अन्ना का क़द मीडिया से बहुत बड़ा है

दिल्ली में अन्ना ने यह घोषणा की कि मैं जनलोकपाल के लिए अपने गांव रालेगण सिद्धी में अनिश्‍चितकालीन अनशन करने

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ज़िंदगी से प्यार करती हूँ-जीना चाहती हूँ

अगर आप आयरन लेडी इरोम शर्मिला को देखकर नहीं पिघलते और आपको शर्म नहीं आती, तो फिर आपको आत्म-निरीक्षण की

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यह आम आदमी की पार्टी है

भारतीय राजनीति का एक शर्मनाक पहलू यह है कि देश के राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों की कमान चंद परिवारों तक सीमित हो गई है. कुछ अपवाद हैं, लेकिन वे अपवाद ही हैं. अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश के प्रजातंत्र के लिए खतरा पैदा हो जाएगा. राजनीतिक दलों और देश के महान नेताओं की कृपा से यह खतरा हमारी चौखट पर दस्तक दे रहा है, लेकिन वे देश की जनता का मजाक उड़ा रहे हैं.

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जनरल वी के सिंह का आहृवान : भ्रष्‍टाचार के समूल नाश का संकल्‍प लीजिए

देश को बचाने के लिए आज़ादी के संकल्पों को याद करके भ्रष्टाचार के समूल नाश का संकल्प युवा पीढ़ी को लेना होगा, भ्रष्टाचार का कीड़ा देश की रूह को खाए जा रहा है. यह बात पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने अयोध्या-फैज़ाबाद दौरे के दौरान कही. उन्होंने कहा कि सेना को उच्च तकनीक का इस्तेमाल करके ख़ुद को मज़बूत करते रहना चाहिए. पड़ोसी देश चीन यदि अपनी सेना को मज़बूत करता है तो यह उसका हक़ है, हमें भी ख़ुद को तैयार करना होगा.

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अन्‍ना हजारे की नाराजगी का मतलब

अचानक ऐसी क्या बात हो गई कि टीम अन्ना और अन्ना के बीच मतभेद सामने आ गए, ऐसा क्या हो गया कि अन्ना इतने नाराज़ हो गए कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के लोगों से कहा कि न तो आप मेरे नाम का और न मेरे फोटो का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसमें दो बातें हैं. राजनीतिक दल बनाने की घोषणा जंतर-मंतर के आंदोलन के दौरान नहीं हुई थी.

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अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं.

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निगाहें भ्रष्‍टाचार पर, निशाना 2014

अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के बाक़ी सदस्य जब जुलाई 2012 के अनशन के लिए मांगों की लिस्ट तैयार कर रहे होंगे, तब उन्हें भी यह अहसास रहा होगा कि वे असल में क्या मांग रहे हैं? 15 दाग़ी मंत्रियों (टीम अन्ना के अनुसार), 160 से ज़्यादा दाग़ी सांसदों और कई पार्टी अध्यक्षों के खिला़फ जांच और कार्रवाई की मांग, अब ये मांगें मानी जाएंगी, उस पर कितना अमल हो पाएगा, इन सवालों के जवाब ढूंढने की बजाय इस बात का विश्लेषण होना चाहिए कि अगर ये मांगें नहीं मानी जाती हैं तब टीम अन्ना का क्या होगा, तब टीम अन्ना क्या करेगी?

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कैसे बचेगी गंगा-जमुनी तहजीब

गंगा की निर्मलता तभी संभव है, जब गंगा को अविरल बहने दिया जाए. यह एक ऐसा तथ्य है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है, लेकिन गंगा की स़फाई के नाम पर पिछले 20 सालों में हज़ारों करोड़ रुपये बहा दिए गए और नतीजे के नाम पर कुछ नहीं मिला. एक ओर स़फाई के नाम पर पैसों की लूटखसोट चलती रही और दूसरी ओर गंगा पर बांध बना-बनाकर उसके प्रवाह को थामने की साजिश होती रही.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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बिगड़े रिश्‍ते, बिगड़ी अर्थव्‍यवस्‍था

अब प्रणब मुखर्जी के दूसरे मंत्रियों और प्रधानमंत्री से रिश्ते की बात करें. वित्त मंत्री माना जाता है कि आम तौर पर कैबिनेट में दूसरे नंबर की पोजीशन रखता है. वित्त मंत्रालय इन दिनों मुख्य मंत्रालय (की मिनिस्ट्री) हो गया है, क्योंकि हर पहलू का महत्वपूर्ण पहलू वित्त होता है, इसलिए बिना वित्त के क्लीयरेंस के कोई भी फैसला हो ही नहीं सकता.

