अराजकतावादी नक्सलवाद : पुनर्विचार की ज़रूरत

नक्सलवादियों की हाल-फिलहाल की गतिविधियों से ऐसा लगता है कि वे अपने उद्देश्यों से भटकते जा रहे हैं. कुछ समय पहले मलकानगिरी के ज़िलाधिकारी का अपहरण कर लिया गया, उड़ीसा में एक विधायक और इटली के दो नागरिकों का अपहरण कर लिया गया.

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बेहतर चुनाव के लिए बेहतरीन प्रयास

जिला निर्वाचन अधिकारी के तौर पर पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में चुनाव कराना संतोषप्रद रहा. अभी तक हुए चुनाव के इतिहास में इस ज़िले में हुआ 2011 का चुनाव सबसे शांतिपूर्ण रहा. राजनीतिक दल, मीडिया तथा आम लोगों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की. इस चुनाव से जुड़े सभी लोगों ने अपनी तऱफ से भरपूर समर्थन और सहयोग दिया.

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बालश्रम खत्म किया जा सकता है

भारत में 14 साल तक के बच्चों की आबादी पूरी अमेरिकी आबादी से भी ज़्यादा है. कुल श्रम शक्ति का लगभग 3.6 फीसदी हिस्सा 14 साल से कम उम्र के बच्चों का है. प्रत्येक दस बच्चों में से 9 काम करते हैं. ये बच्चे लगभग 85 फीसदी पारंपरिक कृषि गतिविधियों में कार्यरत हैं, जबकि 9 फीसदी से कम उत्पादन, सेवा और मरम्मती कार्यों में लगे हैं.

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समाज अपनी खामियों को पहचाने

हमें अपने भारतीय पारिवारिक मूल्यों पर गर्व होता है. अपने पारिवारिक मूल्यों को हम अन्य संस्कृतियों के पारिवारिक मूल्यों से श्रेष्ठ समझते हैं. अगर किसी से स्वर्ग के बारे में पूछा जाए तो वह कहेगा कि वैसा जीवन, जिसमें ब्रिटिश घर हो, अमेरिकी वेतन हो, चाइनीज खाना हो और भारतीय परिवार हो, स्वर्ग कहा जा सकता है.

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शरणार्थी समस्या : सकारात्मक पहल की ज़रुरत

जनसंख्या विस्थापन के क्षेत्र में दक्षिण एशिया का एक अनूठा इतिहास रहा है. यहां युद्ध के बाद लोग या तो अपने देश की सीमाओं से बाहर निकाल दिए गए अथवा वे जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर देश छोड़ने के लिए मजबूर हो गए. इसके बाद पर्यावरणीय या विकासात्मक प्रक्रिया भी विस्थापन की एक वजह बनी.

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राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रयास की जरुरत

ऐसा कहा जाता है कि भारत के पास राष्ट्रीय सुरक्षा का सिद्धांत नहीं है और यहां रणनीतिक दुविधाग्रस्तता की स्थिति बनी रहती है. सुरक्षा विशेषज्ञ जॉर्ज तनहाम ने भी ऐसा अनुभव किया है कि भारत के पास रणनीतिक सोच की संस्कृति का अभाव है. के सुब्रमण्यम के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड द्वारा इस तरफ संकेत करने के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में गंभीरता से सोचा जाने लगा है.

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राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन के मायने

राष्ट्रीय सुरक्षा एक ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल आजकल आम तौर पर किया जाता है. प्राय: यह शत्रु देश के आक्रमण से सुरक्षा से संबंधित होता है अथवा उन हथियारबंद आतंकवादियों से सुरक्षा से, जो राष्ट्र के प्रभुत्व को चुनौती देते हैं या राष्ट्रीय एकता-अखंडता को नुक़सान पहुंचाते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिप्राय केवल इसी से नहीं है, बल्कि इसे और अधिक वृहद अर्थों में समझने की आवश्यकता है.

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जलवायु परिवर्तनः सबसे ज़्यादा असर ग़रीबों पर

इस बात से सभी सहमत हैं कि हमारे वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों की वृद्धि ही जलवायु परिवर्तन की वजह है. इस नीले ग्रह (पृथ्वी) पर जीवन के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी यही है. यदि कोई संदेह रह गया है तो भारत में मानसून की आंख मिचौली और पूरी दुनिया में जलवायु का अनिश्चित व्यवहार इसके प्रमाण हैं.

