पश्चिम बंगालः बदलाव की बयार और वाममोर्चा

राज्य विधानसभा चुनाव के इस आख़िरी दौर में नए-नए मुद्दों के ज़रिए राजनीतिक पैतरेबाज़ी के नित नए-नए रूप देखने को मिल रहे हैं. काला धन और भ्रष्टाचार का मुद्दा तो पूरे देश में दौड़ रहा है, पर बंगाल में आवासन मंत्री गौतम देव ने तृणमूल पर काला धन जुटाने का आरोप लगाकर चुनाव प्रचार को एक नई रंगत दे दी है.

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पश्चिम बंगालः अब तो फैसले की घडी़ है

विधानसभा चुनाव अब आख़िर मुक़ाम पर हैं. फैसले की घड़ी क़रीब है. दो-तीन सालों के रुझानों और उम्मीद के आधार पर हम एक निष्कर्ष तक पहुंचते रहे हैं, पर मामला स़िर्फ 5-7 प्रतिशत वोटों के इधर-उधर होने का है. राष्ट्रीय और प्रांतीय नेताओं द्वारा धुआंधार प्रचार जारी है.

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पश्चिम बंगालः नया इतिहास गढ़ने की तैयारी

चुनावी मौसम में मुद्दों का क़ब्रिस्तान खोद डालने का रिवाज नया नहीं है और जब मुक़ाबला ऐतिहासिक रूप से कांटे का हो तो उन मुर्दों के कंकाल से विरोधियों को डराने की कोशिश भी होती रही है. पश्चिम बंगाल में भी 17 सालों से द़फन एक मामले में ममता के ख़िला़फ जारी वारंट प्रकट हुआ है.

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पश्मिच बंगालः ममता युवाओं में आस जगाएंगी

गर्द के ग़ुबार में आग की तस्वीरें धुंधली दिखती हैं, पर वह आग अगर किसी इंसान की देह में लगी हो तो किसी भी दर्शक की संवेदनाओं के कोमल तंतु को झुलसाने के लिए का़फी हैं. बंगाल में इस समय चुनावी गर्द का कोहरा है और प्रसून दत्ता जैसे बेरोज़गार युवक द्वारा आत्मदाह की कोशिश, वह भी बंगाल की उम्मीद ममता बनर्जी के घर के सामने, एक राष्ट्रीय मुद्दा बनती है.

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पश्चिम बंगालः वाममोर्चा की विदाई आसान नहीं

यह एक महज़ संयोग नहीं था कि जिस दिन बिहार विधानसभा चुनावों के परिणाम आ रहे थे, ठीक उसी दिन बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने राज्य में पंचायतों की 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का फैसला लिया. तमाम झिझक के बावजूद बांग्ला मीडिया के एक हलके में इस बात पर चर्चा हुई कि कामयाबी का बिहार मॉडल बंगाल में भी कारगर हो सकता है.

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पश्चिम बंगालः ममता जी, आपका एक्‍शन प्‍लान क्‍या है

बंगाल के बाहर के लोग नहीं जानते हैं कि ममता बनर्जी ने हावड़ा से सिंगुर तक आंदोलन नामक एक लोकल ट्रेन भी चला रखी है. यह ख़ासकर ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को याद दिलाते रहने के एक प्रतीक की तरह है कि उनके भूमि आंदोलन ने जो जंग जीती है, उसे आगे भी जारी रखना होगा और नैनो के बाद अब वाममोर्चे को लालकिले से बेदख़ल करना होगा.

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बंगाल ने बढ़ाई चुनाव आयोग की चिंता

बंगाल की लड़ाई के मैदान में आजकल मेडिकल टीमों के दौरे तो ख़ूब हो रहे हैं, पर युद्ध विराम का कोई संकेत नहीं मिल रहा है. हत्याओं के बाद परिजनों के आंसू पोछने के लिए सत्तारूढ़ एवं विपक्षी दलों के नुमाइंदे तांता लगाए हुए हैं तो संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल यह जान रहे हैं कि हालात कैसे हैं? उधर चुनावी चिंता में दुबले हो रहे चुनाव आयोग की टीमें भी गांवों की धूल फांक रही हैं.

