केंद्र की यूपीए सरकार से पूर्वांचल के लगभग ढ़ाई लाख बुनकरों को का़फी उम्मीदें थीं. बुनकरों के लिए करोड़ों रुपये के बजट का ऐलान सुनते ही बुनकरों को यक़ीन हो गया कि उनकी हालत अब सुधरने वाली है, लेकिन जब हक़ीक़त सामने आई तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे.
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भारत को गांवों का देश कहा जाता है, क्योंकि यहां की अधिकतर आबादी आज भी गांव में ही निवास करती है, प्रकृति की गोद में जीवन बसर करती है और प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से जीवन के साधन जुटाती है. शहरी सुख-सुविधाओं से दूर ज़िंदगी कितनी कठिनाइयों से गुज़रती है, इसका अंदाज़ा लगाना बड़े शहरों में रहने वालों के लिए मुश्किल है.
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दुनिया में इतिहास रचने वालों की कोई कमी नहीं है. कुछ लोग अपना नाम चमकाने के लिए इतिहास रचते हैं तो कुछ लोग निस्वार्थ रूप से अपना कार्य करते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता कि उन्होंने इतिहास रच दिया. बिहार के गया ज़िले के दशरथ मांझी एक ऐसे ही इतिहास रचयिता रहे हैं, जिन्होंने अपनी पत्नी के इलाज में बाधक बने पहाड़ को काटकर सड़क निर्माण किया था.
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मध्यम वर्ग के संबंध में तो कह चुके. अब लीजिए ग़रीब वर्ग को, जो भूखे हैं, मज़दूर हैं, श्रमिक हैं, भीड़ हैं, चाहे जो कह लीजिए. दुनिया में किसी देश का हो, किसी जाति का हो, स्त्री हो या पुरुष, ऐसा व्यक्ति जिसके पास निज की कोई ज़मीन-जायदाद न हो, न जिसकी कोई पूंजी हो, जिसे अपने जीवन निर्वाह के लिए दूसरों के यहां नौकरी करनी पड़े, काम का मूल्य या भाड़ा लेकर काम करना पड़े, इन सबको सभ्य भाषा में श्रमिक वर्ग कहते हैं.
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उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड, यह नाम सुनते ही एक ऐसी तस्वीर सामने उभर कर आती है, जहां भूख है, सूखा है, मौत है और घरों में लटके ताले हैं. जिन घरों में ताले नहीं लगे हैं, वहां स़िर्फ बुज़ुर्ग है, जो दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में पलायन कर चुके अपने बच्चों द्वारा भेजे गए पैसों की वजह से जिंदा है, न कि केंद्र या सूबे की सरकार के अनुदान से. एक आंकड़े के मुताबिक़, पिछले पांच सालों में बुंदेलखंड से ढाई लाख से ज़्यादा लोग पलायन कर चुके हैं.
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सूबे में गठबंधन राजनीति का दौर क्या आया, निर्दलीयों की अहमियत में चार चांद लग गए, उनका मोल लगने लगा. हालांकि निर्दलीयों के लिए ऐसा अवसर कई बार आया, जब सत्ता की दावेदारी रखने वालों ने उन्हें लालबत्ती से नवाज़ कर कैबिनेट मंत्री तक का दर्जा दिया, लेकिन पूर्ण बहुमत की सरकारों में उन्हें अहमियत नहीं मिली.
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एक समय सरपंच ग्राम पंचायत का सबसे महत्वपूर्ण पद माना जाता था, लेकिन बिहार में इस पद की अहमियत कम होने लगी है. लगभग ढाई दशक बाद बिहार में वर्ष 2001 में पंचायत के चुनाव हुए तो लोगों को लगा कि ग्राम स्वराज का जो सपना महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने देखा था, वह साकार होने वाला है.
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आम तौर पर यह धारणा बनी हुई है कि जनसंख्या वृद्धि हानिकारक है. इससे किसी भी देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है. आर्थिक दृष्टिकोण के सभी पैमाने भी इसी की पुष्टि करते हैं. अर्थशास्त्रियों की परिभाषा का निष्कर्ष यही है कि जनसंख्या वृद्धि के कारण ही खाद्यान्न की कमी होती है, क्योंकि जिस अनुपात में आबादी में इज़ा़फा होता, उस अनुपात में पैदावार नहीं हो पाती है.
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पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने आदमी को एक तरह से मशीन बना दिया है. उदाहरण के लिए घर में काम आने वाली सुइयां या कीलें आज से 200 वर्ष पहले ग्राम का कोई लोहार बनाता था. उसके बनाने में जो साजो-सामान लगता था, उसको प्राप्त करने से लेकर तैयार सुई या कील घर- घर जाकर बेचकर पैसा इकट्ठा करने तक का सारा काम वह स्वयं या उसका परिवार कर लेता था.
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बिहार राज्य विद्युत बोर्ड द्वारा बरौनी ताप विद्युत संयंत्र का विस्तारीकरण किया जाना है. राज्य मंत्रिमंडल ने 3666 करोड़ रुपये की इस योजना को स्वीकृति प्रदान कर दी है. सरकार का कहना है कि फिलहाल 2250 मेगावॉट क्षमता वाले कोयला आधारित विद्युत संयंत्र की स्थापना होगी.
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एक और आवाज़ आजकल जोरों से उठाई जा रही है, वह है सहकारिता आंदोलन की. सहकारिता आंदोलन देश के लिए, राष्ट्र के हर व्यक्ति के लिए उपादेय है, बशर्ते कि इस पद्धति का ईमानदारी से अनुसरण किया जाए.
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भारत में 14 साल तक के बच्चों की आबादी पूरी अमेरिकी आबादी से भी ज़्यादा है. कुल श्रम शक्ति का लगभग 3.6 फीसदी हिस्सा 14 साल से कम उम्र के बच्चों का है. प्रत्येक दस बच्चों में से 9 काम करते हैं. ये बच्चे लगभग 85 फीसदी पारंपरिक कृषि गतिविधियों में कार्यरत हैं, जबकि 9 फीसदी से कम उत्पादन, सेवा और मरम्मती कार्यों में लगे हैं.
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आप सांसद हैं, देवता नहीं |
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