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कितना और क्यों ज़रूरी है मीडिया ट्रायल

मीडिया ट्रायल, इस बहुप्रचारित शब्द को लेकर काफी लंबी-चौड़ी बहस हो चुकी है और अभी भी हो रही है. इसके पक्ष और विपक्ष में ख़ूब सारे तर्क भी दिए जा रहे हैं. दरअसल, किसी भी निर्णय तक पहुंचने से पहले हमें इससे जुड़ी हर एक बारीक़ी और अर्थ को समझना होगा. सबसे पहले सवाल यह उठता है कि मीडिया ट्रायल जैसा शब्द आया कहां से? यह एक नई अवधारणा है या तबसे इसका अस्तित्व है, जबसे चौथे स्तंभ की शुरुआत हुई? कोई यह तर्कभी दे सकता है कि मांग के हिसाब से ही इस दुनिया में कोई चीज अस्तित्व में आती है. इसलिए यदि मीडिया ट्रायल शुरू हुआ तो इसके लिए व्यवस्था में शामिल संस्थाओं की निष्क्रियता या असफलता जैसे तर्क ही सूझते हैं. एक ऐसे व़क्त में, जब अन्य संस्थाएं असफल हो रही हों, तब न्यायपालिका की तरह मीडिया ख़ुद को सामने खड़ा कर अपने तरह से उस शून्य को भरने की कोशिश करता है, जो अन्य संस्थाओं की असफलता की वजह से पैदा हुआ है और इस तरह न्यायिक सक्रियता या मीडिया ट्रायल जैसी अवधारणाओं का जन्म होता है.

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सूचना अधिकार क़ानून: भ्रांतियां और निवारण

भारत में सूचना अधिकार क़ानून (आरटीआई एक्ट) को लागू हुए पांच साल पूरा हो चुका है, लेकिन आम जनता और सरकारी अधिकारी अभी भी इस क़ानून के कई पहलुओं से अनभिज्ञ हैं. यह अनभिज्ञता दायर की गई अपीलों और लोकसेवकों द्वारा उनके जवाबों को देखकर स्पष्ट हो जाती है.

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आम लोगों के लिए हथियार बना सूचना अधिकार क़ानून

अक्सर कहा जाता है कि किसी भी चीज के निर्माण, उसका समुचित प्रदर्शन सुनिश्चित करने और उसमें आवश्यक सुधार के लिए सूचना या जानकारी का होना पहली शर्त है. मनुष्य के अस्तित्व से जुड़े हर पहलू के लिए यह आधारभूत ज़रूरत है, चाहे वह ज्ञानार्जन हो, अपने दायित्वों का निर्वहन हो, नियम-क़ानूनों का अनुपालन हो या कमियों के मद्देनज़र व्यवस्था में सुधार हो.

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पूर्ण स्वच्छता अभियान और मनरेगा

मनरेगा की उपयोगिता और इसके उद्देश्यों को लेकर कोई संदेह नहीं. यह भी सच्चाई है कि इसमें ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन अब तक का अनुभव यही बताता है कि इसके क्रियान्वयन में सुधार की ज़रूरत है. यदि इसे पूर्ण स्वच्छता अभियान जैसी व्यक्तिगत लाभ योजनाओं से जोड़ दिया जाए तो दोनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है.

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मनरेगा : का़फी गुंजाइश है सुधार की

मनरेगा के तहत काम के दौरान मज़दूरों को मिलने वाली सुविधाएं संदेह के घेरे में हैं. योजना में इन सुविधाओं से संबंधित स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन इनका कहां तक पालन किया जाता है, यह संदेहास्पद है. योजना के अंतर्गत कराए जा रहे कार्यस्थलों पर न तो प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध होती और न ही पीने का साफ पानी.

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मनरेगा : भ्रष्टाचार रोकने के उपाय नाका़फी

नरेगा के अंतर्गत भ्रष्टाचार और सरकारी धन के अपव्यय को रोकने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है. इस योजना की संरचना में पर्यवेक्षण और निरीक्षण का खास ध्यान रखा गया है. इसके लिए फील्ड में जाकर ज़मीनी हक़ीक़त की जांच-पड़ताल, मस्टररोल का सार्वजनिक निरीक्षण, योजना के अंतर्गत पूरे किए जा चुके एवं चल रहे कामों को सूचनापट्ट पर प्रदर्शित एवं प्रचारित करने और सामाजिक अंकेक्षण पर विशेष ज़ोर दिया गया है.

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मनरेगा : अधिकारियों की ज़िम्मेदारी तय हो

मनरेगा का उद्देश्य केवल ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराकर गांवों से शहरों की ओर हो रहे पलायन पर रोक लगाना ही नहीं है, बल्कि दूरदराज के क्षेत्रों में परिसंपत्ति का निर्माण करना भी है. इस नज़रिये से देखें तो सरकार को बाज़ार के अनुरूप न्यूनतम मज़दूरी में लगातार बदलाव करना होगा. इससे ग्रामीण मज़दूर शहरों में उपलब्ध ज़्यादा मज़दूरी वाले रोज़गार के अवसरों की ओर कम आकर्षित होंगे. यदि ऐसा नहीं होता है तो लोग गांव में रहकर मनरेगा के लिए काम करने को तैयार नहीं होंगे और ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत संरचना के निर्माण एवं विकास की हमारी हसरत भी धरी की धरी रह जाएगी.

