यह आम आदमी की पार्टी है

भारतीय राजनीति का एक शर्मनाक पहलू यह है कि देश के राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों की कमान चंद परिवारों तक सीमित हो गई है. कुछ अपवाद हैं, लेकिन वे अपवाद ही हैं. अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश के प्रजातंत्र के लिए खतरा पैदा हो जाएगा. राजनीतिक दलों और देश के महान नेताओं की कृपा से यह खतरा हमारी चौखट पर दस्तक दे रहा है, लेकिन वे देश की जनता का मजाक उड़ा रहे हैं.

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उड़ीसा ने अन्‍ना हजारे को सिर-आंखों पर बैठाया : राजनीति को नए नेतृत्‍व की जरूरत है

अन्ना हजारे कार्यकर्ता सम्मेलन में शिरकत करने के लिए उड़ीसा दौरे पर गए. उनकी अगवानी करने के लिए बीजू पटनायक हवाई अड्डे पर हज़ारों लोग मौजूद थे, जो अन्ना हजारे जिंदाबाद, भ्रष्टाचार हटाओ और उड़ीसा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के नारे लगा रहे थे. अन्ना ने कहा कि हमारा काम बहुत बड़ा है और किसी को भी खुद प्रसिद्धि पाने के लिए यह काम नहीं करना है.

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हम तो ख़ुद अपने हाथों बेइज़्ज़त हो गए

जी न्यूज़ नेटवर्क के दो संपादक पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए. इस गिरफ्तारी को लेकर ज़ी न्यूज़ ने एक प्रेस कांफ्रेंस की. अगर वे प्रेस कांफ्रेंस न करते तो शायद ज़्यादा अच्छा रहता. इस प्रेस कांफ्रेंस के दो मुख्य बिंदु रहे. पहला यह कि जब अदालत में केस चल रहा है तो संपादकों को क्यों गिरफ्तार किया गया और दूसरा यह कि पुलिस ने धारा 385 क्यों लगाई, उसे 384 लगानी चाहिए थी. नवीन जिंदल देश के उन 500 लोगों में आते हैं, जिनके लिए सरकार, विपक्षी दल और पूरी संसद काम कर रही है.

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षडयंत्र के साये में भाजपा

भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को समझे बिना आने वाले समय में क्या होगा, इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता. भारतीय जनता पार्टी संसद में प्रमुख विपक्षी पार्टी है और कई राज्यों में उसकी सरकारें हैं. इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी, जो 2014 के चुनाव में दिल्ली की गद्दी पर दांव लगाने वाली है, इस समय सबसे ज़्यादा परेशान दिखाई दे रही है. यशवंत सिन्हा, गुरुमूर्ति, अरुण जेटली, नरेंद्र मोदी एवं लालकृष्ण आडवाणी के साथ सुरेश सोनी ऐसे नाम हैं, जो केवल नाम नहीं हैं, बल्कि ये भारतीय जनता पार्टी में चल रहे अवरोधों, गतिरोधों, अंतर्विरोधों और भारतीय जनता पार्टी पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश करने वाली तोपों के नाम हैं.

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मध्‍य प्रदेश: पुलिस बर्बरता के शिकार हुए किसान

भूमि अधिग्रहण के लिए सरकार भले ही एक मज़बूत क़ानून बनाने की बात कर रही हो, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है. यही वजह है कि देश की सभी राजनीतिक पार्टियां किसानों और मज़दूरों के हितों की अनदेखी करते हुए निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने में जुटी हैं. बात चाहे कांग्रेस शासित महाराष्ट्र की हो या फिर भाजपा शासित मध्य प्रदेश की, हालात कमोबेश एक जैसी ही हैं.

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भविष्य के भ्रष्टाचारियों के कुतर्क

बहुत चीजें पहली बार हो रही हैं. पूरा राजनीतिक तंत्र भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है. पहले भ्रष्टाचार का नाम लेते थे, तो लोग अपने आगे भ्रष्टाचारी का तमगा लगते देख भयभीत होते हुए दिखाई देते थे, पर अब ऐसा नहीं हो रहा है. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ जो भी बोलता है, उसे अजूबे की तरह देखा जाता है. राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े हुए लोग चाहते हैं कि यह आवाज़ या इस तरह की आवाज़ें न निकलें और जो निकालते भी हैं, उनके असफल होने की कामना राजनीतिक दल करते हैं और राजनीतिक दल से जुड़े हुए लोग इसका उपाय बताते हैं कि भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाने वाले लोग कैसे असफल होंगे.

