मध्य प्रदेश…..हकीकत झुठलाने की कोशीश

चुनावी वर्ष है, इसलिए राज्य की भाजपा सरकार प्रचार का कोई मौक़ा छोड़ना ही नहीं चाहती, भले ही इसके लिए

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सरकार ही प्रदूषित कर रही है नर्मदा

धार्मिक दृष्टि से अति पवित्र और प्रदेश की जीवन रेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए भारत सरकार ने मध्य प्रदेश को 15 करोड़ रुपयों की सहायता दी है. इसके अलावा राज्य सरकार भी नर्मदा जल को प्रदूषण से बचाने के लिए कई प्रकार के खर्चीले उपाय कर रही है, लेकिन इस सबके बाद भी नर्मदा में जल प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है. कारण, सरकार स्वयं नर्मदा को गंदा कर रही है.

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गोंडवाना राज्य की मांग फिर बुलंद

पृथक गोंडवाना राज्य के गठन की मांग एक बार फिर बुलंद हुई है. हाल ही भोपाल में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संस्थापक, अध्यक्ष हीरासिंह मरकाम ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की एक सभा में इस मांग को उठाते हुए एलान किया कि इस वर्ष एक नवंबर से पंचायत स्तर ……………………….

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भोपाल न्‍यायिक त्रासदी

पच्चीस साल पहले विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी झेलने वाले भोपाल के लाखों पीड़ितों को आ़िखर क्या मिला? इस पर बहस तो चलेगी पर पीड़ितों को क्या मिलेगा? भोपाल हादसे में 15274 मौतों के बाद लाखों लोगों को तिल-तिल कर मरने के लिए बाध्य करने वाली यूनियन कार्बाइड और उसके अमेरिकन अध्यक्ष वारेन एंडरसन सहित आठ अन्य सज़ायाफ्ता मुजरिम भारतीय न्याय प्रक्रिया की कमज़ोरियों का लाभ उठाकर आज भी आज़ाद हैं.

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कलह और आकांक्षा में डोलती भाजपा

मध्य प्रदेश भाजपा आंतरिक संघर्ष से रूबरू है. सत्ता और संगठन के बीच क्रमश: बढ़ रही दूरियों के कारण राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बढ़ता जा रहा है. प्रभात झा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा के अंदर एक नए राजनीतिक ध्रुव का जन्म हुआ है. भारतीय जनता पार्टी सत्ता की दूसरी पारी में आंतरिक संघर्ष की ओर बढ़ती नज़र आ रही है.

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पोषण आहार कार्यक्रम माफियाओं के कब्‍जे में

बच्चों, गर्भवती तथा नवप्रसूता माताओं में कुपोषण की गंभीर समस्या भारत सरकार और राज्य सरकार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. मध्य प्रदेश में कुपोषण की स्थिति सबसे भयावह और मारक बनी हुई है.

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महाराजा के हाथ कमान

मध्य प्रदेश की सुस्त राजनीति में आने वाला समय काफी उथल-पुथल भरा हो सकता है. इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस एक महाराजा की ताजपोशी पर आमादा है. राष्ट्रीय स्तर पर यह अफवाहें गर्म हैं कि कांग्रेस हाईकमान मध्य प्रदेश में अग्रिम मुख्यमंत्री का चयन पहले ही कर चुका है.

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प्रभात झाः कांटों भरा ताज

तीस साल पहले रोज़गार की तलाश में बिहार से ग्वालियर आए प्रभात झा ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से जुड़े दैनिक समाचारपत्र स्वदेश में एक पत्रकार के रूप में काम करना शुरू किया. थोड़े ही समय में वह भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के दिग्गज नेताओं के संपर्क में आ गए.

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फ्लोराइड का जहर बच्‍चों में विकलांगता

प्रदेश में भीषण जल संकट तो है ही, साथ ही कई स्थानों पर प्रदूषणग्रस्त पेयजल में फ्लोराइड जैसे घातक पदार्थों के घुल जाने से जीवन जल, विकलांगता का कारण बन रहा है. ऐसा नहीं कि सरकार को इसकी कोई जानकारी नहीं है, लेकिन जानकारी होते हुए भी संवेदनहीन सरकारी अमला अकर्मण्य बन बैठे हैं.

