गिरफ्त में आतंकी : सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी से बचता रहा भटकल

आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन के संस्थापक यासीन भटकल की गिरफ्तारी से देश की सुरक्षा एजेसियां और गृह मंत्री सुशील कुमार

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तीसरा मोर्चा : कैसे बनेंगे प्रधानमंत्री

यूं तो तीसरा मोर्चा बनाने की नूरा-कुश्ती हिंदुस्तान की सियासत में पिछले पच्चीस सालों से चल रही है, लेकिन इस

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कांग्रेस में अपनी ढपली-अपना राग : राहुल गांधी की फिक्र किसी को नहीं

कांग्रेस में राहुल गांधी के भविष्य की चिंता किसी को नहीं है. अगर है, तो फिक़्र अपने-अपने मुस्तकबिल की. पार्टी में रणनीतिकार की भूमिका निभाने वाले कई नेताओं के लिए राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की बजाय एक मोहरा भर हैं. राहुल गांधी की आड़ में उक्त नेता कांग्रेस पार्टी पर अपनी हुकूमत चलाना चाहते हैं. लिहाज़ा उनके बीच घमासान इस बात का नहीं है कि आम चुनावों से पहले पार्टी की साख कैसे बचाई जाए, बल्कि लड़ाई इस बात की है कि राहुल गांधी को अपने-अपने कब्ज़े में कैसे रखा जाए, ताकि सरकार और पार्टी उनके इशारों पर करतब दिखाए.

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सरकार की यह कैसी लाचारी है

गृह मंत्री पी चिदंबरम प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं और उनके पिछलग्गू बने मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल गृहमंत्री. पी चिदंबरम ने अपनी मंशा में कामयाब होने की खातिर ज़रिया बनाया है देश की ख़ु़फिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी को. गृह मंत्री पी चिदंबरम प्रधानमंत्री बनने को इस क़दर उतावले हैं कि उन्हें न तो अपनी पार्टी, न सरकार की परवाह है और न देश की आंतरिक सुरक्षा की.

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एनसीटीसी : इस जल्दबाज़ी की वजह क्या है

एनसीटीसी के गठन के पीछे क्या वाकई देश की सुरक्षा की चिंता है या फिर यह कांग्रेस की विपक्षी पार्टियों और नेताओं, ख़ासकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर शिकंजा कसने की कोई सियासत? आख़िर कांग्रेस और उसके मंत्री एनसीटीसी यानी आतंकवाद निरोधी ख़ु़फिया केंद्र को लेकर इतनी हड़बड़ी में क्यों हैं?

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सोनिया के फ़रमाबरदार पुलक चटर्जी : चला रहे हैं सरकार, मनमोहन लाचार

यूं तो कहने को मनमोहन सिंह देश के वज़ीरे आज़म हैं, पर हकीक़त में देखा जाए तो फिलहाल उनकी भूमिका महज़ एक प्यादे भर की रह गई है, क्योंकि देश की बागडोर उनके हाथ में नहीं है. आर्थिक, वाणिज्यिक मामले हों या देश की सुरक्षा से जुड़े मसले या फिर विभिन्न मंत्रालयों में तालमेल और उनकी कार्यप्रणाली निर्धारित करने की बात हो, इन सभी अहम मुद्दों पर फैसला मनमोहन सिंह नहीं, बल्कि कोई और लेता है.

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आदर्श आवास घोटाला : सीबीआई विलासराव और शिंदे पर शिकंजा कसेगी

आदर्श आवास घोटाले में सीबीआई की नज़र कांग्रेस के दो केंद्रीय मंत्रियों पर जाकर टिक गई है. आदर्श आवास घोटाले का जिन्न कांग्रेस की पीठ पर सवार हो चुका है. इस बहुचर्चित घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के फंसने के बाद सीबीआई ने विलासराव देशमुख और सुशील कुमार शिंदे को अभियुक्त बनाने की तैयारी शुरू कर दी है. सीबीआई के वकील के. सुधाकर और एजाज़ खान ने आदर्श घोटाले की पिछली सुनवाई के दौरान मुंबई हाईकोर्ट को बताया कि जांच के दौरान इस मामले में दो और लोगों के शामिल होने के सबूत मिले हैं.

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महिलाओं के अधिकार और क़ानून

हर व्यक्ति जन्म से ही कुछ अधिकार लेकर आता है, चाहे वह जीने का अधिकार हो या विकास के लिए अवसर प्राप्त करने का. मगर इस पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के साथ लैंगिक आधार पर किए जा रहे भेदभाव की वजह से महिलाएं इन अधिकारों से वंचित रह जाती हैं.

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उत्तराखंड : खंडूरी हारे, फिर भी कांग्रेस नहीं जीती

जीतकर भी हारना क्या होता है, अगर आपको यह जानना है तो उत्तराखंड से बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता. कमज़ोर नेतृत्व और आलाकमान में दूरदर्शिता की कमी क्या होती है, उत्तराखंड इसका भी नमूना पेश करता है. जिस राज्य में कांग्रेस की हवा बन चुकी थी, जहां की जनता कांग्रेस के हाथ राजपाट सौंपने का मन बना चुकी थी. उस राज्य में सरकार बनाने की खातिर कांग्रेस के पसीने छूट गए.

