस्युओं का खौफ जो ग्रामीणों के सिर चढ़कर बोलता था अब नज़र नहीं आता, चंबल के निकट बसे ग्रामीण अधिकतर डकैतों को डकैत नहीं बल्कि बाग़ी कहना ज़्यादा पसंद करते हैं.

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