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किसानों पर गोलियां चलाने से हल नहीं निकलेगा

भारत भी अजीब देश है. यहां कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सारे दरवाज़े खोल देती है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें लाभ पहुंचाने के लिए नियम-क़ानून भी बदल दिए जाते हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके हितों की रक्षा सरकारी तंत्र स्वयं ही कर देता है, मतलब यह कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती और उन्हें बिना शोर-शराबे के फायदा पहुंचा दिया जाता है.

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गुजरात चुनाव मुसलमान और कांग्रेस

अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो गई है. कांग्रेस पार्टी ने अगले चुनाव की कमान राहुल गांधी को सौंप दी है. राहुल गांधी को 2014 के लोकसभा चुनाव की समन्वय समिति का प्रमुख बनाया गया है. राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, यह बात पहले से ही तय है. इसमें कोई नई बात नहीं है. इस समिति में वही पुराने चेहरे हैं, जो अब तक कांग्रेस की रणनीति बनाते आए हैं. इसलिए कुछ नया होगा, इसकी उम्मीद नहीं है. लेकिन सवाल यह है कि मुसलमानों के लिए इसमें नया क्या है? सवाल यह है कि जिस तरह उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने मुसलमानों को धोखा देकर वोट लेने की कोशिश की, क्या फिर से वही खेल खेला जाएगा?

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अन्ना हजारे की प्रासंगिकता बढ़ गई

कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की पूरी कोशिश है कि अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे आपस में लड़ जाएं. अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे इस तथ्य को कितना समझते हैं, पता नहीं. लेकिन अगर उन्होंने इसके ऊपर ध्यान नहीं दिया, तो वे सारे लोग जो उनके प्रशंसक हैं, न केवल भ्रमित हो जाएंगे, बल्कि निराश भी हो जाएंगे.

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48 लाख करोड़ का महाघोटाला

जबसे यूपीए सरकार बनी है, तबसे देश में घोटालों का तांता लग गया है. देश के लोग यह मानने लग गए हैं कि मनमोहन सिंह सरकार घोटालों की सरकार है. एक के बाद एक और एक से बड़ा एक घोटाला हो रहा है. चौथी दुनिया ने जब 26 लाख करोड़ रुपये के कोयला घोटाले का पर्दाफाश किया था, तब किसी को यह यकीन भी नहीं हुआ कि देश में इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया जा सकता है.

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दवा कंपनियां, डॉक्‍टर और दुकानदार: आखिर इस मर्ज की दवा क्‍या है

दवा, डॉक्टर एवं दुकानदार के प्रति भोली-भाली जनता इतना विश्वास रखती है कि डॉक्टर साहब जितनी फीस मांगते हैं, दुकानदार जितने का बिल बनाता है, को वह बिना किसी लाग-लपेट के अपना घर गिरवी रखकर भी चुकाती है. क्या आप बता सकते हैं कि कोई घर ऐसा है, जहां कोई बीमार नहीं पड़ता, जहां दवाओं की ज़रूरत नहीं पड़ती? यानी दवा इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे अधिक है. किसी न किसी रूप में लगभग सभी लोगों को दवा का इस्तेमाल करना पड़ता है, कभी बदन दर्द के नाम पर तो कभी सिर दर्द के नाम पर.

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अन्ना हजारे नेता नहीं, जननेता हैं

शायद जयप्रकाश नारायण और कुछ अंशों में विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद देश के किसी नेता को जनता का इतना प्यार नहीं मिला होगा, जितना अन्ना हजारे को मिला है. मुझे लगा कि अन्ना हजारे के साथ कुछ समय बिताया जाए, ताकि पता चले कि जनता उन्हें किस नज़रिए से देखती है और उन्हें क्या रिस्पांस देती है.

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जनरल वी के सिंह और अन्‍ना हजारे की चुनौतियां

भारत में लोकतंत्र की इतनी दुर्दशा आज़ादी के बाद कभी नहीं हुई थी. संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन विडंबना यह है कि आज संसदीय लोकतंत्र को चलाने वाले सारे दलों का चरित्र लगभग एक जैसा हो गया है. चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या अन्य राजनीतिक दल, जिनका प्रतिनिधित्व संसद में है या फिर वे सभी, जो किसी न किसी राज्य में सरकार में हैं, सभी का व्यवहार सरकारी दल जैसा हो गया है.