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और लाल होगी बंगाल की धरती

कविता-नया साल मैंने कई साल पहले लिखी थी. ये उसी की शुरुआती लाइनें हैं. वह कोई साल होगा, जब नए साल कासूरज हिंसा एवं रक्तपात से गीली हुई धरती के क्षितिज पर उगा होगा. बंगाल के मौजूदा हालात पर यह कविता बिल्कुल फिट बैठती है.

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पश्‍चिम बंगालः राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का कुरूप चेहरा

सत्ता के बदलाव के मुहाने पर खड़े पश्चिम बंगाल में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब पूरी तरह गलाकाट दुश्मनी का रूप ले चुकी है. दलों के शीर्ष नेताओं का आचरण देख कार्यकर्ता और भी उत्साहित हो रहे हैं. खासकर माकपा और तृणमूल कॉडरों के बीच खूनी जंग थमने का नाम नहीं ले रही है. सचमुच ऐसा शायद ही किसी राज्य में दिखता हो कि मुख्यमंत्री और विपक्ष का सर्वोच्च नेतृत्व हर क़ीमत पर एक-दूसरे से आंख मिलाने से परहेज करता हो.

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पूरब न जइयो सइयां, चाकरी नहीं हैः औद्योगिक बदहाली से प्रवासियों का बुरा हाल

यह दौर था 30-40 साल पहले का, जब बिहार-उत्तर प्रदेश में महेंद्र मिश्र की यह पूरबी ख़ूब गाई जाती थी. नाच या नौटंकी में इस तरह के गाने चलते थे. उस जमाने में कमाई के लिए पूरब का क्रेज़ था और प्रवासी श्रमिक सतुआ-भूजा की गठरी लेकर निकल पड़ते थे श्रमसंधान के लिए. उनका रुख़ पूरब की ओर यानी असम व पश्चिम बंगाल की ओर होता था.

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राहुल के बंगाल दौरे से राजनीति गरमाईः कांग्रेस और तृणमूल के बीच जंग छिड़ी

क्‍या मैं आपको चिड़िया जैसा दिखता हूं? कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने कोलकाता में ख़बरनवीसों से जब यह बात पूछी तो सभी सकपका गए. हालांकि इशारा समझते उन्हें देर नहीं लगी. 15 से 17 सितंबर तक बंगाल में राहुल के तूफानी दौरे के ठीक एक दिन पहले सिलीगुड़ी में ममता बनर्जी ने कहा था, हम वसंत की कोयल नहीं हैं.

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पश्चिम बंगालः राजनीतिक उठापटक का दौर जारी

देश में माओवादियों के ख़िला़फ चल रही जंग को बंगाल की राजनीतिक उठापटक ने काफ़ी उलझा दिया है. आदिवासियों के हितैषियों एवं मानवाधिकारों के बड़े-बड़े झंडाबरदारों का मुखौटा उतर रहा है. बंगाल में हो रही इस हलचल का ख़ामियाज़ा देश के दूसरे हिस्सों को भी भुगतना पड़ रहा है.

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तस्‍करी की शिकार महिलाओं का पुनर्वास कैसे हो?

यह कविता (बांग्ला से अनुवाद) है यौवन की दहलीज पर खड़ी चांदनी की, जो कोलकाता के एक होम में अपनी नई ज़िंदगी के सपने के साथ खुले आकाश में उड़ना चाहती है. चांदनी जैसी लाखों लड़कियां देश भर के सैकड़ों सरकारी और ग़ैर सरकारी होम या सुधारगृहों में बैठकर सपने बुनती हैं, पर कितनों को उज्ज्वल भविष्य की सौगात मिलती है, इस पर बहुतों का ध्यान नहीं जाता.

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माओवादियों के खिलाफ लालगढ़ की महिलाएं

जीत के लिए चल रही एक लंबी ख़ूनी लड़ाई से जूझ रहे लालगढ़ का एक नया चेहरा सामने आ रहा है. महीनों से चल रहे संयुक्त बलों के अभियान ने माओवादियों की कमर तो तोड़ ही दी है, अब आम जनता के सड़क पर उतरने से सुरक्षाबलों का हौसला और बुलंद हो गया है.

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बदलता बंगाल

यह महज़ एक संयोग था कि जिस दिन बंगाल के स्थानीय निकाय चुनावों उर्फ सेमी फाइनल के परिणाम आ रहे थे, उसी दिन गुजरात के साणंद में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी नैनो की पहली खेप को फीता काटकर रवाना कर रहे थे.

