नए साल में होंगे नए सियासी पैंतरे

उत्तर प्रदेश की सियासत में नए वर्ष 2011 का आगाज़ सियासत की शतरंजी चालों से होगा. बसपा सरकार अपनी छवि सुधारने और जनहित में कराए गए कार्यों के महिमा मंडन करने की शुरुआत करेगी तो विरोधी उसमें मीन मेख निकालेंगे.

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नसों में घुल रहा है आर्सेनिक का जहर

आर्सेनिक के विष से अकेले उत्तर प्रदेश की जनता ही जानलेवा बीमारियों का शिकार नहीं रही है बल्कि बिहार और पश्चिम बंगाल में इसका कहर और अधिक है. चिकित्सकों की मानें तो आर्सेनिक युक्त पानी लंबे समय तक पीने से कई भयंकर बीमारियां शरीर को दबोच लेती हैं. त्वचा का कैंसर हो सकता है.

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उतर प्रदेशा का सियासी महाभारत : उमा बनेंगी सारथी

उत्तर प्रदेश के चुनावी महाभारत में भाजपा को उमा भारती के रूप में सारथी कृष्ण तो मिल गए, लेकिन अभी उसे पांडवों को एकजुट करना होगा. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पार्टी को अर्जुन की तलाश करनी होगी, अन्यथा सत्ता रूपी मछली की आंख वेधने का सपना पूरा नहीं हो सकेगा. पहले प्रदेश भाजपा के पांडव कल्याण सिंह, कलराज मिश्र, लालजी टंडन, ओम प्रकाश सिंह और राजनाथ सिंह हुआ करते थे, लेकिन अब ये बिखर चुके हैं. कल्याण भाजपा के साथ नहीं हैं. राजनाथ सिंह राष्ट्रीय राजनीति में जम चुके हैं. कलराज और लालजी टंडन भी खुद को राष्ट्रीय नेता ही मानते हैं. ऐसे में उमा का साथ कौन देगा, कौन उनकी बात मानेगा, यह विचारणीय है. इसमें कोई शक नहीं कि उमा सारथी की भूमिका अच्छी तरह से निभाएंगी, लेकिन युद्ध जीतने के लिए योद्धा भी ज़रूरी हैं, जो फिलहाल उत्तर प्रदेश में पार्टी के पास दिखाई नहीं देते. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा के पास अब कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जो उसे सत्ता में वापस ला सके. वैसे उत्तर प्रदेश में भाजपा के पास बड़े नामों एवं चेहरों की कमी नहीं है. मुरली मनोहर जोशी, मुख्तार अब्बास नकवी, विनय कटियार, मेनका गांधी एवं वरुण गांधी उत्तर प्रदेश से ही हैं, लेकिन इनमें वरुण को छोड़कर कोई आक्रामक नहीं दिखता. अब भाजपा को यह तय करना होगा कि वह किसे अर्जुन के रूप में उमा के साथ उतारेगी.

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आजम सपा में पर मुसलमान कहां

समाजवादी पार्टी में वापसी के बाद आजम खान ने भले ही अमर सिंह पर निशाना साधा हो, लेकिन उन्हें अब यह भी साबित करना होगा कि उत्तर प्रदेश के मुसलमान आज कहां और किसके साथ खड़े हैं. राजनीति में दोस्ती-दुश्मनी का खेल चलता रहता है, जिसके नफे-ऩुकसान को आम मतदाता, खासतौर पर मुस्लिम समाज अच्छी तरह से समझने लगा है. बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम इसका सबूत हैं. आजम खान की वापसी के बाद मुलायम सिंह यादव, शिवपाल, अखिलेश यादव समेत तमाम नेता ऐसे प्रफुल्लित हैं, मानों समूचा मुस्लिम वोट बैंक पार्टी की झोली में आ गिरा है. सपा के यह खेवनहार लोकसभा चुनाव में रामपुर सीट से जयाप्रदा की शानदार जीत का दृश्य शायद भूल जाते हैं. आजम खान के लाख विरोध करने के बावजूद रामपुर के मुसलमानों ने जयाप्रदा को लोकसभा पहुंचा कर ही दम लिया था. अब सवाल यह है कि जब आजम खान अपने ही घर में प्रभावी नहीं रहे तो वह समूचे उत्तर प्रदेश में मुसलमानों पर कितना प्रभाव छोड़ सकेंगे. वह भी उन परिस्थितियों में, जब मुस्लिम समाज के राजनीतिक मसलों के साथ-साथ प्राथमिकताएं एवं समस्याएं भी बदल चुकी हैं. आम मुसलमान बाबरी मस्जिद की शहादत जैसे भावनात्मक मुद्दों के साथ ही अब शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में हिस्सेदारी के मसले पर भी गंभीर है.

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कोई सुरक्षित नहीं

उत्तर प्रदेश में आम आदमी के साथ मंत्री, सांसद, विधायक और सरकारी अधिकारी-कर्मचारी भी सुरक्षित नहीं हैं. आपराधिक घटनाओं के सरकारी आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं. एक जनवरी, 2010 से 30 सितंबर, 2010 के दौरान नौ माह में प्रदेश में 3123 लोगों की हत्या कर दी गई.

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उत्तर प्रदेश में भाजपाः अब भी न चेते तो कुछ न बचेगा

बात 1991 की है, उत्तर प्रदेश में भगवा लहर चल रही थी और सूबे के चुनावी इतिहास में यह पहली बार हुआ था कि भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाई. सभी नेता खुश थे, कार्यकर्ता प्रफुल्लित थे, कहीं कोई गुटबाजी नहीं.

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अमर सिंह का सियासी सफर

पंचायत चुनाव खत्म होने के बाद बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी में ज़ुबानी जंग छिड़ी है. दोनों ही दल दावा कर रहे हैं कि चुनाव में उनके समर्थक सबसे अधिक संख्या में जीते हैं. अब असलियत क्या है, यह तो इन पार्टियों के नेता ही जानें.

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माया कैसे तोड़ेंगी इतने मंदिर-मस्जिद!

अयोध्या मसले पर हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने फैसले के क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी केंद्र के माथे मढ़ दी. साथ ही धमकी दी कि अगर प्रदेश में क़ानून व्यवस्था बिगड़ती है तो केंद्र ज़िम्मेदार होगा. मायावती ने यह बात अयोध्या के संदर्भ में तो कह दी थी, लेकिन क्या वह सार्वजनिक स्थलों पर बने 45 हज़ार से अधिक अवैध धार्मिक स्थलों के मामले में भी ऐसा कह सकेंगी?

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