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सेना के आंतरिक कार्यक्षेत्र में अनाधिकृत हस्‍तक्षेप

जिस तरह सेना के नेतृत्व में भ्रष्ट बैंकों, वित्तीय संस्थानों और उद्योगों की साझेदारी से ऊर्जा और अन्य कंपनियों के हितों के लिए अमेरिकी मीडिया व्यवसायिक घरानों का मुखपत्र बन गई थी, उसी तरह भारत में भी व्यवसायिक समूहों के स्वामित्व वाले टीवी चैनलों में नीरा राडिया टेप के केस के दौरान टीवी एंकर कॉर्पोरेट घरानों का रु़ख लोगों के सामने रख रहे थे.

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देश का लोकतंत्र और नौजवान

हमारा देश भूलने की विधा का महारथी है. किसी भी चीज़ को हम बहुत जल्दी और बहुत आसानी से भूल जाते हैं. इनमें भुलाने वाले विषय होते हैं, लेकिन वे विषय भी होते जिन्हें कभी भुलाना नहीं चाहिए, याद रखना चाहिए. यह भी कह सकते हैं कि हम अपने पुरुषार्थ को ही भूल जाते हैं. अन्ना हजारे की पूरी कहानी में कुछ ऐसा ही हुआ. अन्ना हजारे का साथ देश भर के लोगों ने दिया.

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हमारी सहिष्णुता कम हो रही है

प्रेसीडेंट बुश के ऊपर जूता क्या चला, सारी दुनिया में जूतों की बहार आ गई. हमारे देश में भी यह दूसरा या तीसरा वाक़िया है, जब राजनेताओं के ऊपर हमले हुए. जनार्दन द्विवेदी पर जूता फेंका गया और अब शरद पवार को एक शख्स ने थप्पड़ मारा. ये घटनाएं दो तरह के संकेत देती हैं. पहला संकेत यह है कि देश में लोकतांत्रिक मूल्यों से नौजवानों का भरोसा उठ रहा है. उन्हें यह लगता है कि धरना-प्रदर्शन, भूख हड़ताल, सिविल ना़फरमानी, ये शब्द बेमानी हो गए हैं और इनके ऊपर अमल करने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है.

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सब्सिडी का लाभ किसे मिलता है

क्‍या भाजपा के ग़लत नेता अनशन पर गए, अनशन पर जिन्हें जाना चाहिए था, वे नहीं गए, बल्कि किसी दूसरे नेता ने अनशन कर लिया? समाचारों में यही आ रहा है कि नितिन गडकरी को अपना मोटापा घटाने के लिए उपाय करने जाना था, जो दु:खद है और हास्यास्पद भी. जैसा कि मुझे ध्यान है, जब गडकरी संघ की शाखा में हाफ पैंट पहन कर व्यायाम करने जाते थे, तब वह बिल्कुल ठीक थे, लेकिन भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें भी नेताओं वाला रोग लग गया.

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टीम अन्ना के ख़िलाफ़ सरकार की साज़िश

अन्ना टीम पर अचानक आरोपों की बरसात होने लगी है. पहले टीम में फूट डाली गई. एक बार फिर से सीडी प्रकरण के बहाने भूषण पिता-पुत्र पर आरोप लगाने की तैयारी है. इस सबसे अलग, अब इस आंदोलन को विदेशी पैसों से चलाए जाने की बात कही जा रही है. कहा जा रहा है कि यह आंदोलन फोर्ड फाउंडेशन और विश्व बैंक की मदद से चलाया गया.