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बार गर्ल्स बनीं आतंकियों का हथियार

भारत के ख़िला़फ रची गई है अब तक की सबसे ख़ौ़फनाक साज़िश. आतंकवादियों ने इस बार भारत पर हमले के लिए तैयार की है महिला ब्रिगेड. इस महिला ब्रिगेड में मुंबई और पाकिस्तान में काम करने वाली बार गर्ल्स शामिल हैं. भारतीय ख़ु़फिया एजेंसी के पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि दुबई में बैठे दाऊद और उसके गुर्गे मुंबई और पाकिस्तान की बार गर्ल्स को डांस करने के नाम पर दुबई बुलाकर उन्हें आतंकी वारदातें अंजाम देने की ज़बरदस्त ट्रेनिंग दे रहे हैं.

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बिहार में नई सियासी नौटंकी

सियासत में शह-मात का खेल कैसे होता है, पल भर में सियासी समीकरण कैसे बदल जाते हैं. अगर आप यह जानना चाहते हैं तो बिहार की सियासी फिज़ा में फैले शगू़फों पर ग़ौर फरमाने की ज़रूरत है, जहां यारों के बीच ही यानी जद-यू और भाजपा के दरम्यान चेक-मेट का खेल अपने शबाब पर है. कुछ इस तरह से गोटियां बिछाई जा रही हैं कि लगता है कि जैसे उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद सियासी जंग की सरज़मीन अब बिहार ही बनने वाला है.

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सत्ता की वसीयत सियासत की विरासत

हिंदुस्तान में अब विरासत की ही सियासत होगी. वंशवाद की ही राजनीति होगी. इस सियासी दुनिया में आम आदमी के लिए जगह पाना तो पहले भी मुश्किल था, अब तो नामुमकिन सी बात होगी. हां, अगर राजनीति में आपका कोई माई-बाप है, तब तो आप सपने संजोने की क़ाबिलियत रखते हैं. अगर नहीं है तो आपको राजनीति में रहने का कोई हक़ नहीं है.

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कांग्रेस और मुलायम सिंह में समझौता हो गया

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच यह करार हो चुका है कि उत्तर प्रदेश में वे मिलजुल कर सरकार बनाएंगी. इस समझौते के मुताबिक़ केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे और समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव उप मुख्यमंत्री का पदभार संभालेंगे. हालांकि अखिलेश ने सूबे का वजीर-ए-आला बनने का सपना पाल रखा है, पर उन्हें अपने पिता का भी ख्याल रखना है और कांग्रेस ने अखिलेश यादव को उनके त्याग का खूब सिला दिया है.

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मुलायम सिंह का परिवार : अखिलेश-शिवपाल में ठनी रार

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का यह नया चेहरा है, जहां नीतियों पर अलगाव है, टकराहट है, सत्ता हथियाने की लालसा है और पार्टी में वर्चस्व को लेकर अंदर ही अंदर सुलग रहा गुस्सा है. यह अखिलेश यादव का समाजवाद है, जो उनके पिता मुलायम सिंह यादव के समाजवाद से बिल्कुल उलट है.

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राहुल गांधी और उत्तर प्रदेश : मिशन-2012 दूर की कौड़ी

उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह, रीता बहुगुणा जोशी और प्रमोद तिवारी को फ्रंट लाइन के योद्धा के तौर पर नियुक्त किया, जबकि प्रदीप जैन, आरपीएन सिंह एवं जतिन प्रसाद जैसे युवाओं को उन्हें बैकअप देने का काम सौंपा गया.

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टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला : बेल का खेल ऑल इज नॉट वेल

टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले में मनमोहन, चिदंबरम एवं सोनिया गांधी ने चुप्पी साध रखी है और देश के क़ानून मंत्री सलमान खुर्शीद चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान चस्पां किए देश की अवाम को भरमाने की खातिर कहते फिर रहे हैं, ऑल इज वेल. पर इस हक़ीक़त से वह और सरकार में शामिल उनके सहयोगी भी ख़ूब वाबस्ता हैं कि ऑल इज नॉट वेल. इस घोटाले की प्रक्रिया और उसके बाद जांच की औपचारिकता के बीच ऐसे कई क़ानूनी पेंच हैं, जिनमें सरकार फंसती नज़र आ रही है.

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विजय माल्या और सियासत का गठजोड़ : आसमान में घोटाला

यह भारतीय लोकतंत्र का बाज़ारू चेहरा है, जो कॉर्पोरेट्स के हितों के मुताबिक़ फैसले लेता है. जहां लोकतंत्र के पहरुवे, भूख से मरते किसानों के लिए रोटी का इंतज़ाम करने का अपना फ़र्ज़ पूरा नहीं करते, लेकिन उद्योग जगत के महारथियों के क़दमों में लाल क़ालीन बनकर बिछ जाना अपनी शान समझते हैं.

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