बलात्कार और हत्या के जुर्म में दोषियों को फांसी की सजा बलात्कारियों को अदालत ने सुनाई सजाए मौत 

महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में चार साल की बच्ची के साथ बलात्कार के बाद हत्या करने के जुर्म में हिंगोली

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आय से अधिक सम्पत्ति का प्रेत जया के बाद माया पर छाया

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की आय से अधिक संपत्ति उनके लिए विपत्ति का कारण बनी और उन्हें जेल जाना पड़ा.

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पुराने शासन से प्रेम?

इस साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश विधानसभा की 125वीं वर्षगांठ मनाई गई. इस उत्सव के समय जो कुछ भी

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ज़िंदगी से प्यार करती हूँ-जीना चाहती हूँ

अगर आप आयरन लेडी इरोम शर्मिला को देखकर नहीं पिघलते और आपको शर्म नहीं आती, तो फिर आपको आत्म-निरीक्षण की

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इंडियन एक्‍सप्रेस की पत्रकारिता- 2

अगर कोई अ़खबार या संपादक किसी के ड्राइंगरूम में ताकने-झांकने लग जाए और गलत एवं काल्पनिक कहानियां प्रकाशित करना शुरू कर दे तो ऐसी पत्रकारिता को कायरतापूर्ण पत्रकारिता ही कहेंगे. हाल में इंडियन एक्सप्रेस ने एक स्टोरी प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था, सीक्रेट लोकेशन. यह इस अ़खबार में प्रकाशित होने वाले नियमित कॉलम डेल्ही कॉन्फिडेंशियल का एक हिस्सा थी.

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हम तो ख़ुद अपने हाथों बेइज़्ज़त हो गए

जी न्यूज़ नेटवर्क के दो संपादक पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए. इस गिरफ्तारी को लेकर ज़ी न्यूज़ ने एक प्रेस कांफ्रेंस की. अगर वे प्रेस कांफ्रेंस न करते तो शायद ज़्यादा अच्छा रहता. इस प्रेस कांफ्रेंस के दो मुख्य बिंदु रहे. पहला यह कि जब अदालत में केस चल रहा है तो संपादकों को क्यों गिरफ्तार किया गया और दूसरा यह कि पुलिस ने धारा 385 क्यों लगाई, उसे 384 लगानी चाहिए थी. नवीन जिंदल देश के उन 500 लोगों में आते हैं, जिनके लिए सरकार, विपक्षी दल और पूरी संसद काम कर रही है.

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फर्रुख़ाबाद को बदनाम मत कीजिए

मैं अभी तक पसोपेश में था कि सलमान खुर्शीद के खिला़फ कुछ लिखना चाहिए या नहीं. मेरे लिखे को सलमान खुर्शीद या सलमान खुर्शीद की जहनियत वाले कुछ और लोग उसके सही अर्थ में शायद नहीं लें. इसलिए भी लिखने से मैं बचता था कि मेरा और सलमान खुर्शीद का एक अजीब रिश्ता है. फर्रुख़ाबाद में हम दोनों पहली बार लोकसभा के चुनाव में आमने-सामने थे और चुनाव में सलमान खुर्शीद की हार और मेरी जीत हुई थी.

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बड़ी कठिन है न्‍याय की डगर

सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.

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हमें किस हवा के साथ बहना चाहिए?

दुनिया में बहुत सारे देश हैं, जिनमें सरकार, पुलिस, सेना और अदालत एक तरह से सोचते हैं, एक तरह से फैसला लेते हैं और मिलजुल कर देश की संपदा और जनता पर राज करते हैं, लेकिन बहुत सारे देश ऐसे हैं, जहां एक-दूसरे के फैसलों के ऊपर गुण-दोष के आधार पर यह तय होता है कि एक पक्ष दूसरे का साथ दे या न दे.

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पति, पत्नी और बिल्लियां

आपने पति, पत्नी और वह यानी किसी तीसरे व्यक्ति के बारे में ज़रूर सुना होगा. इस तीसरे के कारण कई बार अलगाव भी हो जाता है, लेकिन यरुशलम में एक अजीब मामला सामने आया है, जिसमें पति और पत्नी के बीच बिल्लियां आ गई हैं.

