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Gandhi ki dharohar par custom duty
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Azadi Ki Doosri Ladai Part-6
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Archive for the ‘कला और संस्कृति’ Category
ग्रामसभा के अधिकार
ग्रामसभा के अधिकार

  1.            ग्राम संबंधी भूमि व्यवस्था एवं भू-राजस्व संबंधी जो भी अभिलेख, अधिकार आदि आज तहसील (तालुका) या अंचल को हैं, वे सब ग्रामसभा में निहित होंगे, जैसे-ज़मीन की बिक्री, आवंटन आदि के अधिकार. 2.            बड़ी सिंचाई योजनाओं में गांव के खेतों में पानी के बंटवारे का अधिकार या सिंचाई के स्थानीय स्रोतों पर ग्रामसभा [...]

Tags: ग्रामसभा का कर्तव्य, ग्रामसभा के अधिकार
Posted in कला और संस्कृति, जरुर पढें, समाज by Author: ठाकुर दास बंग | No Comments » | Read More...
विवाद के साये में पुस्तक मेला
विवाद के साये में पुस्तक मेला

हर साल आयोजित दिल्ली विश्‍व पुस्तक मेला इस बार कई मायनों में अहम है. नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक एमए सिकंदर ने पिछले साल यह ऐलान किया था और कहा था कि उन्हें कुछ व़क्त दिया जाए, तो वह बेहतर आयोजन कर सकते हैं. उस व़क्त सिकंदर ने एनबीटी का पदभार ग्रहण ही किया था. [...]

Tags: एग्रीमेंट, छपवाने, प्रकाशक, लेखक, लेखकों-प्रकाशकों, वाणी प्रकाशन, संस्थान, साहित्येत्तर, हिंदी
Posted in कला और संस्कृति by Author: अनंत विजय | No Comments » | Read More...
प्रकृति से जु़डी है हमारी संस्कृति
प्रकृति से जु़डी है हमारी संस्कृति

इंसान ही नहीं दुनिया की कोई भी नस्ल जल, जंगल और ज़मीन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती. ये तीनों हमारे जीवन का आधार हैं. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने प्रकृति को विशेष महत्व दिया है. पहले जंगल पूज्य थे, श्रद्धेय थे. इसलिए उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए मंत्रों का सहारा लिया गया. मगर गुज़रते व़क्त के साथ जंगल से जु़डी भावनाएं और संवेदनाएं भी बदल गई हैं.

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Posted in कला और संस्कृति, जरुर पढें, समाज, साहित्य by Author: फ़िरदौस ख़ान | No Comments » | Read More...
फिल्‍मों में लोक संगीत
फिल्‍मों में लोक संगीत

भारत गांवों का देश है. गांवों में ही हमारी लोक कला और लोक संस्कृति की पैठ है. लेकिन गांवों के शहरों में तब्दील होने के साथ-साथ हमारी लोककलाएं भी लुप्त होती जा रही हैं. इन्हीं में से एक है लोक संगीत. संगीत हमारी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है. संगीत के बिना ज़िंदगी का तसव्वुर करना भी बेमानी लगता है. संगीत को इस शिखर तक पहुंचाने का श्रेय बोलती फिल्मों को जाता है.

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Posted in कला और संस्कृति, जरुर पढें, फिल्म by Author: फ़िरदौस ख़ान | No Comments » | Read More...
वजूद खो रही है भाषाएं
वजूद खो रही है भाषाएं

जब से इंसान ने एक दूसरे को समझना शुरू किया होगा, तभी से उसने भाषा के महत्व को भी समझा और जाना होगा. भाषा सभ्यता की पहली निशानी है. किसी भी समाज की संस्कृति और सभ्यता की जान उसकी भाषा में ही बसी होती है. किसी भाषा का खत्म होना, उस समाज का वजूद मिट जाना है, उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास के पन्नों में सिमट जाना है. इंसान के आधुनिक होने में उसकी भाषा का सबसे ब़डा योगदान रहा होगा, क्योंकि इसके ज़रिये ही उसने अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई होगी.

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Posted in कला और संस्कृति, कानून और व्यवस्था, राज्य, विधि-न्याय, समाज, साहित्य, स्टोरी-6 by Author: फ़िरदौस ख़ान | 1 Comment » | Read More...
राजस्‍थान का नंदीग्राम नवलगढ़ : सीमेंट फैक्‍ट्री के लिए भूमि अधिग्रहण
राजस्‍थान का नंदीग्राम नवलगढ़ : सीमेंट फैक्‍ट्री के लिए भूमि अधिग्रहण

बिन पानी सब सून. राजस्थान के अर्द्ध मरुस्थलीय इलाक़े शेखावाटी की हालत कुछ ऐसी ही है. यहां के किसानों को बोरवेल लगाने की अनुमति नहीं है. भू-जल स्तर में कमी का खतरा बताकर सरकार उन्हें ऐसा करने से रोकती है. दूसरी ओर राजस्थान सरकार ने अकेले झुंझुनू के नवलगढ़ में तीन सीमेंट फैक्ट्रियां लगाने की अनुमति दे दी है. इसमें बिड़ला की अल्ट्राटेक और बांगड़ ग्रुप की श्री सीमेंट कंपनी शामिल है.

