अफ़ज़ल की फांसी के बाद यहां काफी फ़र्क़ पड़ा है. दरअसल, मार्च और अप्रैल के पर्यटन सीज़न को बहुत बड़ा झटका लगा है. जिन पर्यटकों ने यहां आने के लिए सारी व्यवस्था कर ली थी, उनमें से अधिकतर ने अपना ़फैसला बदल दिया. रातों रात होटलों और हाउस बोटों में बुकिंग रद्द होनी शुरू [...]
Tags: अफजल की फांसी, कर्फ्यू का सिलसिला, कश्मीर पर्यटक, गुलमर्ग पर्यटन, पर्यटकों का घाटी, मक़बूल, श्रीनगर नगीन झील Posted in पर्यावरण, राजनीति, स्टोरी-6 by Author: Mohammad Haroon | No Comments » | Read More... |
आदिवासियों की पहचान जल, जंगल और ज़मीन से ज़रूर है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण उन्हें इन दिनों अपने मूल स्थान से विस्थापित होना प़ड रहा है. हालांकि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद कर रहे हैं, लेकिन अफ़सोस कि उनकी आवाज़ नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ ही साबित हो रही [...]
Tags: आज़ादी, आदिवासी, इतिहास, उच्च गुणवत्ता, कंपनियों, काठीकुंड, खनिज, जंगल, जल, ज़मीन, झारखंड, दुमका, देश, पदार्थ, पावर प्लांट, प्रकृति, प्राकृतिक संसाधनों, बिहार, राजनीतिक, राज्य, विरोध, विश्व, सरकारी मशीनरी, स्टील प्लांट Posted in कवर स्टोरी-2, पर्यावरण, राज्य by Author: शैलेंद्र सिन्हा | No Comments » | Read More... |
खुदरा बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को केंद्र सरकार भले ही किसानों की भलाई के लिए उठाया गया क़दम मानती है, लेकिन देश के किसान और किसान यूनियन केंद्र सरकार से बिल्कुल सहमत नहीं हैं. वे अपने पुराने अनुभवों के आधार पर सरकार के निर्णय के खिलाफ हैं. पेप्सीको द्वारा देश में अनुबंध आधार पर खेती [...]
Tags: Wall Mart, खुदरा बाज़ार Posted in कवर स्टोरी-2, पर्यावरण, विदेश by Author: नवीन चौहान | 1 Comment » | Read More... |
देश में जब भी भूमि अधिग्रहण की बात होती है, तो सरकार का इशारा आम आदमी और किसान की तऱफ होता है. आज़ादी के बाद से दस करोड़ लोग भूमि अधिग्रहण की वजह से विस्थापित हुए हैं. अपनी माटी से अलग होने वालों में कोई पूंजीपति वर्ग नहीं होता. विकास की क़ीमत हमेशा आम आदमी को ही चुकानी पड़ी है. जिनके पास धन है, वे दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में अपने मनमाफिक मकान ख़रीद सकते हैं, लेकिन वह आम आदमी, जिसके पास अपनी जीविका और रहने के लिए ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा है, उसे बेचकर आख़िर वह कहां जाएगा? ऐसे कई ज्वलंत सवालों पर पेश है चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…
Tags: Aditya Birla, Agriculture, Ashok Gehlot, BJP, Bangur Group, Chief Minister, Farmer, General VK Singh, India Cements Limited, Land, Movement, N. Srinivasan, Nawalgarh, Shekhawati, Shree cement Ltd, UltraTech cement Ltd., acquisitions, approved, brokers, cement, chief, development, factory, government, industrialist, politics, protest, reports, usurp, अधिग्रहण, अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड, अशोक गहलोत, आंदोलन, आदित्य बिड़ला, इंडिया सीमेंट लिमिटेड, उद्योगपती, एन श्रीनिवासन, कारखाना, किसान, कृषि, जनरल वी के सिंह, दलाल, नवलगढ़, फैक्ट्री, बांगड़ समूह, भाजपा, भूमि, मंजूरी, मुख्यमंत्री, राजनीति, रिपोर्ट, विकास, विरोध, शेखावाटी, श्री सीमेंट लिमिटेड, सरकार, सीमेंट, सेनाध्यक्ष, हड़पना, ज़मीन Posted in आंदोलन, आर्थिक, कवर स्टोरी-2, कानून और व्यवस्था, पर्यावरण, राजनीति, राज्य, विधि-न्याय, समाज by Author: अभिषेक रंजन सिंह | No Comments » | Read More... |