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गोरखा राजनीति का एक तालिबानी चेहरा

उनका यक़ीन है कि वे मुझे चुप करा सकते हैं, मगर यहां तक कि अगर कल मैं मर जाता हूं तो कब्र से भी आवाज़ दूंगा. मुझे जिस विचार पर विश्वास है, उसका त्याग मैं इतनी आसानी से नहीं करूंगा. मैं पूरी ताक़त से आवाज़ दूंगा, जगो जगो! केवल तुम्हीं हो, जिसमें एक बेहतर गोरखालैंड बनाने की ताक़त है.

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कांग्रेस और तृणमूलः टूट गया गठबंधन

कोलकाता नगर निगम चुनावों में महज़ 10 सीटों को लेकर तृणमूल और कांग्रेस के बीच गठबंधन टूट गया है. इसके साथ ही बाक़ी 80 नगर पालिकाओं पर भी तिकोनी-चौकोनी लड़ाई तय है. आगामी विधानसभा चुनावों की हवा बनाने के लिए इन चुनावों के परिणाम काफी अहम होंगे.

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उत्तर भारत बांग्‍लादेशी दुल्‍हनों का बड़ा बाजार

मां तुम मुझे अब कभी नहीं देख सकोगी. मुझे भूल जाओ. सोच लो कि तुम्हारी बेटी नज़मा अब मर गई. मैं अपने बच्चों को नहीं छोड़ सकती और वे यहां आ नहीं सकते. वे तुम्हें कभी नानी नहीं कह पाएंगे. मेरी ज़िंदगी नर्क हो गई है, पर मैं कुछ नहीं कर सकती, उक्त उद्गार हैं उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में ब्याही तहमीना नामक दुल्हन के, जो सात साल पहले अपनी मां से मिलने बांग्लादेश लौटी थी.

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पश्चिम बंगाल बना दुल्‍हनों का बाजार

बंगाल के सीमावर्ती ज़िलों में ओ पार यानी बांग्लादेश से लाई जाने वाली लड़कियां कटी पतंग की तरह होती हैं, जिन्हें लूटने के लिए कई हाथ एक साथ उठते हैं. इनमें होते हैं दलाल, पुलिस, स्थानीय नेता और पंचायत प्रतिनिधि. अवैध रूप से सीमा पार से आने वाली इन लड़कियों की मानसिक हालत बलि के लिए ले जाई जा रही गाय की तरह होती है.

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नक्‍सल क्रांति का एक जनक हताशा से हार गया

हताशा ने न जाने कितनी जानें ली हैं, पर अभी हाल में इसने एक ऐसे नेता को अपना शिकार बनाया है, जिसने आज से 43 साल पहले हथियारों के बल पर उस व्यवस्था को बदलने का सपना देखा था, जो किसानों व मज़दूरों का शोषण करती है, उनका हक़ मारती है. इस हताशा के ताजा शिकार हैं, कानू सान्याल.

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मुख्‍यमंत्री की कुर्सी अभी दूर है

रेलवे परियोजनाओं के उद्घाटन की हड़बड़ी के कारण एक रोचक वाकया हो गया. 20 मार्च को महाराजा एक्सप्रेस के उद्घाटन समारोह के लिए अख़बारों को जो विज्ञापन जारी किया गया, उसके ऩक्शे में दिल्ली को पाकिस्तान और कोलकाता को बंगाल की खाड़ी में दिखाया गया.

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भारत में नया बांग्‍लादेश गढ़ रहे हैं घुसपैठिए

बंगाल में एक फीलगुड कहावत है, ए पार बांग्ला, ओ पार बांग्ला. आम जनता की बात छोड़िए, मुख्यमंत्री एवं राज्य के दूसरे बड़े नेताओं को यह कहावत उचरते सुना जाता रहा है. संकेत सा़फ है, ओ पार बांग्ला के निवासी भी अपने बंधु हैं. भाषा एक है, संस्कृति एक है, फिर घुसपैठ को लेकर चिल्ल-पों काहे की. राज्य में भाजपा के अलावा कोई भी दूसरी पार्टी इस मुद्दे को नहीं उठाती.