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अंजुमन तरक्‍की उर्दू हिंद : उर्दू माफ़ियाओं में गैंगवार का नया अड्डा

पहले हम मुंबई के अंडरवर्ल्ड के बीच गैंगवार की बातें सुना करते थे, जिसमें दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन या फिर उससे पहले हाजी मस्तान, करीम लाला के विभिन्न गुट अलग-अलग इलाक़ों में अपना वर्चस्व बनाने के लिए एक-दूसरे का ख़ून बहाया करते थे.

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फिल्मों में शपथ

हुज़ूर, मैं पाक क़ुरआन या गीता पर हाथ रखकर क़सम खाता हूं कि जो कुछ कहूंगा सच कहूंगा, सच के अलावा कुछ नहीं कहूंगा, अदालतों में ऐसे संवाद केवल फिल्मों में ही देखे जाते हैं. लेकिन हक़ीक़त में कोई भी शख्स गीता या क़ुरआन की क़सम खाकर गवाही नहीं देता. यह सब खत्म हुए 170 साल हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद फिल्मों में आज भी यह सब चल रहा है.

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विवाद मिलकर सुलझाएं

अदालत ने हॉकी इंडिया और इंडियन हॉकी फेडरेशन (आईएचएफ) से कहा है कि उनकी लड़ाई में खिलाड़ियों के हितों को नुक़सान नहीं होना चाहिए. अदालत ने कहा कि घरेलू सीरीज़ के भविष्य और खिलाड़ियों के हितों को देखते हुए दोनों संस्थाएं मिलकर विवाद सुलझाएं.

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गर्लफ्रेंड से बॉक्सिंग

फ्लायड मेवैदर आजकल अपनी गर्लफ्रेंड से बॉक्सिंग पर उतारू हैं. वर्ल्ड बॉक्सिंग काउंसिल वेल्टरवेट चैंपियन फ्लायड मेवैदर को पिछले दिनों लास वेगास की एक अदालत ने अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड पर हमला करने के आरोप में तीन महीने कैद की सज़ा सुनाई है.

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सूचना की राह के रोड़े

कई बार लोक सूचना अधिकारी किसी आरटीआई आवेदन के जवाब में कहता है कि फलां सूचना तीसरे पक्ष से जुड़ी है, इसलिए आपको नहीं दी जा सकती या मामला अदालत में विचाराधीन है या फिर अमुक सूचना सार्वजनिक करने से संसद की अवमानना होगी

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महाराष्‍ट्रः हर्षवर्द्धन को हाईकोर्ट की फटकार

मुंबई हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस सी धर्माधिकारी ने सहकारिता मंत्री हर्षवर्धन पाटिल के होश उड़ा दिए हैं. स़िर्फ हर्षवर्धन पाटिल ही ऐसे मंत्री नही हैं. अगर आप मंत्रियों के वातानुकूलित कक्ष के पास से गुजरें तो आपको हर जगह एक जैसा अनुभव होगा. अधिकतर मंत्री विलासी प्रवृत्ति के होते हैं. उनकी इस प्रवृत्ति से आम आदमी अचंभित और हैरान-परेशान होता है, परंतु सत्ताधीशों को इस संदर्भ में कोई अफसोस नहीं होता.

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अदालत, अधिग्रहण और आम आदमी : सुप्रिम कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक है

जमीन वह संपत्ति है, जो एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को बस हस्तांतरित करती है यानी कोई इसका मालिक नहीं होता. हां, केयर टेकर कह सकते हैं. ज़मीन और किसान के बीच कुछ ऐसा ही संबंध था. लेकिन 90 के दशक की शुरुआत में उदारीकरण और निजीकरण की आंधी आने के साथ ही ज़मीन और किसान के इस सनातन संबंध को कमज़ोर बनाने का प्रयास किया जाने लगा, जो सरकार, ब्यूरोक्रेसी और उद्योगपतियों की साठगांठ का नतीजा था.

