हमारे सांसद कुछ ज़्यादा ही सेंसेटिव हो गए हैं. उन्हें लगता है कि वे संसद के लिए चुन लिए गए हैं तो वे लोकतंत्र के देवता हो गए हैं. उन्हें कोई कुछ कह नहीं सकता है. अगर देश में भ्रष्टाचार की बात हो तो सांसदों को लगता है कि उन्हें ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.
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यह महीना हलचल का महीना रहा है. मुझसे बहुत सारे लोगों ने सवाल पूछे, बहुत सारे लोगों ने जानकारियां लीं. लेकिन जिस जानकारी भरे सवाल ने मुझे थो़डा परेशान किया, वह सवाल पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने किया. उसने मुझसे पूछा कि क्या अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता अलग-अलग हैं. मैंने पहले उससे प्रश्न किया कि आप यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं.
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पिछले हफ्ते मैंने चौथी दुनिया की रिपोर्ट में इंडियन एक्सप्रेस और शेखर गुप्ता की पत्रकारिता पर कई सवाल उठाए. उन सवालों को उठाते हुए मुझे हमेशा याद रहा कि पिछले कुछ सालों में इंडियन एक्सप्रेस ने कैसी पत्रकारिता की और शेखर गुप्ता ने अपना आज का मुक़ाम कितनी मेहनत से बनाया है, लेकिन सवाल तो सवाल हैं और कभी ये सवाल इतने बड़े आकार में हमारे सामने आकर खड़े हो जाते हैं कि हमें न चाहते हुए भी वह लिखना पड़ता है, जो नहीं लिखना चाहिए.
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सेना का यह पूरा क़िस्सा पिछले तीन महीने से चल रहा है और लगातार अलग-अलग तरह के आरोप, चाहे मीडिया हो या संसद के सदस्य हों, लगाते आ रहे हैं. वे आरोप हैं जनरल वी के सिंह पर. आरोप यह है कि हर चीज़ जनरल वी के सिंह ने एक रणनीति के तहत की. खुलासे भी उन्होंने किए, चिट्ठियां भी उन्होंने लिखीं, दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश भी उन्होंने की.
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संसद सर्वोच्च है, संसद पवित्र है, संसद लोकतंत्र का मंदिर है और हिंदुस्तान में संसद आज आम आदमी के सुख, सुरक्षा और लोकतंत्र की गारंटी है. इसी संसद ने 1950 में एक संविधान बनाया था. 1950 के बाद संसद का यह धर्म था कि वह संविधान की मूल भावना की रक्षा करे. सवाल यह है कि क्या संसद ने 1950 में बने संविधान की आत्मा, संविधान की भावना की रक्षा की?
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कोयले की कहानी कोयले की तरह और काली होती जा रही है. जब चौथी दुनिया ने 25 अप्रैल-1 मई 2011 के अंक में 26 लाख करोड़ का महाघोटाला शीर्षक से कहानी छापी तो हमें लगा कि हमने एक कर्तव्य पूरा किया, क्योंकि जनता के प्रतिनिधियों, सरकार बनाने वाले प्रतिनिधियों ने हिंदुस्तान के लोगों की गाढ़ी कमाई का पैसा कुछ लोगों की जेब में डाल दिया और उसमें से कुछ पैसा उनकी जेब में भी गया.
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16 मार्च को प्रणब मुखर्जी लोकसभा में भाषण दे रहे थे. यह आम भाषण नहीं था, बल्कि 2012-13 का बजट भाषण था. सारा देश इस भाषण को ध्यान से सुन रहा था. हम भी इस भाषण को सुन रहे थे. इस भाषण को जब हमने सुनना शुरू किया तो हमें बहुत आशा थी कि प्रणब मुखर्जी इस देश के सामने आने वाली तकलीफ़ों को ध्यान में रखकर अपना बजट भाषण रखेंगे.
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भारतीय सेना देश का गौरव है. गौरव इसलिए है, क्योंकि देश का जवान मौत को चुनता है. सेना में जाने की एक ही क़ीमत है. जब भी युद्ध हो या देश में कहीं भी अशांति हो, सेना का जवान वहां हथियार लिए हुए मुस्तैद रहे. इस प्रोफेशन की यही एक मात्र शर्त है. इसका सीधा मतलब अपनी ख़ुशी से मौत को चुनना है. हमारे देश का वह जवान जो ख़ुशी-ख़ुशी देश की रक्षा के लिए, देश में अमन-चैन के लिए मौत को चुनता है. लेकिन जब वह नौकरी से रिटायर होता है, तो सेना और समाज उसे भटकने के लिए छोड़ देता है.
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बीती 27 फरवरी को बंगलुरू में ईटीवी उर्दू और ईटीवी कन्नड़ ने एक सेमिनार किया, जिसका विषय था-फ्यूचर ऑफ कॉरपोरेट्स इन इंडिया. मुख्य वक्ता कंपनी मामलों के केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली थे और मुख्य अतिथि थे कर्नाटक के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा. सेमिनार में जाफर शरीफ, एम वी राजशेखर एवं जमीर पाशा भी शामिल थे, जो कर्नाटक की बड़ी हस्तियां हैं.
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हमारा देश भूलने की विधा का महारथी है. किसी भी चीज़ को हम बहुत जल्दी और बहुत आसानी से भूल जाते हैं. इनमें भुलाने वाले विषय होते हैं, लेकिन वे विषय भी होते जिन्हें कभी भुलाना नहीं चाहिए, याद रखना चाहिए. यह भी कह सकते हैं कि हम अपने पुरुषार्थ को ही भूल जाते हैं. अन्ना हजारे की पूरी कहानी में कुछ ऐसा ही हुआ. अन्ना हजारे का साथ देश भर के लोगों ने दिया.
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली और भ्रष्टाचार आदि मुद्दे सा़फ दिखाई देते हैं, लेकिन इन्हीं के साथ एक और महत्वपूर्ण मुद्दा दिखाई देता है, वह है अपराध. अपराध प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, लेकिन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अपराध से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है राजनीति का अपराधीकरण या अपराधियों का राजनीति में बेख़ौ़फ प्रवेश.
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सभी सम्मान करेंगे. आखिर यह भारत के सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, लेकिन इस फैसले से उन लोगों को निराशा हुई, जो ईमानदारी में यक़ीन रखते हैं. देश का सुप्रीम कोर्ट यह कहता है कि हमें ईमानदारी और इंटीग्रिटी से कोई मतलब नहीं है तो फिर सवाल खड़ा होता है कि क्या देश ईमानदारी छोड़ दे, क्या इस देश में उन्हीं लोगों की सुनी जाएगी, जो भ्रष्ट या बेईमान हैं?
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आप सांसद हैं, देवता नहीं |
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