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घुघुवा जीवाश्‍म राष्‍ट्रीय उद्यानः अतीत की निधियों का खजाना

क्‍या आपने करोड़ों वर्ष पुराने बीज, शंख, पत्तियां, बीज वाले केले और वृक्षों के तनों को देखा है? या फिर जीवोत्पत्ति घड़ी देखी है? अधिकांश का जवाब शायद नहीं होगा. पर यह सवाल भी उठेगा कि ऐसा कैसे संभव है और अगर ऐसा है तो कहां और कैसे देखें? इन सब जिज्ञासाओं का समाधान मध्य प्रदेश में ही विद्यमान है. यह अनूठी वस्तुएं प्रदेश के डिंडौरी ज़िले में घुघुवा स्थित जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान में देखी जा सकती है.

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उमा भारती वापसी की राह आसान नहीं

मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों उमा भारती फैक्टर की चर्चा ज़ोरों पर है. भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान राज्य सरकार का हर नेता इस बात को लेकर चिंतित है कि उमा की वापसी मध्य प्रदेश की राजनीति को किस हद तक अस्थिर कर सकती है. उमा ने अपनी स्वयं की पार्टी से त्यागपत्र देकर भारतीय जनता पार्टी में वापसी के अंतिम प्रयास शुरू कर दिए हैं.

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किसानों की आत्‍महत्‍या जारी

मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार भले ही किसान को खुशहाल बनाने और खेती को लाभदायक व्यवसाय बनाने का प्रचार कर रही है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि राज्य के किसानों की हालत का़फी ख़राब है. हालात ये है कि ग़रीबी तथा ऋण से परेशान होकर किसान आत्महत्या भी कर रहे हैं.

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लक्ष्‍य पूरा कराने के लिए मौत का टीका

मध्य प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग भ्रष्टाचार और लापरवाही के लिए खासा बदनाम है. इस विभाग को लोग हत्यारा विभाग तक कहने लगे हैं. हाल में दमोह ज़िला मुख्यालय में टीकाकरण योजना के तहत खसरे का टीका लगाने के बाद चार बच्चों की मौत हो गई और दस बच्चे गंभीर रूप से बीमार हो गए.

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बिजली संकट बीमारी कुछ, इलाज कुछ

प्रदेश में पिछले दस सालों से बिजली संकट गहराया हुआ है, लेकिन भाजपा के लिए यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा भर है. 2003 के विधानसभा चुनाव में बिजली संकट पर हंगामा करके ही भाजपा ने जीत हासिल की थी. 2008 के चुनाव में भी बिजली संकट के लिए केंद्र को ज़िम्मेदार बताकर वह अपनी सत्ता बचाने में सफल हो गई.

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अभी भी चुनौती है डंपर कांड

मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों द्वारा विधानसभा के पटल पर रखी गई, संपत्ति संबंधी जानकारी में राज्य के वित्तीय विशेषज्ञों को असमंजस में डाल दिया है. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में शिवराज सिंह चौहान और उनकी पत्नी समेत सात व्यक्तियों के ख़िला़फ जनहित याचिका ख़ारिज़ कर दी है.

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प्रशासनिक अनुशासनहीनता और अराजकता का चरम दौर

मध्य प्रदेश में इन दिनों शासन-प्रशासन में अनुशासनहीनता और अराजकता का चरम दौर चल रहा हैं. मंत्री आपस में एक दूसरे को नीचा दिखा रहे हैं, तो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे तत्व सरकारी कर्मचारी, विधायकों और मंत्रियों से खुलकर लड़ झगड़ रहे हैं.

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नौकरशाहों की लोकतंत्र में आस्था नहीं

देश के आला अफसरों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई आस्था नहीं है. नौकरशाह मनमाने ढंग से प्रशासन चलाना चाहते हैं और चला भी रहे हैं. संवैधानिक बाध्यता के कारण विधानसभा एवं मंत्री परिषद आदि संस्थाओं की कार्यवाही में वे औपचारिकता ही पूरी करते हैं.