आने वाले दिनों में यूपीए सरकार की फिर से किरकिरी होने वाली है. 52,000 करोड़ रुपये का नया घोटाला सामने आया है. इस घोटाले में ग़रीब किसानों के नाम पर पैसों की बंदरबांट हुई है. किसाऩों के ऋण मा़फ करने वाली स्कीम में गड़बड़ी पाई गई है. इस स्कीम का फायदा उन लोगों ने उठाया, जो पात्र नहीं थे. इस स्कीम से ग़रीब किसानों को फायदा नहीं मिला. आश्चर्य इस बात का है कि इस स्कीम का सबसे ज़्यादा फायदा उन राज्यों को हुआ, जहां कांग्रेस को 2009 के लोकसभा चुनाव में ज़्यादा सीटें मिली. इस स्कीम में सबसे ज़्यादा खर्च उन राज्यों में हुआ, जहां कांग्रेस या यूपीए की सरकार है.
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हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.
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करीब पांच दशक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 2 अक्टूबर, 1959 को जिस राजस्थान के नागौर ज़िले में पंचायती राज का शुभारंभ किया था, उसी सूबे की पंचायतों और ग्राम सभाओं की उपेक्षा होना यह साबित करता है कि ग्राम स्वराज का जो सपना महात्मा गांधी और डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने देखा था, वह आज़ादी के 65 वर्षों बाद भी साकार नहीं हो सका.
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पंजाब में नहरों का जाल है. गुजरात और महाराष्ट्र विकसित राज्य की श्रेणी में हैं. बावजूद इसके यहां के किसानों को आत्महत्या करनी प़डती है. इसके मुक़ाबले राजस्थान का शेखावाटी एक कम विकसित क्षेत्र है. पानी की कमी और रेतीली ज़मीन होने के बाद भी यहां के किसानों को देखकर एक आम आदमी के मन में भी खेती का पेशा अपनाने की इच्छा जागृत होती है, तो इसके पीछे ज़रूर कोई न कोई ठोस वजह होगी. आखिर क्या है वह वजह, जानिए इस रिपोर्ट में:
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शायद सरकारें कभी नहीं समझेंगी कि उनके अनसुनेपन का या उनकी असंवेदनशीलता का लोगों पर क्या असर पड़ता है. फिर चाहे वह सरकार दिल्ली की हो या चाहे वह सरकार मध्य प्रदेश की हो या फिर वह सरकार तमिलनाडु की हो. कश्मीर में हम कश्मीर की राज्य सरकार की बात इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि कश्मीर की राज्य सरकार का कहना है कि वह जो कहती है केंद्र सरकार के कहने पर कहती है, और जो करती है वह केंद्र सरकार के करने पर करती है.
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क्या पूर्वोत्तर को तभी याद किया जाएगा, जब कोई सांप्रदायिक हिंसा होगी, जब लोगों का खून पानी बनकर बहेगा? या तब भी उनके संघर्ष को वह जगह मिलेगी, उनकी आवाज़ सुनी-सुनाई जाएगी, जब वे अपने जल, जंगल एवं ज़मीन की लड़ाई के लिए शांतिपूर्ण तरीक़े से विरोध करेंगे? मणिपुर में तेल उत्खनन के मसले पर जारी जनसंघर्ष की धमक आखिर तथाकथित भारतीय मीडिया में क्यों नहीं सुनाई दे रही है? एस बिजेन सिंह की खास रिपोर्ट :-
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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