रसायनों का ज़्यादा इस्तेमाल नुक़सानदेह है

जब भी देश के विकास की बात होती है, तो उसमें हरित क्रांति का ज़िक्र ज़रूर होता है. यह ज़िक्र लाज़मी भी है, क्योंकि हरित क्रांति के बाद ही देश सही मायने में आत्मनिर्भर हुआ. देश में कृषि की पैदावार बढ़ी, लेकिन हरित क्रांति का एक स्याह पहलू और भी है, जो अब धीरे-धीरे हमारे सामने आ रहा है.

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फसल बीमा योजना किसानों के साथ छलावा है

हमारे मुल्क में किसानों की हालत सुधारने या उन्हें राहत देने के मक़सद से सरकारी स्तर पर कई पहल हुई हैं. एक दशक पहले शुरू हुई राष्ट्रीय फसल बीमा योजना ऐसी ही एक पहल है. इस योजना का सीधा-सीधा मक़सद फसल नष्ट होने की स्थिति में क्षतिपूर्ति करना और किसान को मदद पहुंचाना है. अपने घोषित मक़सद की वजह से ज़ाहिर है कि यह योजना काफी लोकलुभावनी दिखाई देती है, लेकिन हक़ीक़त इसके उलट है.

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किसानों की समस्याओं पर सरकारें कब संजीदा होंगी

हमारे देश में खेती को मानसून का जुआ कहा जाता रहा है. आधुनिकता से खेती में कई बदलाव आए, मगर खेती का जोखिम कम नहीं हुआ. अलबत्ता, आधुनिक खेती के चलते इसमें कई नए तरह के जोखिम ज़रूर जुड़ गए. अब भारत का किसान मौसम के जोखिम के अलावा सरकारी तंत्र और आधुनिक टेक्नोलॉजी के जोखिम भी एक साथ झेलता है. पश्चिम बंगाल के बर्दवान ज़िले में बीते 6 महीनों के भीतर 27 किसान अपनी जान दे चुके हैं.

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दलित मुस्लिमों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा मिला

दलित मुसलमानों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति के दायरे में शामिल करने की लड़ाई दिनोदिन लंबी होती जा रही है. रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट को 4 साल होने को आए, लेकिन आज भी यूपीए सरकार इस रिपोर्ट की स़िफारिशों को अमल में लाने को लेकर कश्मकश में है, जबकि संसद के अंदर और बाहर दोनों ही जगहों पर सरकार पर रंगनाथ मिश्र आयोग की स़िफारिशें लागू करने का ज़बरदस्त दबाव है. हाल ही में एक बार फिर इस मांग को लेकर मुंबई स्थित कैथोलिक सेक्युलर फोरम, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला और उनसे मांग की कि दलित मुसलमानों और ईसाइयों की सामाजिक, आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए उन्हें जल्द से जल्द अनुसूचित जाति का दर्जा प्रदान किया जाए.

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राष्‍ट्रीय मुकदमा नीतिः देर से सही, एक दुरुस्‍त फैसला

हमारे देश में ज़्यादातर मुक़दमे छोटे झगड़ों और आपसी अहम की लड़ाइयों के नतीजे होते हैं. इनमें कई मुकदमे ऐसे होते हैं, जिन्हें अदालत की जगह घंटों की बातचीत में आसानी से निपटाया जा सकता है.

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कानकुन जलवायु सम्मेलन :दो कदम पीछे

मेक्सिको के कानकुन में हुआ 16वां जलवायु परिवर्तन विषयक सम्मेलन अमेरिका और विकसित मुल्कों के अड़ियल रवैये के चलते बिना किसी ठोस नतीजे के ख़त्म हो गया. बीते साल कोपेनहेगन में हुए सम्मेलन की तरह यहां भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती को लेकर विकसित और विकासशील मुल्कों के बीच कोई आम सहमति नहीं बन पाई. सम्मेलन शुरू होने के पहले हालांकि यह उम्मीद की जा रही थी कि विकसित मुल्क इस मर्तबा उत्सर्जन कटौती संबंधी कोई क़ानूनी बाध्यकारी समझौते पर अपनी राय बना लेंगे, लेकिन दो हफ्ते की लंबी कवायद के बाद भी कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए कोई वाजिब समझौता आकार नहीं ले सका. अलबत्ता सम्मेलन का जो आख़िरी मसौदा सामने निकल कर आया, उसमें कार्बन उत्सर्जन कम करने की बात ज़रूर कही गई है, मगर इसे कैसे हासिल किया जाएगा, इस पर साफ-साफ कुछ नहीं कहा है.

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दिल्ली हाईकोर्ट की अनोखी पहल

हमारे देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मुक़दमों के शीघ्र निपटारे को लेकर न्यायविदों की तऱफ से समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है. यहां तक कि पिछले दिनों सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के एक सम्मेलन में ख़ुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी मुक़दमों के निस्तारण में लगने वाले लंबे समय पर चिंता जताई थी. एक तऱफ अदालतों में मुक़दमों की सुनवाई धीमी रफ़्तार से आगे चल रही है, वहीं दूसरी तऱफ नए मुक़दमों का अंबार लगता चला जा रहा है, जिसके चलते अदालतों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है. ऐसा नहीं है कि सरकार इस समस्या से निबटने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रही है. कोशिशें हो रही हैं, लेकिन समस्या के विकराल रूप को देखते हुए वे काफी कम हैं. लंबित मुक़दमों को तेजी से निपटाने की दिशा में ऐसी ही एक अच्छी कोशिश अभी हाल में दिल्ली हाईकोर्ट ने की.

