ह्यूगो चावेज़ – हम तुम्हें यूं भुला न पाएंगे

21वीं सदी के युग पुरुष एवं दक्षिणी अमेरिकी देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज़ का बीते 6 मार्च को महज़

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भारत-पाकिस्तान : अमन क़ायम करने की मुहिम

इस समय पाकिस्तान पर फौजी हुकूमत द्वारा सत्ता पलट के साये बुरी तरह मंडरा रहे हैं. पाकिस्तान क्या अपने देश में लोकतंत्र की बलि चढ़ाएगा, यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा. पिछले दिनों पाकिस्तान-इंडिया फोरम फोर पीस एंड डेमोक्रेसी द्वारा दोनों देशों की जनता के प्रतिनिधियों ने अमन और दोस्ती का पैग़ाम देते हुए एक संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया.

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वनाधिकार कानून और महिलाएं

देश को आज़ादी मिलने के साठ साल बाद 2006 में वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को मान्यता देने के लिए एक क़ानून पारित किया गया, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत निवासी (वनाधिकारों को मान्यता) क़ानून. यह क़ानून बेहद है. यह केवल वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को ही मान्यता देने का नहीं, बल्कि देश के जंगलों एवं पर्यावरण को बचाने के लिए वनाश्रित समुदाय के योगदान को भी मान्यता देने का क़ानून है.

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हाथियों का हत्‍यारा कौन

नेपाल सीमा से लगे उत्तर प्रदेश के जनपद खीरी के दुधवा नेशनल पार्क में पिछले दिनों बिजली के हाईटेंशन तारों के कारण एक साथ तीन हाथियों की दर्दनाक मौत हो गई. इस घटना में सबसे हृदय विदारक मौत उस गर्भवती हथिनी की हुई, जिसकी कोख से अपरिपक्व बच्चा बिजली के तेज़ झटके लगने के कारण मां के पेट से बाहर आ गया.

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पास्‍को परियोजनाः राष्‍ट्रीय वन संपदा की खुली लूट

उड़ीसा के जगतसिंहपुर में 50 हज़ार करोड़ रुपये निवेश करने वाली दक्षिण कोरिया की कंपनी पोहंग स्टील (पास्को) के आगे केंद्र और राज्य सरकार ने अपने घुटने टेक दिए हैं. पल्ली सभा (ग्राम परिषद) के विरोध के बावजूद बीती 18 मई को पोलंग गांव में भूमि अधिग्रहण के लिए पुलिस भेज दी गई है. इससे नंदीग्राम और सिंगुर की तरह पोलंग में भी ख़ूनी संघर्ष का माहौल तैयार हो चुका है.

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सूरमा देश का पहला वनग्राम बनाः अब बाघ और इंसान साथ रहेंगे

उत्तर प्रदेश के खीरी ज़िले का सूरमा वनग्राम देश का ऐसा पहला वनग्राम बन गया है, जिसके बाशिंदे थारू आदिवासियों ने पर्यावरण बचाने की जंग अभिजात्य वर्ग द्वारा स्थापित मानकों और अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित वन विभाग से जीत ली है. बड़े शहरों में रहने वाले पर्यावरणविदों, वन्यजीव प्रेमियों, अभिजात्य वर्ग और वन विभाग का मानना है कि आदिवासियों के रहने से जंगलों का विनाश होता है, इसलिए उन्हें बेदख़ल कर दिया जाना चाहिए.

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अपने बूते जिंदा हैं आदिवासी

कैमूर पर्वत श्रृखंला भारत की प्राचीनतम पर्वतमालाओं में से है, जहां पर सोन, घाघरा, कर्मनाशा आदि नदियां बहती हैं. वनों से आच्छादित इस क्षेत्र में आदिवासियों का वास रहा है. लेकिन मुगलों व अंग्रेजों के दख़ल के बाद से इस इला़के के आदिवासियों का जीना दूभर हो गया.

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आदिवासी आज भी गुलाम है

आज देश के अधिकांश जंगलक्षेत्र एक ऐसी हिंसा की आग से धधक रहे हैं, जिसकी आंच को कहीं न कहीं पूरा देश महसूस कर रहा है. इस आग का कारण इन क्षेत्रों में माओवादी गतिविधियों का तेज होना है. देश की आज़ादी के बाद से ही सुलग रही इस आग ने आज एक विकराल ज्वालामुखी का रूप धारण कर लिया है.

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