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माओवादी बंदूक की नोक पर बात करना चाहते हैं

अगर माओवादी आदिवासियों का हित चाहते हैं तो उनकी बस्तियों में अमन का होना भी ज़रूरी है, क्योंकि इसके बिना कोई विकास कार्य नहीं किया जा सकता. क्रॉस फायरिंग के माहौल में सड़क या पुल बनाने का काम नहीं हो सकता. माओवादी नेताओं को यह ज़मीनी हक़ीक़त समझनी होगी और सरकार को भी नई सोच के साथ आदिवासियों के कल्याण के लिए लगना होगा. माओवादी मुख में राम-बगल में छुरी वाली कहावत पर चल रहे हैं.

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स्‍वायत परिषद पर गोरखा मान जाएंगे?

गोरखा जन मुक्ति मोर्चे के मुखिया विमल गुरुंग अपने आंदोलन को गांधीवादी करार देते हैं, पर ज़रूरत पड़ने पर वह

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बंगाल के मुसलमानों को दिखी उम्‍मीद की किरण

आख़िरकार बंगाल सरकार ने संसद में रखी गई रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का फैसला कर ही लिया. यह फैसला उस समय हुआ है, जब विपक्षी लहर को मोड़ने के लिए माकपा उठ खड़ी हुई है, जिसे बांग्ला में घुरे दाड़ानो कहा जाता है.

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चटकलिया मज़दूरों पर लटका जूट का फंदा

कोलकाता के पास टीटागढ़ के जूट मिल मज़दूर शाम को चौपाल में जब लोक गायिका प्रतिभा सिंह का यह गीत गाते हैं तो माहौल गमगीन हो जाता है. ढोलक की थाप और झाल की झनकार में सिसकते आंसुओं की आवाज़ भले ही दब जाती हो, पर जैसे-जैसे समय बीत रहा है, वैसे-वैसे जूट मज़दूरों की बस्तियों में दरिद्रता का अंधेरा गहराता जा रहा है. सूदखोरों की चांदी है.

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हाथ रिक्शावाले धीमी मौत मर रहे हैं

कोलकाता की सड़कों से हाथ रिक्शा हटाने की अब कोई हड़बड़ी नहीं दिखती. शायद अगले विधानसभा चुनाव तक सरकार को इसकी ज़रूरत नहीं लगती. कभी हावड़ा पुल के साथ-साथ हाथ रिक्शा को भी कोलकाता की पहचान के तौर पर प्रस्तुत किया जाता था. गणतंत्र दिवस की झांकियों में गनेसी अपनी टुनटुनिया गाड़ी लिए राजपथ पर टहलता दिखता था.

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कामरेड, बसु की विरासत संभालिए

उस कामरेड ने अपनी आंखें दान कर दीं और अपना शरीर भी अस्पताल को दे दिया. वे आम कम्युनिस्ट होंगे, जो आख़िरी दम तक रिटायर नहीं होते. लेकिन, ज्योति बसु नाम का कामरेड तो दम निकलने के बाद तक रिटायर नहीं हुआ. विरासत में इतना कुछ दे गया कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अगर अमल करे तो वह मौजूदा संकट से उबर जाएगी और आइंदा फिर इतनी ग़रीब नहीं होगी. बसु के जाने से ऐसा लगता है कि समय के साथ बदलने का संदेश देने वाला आख़िरी कामरेड चला गया.

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हिंदी के नन्हें महारथियो, थोड़ा और जोर लगाओ

पश्चिम बंगाल में बांग्लाभाषी छात्र छात्राओं के बाद सबसे ज़्यादा संख्या हिंदी भाषियों की है. बावजूद इसके माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक परीक्षाओं में उन्हें हिंदी में प्रश्नपत्र उपलब्ध नहीं कराए जाते. पश्चिम बंगाल छात्र संघर्ष समिति के बैनर तले छात्रों के संघर्ष को पूरी कामयाबी अभी भी नहीं मिल पाई है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि सरकार किसी भाषाई पूर्वाग्रह से तो ग्रसित नहीं है?

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पत्नियां इतनी बुरी होती है

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद निवासी देवाशीष सरकार ने 30 नवंबर 2006 को जब ग्रेजुएट देवारती दत्त सरकार से शादी की तो उनके सामने थे केवल सुनहरे सपने. लेकिन सपने पापड़ की तरह अचानक चूर-चूर हो जाएंगे

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