भारतीय थल सेनाध्यक्ष के साथ एक तऱफ सरकार मज़ाक कर रही है और दूसरी तरफ मीडिया. सरकार बार-बार एक ग़लत बात को सही साबित करने की कोशिश कर रही है. उसे चाहिए कि वह सुप्रीम कोर्ट जाए और वहां कहे कि हिंदुस्तान में किसी भी डेट ऑफ बर्थ के सवाल को हाईस्कूल के सर्टिफिकेट से हल नहीं किया जाएगा, बल्कि उस विभाग का प्रमुख जो डेट ऑफ बर्थ तय करे, उससे हल किया जाएगा.
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आरटीआई को लेकर एक आशंका ज़ाहिर की जाती है कि फाइल नोटिंग के सार्वजनिक होने की वजह से अधिकारी ईमानदार सलाह देने से डरेंगे, लेकिन यह आशंका ग़लत है. इसके विपरीत, हर अधिकारी को अब यह पता होगा कि वह जो कुछ भी लिखता है, वह जन समीक्षा का विषय हो सकता है. यह उस पर जनहित में लिखने का दबाव बनाएगा.
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नए साल की समाप्ति का रास्ता क्या है. हम शुरू करते हैं अन्ना हजारे के अनशन और जेल भरो आंदोलन की धमकी से, जिसके बारे में 27 दिसंबर की दोपहर के बाद पता चल गया था कि उनका यह आंदोलन मुंबई में असफल रहा. दिल्ली की बात कुछ और है. यह ऐसा शहर है, जहां राजनीति का प्रभाव है, शक्ति का केंद्र है, लेकिन मुंबई में ऐसा नहीं है.
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हाल में हुए हाउसिंग घोटाले में नेताओं और बाबुओं का नाम आना उड़ीसा सरकार के लिए चिंता का कारण बना हुआ है, लेकिन यह तो मात्र एक उदाहरण है, क्योंकि ऐसा अन्य राज्यों में भी हो रहा है. इस समय उड़ीसा के मुख्यमंत्री किसी अन्य कारण से परेशानी में हैं.
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शैलेंद्र दुबे जिस उम्र में थे, वह उम्र जाने की नहीं होती. वह बहुत हंसमुख, मिलनसार और ठोस ख्याल के व्यक्ति थे. उन्होंने बहुत ही सादगीपूर्ण जीवन जिया और सादगी के ही रास्ते ईश्वर के पास चले गए. उनकी मित्र मंडली में जिन लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा थी, वे पत्रकार थे.
Tags: Chauthi Duniya, God, Shailendra Dubey, journalist, publisher, simplicity, ईश्वर, चौथी दुनिया, पत्रकार, प्रकाशक, शैलेंद्र दुबे, सादगी Posted in जरुर पढें, मीडिया, समाज by Author: चौथी दुनिया ब्यूरो | No Comments » | Read More... |
चौथी दुनिया उर्दू में प्रकाशित होने वाले पत्रों में से हर सप्ताह एक सर्वश्रेष्ठ पत्र को पुरस्कृत किया जाता है. पुरस्कार के रूप में उक्त पत्र के लेखक को क़ौमी काउंसिल बराए फ़रोग उर्दू द्वारा एक हज़ार रुपये की पुस्तकें प्रदान की जाती हैं.
Tags: Books, Chauthi Duniya, Letters, future, government, support, चौथी दुनिया, पत्र, पुस्तक, भविष्य, समर्थन, सरकार Posted in चौथी दुनिया, जरुर पढें, मीडिया, समाज, साहित्य by Author: चौथी दुनिया ब्यूरो | No Comments » | Read More... |
पांच जून, 1975 को पटना के गांधी मैदान में लालू प्रसाद यादव ने कहा था कि इस संसद को आग लगा दो. अगले दिन अ़खबारों ने उनके इसी वाक्य को इस समाचार का शीर्षक बनाया. लालू यादव उस व़क्त छात्रनेता थे, युवा थे और जयप्रकाश जी के आंदोलन के महत्वपूर्ण आंदोलनकारी थे. 29 दिसंबर, 2011 को लालू यादव सचमुच संसद को आग लगाने का काम कर रहे थे.
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साहित्य और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है. जब से साहित्यिक लेखन की शुरुआत हुई है, तभी से विषयों को लेकर मतांतर भी हैं. उसी मतांतर की परिणति विवादों में होती है. कुछ विवाद घोर साहित्यिक होते हैं
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अन्ना हजारे के ख़िला़फ सरकारी मुहिम के स्वयंभू अगुवा रहे कपिल सिब्बल लंबे समय से राजनीतिक परिदृश्य से ग़ायब थे. विवाद प्रिय नेता होने के बावजूद सिब्बल की मीडिया और विवाद से दूरी आश्चर्य चकित ही नहीं करती थी, बल्कि चौंका भी रही थी.
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प्रेस काउंसिल के नए चेयरमैन ने कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया है, जिसकी वजह से मीडिया में अ़फरा-त़फरी का माहौल बन गया. इसके पीछे प्रेस काउंसिल का मक़सद स़िर्फ इतना था कि वह प्रेस के क्रिया-कलापों व मानकों पर नज़र रख सकेऔर अपने सीमित अधिकारों के सहारे शिकायतों को देख सके.
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प्रेसीडेंट बुश के ऊपर जूता क्या चला, सारी दुनिया में जूतों की बहार आ गई. हमारे देश में भी यह दूसरा या तीसरा वाक़िया है, जब राजनेताओं के ऊपर हमले हुए. जनार्दन द्विवेदी पर जूता फेंका गया और अब शरद पवार को एक शख्स ने थप्पड़ मारा. ये घटनाएं दो तरह के संकेत देती हैं. पहला संकेत यह है कि देश में लोकतांत्रिक मूल्यों से नौजवानों का भरोसा उठ रहा है. उन्हें यह लगता है कि धरना-प्रदर्शन, भूख हड़ताल, सिविल ना़फरमानी, ये शब्द बेमानी हो गए हैं और इनके ऊपर अमल करने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है.
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आप सांसद हैं, देवता नहीं |
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