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न्यायपालिका में पारदर्शिता ज़रूरी है

भारत की न्यायपालिका पर काम का बोझ बहुत है, जिसकी वजह से बहुत सारी परेशानियों ने जन्म लिया है. आज ज़रूरत इस बात की है कि हम इसका तोड़ निकालें. साथ ही ज़रूरत है कुछ और विषयों पर सोचने की, जैसे उच्च स्तर पर न्यायपालिका में पारदर्शिता. इसी से जुड़ा हुआ मुद्दा है न्यायपालिका की जवाबदेही का.

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गोधरा फ़ैसला: छलनी से ज्यादा छेद

बीती 22 फ़रवरी को सत्र न्यायालय ने गोधरा रेल आगज़नी मामले में अपना फैसला सुनाया. अदालत ने गुजरात सरकार के इस आरोप को सही ठहराया कि स्थानीय मुसलमानों ने साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगाने का षड्‌यंत्र रचा था. जिन 94 आरोपियों पर मुक़दमा चल रहा था, उनमें से 63 को बरी कर दिया गया और 31 को साज़िश के तहत कारसेवकों को ज़िंदा जलाने का दोषी ठहराया गया

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पटना विधि विज्ञान प्रयोगशाला : सुशासन और विकास का क़डवा सच

न्याय के साथ विकास और अपराध-भ्रष्टाचार मुक्त बिहार बनाने की बातें अच्छी लगती हैं तथा नीतीश कुमार ने अपना यह वादा पूरा करने की हर मुमकिन कोशिश भी की, लेकिन क़ानून का राज अभी पूरी तरह क़ायम नहीं हुआ है. क़ानून का पालन कराने वाली एजेंसी ईमानदारी से काम नहीं कर रही है.

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सरकार जीने का हक़ दे या फिर मौत

अरुणा शानबाग के बहाने देश में इच्छा मृत्यु के मुद्दे को लेकर बहस शुरू हो गई है, मगर क्या कभी सरकार ने यह सोचा है कि भ्रष्टाचार और प्रशासनिक कोताही के कारण कितने लोग नारकीय जीवन जीने पर मजबूर हैं. ये लोग किससे इच्छा मृत्यु की फरियाद करें.

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राष्‍ट्रीय मुकदमा नीतिः देर से सही, एक दुरुस्‍त फैसला

हमारे देश में ज़्यादातर मुक़दमे छोटे झगड़ों और आपसी अहम की लड़ाइयों के नतीजे होते हैं. इनमें कई मुकदमे ऐसे होते हैं, जिन्हें अदालत की जगह घंटों की बातचीत में आसानी से निपटाया जा सकता है.

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नीतीश सरकार को अदालत की फटकार

बिहार में नीतीश सरकार विकास एवं बेहतर कार्य संस्कृति के भले ही लाख दावे कर रही है, पर पटना हाईकोर्ट को लगता है कि सरकार में राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है. अदालत ने तो यहां तक कह दिया कि पटना जंगल है और यहां अफसरों की मिलीभगत से हर काम कराना संभव है.

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हंगामा है क्यों बरपा

छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के उपाध्यक्ष बिनायक सेन को राजद्रोह के मामले में उम्रकैद की सज़ा सुनाई. बिनायक सेन को यह सज़ा कट्टर नक्सलियों के साथ संबंध रखने और उनको सहयोग देने के आरोप में सुनाई गई है.

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भ्रष्टाचार : देश का सरकारी तंत्र स़डने लगा है

