इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता – 1

भारतीय सेना की एक यूनिट है टेक्निकल सर्विस डिवीजन (टीडीएस), जो दूसरे देशों में कोवर्ट ऑपरेशन करती है. यह भारत की ऐसी अकेली यूनिट है, जिसके पास खुफिया तरीके से ऑपरेशन करने की क्षमता है. इसे रक्षा मंत्री की सहमति से बनाया गया था, क्योंकि रॉ और आईबी जैसे संगठनों की क्षमता कम हो गई थी. यह इतनी महत्वपूर्ण यूनिट है कि यहां क्या काम होता है, इसका दफ्तर कहां है, कौन-कौन लोग इसमें काम करते हैं आदि सारी जानकारियां गुप्त हैं, टॉप सीक्रेट हैं, लेकिन 16 अगस्त, 2012 को शाम छह बजे एक सफेद रंग की क्वॉलिस गाड़ी टेक्निकल सर्विस डिवीजन के दफ्तर के पास आकर रुकती है, जिससे दो व्यक्ति उतरते हैं. एक व्यक्ति क्वॉलिस के पास खड़े होकर इंतज़ार करने लगता है और दूसरा व्यक्ति यूनिट के अंदर घुस जाता है.

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पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकारिता की संवैधानिक मान्यता नहीं है, लेकिन हमारे देश के लोग पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े लोगों से ज़्यादा भरोसा करते हैं. हमारे देश के लोग आज भी अ़खबारों और टेलीविजन की खबरों पर धार्मिक ग्रंथों के शब्दों की तरह विश्वास करते हैं.

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भारतीय सेना को बदनाम करने की साजिश का पर्दाफाश

बीते चार अप्रैल को इंडियन एक्सप्रेस के फ्रंट पेज पर पूरे पन्ने की रिपोर्ट छपी, जिसमें देश को बताया गया कि 16 जनवरी को भारतीय सेना ने विद्रोह करने की तैयारी कर ली थी. इस रिपोर्ट से लगा कि भारतीय सेना देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को समाप्त कर फौजी तानाशाही लाना चाहती है. इस रिपोर्ट ने सारे देश में न केवल हलचल पैदा की, बल्कि सेना को लेकर शंका का वातावरण भी पैदा कर दिया. सभी चैनलों पर यह खबर चलने लगी, लेकिन तीन घंटे बीतते-बीतते सा़फ हो गया कि यह रिपोर्ट झूठी है, बकवास है, किसी खास नापाक इरादे से छापी गई है और इसे छपवाने के पीछे एक बड़ा गैंग है, जो हिंदुस्तान में लोकतंत्र को पसंद नहीं करता.

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निज भाषा पर अभिमान करो

हिंदी में प्रकाशित किसी भी कृति-उपन्यास या कहानी संग्रह या फिर कविता संग्रह को लेकर हिंदी जगत में उस तरह का उत्साह नहीं बन पाता है, जिस तरह अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में बनता है. क्या हम हिंदी वाले अपने लेखकों को या फिर उनकी कृतियों को लेकर उत्साहित नहीं हो पाते हैं. हिंदी में प्रकाशक पाठकों की कमी का रोना रोते हैं, जबकि पाठकों की शिकायत किताबों की उपलब्धता को लेकर रहती है.

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राजनीतिज्ञों से डरना चाहिए

राजनीतिज्ञों से डरना चाहिए. पिछले एक महीने की घटी घटनाएं तो यही कह रही हैं. अब वह राजनीतिज्ञ चाहे समाजवादी पार्टी का हो, भारतीय जनता पार्टी का हो या फिर वह कांग्रेस का हो. राजनीतिज्ञ कब क्या करे, कैसे करे, इसके उदाहरण पिछले एक महीने में हमारे सामने बहुत ही खुलेपन के साथ आए हैं.

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खबरों के समंदर में नई लहर

उत्तर प्रदेश में जब भी सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन की बात आती है तो ज़ेहन में सबसे पहले बुदेलखंड का नाम आता है. बुंदेलखंड के ज़्यादातर इलाक़े भुखमरी और सूखे का सालों से सामना करते आ रहे हैं. इस वजह से ही यह इलाक़ा विकास की रफ्तार में सबसे पीछे छूट गया है.

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