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Posted in आंदोलन, कला और संस्कृति, कवर स्टोरी-2, कानून और व्यवस्था, पर्यावरण, राज्य, विधि-न्याय, समाज by Author: अभिषेक रंजन सिंह | 1 Comment » | Read More...
मन को छूते मेरे गीत
मन को छूते मेरे गीत

गीत मन के भावों की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति हैं. साहित्य ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक मेरे गीत में सतीश सक्सेना ने भी अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर गीतों की रचना की है. वह कहते हैं कि वास्तव में मेरे गीत मेरे हृदय के उद्‌गार हैं. इनमें मेरी मां है, मेरी बहन है, मेरी पत्नी है, मेरे बच्चे हैं. मैं उन्हें जो देना चाहता हूं, उनसे जो पानी चाहता, वही सब इनमें है.

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Posted in कला और संस्कृति, जरुर पढें, समाज, साहित्य by Author: फ़िरदौस ख़ान | No Comments » | Read More...
अ़खबारों से ग़ायब होता साहित्य
अ़खबारों से ग़ायब होता साहित्य

साहित्य समाज का आईना होता है. जिस समाज में जो घटता है, वही उस समाज के साहित्य में दिखलाई देता है. साहित्य के ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे खुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. जिस समाज का साहित्य जितना ज़्यादा उत्कृष्ट होगा, वह समाज उतना ही ज़्यादा सुसंस्कृत और समृद्ध होगा.

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Posted in कला और संस्कृति, कानून और व्यवस्था, जरुर पढें, समाज, साहित्य by Author: फ़िरदौस ख़ान | No Comments » | Read More...
कैसे बचेगी गंगा-जमुनी तहजीब
कैसे बचेगी गंगा-जमुनी तहजीब

गंगा की निर्मलता तभी संभव है, जब गंगा को अविरल बहने दिया जाए. यह एक ऐसा तथ्य है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है, लेकिन गंगा की स़फाई के नाम पर पिछले 20 सालों में हज़ारों करोड़ रुपये बहा दिए गए और नतीजे के नाम पर कुछ नहीं मिला. एक ओर स़फाई के नाम पर पैसों की लूटखसोट चलती रही और दूसरी ओर गंगा पर बांध बना-बनाकर उसके प्रवाह को थामने की साजिश होती रही.

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Posted in कला और संस्कृति, कानून और व्यवस्था, पर्यावरण, विधि-न्याय, समाज, स्टोरी-6 by Author: शशि शेखर | No Comments » | Read More...
ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें
ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें

बीसवीं सदी के मशहूर शायरों में जां निसार अख्तर को शुमार किया जाता है. उनका जन्म 14 फरवरी, 1914 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक सुन्नी मुस्लिम परिवार में हुआ. उनके पिता मुज़्तर खैराबादी मशहूर शायर थे. उनके दादा फज़ले-हक़ खैराबादी मशहूर इस्लामी विद्वान थे. जां निसार अख्तर ने ग्वालियर के विक्टोरिया हाई स्कूल से दसवीं पास की. इसके बाद आगे की प़ढाई के लिए वह अलीग़ढ चले गए, जहां उन्होंने अलीग़ढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री हासिल की.

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Posted in कला और संस्कृति, जरुर पढें, समाज, साहित्य by Author: फ़िरदौस ख़ान | 1 Comment » | Read More...
उत्तराखंडः पिंडरगंगा घाटी, ऐसा विकास किसे चाहिए
उत्तराखंडः पिंडरगंगा घाटी, ऐसा विकास किसे चाहिए

पिंडरगंगा घाटी, ज़िला चमोली, उत्तराखंड में प्रस्तावित देवसारी जल विद्युत परियोजना के विरोध में वहां की जनता का आंदोलन जारी है. गंगा की सहायक नदी पिंडरगंगा पर बांध बनाकर उसे खतरे में डालने की कोशिशों का विरोध जारी है. इस परियोजना की पर्यावरणीय जन सुनवाई में भी प्रभावित लोगों को बोलने का मौक़ा नहीं मिला. आंदोलनकारी इस परियोजना में प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं.

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Posted in आंदोलन, आर्थिक, कला और संस्कृति, कानून और व्यवस्था, पर्यावरण, राजनीति, राज्य, विधि-न्याय, समाज, स्टोरी-6 by Author: शशि शेखर | No Comments » | Read More...
मैंने तो अपनी भाषा को प्यार किया है
मैंने तो अपनी भाषा को प्यार किया है

हर भाषा की अपनी अहमियत होती है. फिर भी मातृभाषा हमें सबसे प्यारी है. क्योंकि उसी ज़ुबान में हम बोलना सीखते हैं. बच्चा सबसे पहले मां ही बोलता है. इसलिए भी मातृभाषा हमें सबसे ज़्यादा प्रिय है. लेकिन देखने में आता है कि कुछ लोग जिस भाषा के सहारे ज़िंदगी बसर करते हैं यानी जिस भाषा में लोगों से संवाद क़ायम करते हैं, उसी को तुच्छ समझते हैं.

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Posted in कला और संस्कृति, जरुर पढें, समाज, साहित्य by Author: फ़िरदौस ख़ान | No Comments » | Read More...

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