प्राकृतिक रेशों का ताना बाना

उत्तर में जबलपुर और दक्षिण में गोंदिया एवं बालाघाट के बीच स्थित है एशिया का सबसे बड़ा नैरोगेज स्टेशन नैनपुर. उत्तर भारत के सूखाग्रस्त इलाक़े से दूर झिरझिराती बारिश की नन्हीं बूंदें नर्मदांचल की भूमि को तर कर रही थीं. धरती पर बिछी हरी घास की चादर, नीरवता से ओतप्रोत गहरी घाटियां, बचे-खुचे जंगल, उफनते बरसाती नाले और नदियां, छाता लेकर खेतों में काम करती जनजातीय महिलाएं, दूर शांत पहाड़ की तलहटी में झोपड़ियों के झुरमुट, छोटे-छोटे स्टेशनों पर बरसात के बीच चाय सुड़कते हुए लोग एवं स्थानीय जनजीवन की झलकी अनायास ही मन मोह लेती है.

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फ्लोरेंस नाइटिंगल की विरासत

कई सालों तक मुख्यभूमि से दूर अंडमान के छोटे से टापू पर घने जंगल में आदिम जनजातियों के लोगों के साथ रहने के बाद शांति टेरेसा लाकरा अब धाराप्रवाह ओंगी भाषा बोलती हैं. फिलहाल वह ओंगी लोगों के साथ नहीं रहतीं, लेकिन पोर्ट ब्लेयर स्थित जी बी पंत अस्पताल के ट्राइबल वार्ड में इलाज के लिए आने वाले ओंगी जब शांति को देखते हैं तो उनके चेहरे पर ख़ुशनुमा मुस्कान तैर जाती है.

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अंडमान में खाद्य प्रसंस्‍करण की पहल

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पर्यावरणीय संतुलन क़ायम रखने के लिए कुछ समय पूर्व न्यायालय ने वनों की कटाई पर रोक लगा दी थी. लंबे समय तक काष्ठ उत्पादों के निर्माण से जुड़े लोगों के सामने ऐसे में रोजी-रोटी का संकट आ खड़ा हुआ.

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अंडमानी समाज और प्रवासी जनजातियों का जीवन

भारत की मुख्य भूमि से क़रीब 1200 किलोमीटर की दूरी पर बंगाल की खाड़ी के हृदय में स्थित अंडमान एवं निकोबार के कुल 572 द्वीपों की श्रंखला और उसकी भौगोलिक बनावट किसी सपनों की दुनिया से कम नहीं है.

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खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योग और ग्रामीण आत्‍मनिर्भरता

भारत गांवों का देश है, जिसकी अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि को माना जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि एक ओर जहां किसानों को बेहतर उत्पादन होने पर भी फसल की कम क़ीमत मिलती है, वहीं दूसरी तऱफ कम उत्पादन होने पर भी उन्हें घाटे का सामना करना पड़ता है.

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संकट में आंवला कारोबार

भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय भले ही आंवला खाओ-आंवला लगाओ के नाम से देश भर में इसके प्रचार-प्रसार की बात कर रहा हो, लेकिन उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले के आंवला उत्पादक किसान एवं व्यवसायी दिनेश शर्मा पिछले कुछ वर्षों से बेहतर उत्पादन के बावजूद आंवला कारोबार में हो रहे उतार-चढ़ाव को लेकर ख़ासे चिंतित नज़र आते हैं.

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स्‍कूलों में बच्‍चों की सुरक्षा का सवाल

हाल में उड़ीसा विधानसभा में एक ऐसे मुद्दे को लेकर गहमागहमी बढ़ गई, जिसका सीधा संबंध ग़रीब आदिवासियों की बेबसी और लाचारी की आड़ में उनके शोषण से जुड़ा था. राज्य सरकार द्वारा संचालित जनजातीय विद्यालय, जो ग़रीब एवं पिछड़े आदिवासी छात्रों को शिक्षा का उजाला दिखाने के लिए खोले गए थे, उनके उत्पीड़न का केंद्र बन गए.

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समान शिक्षा प्रणाली ही चाहिए

केंद्र सरकार जनता को गुमराह करने के लिए धन की कमी का हवाला देकर कारपोरेट एवं ग़ैर सरकारी संगठनों की लॉबी से सांठगांठ करने में जुटी हुई है. इससे भविष्य में ग़रीब एवं अमीर के बीच की खाई गहराने के संकेत स्पष्ट नज़र आ रहे हैं. यदि इसी तरह चलता रहा तो आने वाले समय में यह सामाजिक विषमता विद्रोह का रूप धारण कर सकती है.

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हमारे लिए आजादी हमारी कमाई है

करीब 60 वर्षीय अब्दुल सलाम मुंडु को देखकर यह नहीं समझ में आता कि झुर्रियां उनके चेहरे पर हैं या फिर उनका चेहरा ही झुर्रियों के बीच है. इतने पर भी मुंडु की हाज़िरजवाबी और बेबाकी देखते ही बनती है, झूठ नहीं बोलता साहब, आपसे औरों की तरह 400 या 500 नहीं लूंगा. स़िर्फ 150 रुपये दे देना, हम आपको पूरा डल लेक दिखाएगा.

