एक सौ दो साल पहले दिल्ली में ब्रिटिश शासक को ताज पहनाया गया था. उस समय ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता था और पूरे विश्व के नक्शे पर लाल निशान दिखाई पड़ता था, जो ब्रिटिश राज का रंग था. यह ब्रिटिश साम्राज्य का चरम था. इसके बाद आंदोलन होना शुरू हुआ और धीरे-धीरे जर्मनी, [...]
Tags: अफ्रीकी, अमेरिकी, अर्थव्यवस्था, आंदोलन, ईस्ट इंडिया, एशिया, कारीगरों, ग़रीबों, चिली, चीन, जापान, टेलीफोन सेवा, दिल्ली, देश, धन, परिवर्तन, पूंजीवादी व्यवस्था, ब्राजील, ब्रिटेन, भारत, मैक्सिको, राजनीतिक व्यवस्था, रेशम, लंदन, विश्वक, वैश्विसक, व्यापार, शताब्दी, शासन, समाजवादी, साम्राज्यवाद, सोवियत रूस, स्वतंत्रता Posted in आर्थिक, कवर स्टोरी-2 by Author: मेघनाद देसाई | No Comments » | Read More... |
वित्त मंत्री ने बहुप्रतिक्षित वार्षिक बजट की घोषणा कर दी. वर्ष 1991 के बाद बजट ने अपने महत्व खो दिए, क्योंकि अर्थव्यवस्था को बाजार के हवाले कर दिया गया है. पश्चिमी देशों में वार्षिक बजट अकाउंट के स्टेटमेंट के अलावा कुछ नहीं होता है. भारत में, विशेषकर 1991 के पहले बजट का एक औचित्य होता [...]
Tags: अमीर लोगों, अर्थव्यवस्था, आयकर, कारपोरेट टैक्स, किरोसीन, गरीब लोगों, घोषणा, ज्यादा टैक्स, पेट्रोल और डीजल, बजट, बहुप्रतिक्षित, बीमा, भारत, रिटर्न टैक्स, रेल मंत्री, वित्त मंत्री, विपक्षी दल, वेतनभोगी, व्यक्ति, व्यवस्था, व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य, सरकार Posted in आर्थिक, कवर स्टोरी-2 by Author: कमल मोरारका | No Comments » | Read More... |
देश की तरक्क़ी आम जनता को हाशिए पर रखकर नहीं हो सकेगी, इसलिए वित्त मंत्री चिदंबरम को आम लोगों को दो व़क्त का खाना मिले, यह सुनिश्चत करना ही होगा. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वे इस बार का बजट लोकलुभावन बना पाएंगे? क्या वे देश में मौजूद कालेधन को मुख्यधारा में लाकर [...]
Tags: आम चुनाव, आम जनता, कालेधन, टेलीकॉम कंपनियां, देश के विकास, पी चिदंबरम, रक्षा बजट, राजकोषीय, स्पेक्ट्रम नीलामी, स्पेक्ट्रम शुल्क Posted in Crousel2, आर्थिक, कवर स्टोरी-2, मीडिया, राजनीति by Author: सतीश सिंह | No Comments » | Read More... |
आखिर अन्ना हज़ारे क्या हैं, मानवीय शुचिता के एक प्रतीक, बदलाव लाने वाले एक आंदोलनकारी या भारतीय राजनीति से हताश लोगों की जनाकांक्षा? शायद अन्ना यह सब कुछ हैं. तभी तो इस देश के किसी भी हिस्से में अन्ना चले जाएं, लोग उन्हें देखने-सुनने दौड़े चले आते हैं? उनकी सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ को देखकर कई राजनेताओं को रश्क होता होगा.
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भारतीय राजनीति का एक शर्मनाक पहलू यह है कि देश के राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों की कमान चंद परिवारों तक सीमित हो गई है. कुछ अपवाद हैं, लेकिन वे अपवाद ही हैं. अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश के प्रजातंत्र के लिए खतरा पैदा हो जाएगा. राजनीतिक दलों और देश के महान नेताओं की कृपा से यह खतरा हमारी चौखट पर दस्तक दे रहा है, लेकिन वे देश की जनता का मजाक उड़ा रहे हैं.
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अन्ना हजारे कार्यकर्ता सम्मेलन में शिरकत करने के लिए उड़ीसा दौरे पर गए. उनकी अगवानी करने के लिए बीजू पटनायक हवाई अड्डे पर हज़ारों लोग मौजूद थे, जो अन्ना हजारे जिंदाबाद, भ्रष्टाचार हटाओ और उड़ीसा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के नारे लगा रहे थे. अन्ना ने कहा कि हमारा काम बहुत बड़ा है और किसी को भी खुद प्रसिद्धि पाने के लिए यह काम नहीं करना है.
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भारत भी अजीब देश है. यहां कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सारे दरवाज़े खोल देती है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें लाभ पहुंचाने के लिए नियम-क़ानून भी बदल दिए जाते हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके हितों की रक्षा सरकारी तंत्र स्वयं ही कर देता है, मतलब यह कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती और उन्हें बिना शोर-शराबे के फायदा पहुंचा दिया जाता है.
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अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो गई है. कांग्रेस पार्टी ने अगले चुनाव की कमान राहुल गांधी को सौंप दी है. राहुल गांधी को 2014 के लोकसभा चुनाव की समन्वय समिति का प्रमुख बनाया गया है. राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, यह बात पहले से ही तय है. इसमें कोई नई बात नहीं है. इस समिति में वही पुराने चेहरे हैं, जो अब तक कांग्रेस की रणनीति बनाते आए हैं. इसलिए कुछ नया होगा, इसकी उम्मीद नहीं है. लेकिन सवाल यह है कि मुसलमानों के लिए इसमें नया क्या है? सवाल यह है कि जिस तरह उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने मुसलमानों को धोखा देकर वोट लेने की कोशिश की, क्या फिर से वही खेल खेला जाएगा?
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जबसे यूपीए सरकार बनी है, तबसे देश में घोटालों का तांता लग गया है. देश के लोग यह मानने लग गए हैं कि मनमोहन सिंह सरकार घोटालों की सरकार है. एक के बाद एक और एक से बड़ा एक घोटाला हो रहा है. चौथी दुनिया ने जब 26 लाख करोड़ रुपये के कोयला घोटाले का पर्दाफाश किया था, तब किसी को यह यकीन भी नहीं हुआ कि देश में इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया जा सकता है.
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दवा, डॉक्टर एवं दुकानदार के प्रति भोली-भाली जनता इतना विश्वास रखती है कि डॉक्टर साहब जितनी फीस मांगते हैं, दुकानदार जितने का बिल बनाता है, को वह बिना किसी लाग-लपेट के अपना घर गिरवी रखकर भी चुकाती है. क्या आप बता सकते हैं कि कोई घर ऐसा है, जहां कोई बीमार नहीं पड़ता, जहां दवाओं की ज़रूरत नहीं पड़ती? यानी दवा इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे अधिक है. किसी न किसी रूप में लगभग सभी लोगों को दवा का इस्तेमाल करना पड़ता है, कभी बदन दर्द के नाम पर तो कभी सिर दर्द के नाम पर.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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