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महिला-बाल व्‍यापार का बढ़ता जाल

बाज़ारवाद के इस युग में मनुष्य भी बिकाऊ माल बन गया है. बाज़ार में पुरूष की ज़रूरत श्रम के लिए है, तो वहीं स्त्री की ज़रूरत श्रम और सेक्स दोनों के लिए है. इसलिए व्यापारियों की नज़र में पुरूष की तुलना में स्त्री कहीं ज़्यादा क़ीमती और बिकाऊ है. राजधानी भोपाल की 66 बालिकाएं और 70 बालक ऐसे हैं जिनका पिछले एक साल से कोई अता-पता नहीं है.

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अदानी समूह पर सरकार मेहरबान

मध्य प्रदेश सरकार राज्य में बिजली संकट और कोयला संकट से निपटने के लिए जिस उदारता से निजी क्षेत्र का सहयोग लेती आई है, उससे घपले, घोटाले और भ्रष्टाचार के संदेह जन्म लेने लगे हैं. विशेष रूप से गुजरात के अदानी उद्योग व्यापार समूह पर सरकार की अति मेहरबानी अनेक रहस्यों और संदेहों की अनकही कहानी बयां करती है.

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नर्मदा घाटी में कभी उड़ते थे डायनासोर

धरती का सबसे प्राचीन अतिविशालकाय जीव डायनासोर, जीव विज्ञानियों और धरती के इतिहासकारों के लिए रहस्यमय प्रजाति बना हुआ है. लगभग 6 से साढ़े 6 करोड़ साल पहले धरती पर विचरण करने वाले इन जीवों को लेकर सदियों से जीव विज्ञानी और प्राणी शास्त्री अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन यह अध्ययन आज तक पूरा नहीं हुआ है, क्योंकि दुनिया में जब तब डायनासोर के जीवाश्म मिलने से इस जीव के बारे में नये रहस्यों का खुलासा होने लगता है.

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भ्रष्टाचार के महासागर की छोटी मछलियों का शिकार

मध्य प्रदेश सरकार ने भ्रष्टाचार से हो रही बदनामी से त्रस्त होकर प्रशासन को सा़फ-सुथरी छवि देने का अभियान चला रखा है. पिछले दिनों राज्य भर में साठ से अधिक छोटे कर्मचारी दंडित किए जा चुके हैं. अब तक पुलिस आरक्षक, पटवारी, कार्यालयों के बाबू एवं वनरक्षक जैसे छोटे कर्मचारी रिश्वत लेते या जबरन उगाही करते पकड़े गए और उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया गया.

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कांग्रेस निजी स्‍वार्थों की पूर्ति में उलझी

कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी मध्य प्रदेश को राष्ट्रीय राजनीति में कितना महत्वपूर्ण मानते हैं, इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि यहां टुकड़ों में विभाजित कांग्रेस को एकत्र कर पाने की कोई पहल किसी स्तर पर नहीं की जा रही. मध्य प्रदेश कांग्रेस इन दिनों अलग-अलग धड़ों में विभाजित है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी अपने पांच भक्तों के साथ कांग्रेस को पार लगाने का असफल प्रयास कर रहे हैं. दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपनी संन्यास की राजनीति को मध्य प्रदेश में पुन: वापसी की संभावनाओं के साथ जोड़कर चल रहे हैं.

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स्‍वर्णिम मध्‍य प्रदेश सिर्फ एक सपना है

स्‍वर्णिम मध्य प्रदेश की योजनाओं के तहत मध्य प्रदेश सरकार पर 58000 करोड़ रूपए का क़र्ज़ हो चुका है और उस पर 6500 करोड़ का ब्याज भी च़ढ चुका है. प्रदेश में बच्चों के प्रति अपराधों का ग्राफ चढ़ता ही जा रहा है. राज्य में 40 से अधिक सांप्रदायिक घटनाएं हुई हैं, सरकार की देनदारियों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. महिलाओं और कमज़ोर तबके पर बढ़ते अपराध और अत्याचार, प्रशासनिक स्तर पर वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के भ्रष्टाचारों का खुलेआम नज़र आना. यह सब मिलकर प्रदेश के मनोरम स्वप्न को एक डरावनी हक़ीक़त का रूप देते हैं.

