अपने ही सांसदों से जदयू हलकान

जनता दल यू के दो लोक सभा सदस्य डा. जगदीश शर्मा (जहानाबाद) और पूर्णमासी राम (गोपालगंज) पार्टी के लिए परेशानी का कारण बने हुए हैं. यह जदयू के परिवारवाद विरोधी रुख़ के कारण हो रहा है. देखना है कि नीतीश कुमार अपने इन दबंग सांसदों से कैसे निपटते हैं.

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उपचुनाव तय करेंगे बिहार की दिशा

जन समर्थन की दृष्टि से कांग्रेस बिहार में आगे जाएगी या पीछे हटेगी? अगले महीने राज्य विधानसभा के 18 क्षेत्रों में होने वाले उपचुनाव के नतीजे इस सवाल का जवाब दे देंगे. बिहार विधानसभा के कई सदस्यों के हाल में लोकसभा के लिए चुन लिए जाने व कुछ अन्य विधायकों द्वारा दल-बदल किए जाने के कारण ये सीटें खाली हुई हैं.

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नीतीश को भी कहना प़डा जार्ज की जय

जार्ज फर्नांडीस के राज्यसभा का सदस्य बन जाने पर अधिकतर लोग ख़ुश हैं. जार्ज भी ख़ुश हैं. प्रसन्न जार्ज ने 31 जुलाई को पटना छोड़ते समय सबको थैंक यू कहा. वैसे जनता दल-यू के ऐसे कुछ नेता अवश्य उदास हैं, जिनकी ख़ुद की या फिर जिनके समर्थकों-मित्रों की नज़रें इस सीट पर थीं.

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अपनी भविष्यवाणी याद कीजिए प्रधानमंत्री जी

विधायक व सांसद क्षेत्र विकास निधि की शुरुआत की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. 1993 में शेयर दलाल हर्षद मेहता को लेकर राम जेठमलानी ने आरोप लगाया था कि उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव को एक करोड़ रुपये की रिश्वत दी.

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सांसद-विधायक फंड में फंस गई नीतीश सरकार

विधायक व सांसद क्षेत्र विकास निधि की उपयोगिता को लेकर बिहार में इन दिनों बहस चल रही है. इस बहस की शुरुआत हाल ही में बिहार विधानसभा में हुई. अब इस बहस को राज्य का मीडिया भी चला रहा है. चौक-चौराहों पर भी इस फंड के गुण-दोष को लेकर जनता में चर्चा तेज़ है

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गलत रणनीति के कारण बिहार में कांग्रेस का बंटाढार

कांग्रेस ने बिहार में कभी लालू प्रसाद के कथित ‘जंगल राज’ का लगातार साथ देकर ग़लती की और अब वह लालू से दूर हटकर ग़लती कर रही है. अपनी ग़लतियों के कारण लगातार दुबलाती और कुम्हलाती बिहार कांग्रेस यदि अब यह समझ रही है कि वह अकेले अपने बल पर कांग्रेस को बिहार में ताक़तवर बना सकती है, तो वह इस बार भारी ग़लतफहमी में है.

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अपनी हार का मतलब समझिए लालूजी

अति पिछड़ों के लिए आरक्षण, कानून-व्यवस्था में भारी सुधार और विकास योजनाओं की धमाकेदार शुरुआत ने बिहार में राजग को बड़ी चुनावी जीत दिला दी. इसके अलावा नीतीश कुमार का महादलित कार्ड और पसमांदा मुस्लिम के लिए उनकी सरकार की कल्याण योजनाओं की भी इस चुनाव में भूमिका रही.

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बाहुबल का ज़ोर

राजनीति के चतुर खिलाड़ी लालू प्रसाद और रामविलास पासवान की चतुराई इस चुनाव में कसौटी पर है. बिहार में वे अपने हिसाब से अत्यंत होशियारी से तैयार की गई अपनी राजनीतिक व चुनावी व्यूह रचना के साथ चुनाव मैदान में हैं. इस बार उन्हें अपनी पिछली 29 सीटें बचाने के लिए काफी जद्दोज़हद करनी पड़ रही है, क्योंकि बेहतर क़ानून व्यवस्था और दिखाई पड़ने वाले विकास कार्यों के साथ चुनाव मैदान में जमे नीतीश कुमार से उनका कड़ा मुक़ाबला है. लालू प्रसाद को पहली बार बिहार में सत्ताविहीन होकर चुनाव लड़ना पड़ रहा है.

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