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राजस्‍थान की खिड़की नवलगढ़

बावड़ियां, जोहड़, छतरियां, किले, मंदिर, सुंदर हवेलियां एवं उनकी कहानियां. हवेलियों की दीवारों पर छिटके रंग. आलों में बिखरे रंग. झरोखों से झांकते रंग. हरा, नीला और पीला रंग. रंगों के समुच्चय के बीच उकेरी गई तस्वीरें. हर तस्वीर का एक अलग अंदाज़. एक अलग संदेश. विशाल दरवाज़ों पर सुंदर नक्काशी और धातुओं की बारीक़ सजावट. संकरी गलियां और उनमें पसरा अपनापन. नवलगढ़ के ग्रामीण क़स्बाई लोकजीवन की यह एक छोटी सी झलक भर है.

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चांदोनी ग़ढी गांव की चमक का राज़

मध्य प्रदेश के रायसेन ज़िले के गैरतगंज ब्लॉक का चांदोनी गढ़ी गांव कभी देश के उन तमाम दूसरे गांवों से भिन्न नहीं था, जो आज भी ग़रीबी और उपेक्षा के शिकार हैं. और, जहां पैदा होते ही किसी के हिस्से में आ जाता है अभाव एवं तिरस्कार भरा जीवन.

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सिरसिया गांव के लोग अब आत्मनिर्भर हैं

स्वरोज़गार के सफल प्रयोग ने पलायन के कारण उजड़ते गांव नगला सिरसिया (भरतपुर) को एक बार फिर से आबाद कर दिया है. इसका श्रेय वहां के धाकड़ जाति के पुरुषों एवं महिलाओं को जाता है.

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सरसों के फूलों से शहद का उत्पादन

भरतपुर के किसानों ने सरसों की खेती के साथ ही शहद उत्पादन के रूप में एक साहसिक क़दम उठाया है. बस उन्हें सरकारी संरक्षण-प्रोत्साहन की ज़रूरत है. अगर ऐसा हो जाए तो वे इस क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन कर सकते हैं.

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पपीते ने दी पहचान

राजस्थान में भरतपुर ज़िले की वैर तहसील के किसान यह अच्छी तरह से समझ चुके हैं कि परंपरागत फसलों की खेती से भोजन की आवश्यकता तो पूरी की जा सकती है, लेकिन बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, शादी-ब्याह एवं अन्य खर्चों को पूरा करने के लिए इन पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. शायद यही कारण था कि रेतीली धरती के इन रणबांकुरों ने अपने जीवन की बेहतरी के लिए परंपरागत खेती के साथ-साथ हॉर्टीकल्चर को भी अपनाना शुरू कर दिया. मौसमी परिस्थितियों, भूमि की गुणवत्ता और बाज़ार की स्थिति को ध्यान में रखकर स्थानीय किसान फल, फूल एवं औषधीय पौधों की खेती लंबे समय से कर रहे हैं, जिससे खेती से प्राप्त होने वाले मुना़फे में न केवल वृद्धि हुई है, बल्कि लोगों के जीवन स्तर में भी सुधार आया है.

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साकार हुआ सपना

स्थानीय लोगों की मानें तो चार साल में औसतन यहां मात्र एक फसल होती थी. दूरदराज की ढाणियों और गांवों में बसे किसान परिवारों का जीवनयापन मुश्किल हो गया था,

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‘परदेस’ जाने की मजबूरी खत्म

उदारीकरण के बाद आज जब ग्रामीण उद्योग-धंधे चौपट होते जा रहे हैं और कृषि भी संकट के दौर से गुज़र रही हो तो ग्रामीण बेरोज़गारों का शहरों की ओर पलायन एक स्वाभाविक सी बात हो जाती है, लेकिन गुजरात के मोरकंडा गांव के ग्रामीण आज अपने घर-परिवार के साथ रहकर अच्छी आमदनी अर्जित कर रहे हैं. इस तरह मोरकंडा के गंवई परिवेश के लोगों के लिए रोज़ी-रोटी की तलाश में घर-परिवार छोड़कर शहरों के निष्ठुर वातावरण में जाने और काम करने की मजबूरी समाप्त हो रही है.

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विकास की बलि चढ़ता पर्यावरण

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव सर पर आ चुके हैं और इस चुनाव में बिजली की भीषण कटौती एक बड़ा मुद्दा है. इसी बात को लेकर प्रदेश सरकार बिजली के नाम पर जैव-विविधता और पर्यावरण को नष्ट करने पर आमादा है. सरकार बिजली के मसले पर संजीदगी दिखाकर जनता की सहानुभूति हासिल करने की मंशा रखती है.

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तुलसी माला ने बनाया आत्मनिर्भर

भरतपुर जिले के बहताना गांव की महिलाओं की ज़िंदगी तब तक गांव-देहात की सामान्य महिलाओं की तरह ही हुआ करती थी, जब तक कि उन्होंने तुलसी माला उत्पादन के गुर नहीं सीख लिए थे. आज बहताना की महिलाएं आत्मनिर्भरता की ओर क़दम बढ़ा रही हैं.

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