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स्वर्णिम नहीं, भ्रष्टतम राज्य कहिए

मध्य प्रदेश में प्रत्येक नागरिक भ्रष्टाचार के बीच जन्म लेता है, भ्रष्टाचार के बीच ही पलता और बड़ा होता है और भ्रष्टाचार को भोगते हुए मर भी जाता है. लेकिन मरने के बाद भी भ्रष्टाचार से उसका पीछा नहीं छूटता. यह किसी दार्शनिक का चिंतन वाक्य नहीं है, बल्कि मध्यप्रदेश के नागरिकों का भोगा हुआ यथार्थ है.

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हॉकी के सहारे राजनीति की कोशिश

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री इन दिनों सामान्य राजनीतिक परिस्थितियों में भी असामान्य राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं. उन्होंने मध्य प्रदेश बनाओ यात्रा एवं भारतीय हॉकी टीम के माध्यम से राज्य स्तर पर अपनी पकड़ मज़बूत करने और राष्ट्रीय स्तर पर एक नई छवि बनाने का प्रयास शुरू कर दिया है.

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राजनीतिक दलों के दावों की पोल खाली पंचायत चुनावों में एक लाख पदों के लिए चुनाव नहीं

देश के विभिन्न राजनीतिक दल गांव-गांव तक अपनी पहुंच बताते हैं. इस आधार पर पार्टी का व्यापक जनाधार होने की बात करते हैं. लेकिन, क्या यह हक़ीक़त है? सच कहें तो उनके दावों को पूरी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता. मध्य प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतीराज संस्थाओं के लिए चुनाव शुरू हो गए हैं. इन चुनावों के लिए दाखिल नामांकन पत्रों का विश्लेषण करने से राज्य में राजनीतिक दलों के संगठनात्मक आधार की पोल खुल गई है.

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आंकड़ेबाज़ी नहीं, विकास कीजिए

किसी भी राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले आंकड़े हमेशा विकास की एक अकल्पनीय कहानी होते हैं. इनमें सत्यता का प्रतिशत यह तय करता है कि सरकार की नीयत नागरिकों के प्रति कितनी सा़फ है. मध्य प्रदेश सरकार द्वारा करोड़ों रुपये के विज्ञापनों के माध्यम से अब तक जारी किए गए आंकड़े ज़मीनी हक़ीक़त से कहीं दूर हैं.

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महिला सरपंचों पर अत्‍याचार

बात स़िर्फ किसी महिला की प्रताड़ना, अपमान अथवा तिरस्कार की नहीं है. विचारणीय तथ्य यह है कि महिला सरपंच किसी पंचायत का प्रतिनिधित्व करती है, जो लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है. किसी सरपंच का अपमान गांधी जी के उस सपने का अपमान है, जो उन्होंने पंचायती राज के ज़रिए देखा था.

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मध्‍यप्रदेश और भ्रष्‍टाचार के नज़ारे

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल, इंडिया की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश को कई वर्षों से लगातार देश के अतिभ्रष्ट राज्यों की बिरादरी में शामिल किया जाता रहा है, लेकिन राज्य सरकार के कर्णधारों और समाज के ठेकेदारों को अपनी बदनामी का यह प्रमाणपत्र देखकर भी शर्म नहीं आती.

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बैगा आदिवासियों के नाम पर करोडों की लूट

करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी मध्य प्रदेश में आदिवासी बैगा जनजाति अभी भी भुखमरी की शिकार है. एक अनुमान के अनुसार, सरकार की ओर से अब तक जितना अनुदान बैगा जनजाति के कल्याण कार्यों के लिए मिला है, यदि उसे बैगा परिवारों में बांट दिया जाता तो प्रत्येक परिवार को लगभग साढ़े सात लाख रुपये अपनी हालत सुधारने के लिए सीधे मिल सकते थे. सरकारी तंत्र ने बैगाओं के नाम पर केंद्र सरकार द्वारा आवंटित धनराशि पिछले डेढ़ दशक के दौरान जमकर लूटी.

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