आम बड़ा स्वादिष्ट फल है. यह जब कच्चा होता है तो हम इसे नमक के साथ बड़े चाव से खाते हैं और जब पक जाता है तो यह मीठा हो जाता है, तो और भी खाने लायक हो जाता है. कहने का मतलब यह है कि आम प्राकृतिक तरीक़े से बढ़ता है. अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे कच्चा खाएं, अचार बनाएं या फिर पकने का इंतज़ार करें. आम हर हाल में स्वादिष्ट होता है. अगर इसी आम को हम छोड़ दें तो यह सड़ने लग जाएगा. इसका स्वाद ख़त्म हो जाएगा. बीमारी फैलाने वाला फल बन जाएगा. कोई भी तंत्र इसी थ्योरी पर चलता है. किसी तंत्र के सड़ने का मतलब है आंतरिक विरोधाभास पैदा होना. देश में फैले भ्रष्टाचार के साम्राज्य में अंतर्विरोध पैदा होने लगा है. अब यह पूरा तंत्र सड़ने लगा है, इसलिए यह टूटने और बिखरने लगा है. जो लोग पहले मिल-जुलकर देश को लूट रहे थे, आज आपस में लड़ रहे हैं. यही वजह है कि एक अदालत दूसरी अदालत को भ्रष्ट बता रही है, एक राजनीतिक दल दूसरे को घोटालेबाज़ बता रहा है, उद्योगपति एक-दूसरे को जालसाज बता रहे हैं, एक अधिकारी दूसरे अधिकारी के बारे में ख़ुलासा कर रहा है. मीडिया भी इस सड़न से बदबूदार हो रहा है. राजनीतिक दल, सरकारें, अदालतें, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, उद्योगजगत या फिर फिल्मी सितारे सब सड़ चुके हैं. आम का रसास्वादन करने वाले, सरकारी तंत्र से नाजायज फायदा उठाने वाले अब एक-दूसरे पर वार कर रहे हैं. हर तरफ चाकू निकल रहे हैं. यही वजह है कि पिछले पांच महीने में एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं.

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यह परीक्षा की घड़ी है

ऐतिहासिक घटनाएं चुनौतियां लेकर आती हैं. बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद आज़ाद भारत की पहली ऐसी घटना है, जिसने हमारी राष्ट्रीयता और धर्म निरपेक्षता को एक साथ चुनौती दी है. साठ साल से चल रहे विवाद की सुनवाई खत्म हो गई है. अब फैसले का व़क्त आया है. हालांकि यह भी तय है कि फैसला आते ही मामला सुप्रीमकोर्ट पहुंच जाएगा.

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बाबरी मस्जिद-राम जन्‍मभूमि विवादः संघ परिवार और अदालत

हम कई बार यह कहावत सुनते हैं कि जिसकी लाठी उसकी भैंस, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि यह स़िर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि न्याय दर्शन है. आज से क़रीब दो हज़ार साल पहले यूनान में थ्रैसिमेकस ने न्याय को इस तरह परिभाषित किया था. फिर प्लूटो ने न्याय को नैतिकता बताया.

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ग़ैर-जमानती वारंट के बाद भी अधिकारी बहाल

राज्य में भ्रष्टाचार और घोटालों पर लगाम लगाना वैसे ही मुश्किल हो रहा है. उस पर जो मामले अदालत में चल रहे हैं, उनके दोषियों पर कोई कार्रवाई न कर प्रशासन अप्रत्यक्ष रूप से अपराधियों को संदेश दे रहा है कि क़ानून से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है.

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सर्वोच्च न्यायालय का विभाजन : एक खतरनाक खेल

कानून मंत्रालय द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक खंड और अपीलीय खंड में बांटने के मुद्दे का बारीक़ी से परीक्षण किए जाने की ख़बर है. यह विधि आयोग की अनुशंसाओं पर आधारित है. विधि आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को विभाजित करने और संविधान संबंधी मामलों एवं इससे जुड़े दूसरे मसलों को देखने के लिए दिल्ली में एक संवैधानिक पीठ और चार अलग-अलग जगहों पर अभिशून्य पीठ स्थापित करने की अनुशंसा की है.

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हाथ रिक्शावाले धीमी मौत मर रहे हैं

कोलकाता की सड़कों से हाथ रिक्शा हटाने की अब कोई हड़बड़ी नहीं दिखती. शायद अगले विधानसभा चुनाव तक सरकार को इसकी ज़रूरत नहीं लगती. कभी हावड़ा पुल के साथ-साथ हाथ रिक्शा को भी कोलकाता की पहचान के तौर पर प्रस्तुत किया जाता था. गणतंत्र दिवस की झांकियों में गनेसी अपनी टुनटुनिया गाड़ी लिए राजपथ पर टहलता दिखता था.

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