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कांग्रेस में अपनी ढपली-अपना राग : राहुल गांधी की फिक्र किसी को नहीं

कांग्रेस में राहुल गांधी के भविष्य की चिंता किसी को नहीं है. अगर है, तो फिक़्र अपने-अपने मुस्तकबिल की. पार्टी में रणनीतिकार की भूमिका निभाने वाले कई नेताओं के लिए राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की बजाय एक मोहरा भर हैं. राहुल गांधी की आड़ में उक्त नेता कांग्रेस पार्टी पर अपनी हुकूमत चलाना चाहते हैं. लिहाज़ा उनके बीच घमासान इस बात का नहीं है कि आम चुनावों से पहले पार्टी की साख कैसे बचाई जाए, बल्कि लड़ाई इस बात की है कि राहुल गांधी को अपने-अपने कब्ज़े में कैसे रखा जाए, ताकि सरकार और पार्टी उनके इशारों पर करतब दिखाए.

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फर्रु़खाबाद को अब धोखा बर्दाश्त नहीं

अरविंद केजरीवाल फर्रु़खाबाद गए भी और दिल्ली लौट भी आए. सलमान खुर्शीद को सद्बुद्धि आ गई और उन्होंने अपनी उस धमकी को क्रियान्वित नहीं किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि केजरीवाल फर्रु़खाबाद पहुंच तो जाएंगे, लेकिन वापस कैसे लौटेंगे. इसका मतलब या तो अरविंद केजरीवाल के ऊपर पत्थर चलते या फिर गोलियां चलतीं, दोनों ही काम नहीं हुए.

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एक नहीं, देश को कई केजरीवाल चाहिए

साधारण पोशाक में किसी आम आदमी की तरह दुबला-पतला नज़र आने वाला शख्स, जो बगल से गुजर जाए तो शायद उस पर किसी की नज़र भी न पड़े, आज देश के करोड़ों लोगों की नज़रों में एक आशा बनकर उभरा है. तीखी बोली, तीखे तर्क और ज़िद्दी होने का एहसास दिलाने वाला शख्स अरविंद केजरीवाल आज घर-घर में एक चर्चा का विषय बन बैठा है. अरविंद केजरीवाल की कई अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयां भी हैं. उनकी अच्छाइयों और बुराइयों का विश्लेषण किया जा सकता है, लेकिन इस बात पर दो राय नहीं है कि देश में आज भ्रष्टाचार के खिला़फ जो माहौल बना है, उसमें अरविंद केजरीवाल का बड़ा योगदान है.

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सीमेंट कारखानों के लिए भूमि अधिग्रहण : किसान आखिरी दम तक संघर्ष करें

देश में जब भी भूमि अधिग्रहण की बात होती है, तो सरकार का इशारा आम आदमी और किसान की तऱफ होता है. आज़ादी के बाद से दस करोड़ लोग भूमि अधिग्रहण की वजह से विस्थापित हुए हैं. अपनी माटी से अलग होने वालों में कोई पूंजीपति वर्ग नहीं होता. विकास की क़ीमत हमेशा आम आदमी को ही चुकानी पड़ी है. जिनके पास धन है, वे दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में अपने मनमाफिक मकान ख़रीद सकते हैं, लेकिन वह आम आदमी, जिसके पास अपनी जीविका और रहने के लिए ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा है, उसे बेचकर आख़िर वह कहां जाएगा? ऐसे कई ज्वलंत सवालों पर पेश है चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…

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यह पत्रकारिता का अपमान है

मीडिया को उन तर्कों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जिन तर्कों का इस्तेमाल अपराधी करते हैं. अगर तुमने बुरा किया तो मैं भी बुरा करूंगा. मैंने बुरा इसलिए किया, क्योंकि मैं इसकी तह में जाना चाहता था. यह पत्रकारिता नहीं है और अफसोस की बात यह है कि जितना ओछापन भारत की राजनीति में आ गया है, उतना ही ओछापन पत्रकारिता में आ गया है, लेकिन कुछ पेशे ऐसे हैं, जिनका ओछापन पूरे समाज को भुगतना पड़ता है. अगर न्यायाधीश ओछापन करें तो उससे देश की बुनियाद हिलती है.