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राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण और पर्यावरण संरक्षण

पर्यावरण सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी विवादों को सही समय पर निपटाने के लिए आख़िरकार हमारे देश में भी अलग से पर्यावरण अदालत की स्थापना हो गई है. पिछले दिनों पर्यावरण और वन राज्यमंत्री जयराम रमेश ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के गठन की जब औपचारिक घोषणा की तो भारत विश्व के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया, जहां पर्यावरण संबंधी मामलों के निपटारे के लिए राष्ट्रीय स्तर पर न्यायाधिकरण होते हैं.

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यूनिक आइडेंटिफिकेशन: आधार पर आशंकाएं

यूपीए सरकार ने देश के सभी निवासियों को एक विशिष्ट पहचान नंबर यानी यूनिक आइडेंटिफिकेशन देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. हाल में पश्चिमी महाराष्ट्र के आदिवासी इलाक़े तेंभली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 10 आदिवासियों को 12 अंकों वाले विशिष्ट पहचान नंबर की योजना आधार सौंप कर इसकी शुरुआत की.

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अल्पसंख्यक आयोग के प्रति सरकारों की बेरुख़ी

मध्य प्रदेश राज्य अल्पसंख्यक आयोग के सभी काम अर्से से रुके पड़े हैं. शिक़ायतें और मामले दर्ज होना सभी कुछ बंद है. शिक़ायतें अगर दर्ज भी हो रही हैं तो उनका निराकरण व़क्त पर नहीं हो पा रहा है. शिक़ायती आवेदनपत्र तो किसी तरह जमा हो जाते हैं, लेकिन उनके निराकरण के लिए बेंच गठित करने और उन पर फैसला लेने का काम फिलवक्त बंद है.

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मुख्‍यधारा में कैसे आए मुसलमान

हमारे देश में आज़ादी के बाद से ही सुनियोजित तरीक़े से एक सामान्य बोध विकसित कर दिया गया है कि मुसलमान मुख्य धारा में नहीं आना चाहते और इसी वजह से वे पिछड़े हैं. कहने को मुस्लिम हर मामले में पिछड़े हुए हैं, लेकिन उन्हीं पर यह आरोप है कि बरसों से सियासी पार्टियां उनका तुष्टीकरण कर रही हैं.

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संघ परिवार भगवा आतंकवाद पर क्यों ख़फा है

संघ परिवार आजकल केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम के बयान से खपा है. आतंकवाद पर अपने ताजा बयान से वह संघ परिवार के निशाने पर आ गए हैं. संघ परिवार उन्हें पानी पी-पीकर कोस रहा है. चिदंबरम का कसूर महज़ इतना है कि उन्होंने एक सम्मेलन में दहशतगर्दी के भगवा चेहरे को मुल्क का सबसे बड़ा दुश्मन बताया था.

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गोदामों में सड़ता अनाज और सरकार

हमारे मुल्क की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीमकोर्ट ने एक बार फिर अनाज की बर्बादी पर सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. गोदामों और खुले आसमान के नीचे रखे अनाज के लगातार सड़ने की घटनाओं पर सख्त रवैया अपनाते हुए अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि अनाज को सड़ने देने के बजाय बेहतर होगा कि उसे मुल्क की ग़रीब जनता में बांट दिया जाए.

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आज़ादी के 63 बरसों बाद भी बेगाने

हमारे मुल्क के नीति नियंता किस तरह ग़ैर ज़िम्मेदारी और बिना दूरअंदेशी से अपनी नीतियां बनाते हैं, इसका एहसास हमें अभी हाल में आए शत्रु संपत्ति संशोधन और विधिमान्यकरण विधेयक का हश्र देखकर होता है. हिंदुस्तानी मुसलमानों की ज़मीन-जायदाद से सीधे-सीधे जुड़े इस संवेदनशील विधेयक, जिस पर मुल्क भर में बहुत विचार-विमर्श की ज़रूरत थी, को गोया इस तरह पेश करने की तैयारी थी, मानो यह कोई मामूली विधेयक हो.

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एक बार फिर जी एम खाद्य पदार्थ लाने की तैयारी

खाद्य सुरक्षा के नाम पर एक बार फिर हमारे मुल्क में जीएम फसलों और खाद्य पदार्थों के प्रवेश की तैयारियां हैं. जीएम फूड के ख़िला़फ उठी तमाम आवाज़ों और पर्यावरण एवं जैव तकनीक मंत्रालय के मतभेदों को दरकिनार कर यूपीए सरकार संसद के मानसून सत्र में भारतीय जैव नियामक प्राधिकरण विधेयक 2009 लाने का मन बना रही है.

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सोहराबुद्दीन प्रकरण: मिटते नहीं निशां लहू के

सोहराबुद्दीन फर्ज़ी मुठभेड़ कांड मोदी सरकार के लिए गले की फांस बनकर रह गया है. राज्य के पुलिस महकमे और सीआईडी के अफसरों की गिरफ़्तारी के बाद गुजरात के गृहमंत्री अमित शाह भी आख़िरकार क़ानून के शिकंजे में फंस ही गए.

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संघ पर आखिर निर्णायक कार्रवाई कब?

हिंदुस्तानी अवाम को बरसों से सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाने का दावा करने वाले संघ का असली चेहरा एक बार फिर सारे मुल्क के सामने उजागर हुआ है. अभी हाल ही में एक अंग्रेज़ी दैनिक के स्टिंग ऑपरेशन में संघ से मुताल्लिक जो सच्चाइयां निकल कर आई हैं, वे इतनी खतरनाक हैं कि हुकूमत के होश उड़ा दें.

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