उत्तर प्रदेश के चुनाव में या फिर सभी पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में एक बड़ा सवाल उभर कर सामने आया है कि हम लोकतंत्र के प्रति संवेदनशील हैं भी या नहीं. चुनाव के व़क्त सभी पार्टियां अपना अच्छा चेहरा जनता के पास लाती हैं. अच्छा चेहरा लाने का मतलब होता है उनका घोषणापत्र, जिसमें वे झूठे ही सही, लेकिन वायदे करती हैं. उन वायदों में जहां एक तरफ आम लोगों को यह बताया जाता है कि पार्टी उनके लिए क्या करने वाली है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी यह भी दर्शाती है कि वह लोगों के प्रति कितनी ईमानदार और संवेदनशील है.
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उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड, यह नाम सुनते ही एक ऐसी तस्वीर सामने उभर कर आती है, जहां भूख है, सूखा है, मौत है और घरों में लटके ताले हैं. जिन घरों में ताले नहीं लगे हैं, वहां स़िर्फ बुज़ुर्ग है, जो दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में पलायन कर चुके अपने बच्चों द्वारा भेजे गए पैसों की वजह से जिंदा है, न कि केंद्र या सूबे की सरकार के अनुदान से. एक आंकड़े के मुताबिक़, पिछले पांच सालों में बुंदेलखंड से ढाई लाख से ज़्यादा लोग पलायन कर चुके हैं.
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उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी अपना दमखम दिखाने की पुरजोर कोशिश में है. जबसे भाजपा ने बसपा के भ्रष्ट मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को अपनाया है, तबसे भाजपा की परेशानियां बढ़ गई हैं. भाजपा कुशवाहा के ज़रिए जहां बसपा के घोटालों को उजागर करेगी, वहीं मौर्य, सैनी एवं कुशवाहा आदि के क़रीब 8 प्रतिशत वोट भी अपने पाले में खींच लेगी. अब तक कोई मुद्दा अपने पक्ष में न कर पाने वाली भाजपा अब उस रास्ते पर चल निकली है, जहां से उसे एक बड़ी स़फलता मिल सके.
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अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का इन पांच राज्यों में न घूमना शुभ संकेत है. शुभ संकेत इसलिए है, क्योंकि अन्ना हजारे की भाषा कांग्रेस विरोधी थी और बाबा रामदेव तो कांग्रेस की जड़ में मट्ठा डालने का ही काम कर रहे थे. इससे ये जनता की शक्ति के प्रतीक न बने रहकर कांग्रेस पार्टी की विरोधी ताक़त के प्रतीक बन रहे थे. इन्होंने कभी जनता की ताक़त, खराब होते लोकतंत्र, खराब होते चुनाव और आशाएं तोड़ते नेताओं को अपना निशाना नहीं बनाया.
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सेवा यात्रा के क्रम में पिछले दिनों मुख्यमंत्री मधुबनी के राजकीय अंबेडकर आवासीय स्कूल में गए तो उन्हें कुछ चौंकाने वाले सवालों से रूबरू होना पड़ा. एक छात्र ने कहा कि छत से पानी टपकता है, तो दूसरे ने कहा कि यहां शौचालय नहीं है. मुख्यमंत्री ने शिक्षा सचिव अंजनी सिंह से कहा कि बिना शौचालय के आवासीय स्कूल कैसे हो सकता है.
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एक समय सरपंच ग्राम पंचायत का सबसे महत्वपूर्ण पद माना जाता था, लेकिन बिहार में इस पद की अहमियत कम होने लगी है. लगभग ढाई दशक बाद बिहार में वर्ष 2001 में पंचायत के चुनाव हुए तो लोगों को लगा कि ग्राम स्वराज का जो सपना महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने देखा था, वह साकार होने वाला है.
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जनता और जनप्रतिनिधियों का आमना-सामना पांच सालों में स़िर्फ एक बार ही होता है. वह तब, जब विधायक जी विधायक बनने की आस में जनता के आगे हाथ फैलाकर वोटों की भीख मांगते हैं. चुनाव खत्म होते ही जनप्रतिनिधि असली रंग रूप में आ जाते हैं.
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उत्तर प्रदेश में परिसीमन के कारण कुछ विधानसभा सीटों का सियासी समीकरण बिग़ड गया है. 13 सीटों पर हालत कुछ ऐसे बन गए हैं कि 13 सीटों पर विधायकों की जीत पर संशय पैदा हो गया है.
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मुस्लिम विद्वान को पहले नियुक्त किया और फिर उन्हें हटा दिया. इस घटना को अभी अधिक दिन नहीं हुए थे कि उसने सलमान रुश्दी और सैटेनिक वर्सेस का मुद्दा छेड़ दिया. उसने कहा कि सलमान रुश्दी को वीज़ा न देकर भारत आने से रोक दिया जाए. तस्लीमा नसरीन को भी धमकी दी जाती है. वह बांग्लादेश की हैं और एक महिला भी हैं. यहां तक कि वामदल भी तस्लीमा नसरीन और उनकी मानवाधिकार की लड़ाई में उनके साथ नहीं है
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भूतपूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता स्वर्गीय इंदिरा गांधी का नाम आते ही ज़हन में एक ऐसी महिला की तस्वीर उभर आती है, जिसने कभी झुकना और हारना नहीं सीखा था. ताउम्र उनका विवादों से नाता रहा. देश में इमरजेंसी लगाने जैसा फैसला इंदिरा गांधी जैसी नेता ही ले सकती थीं, यह बात इमरजेंसी का विरोध करने वाले भी कहने से परहेज़ नहीं करते.
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उत्तर प्रदेश के चुनाव का सवाल क्या है, और उत्तर प्रदेश के चुनाव में किन सवालों के जवाब जनता देगी. इसके बारे में स़िर्फ इतना कहना चाहते हैं कि जिन सवालों पर जनता को जवाब देना चाहिए, वे सवाल जनता के सामने नहीं लाए जा रहे हैं. जिन सवालों पर जनता को खामोश रहना चाहिए, वे सवाल उनके सामने लाए जा रहे हैं. लोगों के इमोशन से भी खेलने की कोशिश हो रही है.
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उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र जहां मुलायम सिंह ने मुसलमानों की रहनुमाई का किरदार निभाने के लिए आज़म खां को आगे कर रखा है. खरी बात कहने वाले आज़म खां फायर ब्रांड मुस्लिम नेता हैं. मुलायम के साथ अधिकतर जनसभाओं में मंच पर एक साथ संगत करते हुए देखे जाते हैं.
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अन्ना और रामदेव ने जनता का विश्वास खो दिया |
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