जहां चाह है वहां राह है, लेकिन अपनी मंज़िल की ओर बढ़ना जितना आसान है उतना ही कठिन भी. कुछ ऐसा ही हाल है अंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी एंड रिसर्च (आईपी यूनिवर्सिटी, दिल्ली) के 13 छात्रों का, जिन्होंने अपने सपने को साकार करने के लिए दिन रात मेहनत की. मगर हर बार निराशा ही हाथ लगी.
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मध्य प्रदेश का कटनी ज़िला भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित होने के कारण बेशक़ीमती खनिज संपदा के प्रचुर भंडारण सहित जल संपदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा अपने इस्पात उद्योगों हेतु आवश्यक गुणवत्ता पूर्ण कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले चूना पत्थर (लाईम स्टोन) की खदानें यहां के ग्राम कुटेश्वर में स्थापित की गई थीं.
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दक्षिण कोरिया के सिओेल में परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया. इस सम्मेलन में 53 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जो परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग तथा परमाणु बम के प्रसार को रोकने और इसके वर्तमान ज़खीरे को कम करने के लिए प्रयासरत दिखाई पड़े. सभी देशों के प्रतिनिधियों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी भी स्थिति में परमाणु बम की तकनीक आतंकवादियों के पास नहीं पहुंचनी चाहिए.
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कोयले की कहानी कोयले की तरह और काली होती जा रही है. जब चौथी दुनिया ने 25 अप्रैल-1 मई 2011 के अंक में 26 लाख करोड़ का महाघोटाला शीर्षक से कहानी छापी तो हमें लगा कि हमने एक कर्तव्य पूरा किया, क्योंकि जनता के प्रतिनिधियों, सरकार बनाने वाले प्रतिनिधियों ने हिंदुस्तान के लोगों की गाढ़ी कमाई का पैसा कुछ लोगों की जेब में डाल दिया और उसमें से कुछ पैसा उनकी जेब में भी गया.
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भारत का समाजवादी लोकतंत्र प्रतिनिधित्व की राजनीति में अच्छी तरह रचा-बसा है. यहां विशेषज्ञों की सभा और समिति के बारे में आमतौर पर यह माना जाता है कि वे स्थितियों को बेहतर ढंग से समझते हैं. बनिस्बत उनके जो ऐतिहासिक तौर पर सत्ता प्रतिष्ठान में निर्णायक भूमिका रखते हैं. यह सब एक प्रक्रिया के तहत होता है. इसमें प्राथमिकताएं सुनिश्चित होती हैं, योजनाओं का मूल्यांकन किया जाता है और विकास के रास्ते तैयार किए जाते हैं.
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अभी वैश्विक स्तर पर यह मुहिम चल रही है कि पर्यावरण के नुक़सान को किस तरह से कम किया जाए. विकसित देश यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे पर्यावरण संरक्षण के प्रति का़फी गंभीर हैं. लेकिन उनकी कथनी और करनी में ज़मीन-आसमान का अंतर है. जिस तरह से जहाज़ तो़डने के लिए दक्षिण एशिया की बंदरगाहों का इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे तो ऐसा ही लगता है.
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भारत एक ऐसा देश है, जिसका पर्यावरण संबंधी आंदोलनों, ज़मीनी स्तर पर सक्रियता और उत्तरदायी उच्च न्यायपालिका का अपना समृद्ध इतिहास रहा है. ऐसे देश में 2011 का वर्ष पर्यावरण संबंधी मुकदमेबाज़ी का अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष अर्थात मील का पत्थर साबित हुआ है. यद्यपि पर्यावरण संबंधी मुक़दमेबाज़ी पिछले तीन दशकों में काफ़ी बढ़ गई है, लेकिन पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना के कारण 2011 का वर्ष फिर भी काफ़ी विशिष्ट है.
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हरियाणा में भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की समस्या बरकरार है. यह वही अधिकारी हैं, जिन्होंने राज्य के वन विभाग में हो रहे घोटालों का पर्दाफाश किया था. सरकार के रवैये से परेशान चतुर्वेदी ने केंद्र सरकार से यह आग्रह किया था कि उन्हें केंद्र में डेपुटेशन पर बुला लिया जाए, लेकिन उनका आग्रह नामंजूर कर दिया गया.
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सत्तर के दशक में जब तत्कालीन बिहार सरकार ने प्रदेश के हर ज़िले में लाखों रुपये ख़र्च कर सरकारी नलकूप (स्टेट बोरिंग) लगाना शुरू किया था, तो किसानों को लगा कि अब खेती की लागत कम होगी और उनका राज्य भी कृषि के मामले में पंजाब-हरियाणा की बराबरी कर सकेगा. शुरुआती कुछ वर्षों तक स्टेट बोरिंग ने ठीक तरह से काम किया, लेकिन उसके बाद के वर्षों में ज़्यादातर नलकूप सरकारी लापरवाही के चलते ठप हो गए.
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क्या अतीत की पिछली घटनाओं और उनके तर्क से यह संकेत नहीं मिलता कि अपने पड़ोसियों को लेकर हमारी नीति में परिवर्तन की शुरुआत होने जा रही है, जिसमें भारत को संतुलित करने के प्रयास से लेकर लंबे समय तक इसके साथ आपसी सहयोग भी शामिल है? क्या कारण है कि हमारे पड़ोसी देश, ख़ास तौर पर पाकिस्तान और किसी हद तक बांग्लादेश, श्रीलंका एवं नेपाल अपने ही हित में क्षेत्र की सबसे बड़ी और सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ मिलकर सहयोग नहीं करते?
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यह समय सबसे अच्छा था, यह समय सबसे खराब था, यह युग समझदारी का था, यह युग ही बेवक़ूफ़ियों का था. कोयले की इस वर्तमान गतिशीलता की तुलना किसी षड्यंत्र और दो शहरों की कथा (ए टेल ऑफ़ टू सिटीज़) के झंझावात से नहीं की जा सकती.
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आप सांसद हैं, देवता नहीं |
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