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अन्ना का अनशन: एक कहानी बेहतर मैनेजमेंट की

जरा सोचिए, आख़िर एक फकीर के आंदोलन की आग इतने कम समय में पूरे देश भर में कैसे फैल गई? क्यों सरकार को बार-बार झुकना पड़ रहा है? क्यों पुलिस वालों के तेवर भी अन्ना के आंदोलन के दौरान नरम हो जाते हैं? क्यों मंत्रियों तक की बोलती बंद हो जाती है?

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अन्ना, अनशन और अवाम

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के मंडी हाउस स्थित नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) के समीप अचानक एक ऑटो रिक्शा वहां खड़े कुछ लोगों के पास आकर रुका. ऑटो चालक ने उनसे पूछा, क्या रामलीला मैदान जाएंगे? वहां मौजूद लोगों ने आश्चर्य भरे लहज़े में कहा, हां जाना तो है, लेकिन कितने पैसे लोगे? इस पर ऑटो चालक बोला, साहब, कमाना-खाना तो रोज है, लेकिन अन्ना जी की मुहिम में हमारा भी कुछ योगदान होना चाहिए.

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देश भर से आई आवाज़: मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के ख़िला़फ अन्ना हजारे का आमरण अनशन किसी कुंभ से कम नहीं है. जिस तरह कुंभ किसी एक जगह पर न होकर प्रयाग से लेकर नासिक, उज्जैन और हरिद्वार में संपन्न होता है

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नव उदारवाद और भ्रष्टाचार विरोध की राजनीति

हम यह नहीं कहते कि पूर्व प्रचलित पदों, अवधारणाओं एवं तरीक़ों का मौजूदा संदर्भों में नया अर्थ और प्रयोग नहीं हो सकता, बल्कि वह होना चाहिए, लेकिन अपने स्वार्थवश या अपनी कमज़ोरियों पर पर्दा डालने के लिए इनका रूप बिगाड़ देना इनके अवधारणाओं को लांछित करने के साथ-साथ संघर्ष की परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति द्रोह है.

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ऐसे खत्म हुआ अन्ना का अनशन

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने एक मंत्रिमंडलीय साथी से कहा कि अन्ना बदमाश हैं और उनके साथी बदमाशी कर रहे हैं. आम तौर पर मनमोहन सिंह इस भाषा के लिए जाने नहीं जाते, लेकिन शायद देश में चल रहे अन्ना हजारे के आंदोलन का दबाव इतना था कि वह भाषा की शालीनता भूल गए. उसी तरह, जैसे मनीष तिवारी उम्र और राजनैतिक शिष्टाचार के सामान्य नियम भूलकर अन्ना हजारे को तुम और भ्रष्टाचार में लिप्त बता बैठे.

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टीम अन्‍नाः मिलिए पर्दे के पीछे के नायकों से

आप जैसे ही अरविंद केजरीवाल के दफ्तर ग़ाज़ियाबाद के कौशांबी स्थित पीसीआरएफ पहुंचते हैं, वहां आपकों कई युवा लैपटॉप से जूझते नज़र आएंगे. कोई मोबाइल पर निर्देश देता नज़र आएगा तो कोई बैनर-पोस्टर संभालता हुआ. दरअसल ये सभी इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले चल रहे जन लोकपाल आंदोलन की तैयारी में व्यस्त हैं.

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यह पूरे देश का आंदोलन है

अन्ना हज़ारे इतिहास में सुनहरा पन्ना बनकर जुड़ गए हैं. आज़ादी के बाद कई नेताओं ने आंदोलन किए, लोग उनके साथ जुड़े, उन्होंने अपनी बातें भी मनवाईं. अनशन हुए, आमरण अनशन हुए, उनमें लोग शहीद भी हुए, लेकिन अन्ना का क़िस्सा इन सबसे अलग है. एक ऐसा आदमी, जो देश में कहीं घूमा नहीं, जिसने राज्यों में सभाएं नहीं कीं, लोगों को तैयार नहीं किया, उनके पास अपना मुद्दा नहीं पहुंचाया, कोई संगठन नहीं बनाया, उसके साथ आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा जनसैलाब खड़ा है.