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यूपीए सरकार का नया कारनामा : किसान कर्ज माफी घोटाला

आने वाले दिनों में यूपीए सरकार की फिर से किरकिरी होने वाली है. 52,000 करोड़ रुपये का नया घोटाला सामने आया है. इस घोटाले में ग़रीब किसानों के नाम पर पैसों की बंदरबांट हुई है. किसाऩों के ऋण मा़फ करने वाली स्कीम में गड़बड़ी पाई गई है. इस स्कीम का फायदा उन लोगों ने उठाया, जो पात्र नहीं थे. इस स्कीम से ग़रीब किसानों को फायदा नहीं मिला. आश्चर्य इस बात का है कि इस स्कीम का सबसे ज़्यादा फायदा उन राज्यों को हुआ, जहां कांग्रेस को 2009 के लोकसभा चुनाव में ज़्यादा सीटें मिली. इस स्कीम में सबसे ज़्यादा खर्च उन राज्यों में हुआ, जहां कांग्रेस या यूपीए की सरकार है.

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सेवानिवृत्‍त लेफ्टिनेंट कमांडर बेनीवाल : नियमों के जाल में उलझी पेंशन

तमाम सर्वे बताते हैं कि आज के युवा सेना में नौकरी करने की बजाय अन्य कोई पेशा अपनाना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि सेना की नौकरी के आकर्षण में कोई कमी आई हो या फिर वहां मिलने वाली सुविधाओं में कोई कटौती की गई हो, बावजूद इसके विभिन्न वजहों से सेना में नए अधिकारियों की कमी दिख रही है. उन्हीं वजहों में से एक है पेंशन का मामला. सेना में पेंशन विसंगतियों को लेकर संभवत: पहली बार कोई रिटायर्ड नौसेना अधिकारी सार्वजनिक रूप से सामने आया है. आखिर क्या है पूरी कहानी, पढ़िए चौथी दुनिया की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में….

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फर्रुख़ाबाद को बदनाम मत कीजिए

मैं अभी तक पसोपेश में था कि सलमान खुर्शीद के खिला़फ कुछ लिखना चाहिए या नहीं. मेरे लिखे को सलमान खुर्शीद या सलमान खुर्शीद की जहनियत वाले कुछ और लोग उसके सही अर्थ में शायद नहीं लें. इसलिए भी लिखने से मैं बचता था कि मेरा और सलमान खुर्शीद का एक अजीब रिश्ता है. फर्रुख़ाबाद में हम दोनों पहली बार लोकसभा के चुनाव में आमने-सामने थे और चुनाव में सलमान खुर्शीद की हार और मेरी जीत हुई थी.

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बिना ब्‍याज का कर्ज और सस्‍ती जमीन: यह रिश्‍वत नहीं तो क्‍या है

नए-नए बने राजनीतिक दल (अरविंद केजरीवाल द्वारा घोषित) ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर एक साथ कई आरोप लगाए हैं. इन तमाम आरोपों में कई चीजें शामिल हैं और इनमें कई तथ्य एवं आंकड़े बहुत ही बड़े हैं, लेकिन इस सबके बीच अगर सिद्धांत की बात की जाए तो दो चीजें एकदम स्पष्ट हैं. पहला यह कि रॉबर्ट वाड्रा की कुल पहचान यही है कि वह सोनिया गांधी के दामाद हैं.

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जन सत्‍याग्रह- 2012 अब सरकार के पास विकल्‍प नहीं है

जन सत्याग्रह मार्च ग्वालियर से 3 अक्टूबर को शुरू हुआ. योजना के मुताबिक़, क़रीब एक लाख किसान ग्वालियर से चलकर दिल्ली पहुंचने वाले थे. इस मार्च में शामिल होने वालों में सभी जाति-संप्रदाय के अदिवासी, भूमिहीन एवं ग़रीब किसान थे. ग्वालियर से आगरा की दूरी 350 किलोमीटर है. हर दिन लगभग दस से पंद्रह किलोमीटर की दूरी तय करता हुआ यह मार्च दिल्ली की तऱफ बढ़ रहा था.

