उत्तर प्रदेश के चुनाव का सवाल क्या है, और उत्तर प्रदेश के चुनाव में किन सवालों के जवाब जनता देगी. इसके बारे में स़िर्फ इतना कहना चाहते हैं कि जिन सवालों पर जनता को जवाब देना चाहिए, वे सवाल जनता के सामने नहीं लाए जा रहे हैं. जिन सवालों पर जनता को खामोश रहना चाहिए, वे सवाल उनके सामने लाए जा रहे हैं. लोगों के इमोशन से भी खेलने की कोशिश हो रही है.
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भारतीय थल सेनाध्यक्ष के साथ एक तऱफ सरकार मज़ाक कर रही है और दूसरी तरफ मीडिया. सरकार बार-बार एक ग़लत बात को सही साबित करने की कोशिश कर रही है. उसे चाहिए कि वह सुप्रीम कोर्ट जाए और वहां कहे कि हिंदुस्तान में किसी भी डेट ऑफ बर्थ के सवाल को हाईस्कूल के सर्टिफिकेट से हल नहीं किया जाएगा, बल्कि उस विभाग का प्रमुख जो डेट ऑफ बर्थ तय करे, उससे हल किया जाएगा.
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अखिलेश यादव के एक बयान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी. अखिलेश समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं और मुलायम सिंह यादव के पुत्र. डी पी यादव को पार्टी में न लेने की घोषणा ने उनकी पार्टी में भी मतभेद पैदा किए और उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा को कॉर्नर पर खड़ा कर दिया. आम तौर पर माना जाता है कि अगर यह फैसला मुलायम सिंह को लेना होता तो वह संभवत: डी पी यादव को पार्टी में लेने के लिए हरी झंडी दे देते, लेकिन अखिलेश यादव ने निजी तौर पर यह फैसला लिया और यह फैसला उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की राय के खिला़फ लिया.
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वर्ष 2009 में एक बड़ी घटना हुई. चौथी दुनिया ने रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट छाप दी और सरकार से कहा कि अगर यह रिपोर्ट झूठी है तो वह कहे कि यह रिपोर्ट झूठी है. उस रिपोर्ट को लेकर राज्यसभा में चार-पांच दिनों तक का़फी हंगामा होता रहा. राज्यसभा के सांसदों ने हमारे ख़िला़फ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव रखा और हमने उस विशेषाधिकार हनन के नोटिस का जवाब भी दिया.
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अक्सर यह माना जाता है कि नियम बनाए जाते हैं और बनाते समय ही उसे तोड़ने के रास्ते भी बन जाते हैं. क़ानून बनाए जाते हैं और उनसे बचने का रास्ता भी उन्हीं में छोड़ दिया जाता है तथा इसी का सहारा लेकर अदालतों में वकील अपने मुल्जिम को छुड़ा ले जाते हैं. शायद इसीलिए बहुत सारे मामलों में देखा गया है कि अपराधी बाहर घूमते हैं, जबकि बेगुनाह अंदर होते हैं.
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दिल्ली के उन नेताओं को धन्यवाद देना चाहिए, जो पत्रकारिता जगत का नेतृत्व करते हैं. इनके लिए सारा देश दिल्ली है. अगर दिल्ली में किसी अख़बार के साथ कुछ ग़लत हो तो इनके लिए बहुत बड़ा सवाल बन जाता है. अगर किसी पत्रकार के साथ कुछ हो तो और भी बड़ा सवाल बन जाता है.
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उत्तर प्रदेश का चुनाव सिर पर है और कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण का शिग़ूफा छोड़ दिया है. कांग्रेस इसलिए, क्योंकि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री कांग्रेस के सदस्य हैं. इसलिए यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि शिगू़फा कांग्रेस ने छोड़ा है.
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कितना भी कहें और कितना भी सोचें, लेकिन ऐसा लगता है कि फर्क पड़ने वाला नहीं है. देश की बुनियादी समस्याओं को हल करने के कई सारे तरीके हैं, पर अगर ऐसे रास्ते को, जो कहीं पहुंचता ही न हो या दुनिया में जिसे आजमाया जा चुका है, हम फिर एक बार आजमाएं तो इसे बुद्धिमानी नहीं, बेवकूफी ही कहेंगे. यह सवाल दिमाग में उठता है. देश में बाज़ार है, जो लोगों की ज़रूरतें पूरी करता था, लेकिन वह समाज और राजनीति को दिशा नहीं देता था.
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प्रेसीडेंट बुश के ऊपर जूता क्या चला, सारी दुनिया में जूतों की बहार आ गई. हमारे देश में भी यह दूसरा या तीसरा वाक़िया है, जब राजनेताओं के ऊपर हमले हुए. जनार्दन द्विवेदी पर जूता फेंका गया और अब शरद पवार को एक शख्स ने थप्पड़ मारा. ये घटनाएं दो तरह के संकेत देती हैं. पहला संकेत यह है कि देश में लोकतांत्रिक मूल्यों से नौजवानों का भरोसा उठ रहा है. उन्हें यह लगता है कि धरना-प्रदर्शन, भूख हड़ताल, सिविल ना़फरमानी, ये शब्द बेमानी हो गए हैं और इनके ऊपर अमल करने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है.
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अन्ना हजारे पर चारों तऱफ से हमला हो रहा है. एक तऱफ राजनीतिज्ञ हमला कर रहे हैं तो दूसरी तऱफ मीडिया हमला कर रहा है. राजनीतिज्ञ दो तरह से हमले कर रहे हैं. पहला हमला उनकी छवि को बिगाड़ने का हो रहा है, जिसका नेतृत्व श्री दिग्विजय सिंह कर रहे हैं. और दूसरा हमला उनकी छवि को भुनाने का हो रहा है, जिसका नेतृत्व श्री मोहन भागवत और भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता कर रहे हैं.
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देश का विश्वास अगर किसी एक संस्था के ऊपर अभी तक बना हुआ है, तो वह है हमारी न्यायिक व्यवस्था, जो कभी-कभी इसकी झलकियां देती हैं और यह संदेश भी कि लोगों को उसके ऊपर विश्वास बनाए रखना चाहिए.
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आखिर जस्टिस काटजू ने ऐसा क्या कह दिया कि दिल्ली में तू़फान खड़ा हो गया. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जितने महान सरदार हैं, वे सब तन कर खड़े हो गए, जैसे लगा कि उनका बलात्कार होने वाला है और उन्हें अपनी इज्ज़त की रक्षा करनी है.
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जनता भोली होती है, बेवक़ू़फ नहीं |
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