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अन्ना का प्रस्ताविक आमरण अनशन: सरकारी दमन से निपटने की तैयारी क्या है

अन्ना ने मज़बूत लोकपाल बिल पेश न किए जाने की स्थिति में आगामी 16 अगस्त से आमरण अनशन की घोषणा की है. सरकार ने अनशन न करने देने का मन बना रखा है. बाबा रामदेव और उनके साथी आंदोलनकारियों को लाठी के दम पर खदेड़ कर सरकार ने सा़फ कर दिया है कि उसे अन्ना और उनके समर्थकों को खदेड़ने में कोई वक़्त नहीं लगेगा.

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इनके लिए अनशन कौन करेगा

यह ज़रूरी नहीं है कि सभी अनशन प्रभावकारी साबित हों या वे नैतिक दृष्टि से सही माने जाएं. जब ब्रिटिशों ने अछूतों (जैसा कि उन्हें उस व़क्त कहा जाता था) के लिए अलग निर्वाचक मंडल की घोषणा की, तब गांधी जी ने अनशन किया था.

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अन्‍ना की दस गलतियां

अन्ना का आंदोलन एक अच्छे लोकपाल के गठन को लेकर हुआ था. पांच दिनों तक जंतर-मंतर पर अन्ना का अनशन चला, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि अपार जन समर्थन मिलने के बाद भी अन्ना और उनकी टीम ने सरकार से समझौते के व़क्त जो मांगें रखीं, वे ठीक उस कहावत की तरह थीं कि खोदा पहाड़, निकली चुहिया.

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संत निगमानंद की मौत पर राजनीति

गंगा को बचाने के लिए जान देने वाले संत निगमानंद की मौत पर राजनीति शुरू हो गई है. इस मामले को लेकर जहां प्रदेश की निशंक सरकार पर सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं, वहीं संत के परिवार वालों ने मातृ सदन पर भी कई गंभीर आरोप लगाए हैं. संत के परिवार वालों का कहना है कि निगमानंद पर अनशन का दबाव था.

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अन्‍ना का आंदोलनः कुछ सवालों के जवाब जरूरी हैं

अन्ना का आंदोलन किस दिशा में जा रहा है? टीम अन्ना अपने बयानों में, अपनी बातों में और अपने विचारों में कितनी समानता रखती है? अन्ना रामदेव के साथ रामलीला मैदान में बैठने की बात करते हैं तो स्वामी अग्निवेश इसका विरोध करते हैं. फिर अगले ही दिन अन्ना रामलीला मैदान में रामदेव के सत्याग्रह पर हुई पुलिसिया कार्रवाई के विरोध में 8 जून को जंतर-मंतर पर एक दिन के अनशन की घोषणा करते हैं.

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आरोप लगाने से ज़्यादा कठिन है शासन करना

वर्ष 1970 की बात है. एडवर्ड हीथ प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हैरल्ड विल्सन के ख़िला़फ खड़े थे और लोगों से यह वादा कर रहे थे कि मैं महंगाई कम कर दूंगा. जब वह जीत गए, प्रधानमंत्री बन गए, तब उन्हें पता चला कि विपक्ष में रहकर आरोप लगाने से ज़्यादा कठिन सत्ता में आने के बाद काम करना होता है, अपने वादों को पूरा करना होता है.

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राजनीतिज्ञों से डरना चाहिए

राजनीतिज्ञों से डरना चाहिए. पिछले एक महीने की घटी घटनाएं तो यही कह रही हैं. अब वह राजनीतिज्ञ चाहे समाजवादी पार्टी का हो, भारतीय जनता पार्टी का हो या फिर वह कांग्रेस का हो. राजनीतिज्ञ कब क्या करे, कैसे करे, इसके उदाहरण पिछले एक महीने में हमारे सामने बहुत ही खुलेपन के साथ आए हैं.

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पश्चिम बंगालः अब तो फैसले की घडी़ है

विधानसभा चुनाव अब आख़िर मुक़ाम पर हैं. फैसले की घड़ी क़रीब है. दो-तीन सालों के रुझानों और उम्मीद के आधार पर हम एक निष्कर्ष तक पहुंचते रहे हैं, पर मामला स़िर्फ 5-7 प्रतिशत वोटों के इधर-उधर होने का है. राष्ट्रीय और प्रांतीय नेताओं द्वारा धुआंधार प्रचार जारी है.

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