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रॉबर्ट वाड्रा को आरोपों का सामना करना चाहिए

रॉबर्ट वाड्रा ने जो किया, वह अनोखा नहीं है. जो भी बिजनेस में होते हैं, उनमें ज़्यादातर लोग ऐसे ही तरीक़े अपनाते हैं और अपनी संपत्ति बढ़ाते हैं. फर्क़ स़िर्फ इतना है कि उनका जुड़ाव सत्ता से नहीं होता, जबकि रॉबर्ट वाड्रा का रिश्ता सीधे सत्ता से है और सत्ता से भी इतना नज़दीक का कि वह वर्तमान सरकार को नियंत्रित करने वाली सर्वशक्तिमान महिला श्रीमती सोनिया गांधी के दामाद हैं और भारत के भावी प्रधानमंत्री, यदि बने तो, राहुल गांधी के बहनोई हैं.

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सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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जनरल वी के सिंह का आहृवान : भ्रष्‍टाचार के समूल नाश का संकल्‍प लीजिए

देश को बचाने के लिए आज़ादी के संकल्पों को याद करके भ्रष्टाचार के समूल नाश का संकल्प युवा पीढ़ी को लेना होगा, भ्रष्टाचार का कीड़ा देश की रूह को खाए जा रहा है. यह बात पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने अयोध्या-फैज़ाबाद दौरे के दौरान कही. उन्होंने कहा कि सेना को उच्च तकनीक का इस्तेमाल करके ख़ुद को मज़बूत करते रहना चाहिए. पड़ोसी देश चीन यदि अपनी सेना को मज़बूत करता है तो यह उसका हक़ है, हमें भी ख़ुद को तैयार करना होगा.

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गुजरात चुनाव सब की परीक्षा लेगा

गुजरात विधानसभा चुनाव किसके लिए फायदेमंद होगा और किसके लिए नहीं, यह तो आख़िरी तौर पर दिसंबर के आख़िरी हफ्ते में पता चलेगा, जब परिणाम आ जाएंगे. लेकिन परीक्षा किस-किस की है, इसका आकलन करना ज़रूरी है. गुजरात विधानसभा चुनाव में पहली परीक्षा श्रीमती सोनिया गांधी की है. कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के अलावा कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसके जाने से भीड़ इकट्ठी हो सके. यहां तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सभा में भी सारे ख़र्चों और सारी कोशिशों के बावजूद लोगों की संख्या कुछ हज़ारों तक सीमित रहती है.

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एक अफसर का खुलासाः ऐसे लूटा जाता है जनता का पैसा

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एवं शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने अपने पद से इस्ती़फा दे दिया है. हालांकि उनके इस्ती़फे के बाद राज्य में सियासी भूचाल पैदा हो गया है. अजीत पवार पर आरोप है कि जल संसाधन मंत्री के रूप में उन्होंने लगभग 38 सिंचाई परियोजनाओं को अवैध तरीक़े से म़ंजूरी दी और उसके बजट को मनमाने ढंग से बढ़ाया. इस बीच सीएजी ने महाराष्ट्र में सिंचाई घोटाले की जांच शुरू कर दी है.

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अन्‍ना हजारे की नाराजगी का मतलब

अचानक ऐसी क्या बात हो गई कि टीम अन्ना और अन्ना के बीच मतभेद सामने आ गए, ऐसा क्या हो गया कि अन्ना इतने नाराज़ हो गए कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के लोगों से कहा कि न तो आप मेरे नाम का और न मेरे फोटो का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसमें दो बातें हैं. राजनीतिक दल बनाने की घोषणा जंतर-मंतर के आंदोलन के दौरान नहीं हुई थी.

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देशभक्तों और ग़द्दारों की पहचान कीजिए

जब बाबा रामदेव के अच्छे दिन थे, उस समय हिंदुस्तानी मीडिया के कर्णधार उनसे मिलने के लिए लाइन लगाए रहते थे. आज जब बाबा रामदेव परेशानी में हैं तो मीडिया के लोग उन्हें फोन नहीं करते. पहले उन्हें बुलाने या उनके साथ अपना चेहरा दिखाने के लिए एक होड़ मची रहती थी. आज बाबा रामदेव के साथ चेहरा दिखाने से वही सारे लोग दूर भाग रहे हैं. यह हमारे मीडिया का दोहरा चरित्र है.

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