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मनरेगा : अनुभव से सीखने की ज़रूरत

महात्मा गांधी नेशनल रूरल इंप्लायमेंट गारंटी प्रोग्राम (मनरेगा) की शुरुआत हुए चार साल से ज़्यादा व़क्त बीत चुका है और अब यह देश के हर ज़िले में लागू है. अपनी सफलता से तमाम तरह की उम्मीदें पैदा करने वाले मनरेगा को सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी एवं आकर्षक योजनाओं में गिना जा रहा है.

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नक्सल समस्या : राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाने की ज़रूरत

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले में नक्सली हमले में एक साथ 76 लोगों की मौत ने देश में लगातार गंभीर बनती जा रही इस समस्या की ओर फिर से ध्यान खींचा है. नक्सलियों की बढ़ती ताक़त, उनके प्रभाव क्षेत्र में विस्तार और मारक क्षमता के मद्देनज़र यह ज़रूरी है कि हम इस समस्या की गंभीरता पर नए सिरे से विचार करें.

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जातिगत आरक्षण : व्यवस्थागत खामियों का प्रतिबिंब

सरकारी एवं ग़ैर सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में जाति आधारित आरक्षण का मुद्दा बार-बार हमारे सामने आता रहा है. ठीक उसी दैत्य की तरह, जो हर बार अपनी राख से ही दोबारा पैदा हो जाता है. इस मुद्दे पर विचार-विमर्श की ज़रूरत है. हमें यह सोचना होगा कि क्या आरक्षण वाकई ज़रूरी है.

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बाल मजदूरी देश के लिए अभिशाप

यह माना जाता है कि भारत में 14 साल के बच्चों की आबादी पूरी अमेरिकी आबादी से भी ज़्यादा है. भारत में कुल श्रम शक्ति का लगभग 3.6 फीसदी हिस्सा 14 साल से कम उम्र के बच्चों का है. हमारे देश में हर दस बच्चों में से 9 काम करते हैं. ये बच्चे लगभग 85 फीसदी पारंपरिक कृषि गतिविधियों में कार्यरत हैं, जबकि 9 फीसदी से कम उत्पादन, सेवा और मरम्मती कार्यों में लगे हैं. स़िर्फ 0.8 फीसदी कारखानों में काम करते हैं.

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क्या हम भारतीय नस्लवादी हैं?

कई अफ्रीकी नागरिक भारतीयों द्वारा नस्लीय भेदभाव का आरोप लगाते रहे हैं. अफ्रीकियों की अपेक्षा अधिक गोरे रंग का होने की वजह से बहुत से भारतीय ख़ुद को उनसे श्रेष्ठ मानते हैं. एक व़क्त ऐसा भी था, जब यह आरोप लगा कि गोरे रंग के पूर्वाग्रह से ग्रसित लोग गोरे रंग की ही एयर होस्टेस, टीवी न्यूज़ रीडर, अभिनेता और अभिनेत्रियों का चयन करते हैं. अभी भी अधिकांश सफल अभिनेता और अभिनेत्रियां अपने वास्तविक रंगों के बजाय मेकअप में शूटिंग करते हैं.

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खुद को बदलें, पर्यावरण बदलेगा

जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा प्रभाव ग़रीब और समाज के सबसे निचले तबके पर पड़ेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि इनके हाथों में बहुत ही सीमित क्षमता, योग्यता और स्रोत हैं. इसलिए समाज के इन वर्गों के जीविकोपार्जन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की ज़रूरत है. जलवायु परिवर्तन की गंभीर समस्या में नगण्य योगदान के बावजूद सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वालों में यही लोग होंगे.

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यस सर नहीं, यस मैडम बोलिए

एक ग़रीब आदमी यह कभी नहीं सोचता कि उसके फैसले से किसी को कुछ ़फर्क़ भी पड़ता है, लेकिन पत्नी के फैसले उसकी या किसी और की ज़िंदगी के लिए काफी अहम होते हैं. अहंकार उसे भ्रम में डाल देता है. आज भी मेरे मित्र और उनकी पत्नी दोनों अच्छी तरह साथ-साथ रहते हैं. मगर, दोनों के अपने-अपने तरीक़े हैं.

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शरणार्थी समस्या : सकारात्मक पहल की ज़रूरत

जनसंख्या विस्थापन के क्षेत्र में दक्षिण एशिया का एक अनूठा इतिहास रहा है. यहां, युद्ध के बाद लोग या तो अपने देश की सीमाओं से बाहर निकाल दिए गए अथवा वे जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर देश छोड़ने को मज़बूर हो गए. इसके बाद पर्यावरण या विकासात्मक प्रक्रिया भी विस्थापन की एक वजह बनी.

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सूचना के अधिकार को मज़बूती देनी होगी

अक्टूबर 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) लागू हुआ था. उस घटना को तीन साल से ज़्यादा हो गए हैं. इसके लागू होने के कुछ ही दिनों के अंदर लोग यह भी आशंका व्यक्त करने लगे कि इस अधिनियम को लागू करने में पूरी ईमानदारी नहीं बरती जा रही.

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